Social media : आज के सोशल मीडिया के दौर में हर उम्र के लोगों को अपने इमोशन यानि खुशी हो या गम तुरंत दुनिया के सामने रखने की आदत बन गई है. इस में बुराई नहीं है लेकिन कुछ लोग ब्रेकअप, तलाक या किसी अपने के खोने जैसे गहरे दुखद अनुभवों को भी सैलिब्रेशन के रूप में पेश करने लगे हैं. लेकिन आप खुद ही सोचिए कि क्या हर दर्द को दिखावा बनाना सही है? यह सवाल आज बेहद जरूरी हो गया है.
दुख का भी होता है अपना सम्मान
मौत, रिश्ता टूटना या तलाक आदि मामले जीवन के सब से संवेदनशील और निजी पल होते हैं. इन पलों में इंसान भीतर से टूटता है, खुद को संभालने की कोशिश करता है. ऐसे समय में सोशल मीडिया पर पोस्ट डाल कर या वीडियो बना कर उसे इवेंट बना देना, उस दर्द की गंभीरता को कम कर देता है. दुख को समझना और उसे समय देना खुद के प्रति सम्मान दिखाने जैसा है.
दिखावे की खुशी हमेशा सच्ची नहीं होती
कई बार लोग ब्रेकअप या तलाक के बाद 'मैं खुश हूं' दिखाने के लिए पार्टी, फोटोशूट या रील्स डालते हैं. लेकिन अंदर का दर्द अकसर छिपा ही रहता है. यह दिखावा कुछ समय के लिए ध्यान भटका सकता है, लेकिन असली हीलिंग (ठीक होना) तभी होती है जब हम अपने जज्बातों को स्वीकार करते हैं।
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सोशल मीडिया हर बात के लिए नहीं है
हर अनुभव को लाइक और कमैंट्स में बदल देना जरूरी नहीं है. कुछ बातें निजी होती हैं, जिन्हें सिर्फ अपने करीबी लोगों के साथ साझा करना बेहतर होता है.
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