Sexual Exploitation: पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के हाथरस में शर्मसार करने वाले एक मामले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया.हाथरस के पीसी बागला डिगरी कालेज के प्रोफेसर रजनीश कुमार को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है.
प्रोफेसर रजनीश की 50 से भी अधिक वीडियो सामने आई है, जिस में वह डिगरी कालेज में पढ़ने वाली छात्राओं के साथअश्लील हरकतें करता नजर आ रहा है. इस डिगरी कालेज में पढ़ने वाली छात्राओं को आरोपी प्रोफेसर परीक्षा में अच्छे नंबर और सरकारी नौकरी दिलाने का झांसा दे कर उन के साथ रेप की घटनाओं को अंजाम देता था और उन का अश्लील वीडियो व फोटो निकाल कर उन्हें बदनाम करने की धमकी देता था. जब इस का वीडियोज सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स पर वायरल होने लगे तो शहर में चर्चा शुरू हो गई. पुलिस ने आरोपी प्रोफेसर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उस की तलाश शुरू कर दी. प्रोफेसर पर आरोप है कि वह 20 साल से छात्राओं का शोषण कर रहा है.
यह कैसी सोच
बहुत पहले से चली आ रही एक पौराणिक सोच है कि लड़कियां तो चूल्हेचौके के लिए ही बनी हैं. अगर वे पढ़लिख गईं, अपने पैरों पर खड़ी हो गईं तो इस पुरुष प्रधान समाज का क्या होगा? ये औरतों को अपनी दासी बना कर कैसे रखेंगे?
दरअसल, यह सब लड़कियों के खिलाफ एक साजिश है कि वे अच्छी शिक्षा न लें ताकि उन का कैरियर ही न बन पाएं, क्योंकि अगर कैरियर में आगे बढ़ कर वे पुरुषों के साथ बराबर का कमाने लगीं तो वे घर की जिम्मेदारी अकेले नहीं निभाना चाहेंगी, उन्हें इस में पुरुषों का बराबर का सहयोग चाहिए होगा, जो वे नहीं होने देना चाहते.
लड़कियां अपने पैरों पर खड़ी होंगी तो पुरुषों का अन्याय नहीं सहेंगी
आज हर जगह अतुल सुभाष और मेरठ कांड, जिस में पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर पति की हत्या कर दी और उसे नीले ड्रम में बंद कर दिया चर्चा का विषय है. हमेशा से पुरुष महिलाओं की बलि देता आया है, कभी समाज के नाम पर और कभी परिवार के नाम पर. दहेज के लिए भी लड़कियां शुरू से ससुरालों में जलाई जाती रही हैं. जब लड़किओं पर सदियों से अत्याचार हो रहे थे तब यह समाज कहां था? महिलाओं के द्वारा किए गए इन अपराधों को सही नहीं माना जा सकता लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी होंगी तो अत्याचार के खिलाफ आवाज तो वे उठाएंगी ही और शायद यही बात अब रास नहीं आ रही.
यही वजह है कि कुछ लोगों का कहना है कि लड़कियों को ज्यादा नहीं पढ़ाना चाहिए, क्योंकि अगर वे ज्यादा पढ़ लेंगी तो फिर ससुराल में काम नहीं करेंगी. उन का संसार बस नहीं पाएगा. तलाक के केस बढ़ेंगे, क्योंकि अब वे पुरुषों की दासी बनने से इनकार जो करने लगी हैं.
ऐसे बहुत कारणों से लोग आज भी लड़कियों को पढ़ाना नहीं चाहते हैं. बस, उतना ही पढ़ाते हैं जितने में शादी हो जाए.
लड़कियां पढ़ाई छोड़ने को मजबूर क्यों
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) के मुताबिक लगभग 5 में से 1 लड़की अभी भी निम्न माध्यमिक की पढ़ाई पूरी नहीं कर पा रही हैं. लगभग 10 में से 4 लड़कियां आज भी उच्च माध्यमिक विद्यालय की पढ़ाई पूरी नहीं कर पा रही हैं. कुछ क्षेत्रों में तो यह संख्या और भी निराशाजनक है. भारत में प्राइमरी स्कूल की शिक्षा पूरी करने के बाद लगभग 65% लड़कियों ने स्कूल छोड़ दिया. ये आंकड़े शिक्षा मंत्रालय ने अपनी पहली ‘ग्रामीण भारत में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति’ रिपोर्ट में बताए हैं. हालांकि इस पढ़ाई छोड़ने के पीछे यौन हिंसा के अलावा और भी कई बड़े कारण हैं लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इन बच्चियों के मातापिता के मन का सब से बड़ा डर जरूर है.
