सीएएमएस की ‘गोइंग बियान्ड द बाक्स’ रिपोर्ट ने एक ऐसी सच्चाई सामने रखी है जो पिछले कई मिथ तोड़ रही है. फाइनेंशियल ईयर 2026 में महिला इन्वेस्टर्स का कुल एयूएम 11% से बढक़र 11.3 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया है. खास बात ये कि पुरुष इन्वेस्टर की ग्रोथ भी 11%; ही रही. आंकड़े चौंकाते हैं कि कुल 41.50 करोड़ इन्वेस्टर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ 32%; है. फिर भी ये कुल व्यक्तिगत एयूएम का 37%; और कुल ग्रास इनफ्लो का 35%; कंट्रोल कर रही हैं. मतलब साफ है प्रति इन्वेस्टर औसत इन्वेस्टमेंट के मामले में महिलाएं पुरुषों से आगे हैं. कमसंख्या में होने के बावजूद ज्यादा पैसा लगा रही हैं. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि फाइनेंशियल लिटरेसी बढऩे और डिजिटल प्लेटफार्म की पहुंच से महिलाएं ‘सेविंग’ से ‘इन्वेस्टिंग’ पर शिफ्ट हो रही हैं. स्ढ्ढक्क से लेकर इक्विटी तक हर सेगमेंट में हिस्सेदारी बढ़ रही है. घर रसोई से बाहर निकलकर महिलाएं अब पोर्टफोलियो भी संभाल रही हैं. ये ट्रेंड बताता है कि अगला दशक महिला इन्वेस्टर्स का होगा.
एक्टिव एसआईपी में महिलाओं की 29%; हिस्सेदारी इस बात का सबूत है कि अब महिलाएं इन्वेस्टमेंट को ‘बचत का विकल्प’ नहीं बल्कि ‘वेल्थ क्रिएशन का जरिया’ मान रही हैं.
बड़े मिथ जो टूटे हैं
1. मिथ : महिलाएं रिस्क नहीं लेतीं
सच्चाई : महिलाओं के कुल एयूएम का 82% इक्विटी स्कीम्स में है. केवल 9%; डेट में. वित्त वर्ष 2025 से 26 के बीच हाइब्रिड में 16%;, इक्विटी में 10%; की ग्रोथ हुई जबकि डेट में 1% की गिरावट आई. यानी महिलाएं अब कैलकुलेटेड रिस्क लेने से नहीं डर रहीं.
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