Challenges in military families : फौजियों की ड्यूटी अकसर कठिन इलाकों में होती है जहां परिवार साथ नहीं रह सकता. महीनों तक पति से दूर रहना, बच्चों की परवरिश अकेले करना और घर की सारी जिम्मेदारियां एक लंबे समय तक खुद संभालना मानसिक रूप से थका देने वाला हो सकता है. वहीं एक फौजी जब सीमा की सख्त अनुशासन वाली दुनिया से निकल कर घर की चारदीवारी में कदम रखता है, तो उस का व्यवहार अपनी ड्यूटी और घर के बीच कहीं उलझ सा जाता है. यह 2 अलगअलग जिंदगियां होती हैं जिस में तालमेल बैठाना मुश्किल सा लगता है लेकिन अगर कोशिश की जाए, तो असंभव नहीं है.
फौज का सख्त अनुशासन घर के माहौल में कभीकभी फौज का सख्त अनुशासन घर के माहौल में भी आ जाता है. अगर पति घर पर भी ‘कमांडिंग’ व्यवहार रखते हैं, तो आपसी तालमेल में दिक्कत आ सकती है.
सालों तक आदेश देने और मानने की आदत के कारण कई फौजी घर में भी हर चीज परफैक्ट और समय पर चाहते हैं. जूतों का सही जगह होना या बच्चों का समय पर सोना आदि छोटी बातों पर वे कभीकभी सख्त हो सकते हैं.
घर के अनुशासन को अपनी यूनिट की तरह चलाना चाहते हैं
परेशानी तब होती है जब पति घर आ कर घर के अनुशासन को अपनी यूनिट की तरह चलाने की कोशिश करता है. अगर आपसी संवाद (Communication) अच्छा है, तो पत्नियां इन आदतों को प्यार से संभाल लेती हैं नहीं तो घर का माहौल भी एक जंग के मैदान की तरह हो जाता है जहां हरकोई अपनेआप को सही प्रूफ करने में लगे होते हैं और अपनेअपने हिस्से की जंग एकदूसरे से लड़ रहे होते हैं.
कमांड करने की प्रवृत्ति
लंबे समय तक जवानों को कमांड देने के कारण उन के बात करने का लहजा कभीकभी अनुरोध के बजाय आदेश जैसा लगने लगता है. वे चाहते हैं कि उन के कहे बिना ही काम हो जाए. जो फौजी एक तरफ तो सिर्फ हुक्म देता हो और दूसरी तरफ मरनेमारने पर तैयार रहता हो उसे हुक्म देने की इतनी आदत हो जाती है कि वह अपनी पत्नी पर भी हर वक्त रौब मारता है, उसे किसी काम के लिए भी कहता है तो भी मानों आदेश दे रहा हो और यह बात अब तक अकेली आजाद रह रही बीवी को रास नहीं आती है और उन के झगड़े बढ़ने लगते हैं जिस का गलत प्रभाव बच्चों और घर के माहौल पर पङता है.
फौजी की पंक्चुअलिटी और परिवार
फौज में 05:00 का मतलब 05:01 नहीं होता. घर में जब पत्नी या बच्चे तैयार होने में देरी करते हैं या खाने का समय ऊपरनीचे होता है, तो उन्हें लगता है कि समय की बरबादी हो रही है. यह सख्ती अकसर घर के सदस्यों को तनाव में डाल देती है क्योंकि उन्हें लगता है कि घर एक आराम की जगह है, परेड ग्राउंड नहीं.
यस सर सुनने की आदत हो जाती है
एक शहरी आदमी को अपने काम कराने के लिए कई लोगों की जी हजूरी करनी पड़ती है लेकिन जो आदमी सेना में चला जाता है उस में हर बात के लिए यस सर होता है क्यों सर नहीं होता. वहां पर जिस के पास ताकत है उस ने अगर कहा कि जवान बैठ जा या लेट जा तो वह बिना सवाल पूछे उस आदेश को मान लेते हैं. ऐसे आदमी जब घर में आते हैं तो वे यही चाहते हैं कि परिवार के लोग भी इन के साथ वैसा ही बिहेव करें.
लेकिन इन की पत्नियां भी शुरू से अकेली रह रही होती हैं और उन्होंने भी पति के बिना घर की पूरी सत्ता संभाली होती है. उन्हें किसी से इस तरह का आदेश सुनने की आदत नहीं होती और इन्ही बातों को ले कर दोनों के बीच ईगो क्लैश कर जाती है और कई बार उन का रिश्ता बहुत सारे क्लेशों से घिर जाता है.
