Love or Career: प्यार और शादी के माने बहुत ऊपर हैं. लेकिन क्या इतने ऊपर कि इन पर कैरियर की बलि चढ़ा दी जाए? नहीं न. पहले शादी करने को इतनी अधिक प्राथमिकता दी जाती थी कि लड़का हो या लड़की उन के कैरियर के बारे में ज्यादा सोचा नहीं जाता था और आज भी यह स्थिति इतनी सुधरी नहीं. वह इसलिए कि पहले परिवार शादी के नाम पर बच्चों के कैरियर को किनारे कर देते थे और अब बच्चे प्यारमुहब्बत के नाम पर खुद को फेल्योर बना लेते हैं.

आज जहां परिवार बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के लिए हर अच्छे कोचिंग सैंटर, काउंसलिंग और स्कूलकालेज के दरवाजे खटका रहे हैं बच्चे उन्हीं दरवाजों से भीतर जा एक आशिक या दिलजला बन निकल रहे हैं. यंग ऐज में किसी दूसरे की तरफ आकर्षण और प्यार स्वाभाविक है और इस में कोई दोष भी नहीं. मगर उस रुझन को आप खुद पर इतना हावी भी न होने दें कि उस के गुलाम ही बन जाओ क्योंकि इस उम्र का प्रेम कितने दिन टिकेगा इस का कोई ठीक नहीं.

इसलिए अपने इश्क को अपने ही जीवन की रुकावट मत बनने दें. जो समय आप प्रेम प्रसंग और शादी के सपने लेने में गवां रहे है यह वही समय है जब एक कैरियर की नींव रखी जाती है. तो इस समय को यों प्रेम की मौसमी हवाओं में न उड़ाएं वरना आप भी गीता की तरह आगे बढ़ने के बजाय पीछे आ जाएंगी या समीर की तरह टौपर से फेलयोर. नौट सो स्मार्ट गीता और अर्जुन स्कूल टाइम से साथ थे. फिर कालेज और प्यार. जहां अर्जुन को कालेज से निकल बड़ी मुश्किल से जौब मिली वहीं गीता को एक यूएस कंपनी से औफर आया, जिस से गीता बहुत खुश थी. सब सैट था सिर्फ पासपोर्ट नहीं. गीता ने कंपनी से थोड़ा समय मांग. पासपोर्ट के लिए अप्लाई कर दिया. जल्द ही पासपोर्ट औफिस से डौक्यूमैंटेशन की डेट भी आ गई.

लेकिन गीता को नहीं पता था कि डेट के दिन अर्जुन एक नन्हे बच्चे की तरह उस का हाथ पकड़ रोने लगेगा. गीता के हाथ में डौक्यूमैंट थे और पासपोर्ट औफिस का गेट बस 10 कदम की दूरी पर. मगर 10 कदम के बीच अर्जुन उस का हाथ पकड़ सड़क पर बैठे रो रहा था. ‘‘प्रौब्लम क्या है अर्जुन?’’ ‘‘अगर तुम चली गई तो मैं अकेला क्या करूंगा या तुम ने वहां किसी और को पसंद कर लिया तो अथवा यहां मेरी शादी और किसी से हो गई तो? नहीं मुझे छोड़ कर मत जाओ. प्लीज, यहीं कोई नौकरी कर लो. तुम्हें बड़े आराम से नौकरी मिल जाएगी. तुम तो मुझ से कहीं ज्यादा स्मार्ट हो.’’ मगर गीता अर्जुन से स्मार्ट नहीं निकली. उस ने अपना फैसला बदल दिया और अर्जुन के पास रुक गई.

आज वही गीता अर्जुन से बहुत पीछे है. उसे अर्जुन से अच्छी नौकरी तो मिली लेकिन अर्जुन से शादी के बाद उसे 2 बार नौकरी चेंज करने पड़ी. एक तो अर्जुन की जौब पोस्टिंग की वजह से और दूसरी प्रैगनैंसी की वजह से. कैरियर में 2 बड़े बदलाव गीता को भारी पड़े और वह आज अर्जुन से बहुत पीछे हो गई. जो अर्जुन पहले उसे ज्यादा स्मार्ट होने की दुहाई देता था आज वही उसे कहता है, ‘‘गीता यह किचन इतनी फैली क्यों है? अरे बेबी का सामान ठीक से रखा करो. बिल्स पेमैंट तो बेबी के साथ घर बैठे कर ही सकती हो. पता है वह अपना सुनील था न, उस की वाइफ लंदन जा रही है. अच्छी जौब मिली है उसे. बहुत खुश था वह. उन की तो लाइफ सैट हो गई. और वह कालेज की श्वेता उसे तीसरी प्रोमोशन मिली है. ग्रोथ के लिए तुम भी थोड़ा स्मार्ट वर्क किया करो.’’

