Fast Delivery: जैप्‍टो, जोमैटो, बिस्ट्रो, स्विगी और ब्लिंकिट जैसी सर्विसेज के तहत कंपनियां 10 मिनट में खाना पहुंचाने की होड़ में हैं. इस विषय पर अभी हाल ही में आप आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने संसद में 10 मिनट की डिलिवरी सेवाओं पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है क्योंकि यह गिग वर्कर्स (डिलिवरी पार्टनर्स) पर अत्यधिक दबाव डालता है, जिस से वे अपनी जान जोखिम में डालते हैं और ग्राहक दुर्व्यवहार का सामना करते हैं.

उन्होंने इसे जुल्म बताते हुए कहा कि ये लोग रोबोट नहीं, बल्कि किसी के पिता, पति या बेटे हैं, जिन के लिए सुरक्षित काम करने की स्थिति और अधिकार सुनिश्चित किए जाने चाहिए. सवाल ग्राहकों पर भी उठ रहे हैं  कि 10 मिनट में डिलिवरी पाने का और्डर देना और अगर डिलिवरी बौय को ट्रैफिक की वजह से देरी हो जाएं तो सामान लेने से इनकार करना उस के साथ ग्राहक का अमानवीय व्यवहार दर्शाता है क्योंकि कंपनी वह पैसे डिलिवरी बौय की सैलरी से काटती है इसलिए उसे समय से डिलिवरी देना बहुत जरूरी हो जाता है. इस वजह से दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं? क्या यह सही है?

पहली गलती- कंपनी ने कहा क्यों कि हम 10 मिनट में डिलिवरी देंगे?

यहां गलती कस्टमर की नहीं है, बल्कि कंपनी की है. अगर 10 मिनट में पहुंचना और सामान पहुंचना मुश्किल है, अमानवीय है तो इस में गलती कंपनी की है. उस ने ऐसा रूल बनाया ही क्यों? 10 मिनट के बजाएं आधे घंटे में डिलिवरी होगी ऐसा भी रूल हो सकता था लेकिन इस में कंपनी का अपना फायदा है. वह अपनी मार्केटिंग कर रही है इसलिए ऐसे रूल बनाए और बदनाम ग्राहकों को कर रही है.

दूसरी गलती – 10 मिनट कहते हो लेकिन लिख कर आता है डिलिवरी 20 मिनट में क्यों?

ये कंपनियां हल्ला तो खूब मचती हैं कि हम 10 मिनट में डिलिवरी देंगे, मगर जब जब और्डर करो तो लिख कर आता है कि जीपीएस के हिसाब से 22 मिनट में डिलिवरी मिलेगी. ऐसा क्लेम करना ही क्यों जिसे कंपनी पूरा ही न कर पाएं. फिर वह 30 मिनट में पहुंचता है तो लोग लड़ाई करते हैं.

दरअसल, कंपनी खुद कस्टमर को मिसगाइड कर रही है तो वे तो शोर मचाएंगे ही. कंपनी 10 मिनट का क्लेम करती ही क्यों है? वे यह क्यों नहीं कहते कि डिलिवरी होने में आधा घंटा लगेगा.

10 मिनट एक ब्रैंडिंग और मार्केटिंग स्लोगन है

’10 मिनट’ एक ब्रैंडिंग और मार्केटिंग स्लोगन है. यह ग्राहकों को आकर्षित करने और बाजार में अपनी पहचान बनाने के लिए कंपनी द्वारा दिया गया एक आदर्श लक्ष्य है.

लेकिन ’20 मिनट’ वह वास्तविक समय अनुमान (Estimated Time of Arrival – ETA) है जो ऐप वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर दिखाता है. अगर आने में टाइम लग रहा है तो औनटाइम कहना ही क्यों?

तीसरी गलती- ऐसा प्रोमिस करना ही क्यों जो अनलाइकली है?

हम तो भारतीय हैं जो 3 दिनों तक भी खाने का इंतजार कर सकते हैं. ऐसी क्या आफत है जो कंपनी को 10 मिनट कहना पड़ा. आप गलत बात कर के कस्टमर को बहकाते क्यों हो. आप यह भी कह सकते हैं कि 40 मिनट में आएगा और 30 मिनट में पहुंचा दो, यह ज्यादा अच्छा रहेगा. इस में सड़कें भी देखनी पड़ेंगी जिस जगह जाना है वहां की सड़क खराब होगी, जाम होगा तो डिलिवरी बौय 10 मिनट में पहुंच ही नहीं सकता. इस के आलावा जिस सोसायटी में जा रहा हैं वहां वाहन फ्लैट्स की नंबरिंग सही नहीं है तो भी घर ढूंढ़ने में टाइम लगेगा. वहां लिफ्ट खराब है तो भी पहुंचने में टाइम लगेगा. फिर ऐसे दावे कंपनी करती ही क्यों है जिन्हें पूरा किया ही न जा सकें.