परफैक्शन एक लत बन जाती है
फौज में हर चीज का एक तय स्थान है, हथियारों से ले कर जूतों तक. घर आने पर जब उन्हें चीजें बिखरी हुई मिलती हैं या योजना के मुताबिक काम नहीं होता, तो वे मानसिक रूप से असहज हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि अनुशासन ही जीवन को सरल और सफल बनाता है, इसलिए वे वही फौर्मूला घर पर भी लागू करना चाहते हैं.
इस बात को ले कर बच्चे तक परेशान हो जाते हैं और एक दिन वे अपने पिता को चिल्ला कर कहते हैं कि हम अपने घर में रहते हैं होटल में नहीं इसलिए हमारी जिंदगी को अपने हिसाब से चलाना बंद करिए. यह बात फौजी को भी गहरे तक चुभ जाती है और तब उसे एहसास होता है कि यह घर अब मेरा उतना नहीं है जितना मैं सोच रहा था. यहां सब की अपनी जिंदगी है.
फौजियों की बीवियां भी रौबीली होती हैं
फौजियों की बीवियां दबंग होती हैं. जब तक पति पोस्टिंग पर होते हैं तब तक तो फौजी पत्नियां बड़े मजे में रहती हैं, सैलरी मिलती है, मौजमस्ती मिलती है, पति अपने पर कुछ खर्चता नहीं है क्योंकि उस का सारा खर्चा लगभग सरकार उठाती है, सब पैसा पत्नी के हाथों में रहता है. घर मिल जाता है, नौकरचाकर मिल जाते हैं.
जब पति लौट कर आ जाता है
इस का जवाब देते हुए अर्पणा कहती हैं मैं भी एक फौजी की बीवी हूं. मेरे पति और मेरे बीच बहुत प्यार था लेकिन जब वे रिटायर हो कर घर आए तो उन का एक अलग ही रूप देखा मैं ने. वे हिटलर बन गए थे. हर बात का रौब मुझ पर चलाते थे. यहां तक कि पैसों का हिसाब मांगते थे. यह गलत नहीं था पर फिर भी मुझे बरदाश्त नहीं था कोई मुझ से हिसाब मांगे क्योंकि पूरी जिंदगी घर मैं ने चलाया है. अब अचानक से कोई मुझ पर कोई रौब चलाए यह मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं था. हमारे झगड़े बढ़ते गए और हम एक कमरे से कब 2 अलग अलग कमरों में शिफ्ट हो गए पता ही नहीं चला.
फौजी बीवियां पति की दखलंदाजी बरदाश्त नहीं कर पातीं
सेना में जाने वाले पति और उन की पत्नियों से डील करना आसान नहीं है. मकान खरीदना, बैंक में खाता खुलवाना, बच्चों का एडमिशन करना आदि सब काम फौजी की बीवियां करती हैं. पति सिर्फ पैसा भेजता है और नौकर या अर्दली का इंतजाम कर देता है. लेकिन जिम्मेदारी तो बीवी की ही होती है. वे पूरी तरह से इंडिपेंडेंट होती हैं फिर उन्हें किसी की दखलअंदाजी पसंद नहीं आता है. वे पति की दखलंदाजी बरदाश्त नहीं कर पातीं.
मैंटली स्ट्रौंग होती हैं फौजन
वे इस बात के लिए भी तैयार होती हैं कि हमें कभी भी अकेले रहना पङ सकता है, कभी भी पति शहीद हो सकते हैं. उन्हें पता होता है कि पति ऐसी नौकरी में हैं जिस में डेथ के चांस काफी ज्यादा होते हैं. वे मैंटली स्ट्रौंग होती हैं और उन्हें बहुत सारे काम खुद ही करने पङते हैं. लेकिन जब पति आ जाता है, चाहे 6 महीने के लिए आया हो, 6 साल के लिए आया हो या फिर रिटायर हो कर आया हो, उन की जिंदगी मानों हिल जाती है. ये पूरी तरह से इंडिपेंडेंट होती हैं और इन्हें अपने तौरतरीकों पर किसी का सवाल उठाना नहीं भाता.
फौजी पतियों में लौजिक नाम की कोई चीज नहीं होती है
ये अपने बच्चों को भी कंट्रोल नहीं कर पाते क्योंकि इन की जिंदगी में लौजिक नाम की कोई चीज नहीं होती है. हमला करने का और्डर मिला तो कर दिया पर बदले में सामने वाला भी हमला करेगा या फिर क्यों कर रहे हैं, इस का नतीजा क्या होगा इस से उन्हें कोई मतलब नहीं क्योंकि उन का काम सिर्फ और्डर का पालन करना होता है.
