China vs America: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खप्पीपनी टैरिफों के खिलाफ चीन ने इस साल अमेरिका से सोयाबीन और मक्का खरीदना बंद कर दिया है और लाखों टन सोयाबीन और मक्का अमेरिकी खेतों में सड़ रहा है. चीन पर टैरिफ उसी राष्ट्रपति ने लगाए जो इन खेतों के मालिकों के वोटों से जीत कर आया है. एक तरह से जैसी करनी वैसी भरनी की कहावत का मामला हुआ है जिस में गोरे, धर्मनिष्ठ किसान जो रिपब्लिकन पार्टी के अंधभक्त हैं बेसिरपैर की नीतियों के शिकार हो रहे हैं.

चीन 18.57 अरब डौलर के मक्का के अमेरिका से निर्यात में से 5.21 अरब डौलर का अकेला ग्राहक था. सोयाबीन की बिक्री 70-75% चीन को होती थी. जब से डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के मुकाबले मोरचे खोले हैं, चीन ने अमेरिका से खरीदारी कम या बंद कर दी है और अमेरिकी अनाज सड़ने लगा है. चीन सूअरों को खिलाने के लिए सोयाबीन खरीदता है और अब ब्राजील व दूसरे देशों से खरीद रहा है.

अमेरिका भारत के बाजार में अपना फालतू कृषि उत्पाद बेचना चाह रहा है पर इस से भारतीय बाजार एकदम लुढ़क जाएगा और इस से भारत का गरीब किसान और भूखा मरने लगेगा, इसलिए अमेरिका की जिद पर भारत अपना बाजार खोले मानने को तैयार नहीं है. चीन खरीदने को तैयार है पर अमेरिका से नहीं. अमेरिकी राष्ट्रपति और उन की लाल टोपी वाले मागा जब तक नया बाजार ढूंढ़ेंगे तब तक 2 फसलें निबट चुकेंगी और सैकड़ोंहजारों अमेरिकी किसान डोनाल्ड ट्रंप के नारों पर विश्वास करने की कीमत चुकाते रहेंगे.

मामला खेतों का हो या इंडस्ट्री का, कोई भी नया बाजार बनाना आसान नहीं होता. ग्राहक का पता करने और फिर उस की मनपसंद की चीज बनाने में समय लगता है जो अमेरिकी किसान खास तरह की किस्म का सोयाबीन या मक्का चीन के लिए उगा रहे थे उन्हें उसे दूसरे देशों में बेचने में काफी कठिनाई होगी. नए ग्राहक यह जान कर कि बेचने वाले की गर्ज है, दाम काफी कम देंगे. भारत के किसानों की तरह अमेरिकी किसानों की हालत पतली ही रहती है, चाहे उतनी बुरी नहीं जितनी यहां है पर वहां भी बिचौलिए और व्यापारी ज्यादा मुनाफा हड़प जाते हैं. ज्यादातर किसान अमेरिका में भी कर्ज में डूबे रहते हैं पर हैं पक्के धर्मनिष्ठ और इसीलिए नए धर्मगुरु पोप डोनाल्ड ट्रंप के वोटर हैं.

अब उन्हें अपने धर्म के कारण गहरा नुकसान होगा. इस से उन की निष्ठा डिगेगी ऐसा तो नहीं लगता पर यह जरूर है कि चट्टान जैसी भक्ति में दरारें पड़ने लगी हैं क्योंकि नारेबाजी से दुनिया नहीं चलती. डोनाल्ड ट्रंप के नारों से आम अमेरिकी वैसे ही खमियाजा भरेगा जैसे अफगानिस्तान, ईरान में लोग भर रहे हैं या हिटलर और स्टालिन के युग में यूरोपीयों ने भरा था.

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