10 मिनट में डिलिवरी का वादा एक बिजनैस कंपीटिशन और कस्टमर के  मनोविज्ञान की सोचीसमझी रणनीति है.

जब डिलीवरी इतनी तेज होती है, तो ग्राहक छोटीछोटी चीजों को तुरंत और्डर कर देते हैं, जिस के बारे में वे 30-40 मिनट की डिलिवरी के लिए शायद सोचते भी नहीं. यह खरीदारी की आवृत्ति और मात्रा को बढ़ाता है.

कंपनी ने 10 मिनट की डिलीवरी का वादा मार्केट शेयर पर कब्जा करने, ग्राहकों को तुरंत आकर्षित करने और निवेशकों को प्रभावित करने के लिए किया, भले ही इस मौडल को बनाए रखने के लिए भारी परिचालन लागत और नैतिक चुनौतियां क्यों न हों.

10 मिनट की डिलीवरी का मौडल कंपनी द्वारा स्वयं चुना गया है. यह उन की प्रतिस्पर्धात्मक रणनीति का हिस्सा है.

कंपनियां खुद को अल्ट्रा फास्ट ब्रैंड के रूप में स्थापित करना चाहती है

जब मार्किट में स्वीगी, इंस्टामार्ट और ब्लिंकिट (पहले ग्रोफर्स) जैसी कंपनियां सभी कंपीटिशन में हों तो बाजार में अपनी पहचान बनाने के लिए कुछ असाधारण करना जरूरी हो जाता है. सच तो यह है कि 10 मिनट की डिलिवरी ने इन कंपनी को तुरंत सुर्खियों में ला दिया और उन्हें एक अल्ट्रा फास्ट ब्रैंड के रूप में स्थापित किया.

कंपनी का औपरेशनल स्ट्रक्चर ही खराब है

कंपनी बड़ेबड़े वादे कस्टमर से करती है कि 10 मिनट में डिलिवरी होगी लेकिन जब ऐसा नहीं हो पता तो ठीकरा अपने ही कर्मचारियों के सिर पर फोड़ दिया जाता है और उन की सैलरी काट ली जाती जबकि सच तो यह है कि इस वादे को पूरा करने के लिए कंपनी को छोटे, स्थानीय डार्क स्टोर्स बनाने पड़ते हैं. डार्क स्टोर का आंतरिक लेआउट ऐसा होना चाहिए कि पिकिंग स्टाफ 2 मिनट के भीतर और्डर तैयार कर सके. यदि लेआउट खराब है, तो पैकिंग में अनावश्यक देरी होती है.

इस के आलावा फास्ट डिलिवरी का मतलब है कि स्टोर में हर समय पर्याप्त स्टौक होना चाहिए. यदि लोकप्रिय आइटम स्टौक में नहीं हैं, तो और्डर रद्द करना पड़ता है, जो परिचालन की विफलता है.

10 मिनट के लक्ष्य को पूरा करने के लिए कंपनी डिलिवरी एजेंटों (राइडर्स) पर अमानवीय दबाव डालती है. इस से सुरक्षा जोखिम और यातायात नियमों के उल्लंघन होते हैं. किसी भी दुर्घटना या त्रुटि की जड़ इस अति तेज मौडल में होती है जो कंपनियों के द्वारा केवल अपना मुनाफा कमाने के लिए किया जाता है.

कंपनी की खराब शेड्यूलिंग भी देरी की वजह बनती है

पीक आवर्स के दौरान राइडर्स की संख्या कम होना और औफ पीक आवर्स में अधिक होना, खराब शेड्यूलिंग को दर्शाता है, जिस से डिलिवरी में अनावश्यक देरी होती है और गलती डिलिवरी बौय की बता कर उस की सैलरी काट ली जाती है. इसलिए यह कस्टमर का नहीं बल्कि कंपनियों का अमानवीय व्यवहार है.

