Political nepotism : चाहे  राजनीति हो या आम बिजनैस, यह तो पक्का है कि परिवारवाद चलेगा ही. भारतीय जनता पार्टी अगर परिवारवाद का नाम ले कर पानी पीपी कर कोसती रहती है तो इस की वजह यह है कि वह जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव की टक्कर के नेता अपने दल भारतीय जनता पार्टी में पैदा नहीं कर पाई. भाजपा में हर पीढ़ी में पहले से ज्यादा कमजोर और कम योग्य व मेहनती नेता आ रहे हैं और उन की सफलता सिर्फ हिंदूमुसलिम विवाद या पूजापाठ के पाखंड को और तेजी से और व्यापक फैलाने से हुई है.

दूसरी तरफ हाल ही में शरद पवार के भतीजे अजित पवार की हवाई दुर्घटना में मृत्यु के बाद नैशनल कांग्रेस पार्टी के एक हिस्से की बागडोर उन की पत्नी सुनेत्रा ने ही संभाली जबकि प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे जैसों ने कोशिश की भी कि उन्हें केवल डैकोरेटिव पद दे कर चुप कर दिया जाए. पर ऐसा नहीं हो पाया और पत्नी को सारी पार्टी मिली.

भारतीय जनता पार्टी और उस के मालिक आरएसएस में परिवारवाद इसलिए भी कम है क्योंकि संघ का जो प्रमुख होता है वह अविवाहित ही होता है. भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में काफी अनमैरिड थे, जिन में अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी मुख्य हैं (नरेंद्र मोदी से अलग ही रही पत्नी). दोनों के बच्चे नहीं हुए. ये लोग जोरशोर से परिवारवाद को कोस सकते हैं. कोसते तो अमित शाह भी हैं जिन के सुपुत्र जय शाह जुए के खेल क्रिकेट को चलाने वाली बीसीसीआई के सर्वेसर्वा हैं और बीसीसीआई की खुली व छिपी कमाई खरबों में है.

परिवारवाद को कोसने में कठिनाई यह है कि यह संदेश हर घर में जाता है. भक्त लोग, संघ के भक्त, कन्फ्यूज रहते हैं कि दशरथ के पुत्र राजा राम की पूजा करें तो कैसे करें, पांडु के पुत्रों पांडवों को हांकने वाले कृष्ण की पूजा करें तो कैसे करें, जब वे भी परिवारवाद का हिस्सा थे.

हर खेत, हर कारखाना, हर घर, हर बिजनैस परिवारवाद की बदौलत चलता है. औरतें सुखी और सुरक्षित रहती हैं जब उन पर परिवारवाद का साया रहता है. औरतों को सदियों से गुलाम बनाया गया ही परिवारवाद के नाम पर है. उन से कहा गया है कि वे परिवार में ही सुरक्षित हैं और परिवार बनाए रखने के लिए अपना हाड़मांस गलाए रखें, घरों में गुलामों की तरह रहें.

मगर भारतीय जनता पार्टी के सामने जब भी औरतों के साथ कुछ सत्ता या संपत्ति शेयर करने की बात आती है तो औरतों को पीछे कर दिया जाता है. 1956 के हिंदू सक्सैशन एक्ट के पहले औरतों को परिवार की संपत्ति में से कोई हिस्सा नहीं मिलता था. संतानहीन विधवा का पैसा उस के देवर, जेठ, भतीजे ले उड़ते थे. वहां परिवारवाद भाजपा के लिए जरूरी था. उन्होंने खूब विरोध किया पर चली नहीं.

नैशनल कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष अजित पवार की मृत्यु के पश्चात कोशिश यही की गई थी कि सुनेत्रा पवार को गद्दी न मिले. भारतीय जनता पार्टी को उस से अच्छी कोई कठपुतली नहीं मिलती थी इसलिए उस ने आननफानन में उसे पद दिलवा दिया. इस तरह की नौटंकी हर घर में होती है. पौराणिक कहानियां भी इन से भरी हैं जिन का पूरा इफैक्ट हमारी मानसिकता पर आज भी है क्योंकि आज भी हमारे यहां नैरेटिव तो सदियों पुराना है जिस पर केवल वैज्ञानिकता और टैक्नोलौजी का कवर लगा है.

अगर बच्चे हैं तो परिवार में संपत्ति और सत्ता के हाथ बदलने इस पर कोई उंगली नहीं उठे चाहे डैमोक्रेसी हो या नहीं. वोटर और बाजार पुत्रों की सफलता का आंकलन खुद करेंगे, स्वयंभू निर्णायक नहीं.

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