अमीरों ने गरीब मजदूरों, मेहनतकशों को फिर से फंदे में फांसने के लिए इंटरनैट का जम कर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. पहले तो इंटरनैट सिर्फ अमीरों का मनोरंजन या पोस्टल डिपार्टमैंट बना था, फिर बैंकबनने लगा, फिर ट्रैवल एजेंजियों को खत्म करते हुए टै्रवल बुकिंग करने लगा और अब जोमैटो, उबेर, ओला, ब्लिंकिट, अमेजन से रेस्तराओं के वेटरों, टैक्सी खरीदने का सपना देखने वालों, किराने की छोटी सी दुकान शुरू करने का प्लान देखने, बनाने वालों की प्लानिंग का चकनाचूर कर दिया है.
लेटैस्ट ऐंट्री है इंडीपैंडैंट हाउस हैल्पों की जिन्हें हाउस और अंबेन स्नैबिट कंपनी इंटरनैट के सहारे कंट्रोल कर रही है. कहने को यह बड़ी सुविधा है मालिकों के लिए भी और घरेलू कर्मचारियों के लिए भी पर असल में यह बैंकों, क्रैडिट कार्डों, इंश्योरैंस कंपनियों, गूगल की जीमेल जैसी सुविधा है जो अभी अच्छी व सस्ती मिल रही है पर फिर महंगी हो जाएगी और ज्यादा मनमानी वाली हो जाएगी.
टैक्नोलौजी अच्छी होती है पर जब टैक्नोलौजी को चलाने वाले थोड़े से हों तो डर रहता है कि वे मोनोपौली का पूरा लाभ उठाएंगे. आज जो चीज सस्ती मिल रही है वह कल को महंगी और मनमानी सर्विस वाली हो जाएगी. एअरलाइनों को देख लें. अब एअरलाइनें अपने पैसेजरों की चिंता नहीं करतीं. अगर आप ने पहले सस्ते में बुकिंग करा ली और बाद में दाम बढ़ने लगें तो एअरलाइन आप की फ्लाइट बिना पूछे चेंज कर देगी. हां, रिफंड पूरा अदा कर देगी पर उस से क्या होता है? आप को तो जहां जाना है वहां जाएंगे और पहले की बुकिंग टाइम पर ही जाएंगे. आप मजबूर हो कर उसी एअरलाइन की उसी फ्लाइट का ज्यादा दाम दे कर नया टिकट खरीदेंगे या दूसरी एअरलाइन का उसी टाइम का खरीदेंगे और रोतेपीटते जाएंगे.
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