यदि स्टोर पर और्डर की संख्या अधिक है (पीक आवर्स में), तो पिकिंग और पैकिंग में 5-7 मिनट लग सकते हैं

कंपनी के द्वारा अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड सेहत के लिए नुकसानदायक है

10 मिनट में खाना पहुंचाने के लिए उसे 3 मिनट या उस से कम समय में पकाना होगा. यह तभी मुमकिन है जब अल्ट्रा प्रोसेस्ड, रैडी टू ईट खाना दिया जाए. पहले से पका, फ्रोजन, माइक्रोवेव किए हुए खाने को और फिर डिलिवर किया जता है.

इस से कैंसर का खतरा 12% बढ़ जाता है. हृदयरोग का खतरा 10% बढ़ता है. मोटापे की समस्या बढ़ती है, जो 27.8% भारतीय वयस्कों को प्रभावित करती है. शुगर लेवल बढ़ता है. इस से डायबिटीज का खतरा रहता है. ट्रांस फैट की मात्रा ज्‍यादा होती है, जो दिल की बीमारी से जुड़ा है.

इसलिए समय भले ही थोड़ा ज्यादा लग जाएं लेकिन कस्टमर की सेहत के साथ इस तरह खिलवाड़ करना किसी भी लिहाज से सही नहीं है. सस्ते और अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाने में ज्‍यादा चीनी और पाम औयल होने के शरीर को बहुत नुकसान पहुंचता है. इसलिए यह जरूरी है कि फूड डिलिवरी कंपनियां सुविधा से ज्‍यादा गुणवत्ता को प्राथमिकता दें.

इंस्टैंट डिलिवरी के नाम पर कंपनियां कई तरह के हैंडलिंग चार्ज वसूल रही हैं

हैंडलिंग चार्ज, प्लेटफौर्म फीस, प्राइस सर्ज, रेन फी जैसे तमाम चार्ज वसूले जा रहे हैं. मांग अधिक होने पर (जैसे शाम या बारिश के दौरान), कंपनी अतिरिक्त पीक टाइम या सर्च शुल्क लगाती हैं. यह सीधे तौर पर  राइडर को उस समय तेजी से डिलिवरी करने के लिए दिया जाने वाला अतिरिक्त प्रोत्साहन होता है, जिसे ग्राहक से वसूला जाता है.

10 मिनट की डिलिवरी के लिए छोटेछोटे डार्क स्टोर को हर 2-3 किलोमीटर पर खोलना पड़ता है और उन्हें 24/7 स्टौक करना पड़ता है. इस का किराया और रखरखाव बहुत महंगा होता है. शुरुआती चरणों में कंपनियां फंडिंग पर चलती हैं, लेकिन जैसेजैसे वे बड़ी होती हैं, निवेशकों का दबाव मुनाफा कमाने पर बढ़ जाता है. इसलिए वे लागत को ग्राहक पर डालना शुरू कर देती हैं और हम और आप घर बैठे मिल रही इन सुविधाओं के चलते और अपने आलसीपन के चलते कि छोड़ो अब कौन दूध लेने मार्केट तक जाएं जैसी छोटीछोटी जरूरतों के लिए इन आप से और्डर कर रहे है और ये कंपनियां इस के लिए हम से मनमाना वसूल रही हैं और साथ ही 10 मिनट में की जाने वाली डिलिवरी के लिए डिलिवरी बौय पर होने वाले अमानवीय व्यवहार का ठीकरा भी हमारे ही सिर पर फोड़ रही है जोकि बिलकुल गलत है.

जो सिस्टम अवलेबल होगा हम तो उस से चलेंगे

लेकिन हमारा सवाल है यह 10 मिनट में डिलिवरी देने का वादा और स्कीम कंपनी की तरफ से चलाया गया है तो इसे पूरा करने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होनी चाहिए. अगर तय समय से डिलिवरी नहीं हो रही तो इस में ग्राहक की गलती नहीं है बल्कि ऐसा अमानवीय दवा करने वाली कंपनी की गलती है? कंपनी ने अपने मार्केटिंग मौडल के चलते ये प्रलोभन जनता को दिया है ताकि उन की कंपनी चल सकें, ज्यादा मुनाफा कमा सकें. इस में फायदा केवल कंपनियों का है.

जब कंपनी 10 मिनट का विकल्प देती है, तो ग्राहक उसे चुनता है क्योंकि वह उपलब्ध है. ग्राहक यह नहीं कहता कि मुझे 10 मिनट में दो, भले ही राइडर की जान खतरे में पड़ जाएं.वह बस विकल्प का उपयोग कर रहा है. इसलिए ग्राहक को कोसने के बजाय कंपनी को कोसें.

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