Naseem Shaikh: साल 1993 में लातूर भूकंप से चर्चा में आने वली सोशल वर्कर नसीम शेख ने, जो स्वयं शिक्षण प्रयोग (एसएसपी) में एसोसिएट प्रोग्राम डाइरैक्टर हैं और महिला सशक्तिकरण, जलवायु परिवर्तन व ग्रामीण किसान स्त्रियों की सतत विकास के क्षेत्र में पिछले 20 साल से काम कर रही हैं, खासकर कृषि और खाद्य प्रणालियों में, उन का योगदान काफी है.

नसीम महाराष्ट्र के शोलापुर की हैं. इस संस्था को साल 1986 में प्रेरणा गोपालन ने शुरू किया. नसीम ने साल 1996 में इस में जौइन किया और तभी से लगातार काम कर रही हैं. वे सामाजिक कार्यकर्ता प्रेरणा गोपालन से काफी प्रेरित हैं क्योंकि वे पढ़ीलिखी होने के साथसाथ दिनरात ग्रामीण स्त्रियों के मामले को गहराई से समझती और उस दिशा में काम करती हैं.

उन का मानना है कि एक स्त्री के अंदर बहुत अधिक पोटैंसियल होती है, लेकिन उसे आगे लाने के लिए एक मंच की जरूरत होती है और उन्होंने उसे देने की कोशिश की है. इस के केंद्र शोलापुर, लातूर, उस्मानाबाद, नांदेड, वाशिम, जालना, वर्धा, पुणे आदि स्थानों पर हैं, जिन में महाराष्ट्र के लाखों सूखा प्रभावित स्त्रियों ने प्रशिक्षण ले कर अपने जीवन को सुधार लिया है और वे अपनी भूमिका जानने लगी हैं.

मिली प्रेरणा

इस क्षेत्र में आने की वजह के बारे में पूछने पर नसीम बताती हैं कि मेरी जर्नी मेरी मां से शुरू हुई. मैं ने मां की संघर्ष को देखा था, जिस में वे किसी भी कठिन परिस्थिति में भी डट कर खड़ी रहती थीं. उन से भी मैं बहुत प्रेरित थी, जिस में एक स्त्री को कुछ भी करने के लिए काफी चुनौतियां होती हैं.

शोलापुर में रहते हुए मैं ने देखा है कि कई सारी स्त्रियां, जिन के पति कमाते नहीं, नशे के शिकार हैं या अचानक मृत्यु हो चुकी है, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उन पर आ जाती है. ऐसी महिलाएं बड़ी मुश्किल से अपना जीवन गुजारती हैं क्योंकि उन के पास कोई रिसोर्स नहीं है, सामाजिक चुनौतियां हैं, साथ ही पढ़ीलिखी भी नहीं हैं. ये सारी बातें मेरे दिमाग में बहुत कम उम्र से घूमती रहती थीं और इस का समाधान खोजती रहती थी.

ऐसे ही मेरे अंदर इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा जागी. इस के अलावा मेरी दादी भी स्ट्रौंग महिला थी और दूसरों की हमेशा सहायता करती थीं, ये सभी बातों ने मुझे इस क्षेत्र में काम करने के लिए प्रेरित किया. साथ ही मेरे पिता न होने की वजह से बहुत कम उम्र से मैं ने जौब कर पढ़ाई पूरी की है क्योंकि मैं मां की तरह नहीं थी, पढ़ीलिखी लङकी बनना चाहती थी. वित्तीय अवस्था अच्छी न होने की वजह से मैं ने एक अस्पताल में पार्टटाइम काम करते हुए इंग्लिश में ग्रैजुएशन और पोस्ट ग्रैजुएट की शिक्षा पूरी की है.

लिया सही ट्रैनिंग 

नसीम आगे कहती हैं कि अस्पताल में काम करते हुए एक इमरजैंसी हुई और काफी सारे मरीज वहां आए और मैं सब की सहायता कर रही थी, तभी वहां के एक स्टाफ ने मुझे अस्पताल में काम करने के लिए सोशल वर्क में मास्टर का कोर्स करने की सलाह दी. फिर मैं ने शोलापुर में मास्टर औफ सोशल वर्क में पढ़ाई की और अस्पताल की जौब भी करती रही. उसी वक्त लातूर में भूकंप आया. मैं वहां वालंटियर के रूप में कालेज से काम करने गई और एक से डेढ़ साल तक काम करती रही. उसी दौरान मेरा कोर्स भी पूरा हो गया. मैं ने कई जगहों पर अप्लाई किया, लेकिन इंटरव्यू का इनवाइट मुझे देर से मिला और नौकरी नहीं मिली, लेकिन वहां के एक कर्मचारी ने मुझे स्वयं शिक्षण प्रयोग (एसएसपी) उस्मानाबाद जाने की सलाह दी और मुझे वहां काम मिल गया.

