Indian family values : ‘‘आज  मेरे मम्मीपापा आ रहे हैं तो मुंह बना कर बैठी हो और जब खुद के मौमडैड आते हैं तो बड़ा कूदकूद कर घर की सफाई करती हो.’’

‘‘हां क्योंकि मेरे मौमडैड तुम्हारे मम्मीपापा की तरह दिमाग नहीं खाते. बहू यह क्यों बनाया? बहू मेरा बेटा खुद नाश्ता क्यों बना रहा है?’’

‘‘अच्छा उन के सवाल चुभते हैं तुम्हें और जब तुम्हारे पापा मु?ो सेविंग के ऊपर जो 1-1 घंटे का ज्ञान देते हैं वह या तुम्हारी मम्मी जो बारबार बोलती हैं कि ‘‘मेरी फूल सी बेटी को सारा घर खुद मैनेज करना पड़ता है. कितना अच्छा होता अगर हमारे पसंद के एनआरआई लड़के से शादी कर लेती.’’

संदीप और दिव्या की यह लड़ाई जब भी कोई इनलौज आए तो हो ही जाती है और संदीपदिव्या ही क्यों यह लड़ाई तो हर कपल की आम लड़ाई बनती जा रही है. कभी सासससुर के घर आने पर लड़ाई तो कभी सासससुर के घर जाने पर लड़ाई. वे आप के पास आएं या आप उन के पास जाएं, तकरार तो हो ही जाती है.

दामाद हो या बहू उन्हें उन के इनलौज ‘हमेशा टेंश नहीं लगते है.’ पहले तो परिवार एकजुट एक छत के नीचे ही रहते थे, मगर अब समय के साथसाथ लोगों की सोच और छत दोनों अलग होते जा रहे हैं, जिस में कोई बुराई भी नहीं. हां, लेकिन कभीकभी एकजुट होना पड़े तो मनमुटाव भी नहीं होना चाहिए खासकर अपने इनलौज यानी ससुराल वालों के साथ और यह बात बहू और दामाद दोनों पर लागू होती है. मगर समझ होते भी दूरियां बनी ही रहती हैं.

आखिर क्यों होती हैं दूरियां

रोकटोक की समस्या: ऐसा क्यों किया, वैसा क्यों किया, यह क्या बनाया है, यह क्या पहना है अकसर ऐसे सवाल सिर्फ बहू से पूछे जाते हैं. उस के हर कदम को अच्छे से नापा जाता है, जिस वजह से सास और बहू के बीच हमेशा एक दूरी बनी रहती है.

आपसी नोक?ोंक: कभी सास ने बहू को खरीखोटी सुनाई होती है तो बहू ने उलटा जवाब दिया होता है, तो कभी दामाद को ससुर ने लाइफ मैनेजमैंट का लंबाचौड़ा ज्ञान दिया होता है. ऐसी बहुत सी बातें मन को नहीं भातीं और एकदूसरे से मन कटने लग जाता है.

आदरभाव की कमी: रिश्तों में जब इतनी रोकटोक हो जाती है, मनभेद हो जाता है तो एकदूसरे के लिए आदरभाव अपनेआप ही खत्म हो जाता है. कोई एक सही बात भी करे तो उस की बात का न सम्मान किया जाता है और न ही गौर.

काम बढ़ने की दिक्कत: घर में एक भी सदस्य बढ़ जाए तो थोड़ा काम भी बढ़ जाता है. मगर सासससुर का आना हो तो काम तो बढ़ता ही है, साथ ही टैंशन भी बढ़ जाती है. हर काम बहुत सोचसंभल कर करना पड़ता है. उन की पसंदनपसंद को ध्यान में रख सारे काम करने पड़ते है क्योंकि जरा सी भी चूक आप को कामचोर, बेअकल और नकारा कहलवाने के लिए काफी होती हैं.

सासससुर का हस्तक्षेप: 4 दीवारों में भी कई बार मियांबीवी के बीच की बात अकसर सार्वजानिक हो जाती है. दोनों के बीच अगर कोई मसला चल रहा हो या किसी बात पर चर्चा चला रही हो तो सासससुर की अनचाही दखलंदाजी या टिप्पणी सामने आ जाती है. मेरे बेटे को ऐसा क्यों कहा या मेरी बेटी से यह कैसा बरताव किया तुम ने वगैरहवगैरह.

सोचविचारों का मतभेद: अब सुबह किचन में सास खड़े हो बोली कि नाश्ते में घी से बने परांठे ही बनेंगे और बहू कहे स्प्राउट ब्रेकफास्ट. तब क्या? अब यहां दोनों के बीच की सोच मतभेद का काम करती है और मतभेद कभीकभी मनभेद का कारण भी बन जाता है.

रहनसहन का फर्क: आप के सासससुर को सुबह 6 बजे उठते ही गरमगरम अदरक की चाय चाहिए और आप आराम से अंगड़ाई लेते हुए उन्हें

8 बजे ग्रीन टी दे रही हैं तो यह भी तो ठीक नहीं. हर किसी का रहनसहन अलग होता है और वह उस अनुसार जीना पसंद करता है. अब किसी का रहनसहन आप की आलस भरी दिनचर्या से खराब होता हो तो वह भला आप को कितना पसंद करेगा.

