Yashoda Prakash: ऐंपावरमैंट थ्रू ऐंटरटेनमैंट अवार्ड (औफस्क्रीन)- जब एक सफल फाइनैंशियल एडवाइजर को उस के सपने, उस के जनून ने सोने नहीं दिया और फिर ले आया उसे कहानियों के एक ऐसे सफर में जिस का रोमाचंक मोड़ बना नैशनल फिल्म अवार्ड.
कोडागु, कर्नाटक की हरियाली की गोद में जन्मी बच्ची एक दिन नैशनल अवार्ड जीतेगी, यह कभी किसी ने सोचा नहीं था. अपने प्रांत, संस्कृति के रंगों और कहानियों के बीच खेलीकूदी यशोदा हमेशा से अपने भीतर कुछ बड़ा करने का जज्बा लिए हुए थी, जिस की वजह से आज वे पहली कोडावती महिला निर्माता बनी.
एक निर्माता की शुरुआत: स्वास्तिक ऐंटरटेनमैंट
अपने सपने को पूरा करते हुए यशोदा ने स्वास्तिक एंटरटेनमैंट बैनर की नींव रखी, जिस के नीचे यशोदा ने कई फिल्में बनाई. ‘बाक्के माना,’ ‘श्मशान मौन,’ ‘दीक्षा और नाडा पेड़ा आशा’ की वे सहनिर्माता रही. मगर 2023 में बनी फिल्म ‘कंदीलु दी रे औफ होप’ यशोदा के जीवन का एक लाइफ चेंजिंग पौइंट रहा. फिल्म ‘कंदीलु’ को 71वें नैशनल फिल्म अवार्ड्स के अंतर्गत बैस्ट कन्नड़ फिल्म का खिताब मिला.
स्वास्तिक ऐंटरटेनमैंट की स्थापना करने का मकसद शायद यही था कि वे संवेदनशील और ठोस कहानियों को दुनिया के सामने रख सकें ताकि समाज में उन की कहानियों के जरीए कुछ मजबूत बदलाव होने की एक शुरुआत हो सके.
क्यों अलग हैं यशोदा की कहानियां
यशोदा की हर फिल्म लोगों के दिलोदिमाग पर गहरी छाप छोड़ जाती है, जिस से उन्हें दुनियाभर से प्यार और सम्मान मिलता है क्योंकि इन फिल्मों की कहानियां कोई काल्पनिक घटनाओं से नहीं बुनी रहतीं बल्कि जीवन और समाज की वास्तविकता की जमीनी सचाई से उठ कर आती हैं. आम लोगों की आम कहानियां जो जीवन के हर रंग यानी सुखदुख, रोनाहंसना, चीखपुकार को हम सब के सामने एक फिल्म के जरीए पेश करती हैं. इन की कहानियों में कोई सुपर हीरो या फालतू के ट्विस्ट नहीं होते बल्कि एक किसान की पीड़ा, महिला की दुखद जीवनी, परिवार का कठिन संघर्ष और समाज के ऐसे वर्ग के लोगों की कहानियां होती हैं, जिन्हें हम न अपनी दौड़तीभागती जिंदगी में देखते और शायद न देखना चाहते हैं.
यशोदा की अपनी कहानियों के द्वारा समाज को आईना दिखाने और महिलाओं को सशक्त करने के हौसले को नमन करते हुए और उन के इस जब्बे को और मजबूत करने की राह में गृहशोभा ने भी अपनी भूमिका निभाई.
गृहशोभा ने यशोदा को ‘ऐंपावरमैंट थ्रूऐंटरटेनमैंट’ का अवार्ड दे कर यह आशा कि यशोदा यों ही अपनी फिल्मों से महिलाओं को समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ खड़े होने की ताकत और उन से लड़ कर आगे बढ़ने की एक प्ररेणास्रोत बनी रहेंगी.
सम्मान और उपलब्धियां
यशोदा आज फिल्म इंडस्ट्री में उम्दा निर्देशक और निर्माता की श्रेणी में गिनी जाती हैं. उन का काम इंडस्ट्री के साथ आम जनता के दिल को जीतते हुए कई फिल्म फैस्टिवल की शान बन गया है. यशोदा के उन्हीं बेहतरीन फिल्मों की उपलब्धि पर एक नजर:
– ‘कंदीलु दी रे औफ होप’ बैस्ट कन्नड़ फिल्म 71वें नैशनल फिल्म अवार्ड्स (2025).
– ‘बाक्के माना’ कोलकाता इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल, 2017 में चयनित.
– ‘श्मशान माना’ बैंगलुरु इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल, 2018 में चयनित.
– ‘दीक्षा’ कर्नाटक फिल्म फैस्टिवल में चयनित.
– ‘कंदीलु’ विभिन्न फैस्टिवल नौमिनेशन एवं बीआईएफ फैस्टिवल में दूसरे स्थान की बैस्ट कन्नड़ फिल्म.
सोच और निश्चय
यशोदा हर संभव प्रयास करती हैं कि उन की कहानियां, फिल्में समाज में जागरूकता और बदलाव लाएं. इसलिए उन की कहानियां महिला संदर्भ के साथ पारिवारिक चुनौतियों, समाज के दबे वर्ग, उस की अनसुनी पुकार के इर्दगिर्द ही रहती हैं. अपने निर्देशन कार्य में आने वाली कोई भी कठिनाई यशोदा को और अधिक परिश्रम करने की प्रेरणा देती है जो उन के प्रयासों को और भी निखारता है, जिस से हमें सिनेमा इंडस्ट्री में कई यूनीक फिल्में देखने को मिलती हैं.
यशोदा ने एक इंटरव्यू में यह जताया था कि वे अपनी कोडावा संस्कृति को सिनेमा के जरीए विश्वभर में प्रस्तुत करना चाहती हैं और उन की फिल्में खासकर फिल्म ‘कंदीलु’ उसी बात का सत्य प्रमाण दिखता है. यशोदा समाज की कुंठित सोच को तोड़ते हुए दुनिया को ऐसी कहानियां दिखा रही हैं जो कोई कथाकहानियां नहीं बल्कि कड़वी सचाई हैं.
Yashoda Prakash