साल 1996 से मैं इस संस्था के साथ काम कर रही हूं. मैं ने अपनी मां के साथ 12 साल की उम्र से काम शुरू किया है और मैं मां की समस्या को समझती थी क्योंकि मेरे पिता घर पर नहीं रहते थे. मां ने ही हमारी परवरिश की है. इस के कुछ सालों बाद पिता का देहांत भी हो गया था. मैं ने मां की मानसिक व शारीरिक हर परिस्थिति को नजदीक से देखा है.

स्त्री का रूपांतरण जरूरी

नसीम कहती हैं कि काम करते हुए मैं ने महसूस किया है कि एक स्त्री को ट्रांसफौर्मेशन की काफी जरूरत है, जिस में काम करने की आजादी, उच्च शिक्षा, परिवार का सहयोग आदि सब चीजों की जरूरत है. अभी प्राइमरी शिक्षा सभी को मिल रही है, लेकिन आज के बदलते परिवेश में उच्च शिक्षा की जरूरत भी हर लड़की के लिए है क्योंकि एक लड़की के ट्रांसफौर्म होने से वह पूरे परिवार को बदल सकती है. उसी कौंसेप्ट के साथ मैं आगे बढ़ती रही, जिस में मैं तब तक उस स्त्री के साथ काम करती रहूंगी, जब तक उस का ट्रांसफौर्म न हो जाए.

चुनौतियां

साल 1996-1997 में जब मैं ने काम शुरू किया था, तो एक स्त्री को मुझ से बात करने के लिए अपने पति, भाई या पिता की सलाह लेनी पड़ती थी. घर के अंदर जाने पर परिवार का पुरुष सदस्य सामने बैठा रहता था कि मैं उस से बात क्या कर रही हूं. अभी परिवर्तन उन जगहों पर काफी हुए हैं, लेकिन आज भी परभणी जैसे गांव में किसी स्त्री से बात करना मुश्किल होता है. मैं ने पिछले साल इस क्षेत्र में काम करना शुरू किया है.

एक बार जब मैं एक स्त्री से बात करना चाही, तो उस के दादाजी सामने बैठे हुए थे. मैं ने उन्हें बाहर जाने के लिए कहा, क्योंकि मैं मासिकधर्म के बारें में उस स्त्री से बात करने वाली थी. ऐसा कई बार होता है, जब उस महिला के दादा, चाचा या पति को बाहर भेजना पड़ता है क्योंकि यहां की स्त्रियां किसी पुरुष के सामने खुल कर बात नहीं कर सकतीं. एक स्त्री के ऊपर लगातार सामाजिक दबाव रहता है, जो उन के मानसिक विकास को क्षति पहुंचाती है.

पुरुषों का रहता है दबदबा

नसीम आगे कहती हैं कि महाराष्ट्र के उस्मानाबाद में साल 1996–1997 में मैं ने जब काम शुरू किया था, तो वहां की स्थिति को फेस करना मेरे लिए बहुत चुनौती रही, क्योंकि वहां के पुरुष चाहते ही नहीं थे कि एक स्त्री घर से निकले, काम करे, उस के हाथ में पैसा हो आदि. इस से आज भी वे डरते हैं क्योंकि महिला के आत्मनिर्भर होने पर उन का दबदबा कम हो सकता है.

इस के अलावा साल 2012 के सूखे के बाद जब मैं ने एक किसान स्त्री को कैमिकलफ्री खेती का काम करने के लिए थोड़ी प्रशिक्षण को जरूरी समझा और उन्हें घर के पास ही इसे करने की सलाह दी, तो घर वाले ने सीधे तौर पर मना कर दिया. उन्होंने कह दिया कि आप कुछ भी सीखकर यहां आ कर अप्लाई नहीं कर सकतीं. फिर मैं ने दूसरी जगह पर जा कर उन्हें प्रशिक्षित किया और जब पुरुषों को इस की गुणवत्ता के बारे में पता चला, तो उन्होंने उसे बाद में स्वीकार किया.

