Indian wedding customs :  शादी के बाद कपल्स को एकदूसरे की भावनाओं को समझना ज्यादा जरूरी होता है. एकांत के पलों में एकदूसरे को समझने के बजाय हर समय पूजापाठ में उलझे रहना विवाहित जोड़े के लिए महंगा पड़ सकता है. शादी होने के बाद हनीमून के लिए कपल पर्यटन स्थलों की यात्रा के बजाय धार्मिक स्थलों का चुनाव करते हैं, मगर वहां मची लूट उन का सारा मजा किरकिरा कर देती है.

वैसे भी देखा जाए तो तीर्थ यात्राएं केवल पंडों को ही सुख देती हैं, अंधभक्त तो हर हाल में लूटे जाते हैं. सभी धार्मिक स्थलों पर कुंडली मारे बैठे ये पंडेपुजारी तरहतरह के पूजापाठ के नाम पर लोगों को ठगने का काम करते हैं.

हिंदू धर्मग्रंथों में लिखी गई कथाकहानियां भी लोगों को यही सीख देती हैं कि पृथ्वी लोक पर कितने ही पाप कर लो, मगर तीर्थ यात्रा पर जाने से, नदी, सरोवर में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं और स्वर्ग की अप्सराओं से मिलने का टिकट कन्फर्म हो जाता है.

इतनी सारी मान्यताओं के बावजूद एक पढ़ीलिखी महिला ने शादी के बाद पति द्वारा अयोध्या ले जाने के कारण अपने रिश्ते पर पूर्णविराम लगा दिया. अयोध्या में राम मंदिर में रामलला की प्रतिमा की स्थापना के बाद जब पूरा देश अंधभक्ति में डूबा हुआ था, उस समय मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के पिपलानी इलाके में रहने वाली एक नवविवाहिता ने अपने पति से तलाक मांगा था और इस की वजह भी हैरान करने वाली थी.

किएकराए पर पानी

पिपलानी में रहने वाली एक महिला वंदना, जिस की 5 महीने पहले शादी हुई थी, ने तलाक के लिए भोपाल के फैमिली कोर्ट का रुख किया. महिला का कहना था कि उस के पति ने उसे हनीमून के लिए गोवा ले जाने का वादा किया था लेकिन पति अपने बादे से मुकर गया और गोवा के बजाय पत्नी को अयोध्या ले गया.

तलाक की अर्जी देने वाली महिला का पति आईटी सैक्टर में काम करता था और अच्छीखासी सैलरी पाता था. महिला भी शादी के पहले प्राइवेट कंपनी में जौब करती थी, जिसे शादी के बाद उस ने छोड़ दिया और अब वह खुद वर्किंग वूमन है. उस का कहना है कि उन के लिए हनीमून पर विदेश जाना भी कोई बड़ी बात नहीं थी लेकिन पति ने यह कह कर मना कर दिया कि घर वाले राजी नहीं होंगे. इस के बाद हनीमून के लिए गोवा या साउथ इंडिया जाने का प्लान बनने लगा लेकिन घूमने जाने से ठीक पहले पति ने अयोध्या और वाराणसी की फ्लाइट के टिकट ले लिए. महिला का कहना है कि उसे जाने के एक दिन पहले ही यह बात पता चली थी.

दरअसल, महिला की सास रामलला की प्राणप्रतिष्ठा के पहले अयोध्या जाना चाहती थी. मां की सलाह पर ही पति ने यह फैसला लिया था.

महिला अपने हनीमून के लिए अपने दिल में कई सपने संजोए थी, परंतु गोवा जाने के बजाय अयोध्या की धार्मिक यात्रा ने सब किएकराए पर पानी फेर दिया.

जब पतिपत्नी अयोध्या से लौटे तो महिला ने फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी लगा दी. उस का कहना था कि पति को उस से ज्यादा अपने परिवार की इच्छाओं का खयाल है और इसीलिए वह इस रिश्ते में नहीं रहना चाहती है.