टीचर्स के द्वारा यौन शोषण पर शिकायतें कम क्यों दर्ज कराई जाती हैं
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लड़कियों को डर होता है कि यह पता चलने पर कहीं उन की पढ़ाई ही न छुङवा दें. कई बार उन की आवाज इज्जत के नाम पर भी दबा दी जाती है. अगर समाज में पता चल गया कि बेटी के साथ गलत हुआ है तो उस से शादी कौन करेगा. जैसेकि 2023 में उत्तर प्रदेश का उन्नाव, एक सरकारी स्कूल को लेकर सुर्खियों में आया. यहां स्कूल के हेडमास्टर पर कम से कम 18 नाबालिग छात्राओं ने कथित तौर पर यौन शोषण के आरोप लगाए.
इस से पहले हरियाणा के जींद से भी कुछ ऐसी ही खबर सामने आई थी, जहां 60 स्कूली छात्राओं के साथ यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया था.
लेकिन जींद के मामले में भी यह आरोप लगा कि पुलिस ने मामले में देरी की और 1 महीने बाद जा कर प्रिंसिपल के खिलाफ मामला दर्ज किया गया.
उन्नाव मामले में भी यही सुनने को मिला कि लड़कियां लंबे समय से परेशान थीं और वे अभी भी काफी तनाव में हैं. यह सब उन के लिए इतना आसान नहीं है क्योंकि यहां बात सिर्फ आगे बढ़ कर शिकायत करने की नहीं है, उन के सामने सब से बड़ा डर उन की पढ़ाई छूटने की भी है.
सरकारी या गैर सरकारी सभी बालिका छात्रावासों और बालगृहों की बदहाल स्थिति किसी से छिपी नहीं है. यहां कई बार अलगअलग तरह के मुजफ्फरपुर, देवरिया, कानपुर और आगरा समेत कई बालिका गृहकांड देश के सामने आ चुके हैं. कई बार आरोपी गिरफ्तार भी हुए, एकाध मामलों में सजा भी मिली, लेकिन इन सब में जो मुख्य मुद्दा सुरक्षा का है उस में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है क्योंकि इस ओर सरकार और महिला आयोग का ध्यान बिलकुल ही नहीं जाता, जब तक कुछ बड़ी घटना घटित नहीं हो जाती.
मातापिता के लिए लड़कियों की सुरक्षा एक बड़ा सवाल
आज भी दूरदराज के गांवों में कई किलोमीटर पैदल चल कर पढ़ने जाना पड़ता है. वहां अकेले उन्हें अपनी बेटियों को भेजने से डर भी लगता है. कभी कहीं किसी लड़की के साथ हुई शोषण व उत्पीड़न की घटनाएं बाकी लड़कियों को भी घर में कैद होने को मजबूर कर देती हैं. कोलकाता में मैडिकल की छात्र के साथ हुआ रेप केस भी इस का अपवाद नहीं है.
इस तरह की घटनाएं होती हैं तो पढ़ेलिखे शहरों में रहने वाले मातापिता भी अपनी बेटियों की सुरक्षा को ले कर चिंता में आ जाते हैं और उन्हें लगता है कि इतना पढ़ालिखा कर क्या करना है, शादी समय से कर दो बस, जिम्मेदारी खत्म.
लड़कियों की शादी कर घर बसाना पढ़ाई करने से ज्यादा जरूरी क्यों
वाकई आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लड़के और लड़कियों में फर्क किया जाता है. यहां लड़का जितना चाहे, जो चाहे पढ़ सकता है लेकिन लड़की नहीं. यहां लड़की अपनी मरजी से कुछ नहीं कर सकती है. यहां तक कि पढ़ाई भी नहीं. उन को क्या पढ़ना है और कितना पढ़ना है, यह मांबाप और रिश्तेदार तय करते हैं. लड़की को पढ़ाया तब तक जाता है जब तक कोई अच्छा लड़का न मिल जाए.
तलाक शिक्षा के कारण नहीं हो रहे
समय आगे बढ़ गया पर लोग उसी पिछड़ी हुई सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं. यह तो वही बात हुई कि अगर सहूंगी तो कमजोर और बोला तो बदतमीज. शहरों में लड़की सब को कामकाजी ही चाहिए लेकिन गिलासभर पानी खुद उठा कर नहीं पीएंगे जनाब, यह सोच ही तलाक की जड़ है.
पतिपत्नी दोनों कमा रहे हैं लेकिन पति चाहता है कि पत्नी घरबाहर दोनों संभाले. आधे से ज्यादा घरों में यही फसाद की जड़ है पर आज की महिला पढ़ीलिखी है, अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है या खड़े होने की कोशिश कर रही है पर इलजाम यही लगता है कि ज्यादा पढ़लिख गई इसलिए दिमाग खराब है इस का. सामने से कितना भी दिखा ले पुरुष कि वह मौर्डन है पर कहीं न कहीं यही सोच, यही धारणा आज भी पनप रही है. आज हर किसी को अपने बराबर पढ़ीलिखी लड़की चाहिए शादी के लिए, क्योंकि सोशल मीडिया पर ढिंढोरा जो पीटना है पर वाइफ की सोच का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में भी चाहिए .