एक सैलरी काफी नहीं फाइनल ऐग्जाम हुए ही थे कि सुधा के मांबाप उस के लिए लड़का देखने लगे और रिजल्ट आने तक उस की शादी भी हो गई. शादी के कुछ दिन बाद ही सुधा ने दिनेश से कहा कि वह नौकरी करना चाहती है. उस की बात सुन दिनेश नाराज हुआ और उस को ताना मार कहा, ‘‘तुम्हारी ऐसी कौन सी जरूरत मेरी तनख्वाह पूरी नहीं कर रही कि तुम्हें नौकरी करने की सूझ?’’ और फिर यही ताना दिनेश के घर वालों ने भी मारा जब दिनेश ने उन्हें सुधा की नौकरी करने की बात बताई. परिवार का ताना खा सुधा ने अपनी चाह दबा ली. समय बीता और सुधा ने एक बच्ची को जन्म दिया. नाम रखा वर्षा. दिनेश की नौकरी अच्छी चल रही थी और ससुरजी की नौकरी भी.

मगर कुछ साल बाद कुछ ऐसा हुआ कि सबकुछ उलटपलट गया. ससुरजी की तबीयत ऐसी खराब हुई कि उन्हें नौकरी छोड़ घर पर बैठ आराम करना पड़ गया. एक लंबी छुट्टी पर होने की वजह से कुछ दिन बाद ही उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया. अब घर का सारा खर्चा सिर्फ दिनेश के सिर आ गया. दिनेश जैसेतैसे सब संभाल लेता. लेकिन जैसेजैसे वर्षा बड़ी हो रही थी खर्चे भी बढ़ रहे थे.

वर्षा के प्ले स्कूल तक फीस तो निकल जाती थी लेकिन अब रैग्युलर स्कूल की एडमिशन फीस और डोनेशन तो उधार पर हो गया लेकिन हर महीने की फीस उस का क्या? घर की आर्थिक तंगी बढ़ती जा रही थी और सुधा का धैर्य घटता जा रहा था. एक सुबह सुधा को अच्छे से तैयार होता देख उस की सास ने पूछा, ‘‘कहां चल दी.’’ सुधा ने पर्स में पानी की बोतल और लंच रख कहा, ‘‘आज से नौकरी करने जा रही हूं. यहीं पास में ही मिल गई है. खाना बना दिया और कपडे़ भी धो कर सूखने डाल दिए हैं.’’ सुधा के सासससुर उस की बात सुन हैरान थे कि तभी दिनेश एकदम चिल्लाया, ‘‘ऐसी भी क्या जरूरत आ पड़ी जो नौकरी करनी है?’’ सुधा ने उसे एक लिस्ट पकड़ा दी और कहा, ‘‘घर का यह सामान पापा की दवाई और वर्षा की पिछले 2 महीने की फीस बाकी है. बस यहीं जरूरत आ पड़ी. लेकिन ठीक से देखो. इस में मेरी कोई जरूरत नहीं क्योंकि तुम्हारी सैलरी और कर्ज मेरी हर जरूरत तो पूरी कर देते हैं लेकिन इस पूरे परिवार की नहीं.’’ प्रिय से अप्रिय होना प्रिया समीर की जान थी.