शादी के बाद की दकियानूसी परंपराएं

शादी के बाद निभाई जाने वाली कुछ दकियानूसी परंपराएं भी कपल्स के लिए मुसीबत का सबब बन जाती हैं. शादी होने पर पतिपत्नी को देवीदेवताओं के मंदिर ले जाने की परंपरा है, परंतु सब से ज्यादा परेशानी उन परिवारों को होती है, जिन के देवीदेवता मीलों दूर उन के पुस्तैनी गांव में होते हैं. इस मुसीबत का सामना साधारण घरों के लड़केलड़कियों को ज्यादा करना पड़ता है. इन घरों में शादी होने पर देवीदेवता के यहां मीलों का फासला तय कर के दर्शन पर जाना पड़ता है और भेंट भी चढ़ानी पड़ती है.

साधारण घरों में वैसे ही शादी में पैसा खर्च हो जाता है, ऊपर से देवीदेवताओं को भेंट चढ़ाने रोडवेज की खटारा बसों में सफर करना पड़ता है. पतिपत्नी एकदूसरे के साथ खुशी के पल बिताना चाहते हैं, मगर रूढि़वादी परंपराएं उन की मुश्किलें बढ़ा देती हैं.

पूजापाठ और दर्शन की बुकिंग

धार्मिक स्थलों पर मंदिर में मूर्ति को छूने और जल, दूध अर्पण, आरती देखने के, जल चढ़ाने के लिए अलगअलग शुल्क, निर्धारित हैं. अब बड़ेबड़े मंदिर आस्था का केंद्र नहीं एक तरह से फाइव या सैवन स्टार होटल की तरह हो गए है, जहां मेनू कार्ड पर हर चीज के रेट लिखे होते हैं.

उज्जैन के महाकाल मंदिर की प्रबंध समिति ने बाबा महाकाल के दर्शन के लिए अलगअलग प्रकार के शुल्क लगा रखे हैं. हर दिन देशविदेश से मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं को यह व्यवस्था भ्रम में डाल रही थी, इसलिए प्रबंध समिति के जिम्मेदारों ने मंदिर परिसर में अलगअलग स्थानों पर बड़ेबड़े बोर्ड लगा दिए. इस में दर्शन, पूजन और अभिषेक के अलावा शीघ्र दर्शन व्यवस्था के लिए कितने रुपए श्रद्धालुओं को देना होंगे, सबकुछ लिख रखा है.

अधिकारियों की मानें तो इन बोर्ड को लगाने का उद्देश्य बस इतना सा है कि यहां किसकिस दर्शन, पूजन के लिए कितने रुपए देना होंगे, यह सबकुछ स्पष्ट रहे और इस में किसी प्रकार से कोई भी व्यक्ति छलावे का शिकार न बने. मंदिर समिति ने श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए ही ये बोर्ड लगाए हैं.

महाकाल मंदिर में कोई छोटाबड़ा नहीं,

यह बात अब पुरानी हो गई है. अब तो यहां कैटेगरी अनुसार काम होता है.यदि प्रोटोकौल से आ रहे हैं और वीवीआईपी श्रेणी के हैं तो कोई शुल्क नहीं लगेगा और मंदिर समिति दुपट्टा ओढ़ा कर, आधा या एक किलोग्राम का लड्डू पैकेट दे कर सम्मान करती है और 2-3 कर्मचारियों को साथ भेज कर गेट से लाने ले जाने की व्यवस्था पूरी तरह से नि:शुल्क रहती है. लेकिन उसी प्रोटोकौल में यदि आप सामान्य श्रेणी वाले हुए तो आप को क्व250 तो देने ही हैं, बैरिकेड्स से ही दर्शन करने पड़ेंगे.

इस के अलावा अन्य लोग जो थोड़ेबहुत रसूखदार हैं उन के लिए 4 और 5 नंबर गेट फिक्स कर रखे हैं. इन दरवाजों के अलावा यदि दूसरे गेट से घुसे या कोशिश भी की तो वहां खड़े गार्ड ही आप को दुत्कार देंगे.

ज्योतिर्लिंग में गर्भगृह से दर्शन की व्यवस्था मंदिर प्रशासन ने टिकट के माध्यम से तय की है. एक व्यक्ति के लिए क्व750 शुल्क निर्धारित है, वहीं क्व1500 में 2 लोगों को गर्भगृह में प्रवेश दिया जाता है. आम बोलचाल में क्व1,500 का टिकट बोलने के कारण श्रद्धालु भ्रमित हो रहे हैं, इसलिए मंदिर प्रशासन ने जगहजगह बोर्ड टांग दिए. पिछले दिनों गुजरात से आई एक महिला श्रद्धालु क्व1,500 एक व्यक्ति का सम?ा कर 2 लोगों के क्व3 हजार दे कर चली गई.