तो कैसे बनाएं तालमेल

अन्यथा दिल पर मन लें: छोटी सी डांट या टोक को दिल से न लगाएं. जिस तरह अपनी मां के डांटने पर आप उन से रिश्ता नहीं तोड़ते या पलट कर खरीखोटी नहीं सुनाते ठीक वैसे ही अपनी सास को भी मां समझ कर उन की बातों को हमेशा ताना न सम?ों और आप दामाद भी जब अपने पापा के सवाल पर उंगली नहीं उठाते तो अपने ससुर के सवालों का भी मान करें. इनलौज की हर बात कोई ताना या उलाहना नहीं होती. इसलिए हर बात को तूल न दें, उन से न मुंह फुलाएं.

अनुमान न लगाएं: कई बार देखा गया कि बात कुछ हुई नहीं कि बतंगड़ बन जाता है, जिस का सब से बड़ा कारण है अनुमान लगाना. कोई रोकटोक हुई नहीं कि दिमाग हर दिशा में भागने लगता है जहां केवल नकारात्मकता ही मिलती है. मेरी सास ने मु?ो रोका मतलब उसे मैं पसंद नहीं, मु?ो गलत ही सम?ाती हैं, मेरी तो कोई इज्जत ही नहीं. ऐसे कई अनुमान लगा आप अपने मन में कड़वाहट पैदा करते रहते हैं. इसलिए किसी बात की पूरी गहराई या सचाई जाने बिना कोई भी अनुमान न लगाएं.

उन की पहल और कोशिशों को सराहें: अगर आप के इनलौज किसी काम में आप की मदद करना चाहते हैं या आप से किसी गंभीर विषय पर बातचीत करना चाहते हैं तो उन की पहल को नजरअंदाज न करें. माना आप दोनों के खयाल या सोच आपस में नहीं मिलती लेकिन उन की बात सुनने में कोई हरज तो नहीं. वे आप के विचारों से भले नाखुश रहते हों लेकिन चाहते तो आप का भला ही है. इसलिए एक बार उन का मत भी अवश्य सुनें.

संवेदनशील या विवादित मुद्दे न उठाएं: दीनदुनिया की बातें यानी राजनीति, पासपड़ोस, सामाजिक मान्यताओं आदि को छोड़ कर भी ऐसे बहुत से विषय हैं, जिन में भेद मतभेद होते रहे हैं. जैसे पारिवारिक मसले. हर परिवार में कुछ ऐसे मसले या बातें होतीं जो बहुत ही संवेदनशील होती हैं. उन पर अधिक चर्चा विवाद और विरोध का रूप ले लेती है. इसलिए अच्छा हो कि आप उन विषयों को न छेड़ें और अगर छेड़ बैठे हैं तो कृपया धीरज और सम?ा से काम लें.

उन के साथ वक्त बिताएं: कई बार छोटीमोटी नोक?ोंक पर हम एकदूसरे से इतना रुष्ट हो जाते हैं कि उन की खराब छवि मन में बना कर हमेशा के लिए रख लेते हैं जो किसी भी रिश्ते के लिए ठीक नहीं. इसलिए अपने रिश्तों को प्राथमिकता देते हुए एकदूसरे के साथ पर्याप्त समय बिताएं, एकदूसरे को सुनें, देखें, सम?ों. कई बार साथ में समय बिताने से हम किसी को करीब से जान पाते हैं. कई बार मन में बनी छवि सामने बैठे व्यक्ति के बिलकुल विपरीत निकलती है.

संयमित रहें: अगर आप लोगों को एकदूसरे का बरताव पसंद नहीं आता तो एकदम से कोई प्रतिक्रिया न दें. थोड़ा संयम रखें और थोड़ा सोचविचार कर उन के साथ बैठ उस बारे में बात करें. हो सकता है आप को उन की बात समझ आ जाए या उन्हें आप की और जिस किसी से गलती हुई हो वह उस गलती को समझे और उसे दूर करने की कोशिश भी करे.

सलाह लेने से हिचकिचाएं नहीं: जिस तरह आप अपने मांबाप से सलाहपरामर्श लेना गलत नहीं मानते या हिचकते नहीं. ठीक वैसे ही आप को अपने सासससुर से भी कोई सलाह लेने से संकोच नहीं करना चाहिए.

उन से सलाह लेने से एक तो आप किसी बात का सम?ाने का एक अलग नजरिया मिलेगा या आप की बात पर उन की स्वीकृति मिलने से आप का खुद पर भरोसा और उन का आप पर भरोसा दोनों मजबूत होंगे, साथ ही उन्हें यह देख कर अच्छा भी लगेगा कि आप उन पर विश्वास कर उन से अपनी बात सा?ा करने आए जो आप दोनों के रिश्ते के लिए बहुत अच्छा होगा.

इसलिए दोनों को ही अपने दिल और दिमाग के ताले खोल कर रखने चाहिए.

यह न हो कि सास के आने से बहू मुंह बना रही है या ससुर की बातों से दामाद कान बंद किए बैठा है. हम यह नहीं कहते कि सारे सुधार और सम?ा की जरूरत सिर्फ आप को है. मगर किसी भी रिश्ते को निभाने के लिए दोनों ओर के लोगों को बराबर पहल और सुलह करनी पड़ती है तो क्यों न पहल आप से ही शुरू हो.

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