लड़कियों के पिछड़ने का कारण लोगों की संक्रीण मानसिकता है
आज के वक्त में लड़िकयों के पिछड़ने का सब से बड़ा कारण है लोगों की मानसिकता है. दिनप्रतिदिन लड़कियों के साथ बढ़ते अपराध (बलात्कार), लड़के और लड़कियों के प्रति सामाजिक भेदभाव के कारण अपने सपनों से मुंह मोड़ना पड़ रहा है.
पंडेपुजारी भी नहीं चाहते लड़कियां पढ़ें
पंडेपुजारियों का हमारे घरों में बहुत बड़ा रोल है. वे चाहते हैं कि महिलाएं बस किचन में घुसी रहें और अपने बाकी के बचे हुए दिन में हमारे प्रवचन सुनने आएं और हमारी दुकाने चलवाएं. लेकिन अगर वे पढ़लिख कर नौकरीपेशा बन गईं तो उन के पास हमें देने के लिए समय ही नहीं होगा. अगर ऐसा हुआ तो पंडितों का महिलाओं को मुर्ख बना कर पैसे ऐंठने का धंधा तो चौपट हो ही जाएगा.
इसलिए लड़कियों के ड्रौपआउट को कम करने के लिए सब से पहले सुरक्षा के पुख्ते इंतजाम के साथ ही अपराधियों पर सख्त काररवाई की भी जरूरत है, जिस से लड़कियों के हौसले बुलंद हो सकें. मांबाप भी निश्चिंत हो सकें और लड़कियां अपनी पढ़ाई पूरी कर आजादी से जीवन जी सकें.
सरकारों को चाहिए कि वे लोगों को जागरूक करने के साथसाथ अपराध पर लगाम लगाएं ताकि लड़कियां बिना डरेसहमे अकेली चल सकें. घर वाले न भी ज्यादा पढ़ाना चाहें तो भी वे खुद अकेली जा कर, पैसे कमा कर पढ़ सकें. सरकार ने हर जगह कालेज तो दिए हैं मगर कालेज जाने वाले माहौल नहीं दिए.
एक शिक्षित लड़की की अगर कम उम्र में शादी नहीं की जाए तो वह भारत में शिक्षा क्षेत्र में लेखक, शिक्षक, वकील, डाक्टर और वैज्ञानिक के रूप में देश की सेवा कर सकती है. वह बिना किसी संदेह के अपने परिवार को एक पुरुष की तुलना में अधिक कुशलता से संभाल सकती है. एक आदमी को शिक्षित कर के हम केवल राष्ट्र का कुछ हिस्सा शिक्षित कर सकते हैं जबकि एक महिला को शिक्षित कर के पूरे देश को शिक्षित किया जा सकता है. इसलिए भारत में शिक्षा का अधिकार न केवल पुरुष को बल्कि महिलाओं को भी होना चाहिए.
वैदिक काल के बाद से लड़कियों की शिक्षा गैर जरूरी क्यों समझी जाने लगी
वैदिक काल के बाद से धीरेधीरे लड़कियों की शिक्षा गैर जरूरी समझी जाने लगी और मुगलकाल तक आतेआते वे घर की चारदीवारी में ही कैद हो कर रह गईं. इस के पीछे सोच यह थी कि जब विवाह कर के घर ही संभालना है तो पढ़ाई किसलिए? और फिर दहेज के लिए धन भी जुटाना है. इसलिए उन की शिक्षा पर समय और धन क्यों नष्ट किया जाए?
कुछ उदार पिता इतनी स्वीकृति अवश्य दे देते कि चिट्ठीपत्री लिख सके या रामायण बांच ले. खैर, मुगलकाल तक आतेआते तो वैसे भी लड़कियों को घर की चारदीवारी में बंद रखना मजबूरी हो गया. यह स्थिति अंगरेजों के राज में यथावत रही.
गांधीजी ने लड़कियों की शिक्षा पर जोर दिया
महात्मा गांधी ने लड़कियों की शिक्षा को बेहद महत्त्वपूर्ण माना और कहा कि अगर आप एक व्यक्ति को शिक्षित करते हैं तो आप एक व्यक्ति को शिक्षित करते हैं, लेकिन अगर आप एक महिला को शिक्षित करते हैं तो आप पूरे परिवार को शिक्षित करते हैं…
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गांधीजी ने स्त्रियों का आव्हान किया कि वे घरों से निकल कर देश की आजादी के लिए पुरुषों को योगदान दें और तभी उन की शिक्षा पर भी गौर किया गया. गांधीजी ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए चरखा चलाना सिखाया और उन्हें शिक्षा हासिल करने और नौकरी करने के लिए प्रोत्साहित किया. गांधीजी महिलाओं की शिक्षा के पक्षधर थे. उन्होंने लड़कियों व लड़कों के लिए निशुल्क व अनिवार्य शिक्षा देने का प्रावधान किया.
Sexual Exploitation