श्रीमहाकाल लोक बनने के बाद से ही दर्शनार्थियों की संख्या में इजाफा हुआ है. हर दिन 50 हजार से 1 लाख श्रद्धालुओं के आने का क्रम लगातार चल रहा है. यही वजह है कि अधिक भीड़ के दबाव के चलते मंदिर प्रशासन ने जगहजगह टिकट घर खोल दिए हैं ताकि व्यक्ति कहीं से भी दर्शन के टिकट खरीदे और दर्शन कर के खुद को धन्य महसूस कर सके.

लूट कोई नई बात नहीं

इसी तरह धार्मिक स्थलों की यात्रा में परिवार के लोग साथ हो लेते हैं और पतिपत्नी का घूमने का मजा किरकिरा कर देते हैं. वैसे भी हरेक तीर्थयात्रा में खर्चा भी खूब होता है. साधारण परिवार के पतिपत्नी ट्रेन में रिजर्वेशन नहीं करवा पाते हैं, मजबूरन भेड़बकरियों की तरह जनरल कोच में यात्रा कर के अपनी जान मुसीबत में डालनी पड़ती है. बसों का सफर महंगा तो होता ही है वक्त भी खूब लगता है. ऊपर से धार्मिक मठों, मंदिरों में पूजा और दर्शन के नाम पर जेब भी ढीली करनी पड़ती है. सब से ज्यादा मुश्किल औरतों को होती है क्योंकि उन्हें तरहतरह के प्रयोजन करने के लिए मजबूर किया जाता है और फिर खानेपीने का इंतजाम भी उन्हें ही करना होता है. साधारण बसों का सफर उन की इस यात्रा को बो?िल बना देता है.

धार्मिक स्थलों पर लूट कोई नई बात नहीं है. किसी भी धर्ममजहब के स्थान हों, वहां पर खुलेआम लूट मची होती है. होटल, कार से ले कर मंदिर प्रशासन तक इस लूट के कारोबार में बराबर के हिस्सेदार होते हैं.

अप्रैल, 2025 में दिल्ली में पत्रकारिता कर रही मेघा उपाध्याय ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट कर बताया था कि खाटूश्यामजी मंदिर दर्शन के दौरान उन की माताजी को वाशरूम इस्तेमाल करने के लिए क्व800 देने पड़े थे. मेघा ने पोस्ट के जरीए लिखा था कि मंदिर दर्शन के बाद काफी देर ढूंढ़ने पर भी जब कोई पब्लिक टौयलेट नहीं मिला तो मजबूरन एक होटल में गए, जहां उन से क्व800 मांगे. कोई और औप्शन नहीं था तो क्व800 देने को तैयार हुए और जीएसटी के साथ बिल मांगा. इस के बाद होटल वाले ने पूरे क्व800 का बिल बना कर दिया जबकि हम ने होटल में सिर्फ 5 मिनट वाशरूम इस्तेमाल किया था.

राजस्थान का खाटूश्याम मंदिर देश ही नहीं दुनिया में विख्यात है. यहां कोनेकोने से भक्त आते हैं और लूट का शिकार बनते हैं. सरकार द्वारा मंदिर को विश्वस्तरीय धार्मिक स्थल बनाने की तैयारी चल रही है, 100 करोड़ खर्च करने का ऐलान भी सरकार ने किया, मगर वहां महिलाओं के लिए पब्लिक टौयलेट की व्यवस्था न होना व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है.

उज्जैन में भी यही हालात हैं. शिप्रा नदी के तट पर गंदगी का अंबार लगा है. टौयलेट के लिए जो स्थान हैं वे इतने गंदे रहते हैं कि उन में जाना बीमारी को खुला न्यौता देना है. होटल वाले यात्रियों को देख कर टूट पड़ते हैं. घंटेभर समय बिताने बाशरूम इस्तेमाल करने के लिए हजारों रुपए की मांग करते हैं. सरकार ने यहां भी महाकाल लोक बनाने के नाम पर ऊंचीऊंची मूर्तियां बनवा दी हैं, मगर शहर गंदगी से अटा पड़ा है.

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