जब यह मानसिकता घर में आ जाएं तब क्या होता है
तब बच्चे भी इरिटेट होते हैं क्योंकि ये बच्चों के स्कूल में जाएंगे और टीचर 5 मिनट देर से आएं तो उस से लड़ लेंगे. अपना रौब दिखाएंगे, उसे समय के पाबंद के किस्से सुनाने लगेंगे. हर जगह रौब दिखाएंगे. इन बातों से बच्चे तो नाराज होते ही हैं साथ ही पत्नी भी इन्हें समझती हैं कि ये सिविलियंस की रहने की जगह है यहां हर किसी से झगड़ा न करो. लेकिन ये बीवी की नहीं सुनते. ऐसे में बीवी कुछ कर नहीं पाती बस कुढ़ती रहती है और एक दिन यही कुढ़न बड़े झगड़े के रूप में बाहर निकल आती है.
फौजी पति और पत्नी आपस में सामंजस्य कैसे बैठाएं
कमांडिंग औफिसर मोड को स्विचऔफ करना : फौज में आदेश देना उन की ट्रेनिंग का हिस्सा है, लेकिन घर पर उन्हें यह समझना होगा कि यहां वे एक साझेदार (Partner) हैं, बौस नहीं. घर आने पर उन्हें अपनी यूनिट वाली भाषा को पारिवारिक भाषा में बदलना चाहिए. घर की छोटीछोटी अव्यवस्थाओं को अनुशासन की कमी के बजाय जीवन की सहजता के रूप में देखना शुरू करना चाहिए.
पत्नी की भूमिका : पत्नी को भी यह समझना चाहिए कि पति की सख्ती उन के स्वभाव का हिस्सा बन चुकी है, उसे व्यक्तिगत (Personal) न ले कर प्यार से टोकना चाहिए.
पत्नी का सम्मान करना आना चाहिए : जब पति महीनों सीमा पर होते हैं, तो पत्नी घर के हर छोटेबड़े फैसले खुद लेती हैं. जब पति घर आएं, तो उन्हें अचानक से सारा नियंत्रण अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए. इसके बजाय, उन्हें पत्नी से पूछना चाहिए कि तुम ने अब तक इसे कैसे मैनेज किया? तुम्हारी राय क्या है? इस से पत्नी को सम्मान महसूस होता है और उसे लगता है कि उस के संघर्ष की कद्र की गई है.
पत्नी की भूमिका : पत्नी को भी चाहिए कि वह पति को घर के शांत माहौल में ढलने के लिए थोड़ा समय दे. अब आप अकेले नहीं हैं इसलिए मिलजुल कर ही घर की जिम्मेदारी बांटें.
मेंटर और सलाहकार की भूमिका : एक फौजी पति को अपनी पत्नी को केवल घर संभालने वाली के रूप में नहीं, बल्कि एक सलाहकार के रूप में देखना चाहिए. चाहे वह आर्थिक निवेश (Investment) हो या भविष्य की प्लानिंग, जब पति अपनी पत्नी की बुद्धिमानी पर भरोसा करता है और उस से सलाह लेता है, तो आपसी तालमेल गहरा हो जाता है.
पत्नी की भूमिका : पत्नी भी लड़े बिना पति को सारी बाते प्यार से समझाएं. उसे धीरेधीरे सिविलियन की दुनिया में वापस लाएं. हर बात पर टोके और लड़ें नहीं. कुछ उन की सुनें कुछ अपनी चलाएं.
इन पर भी ध्यान दें
घर के कुछ हिस्सों में फौजी पति के अनुशासन का सम्मान हो (जैसे उन का सामान व्यवस्थित रखना), लेकिन बच्चों की मस्ती या घर की छोटीमोटी अव्यवस्थाओं को ले कर पति को थोड़ा लचीला होना चाहिए.
निवेश, बच्चों का कैरियर और रिटायरमेंट के बाद की योजनाएं मिल कर बनाएं. जब लक्ष्य साझा होते हैं, तो छोटेमोटे मनमुटाव अपनेआप कम हो जाते हैं.
पति को पत्नी के अकेले संघर्ष की और पत्नी को पति के कठिन जीवन की सराहना करते रहना चाहिए. इस तरह जब दोनों एकदूसरे को बराबर का हिस्सेदार मानते हैं और घर को एक टीम की तरह चलाते हैं, तो अनुशासन और प्यार का एक बहुत ही सुंदर संगम बन जाता है उन का घर.