समीर कालेज का टौपर लड़का जो हमेशा हर चीज में टौपर रहा. आज वह इंटरव्यू में सब से पीछे था. इंजीनियरिंग के फाइनल ऐग्जाम सिर पर थे. सब को यही उम्मीद थी कि समीर ही टौप करेगा और फिर एक बड़ी कंपनी में हाई पेड सैलरी उस का स्वागत करेगी. मगर हुआ कुछ उलटा ही. समीर का स्वागत तो हुआ लेकिन किसी कंपनी में नही बल्कि थाने में. प्रिया जो समीर की गर्लफ्रैंड थी की अचानक सगाई फिक्स हो गई. जब समीर को यह पता चला तो उस ने प्रिया से बहुत बहस की. प्रिया जो यह कहती थी कि वह समीर से प्यार करती है आज उस से खुद बोल रही थी कि वह सब एक अट्रैक्शन था जो खत्म हो गया.

इसलिए समीर को उसे भूल जाना चाहिए. लेकिन समीर यह सब नहीं समझ पा रहा था और न भूल. वह खुद को दिनरात शराब में डुबोए रहता. उस के दोस्तों ने, परिवार ने, यहां तक कि प्रोफैसर ने भी बहुत कोशिश की लेकिन वह अपने दर्द से बाहर नहीं निकल पाया और यही दर्द उसका फाइनल ईयर खा गया. न उस ने कोई पढ़ाई की और न कोई ऐग्जाम दे पाया. लाइफ में फेल्योर बनने का दर्द उसे नशे के साथ सड़क पर ले आया और फिर थाने. बड़ी मुश्किल से परिवार और दोस्तों ने थाने और कालेज वालों के हाथपांव जोड़ उसे दूसरा मौका देने को मनाया.

1 साल बरबाद होने के बाद समीर फिर से ऐग्जाम में बैठ तो पाया लेकिन अंकों में आगे नहीं निकल पाया. टौप करने वाला लड़का सिर्फ पास होने लायक ही अंक जुटा पाया. आज उन ही अंकों को लिए वह अपने 10वें इंटरव्यू में सब से पीछे बैठा है. गंभीरता को समझें इन छोटी कहानियों से हम कोई ज्ञान नहीं देना चाहते लेकिन हां जीवन की सचाई जरूर दिखाना चाहते हैं. आप में से बहुत से युवाओं ने यह सचाई अपने आसपास के लोगों या किसी करीबी को जीते देखी भी होगी.

इसलिए आप इस बात की गंभीरता को समझ और अपने कैरियर पर ध्यान दो. हम यह भी नहीं कहते कि प्रेम से आंखें ही मूंद लो लेकिन आंखें इतनी भी तो खुली रखो कि अपना अच्छाबुरा देख सको क्योंकि अब वह समय चल रहा है जहां प्रेम प्रसंगों, शादी के ख्वाबों की जगह कैरियर को प्राथमिकता दी जाए. वैसे भी असली प्रेम वही होता है जहां दोनों का हर रूप में विकास हो, भविष्य सुधरे और वे एकदूसरे को आगे बढ़ने में मदद करें. एक अच्छा कैरियर केवल अच्छे पैसे कमाने का जरीया ही नहीं बनता बल्कि खुद को स्वतंत्र, मजबूत और संतुष्ट भी बनाता है.

साथ एक अच्छा कैरियर आप को दुनिया की बहुत सी खुशी ला सकता है और हां प्रेम भी क्योंकि अगर आप सफल होंगे तो आप को जीवन में बहुत से सुंदर लोग और रिश्ते मिलेंगे. दोनों ही एकदूसरे के बोझ से दबे रहेंगे और यह तर्क दोनों लड़का और लड़की के लिए है. आज लड़की का इंडिपैंडैंट होना उतना ही जरूरी है जितना लड़के का है क्योंकि आज की जीवनशैली और जरूरतें बहुत बदल और बढ़ चुकी हैं जो किसी एक के जिम्मे नहीं हैं.

एक व्यक्ति का अपना खर्च ही इतना है कि कभीकभी उस की आमदनी स्वयं की पूर्ति के लिए कम पड़ जाती है तो अन्य का भार कोई कैसे उठाएगा और अगर आप इतने काबिल हो. पढ़ीलिखी हों तो क्यों किसी पर आप को आश्रित होना है. आप स्वयं क्यों नहीं इंडिपैंडैंट बनतीं? एक सफल कैरियर न केवल आप का स्वयं का विश्वास बढ़ाएगा बल्कि आप के साथी और बाकी परिवार का भी आप पर विश्वास मजबूत करेगा.

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