भूमि को ऐक्सेस करना और भूमि की मालिकाना हक अभी भी इन जगहों पर सोशल ट्रांसफौर्मेशन की दिशा में एक बड़ी समस्या है. किसी भी स्त्री की प्रोडक्टिव एसेट पर ओनरशिप बहुत कम है. नई जैनरेशन इसे सुधारने की कोशिश कर रही है, लेकिन यह तब तक संभव नहीं होगा, जब तक घर के पुरुष यह न समझ लें कि कोई भी लड़की जो भी काम करती है, उस का फायदा उस के पूरे परिवार को ही मिलेगा.

कृषि के क्षेत्र में काम करते हुए मैं ने पाया कि इस में एक अनुपात होता है, मसलन 10 हजार महिलाओं के साथ काम किया और पाया कि 10 से 12 फीसदी स्त्रियों के पास भी भूमि का मालिकाना हक नहीं था, लेकिन अभी 2 लाख किसान महिलाएं मेरे साथ हैं और इस की अनुपात बढ़ कर 49% लैंड ओनरशिप उन्हें मिल चुका है. एक बदलाव धीरेधीरे अब समाज और परिवार में हो रहा है.

पति और परिवार वालों ने दिया सहयोग 

मुसलिम परिवार की नसीम के परिवार में उन की मां के अलावा उन का ससुराल भी एक ग्रामीण परिवार से है, जहां उन के पति गांव के ही एक स्कूल के टीचर हैं. शादी तय होने से पहले नसीम ने परिवार वालों को कह दिया था कि उन्हें वही परिवार शादी के लिए मंजूर होगी, जो उन्हें शादी के बाद भी काम करने की पूरी आजादी दें. वे कहती हैं कि मेरा काम घूमनेफिरने और लोगों के पास जाने का होता है, जिस में समय सीमा तय नहीं की जा सकती क्योंकि मुझे जरूरतमंदों के पास किसी भी समय जाना पड़ता है. मैं अपनी लाइफ में शादी के बाद कोई बदलाव नहीं चाहती और यह संभव नहीं हुआ, तो मुझे शादी करनी ही नहीं है, लेकिन मेरे ससुराल वालों ने मेरी पूरी शर्तें मान लीं और मेरी शादी हुई और मैं एक बेटे की मां भी बनी.

मेरा बेटा जब छोटा था तो मेरे पति बाबासाहेब शेख और सासससुर ने मुझे पूरा सहयोग दिया है.

जलवायु परिवर्तन पर असर

नसीम का कहना है कि स्त्रियों की समस्याओं के साथसाथ क्लाइमेट पर बहुत सारा काम करती हैं क्योंकि जलवायु का असर एक नारी के जीवन पर बहुत गहरा होता है. जब सूखा पड़ता है या बाढ़ आती है, तो परिवार को खाना नहीं मिलता, डोमैस्टिक वायलेंस बढ़ती है. इस प्रकार हर चीज की कमी का असर एक महिला के जीवन पर पड़ता है. इसलिए पर्यावरण को बैलेंस करते हुए एक परिवार को कैसे आगे बढ़ाया जाए और महिला सशक्तिकरण पर ध्यान दिया जाए आदि पर काम कर रही हूं, ताकि जीवन तनावमुक्त हो. इस काम में वित्तीय जरूरतें पूरी हो जाती हैं क्योंकि ये सारे काम एक स्त्री के जीवन को सुधारने के लिए ही होता है, जिस में ट्रैनिंग की खास भूमिका होती है और इसे आगे लाने के लिए सरकार, प्राइवेट सैक्टर्स, डोनर्स आदि की भूमिका बड़ी होती है. सब को साथ आ कर एकजैसा सोचना पड़ेगा.

अभी जीवन एक बड़ी चुनौती है, आपदा कब क्या हो समझना मुश्किल होता है, लेकिन इस का असर सब से पहले परिवार में एक स्त्री पर पड़ता है क्योंकि हर परिस्थिति में उसे ही अपने परिवार को संभालना पड़ता है.

Naseem Shaikh

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