Arunima sinha everest story : अरुणिमा सिन्हा साहस, संकल्प और समर्पण की कहानी है. 2011 में 24 वर्षीय राष्ट्रीय स्तर की वौलीबौल खिलाड़ी अरुणिमा सिन्हा को चोरों ने चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया क्योंकि उन्होंने अपनी सोने की चेन देने से इनकार कर दिया था. पटरी से ट्रेन के गुजरने से उन का बायां पैर कट गया. एक पैर कटने के बाद अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए अरुणिमा सिन्हा ने एक ऐसा संकल्प लिया जो सामान्य लोगों के लिए भी आसान नहीं था. उस दिन से उन का मकसद दुनिया के सब से ऊंचे शिखर माउंट ऐवरैस्ट पर चढ़ना था. 2013 में उन्होंने यह कर दिखाया और ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला बनीं. 2015 में उन्हें भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया गया.
अरुणिमा सिन्हा अब तक दुनिया के सभी सातों महाद्वीपों यानी कौंटिनैंट्स की सब से ऊंची चोटियों पर तिरंगा फहरा कर पहले ही इतिहास रच चुकी हैं. उन्होंने ऐवरैस्ट के अलावा किलिमंजारो (अफ्रीका), एल्ब्रस (यूरोप), कोसियुस्को (आस्ट्रेलिया), एकानकागुआ (दक्षिण अमेरिका), डेनाली (उत्तर अमेरिका) और विंसन मासिफ (अंटार्कटिका) पर भी विजय प्राप्त की है. वे दुनिया की पहली महिला दिव्यांग हैं जिन्होंने सातों महाद्वीपों की सर्वोच्च चोटियों को फतह किया है.
अरुणिमा उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले से हैं जो लखनऊ से 200 किलोमीटर दूर है. उन के पिता सेना में इंजीनियर थे और मां सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में स्वास्थ्य पर्यवेक्षक थीं. अरुणिमा की एक बड़ी बहन और एक भाई है.
जिंदगी बदलने वाला हादसा
अरुणिमा बचपन से ही खेलकूद में रुचि रखती थीं. अपने स्कूल में वे वौलीबौल की अच्छी खिलाड़ी रही थीं. जैसेजैसे समय बीतता गया अरुणिमा की पहचान वौलीबौल खिलाड़ी के रूप में राष्ट्रीय स्त्तर पर होने लगी. वे 7 बार चैंपियन रहीं. बाद में अरुणिमा एक जौब इंटरव्यू के सिलसिले में 11 अप्रैल, 2011 की रात पद्मावत ऐक्सप्रैस से लखनऊ से दिल्ली जा रही थीं. उस दौरान उन के साथ हुए एक ऐक्सीडैंट ने उन की दुनिया बदल दी.

दरअसल, कुछ लुटेरे ट्रेन में घुस आए और उन की गोल्ड की चेन छीनने की कोशिश करने लगे. करीब 4-5 लुटेरे थे और अरुणिमा अकेली थी. अरुणिमा ने उन का डट कर मुकाबला किया मगर चेन बचाने की कोशिश करने पर लुटेरों ने उन्हें चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया. वे सामने से आ रही एक ट्रेन से टकराईं और दूसरी पटरी पर जा गिरीं. इस से पहले कि वे अपना बायां पैर पटरी से हटा पातीं पटरी पर आ रही एक और ट्रेन उन के पैरों के ऊपर से गुजर गई. अरुणिमा का एक पैर कट गया. वे रातभर पटरियों पर घायल और खून से लथपथ पड़ी रहीं. उन के पास से कितनी ही ट्रेनें गुजरती रहीं.
सुबह ग्रामीणों ने देखा तो उन्होंने अरुणिमा को लोकल हौस्पिटल में दाखिल कराया. गैंग्रीन को रोकने के लिए उन के बाएं पैर को घुटने के नीचे से तुरंत काटना पड़ा. उस अस्पताल में सुविधाओं की कमी थी. बाद में जब मामला टूल पकड़ने लगा तो तत्कालीन खेल मंत्री ने उन्हें एम्स में भरती कराया. अरुणिमा का दाहिना पैर भी इस हादसे से पूरी तरह अछूता नहीं रहा था. दाहिने पैर में घुटने से टखने तक एक रौड डाली गई. ऐल्बो टूट गए थे. स्पाइन की डिस्क भी टूटी थी. अरुणिमा की काफी क्रिटिकल कंडीशन थी. वे 4 महीने एम्स में एडमिट रहीं. लोग छोटीछोटी चोटों पर बैठ जाते हैं लेकिन वे कहती हैं कि उन के लिए फिजिकल से ज्यादा मैंटल टौर्चर तकलीफ दे रहा था.
दरअसल, जब अरुणिमा अपनी जिंदगी के लिए संघर्ष कर रही थीं तब उन्हें पता भी नहीं चला कि वे मीडिया में सनसनी बन चुकी हैं. वे 4 महीने हौस्पिटल में थीं और उस दौरान बाहर नैगेटिविटी चल रही थी. वे बताती हैं कि जीआरपी के डीजे ए के जैन ने कह दिया था कि वह सुसाइड के लिए गई थी या फिर किसी फैमिली मैंबर ने ही नौकरी के लिए धक्का दे दिया होगा ताकि विकलांग कोटे में तुरंत नौकरी मिल जाए. इस के बाद मीडिया ने अरुणिमा से क्रौस क्वैश्चन किए तो वे बोलीं, ‘‘जैन साहब बहुतबहुत धन्यवाद. आप ने मेरे साथ इतनी अच्छी सहानुभूति दिखाई. चलिए कोई बात नहीं है. आप फिलहाल डीजे हैं. अगर मैं आप को मौका दूं कि आप पैर कटवा लेते हैं तो हम किसी भी तरह आप को एक स्टेट का गवर्नर बनवा देंगे. ऐसे में बताइए क्या आप को मंजूर होगा?’’
यह सब लाइव चल रहा था. डीजे साहब वहां से चले गए लेकिन बाद में ऐवरैस्ट फतह कर के लौटने पर वे बोले कि कुछ गलतफहमियां हो गई थीं. मैं जानता था कि अरुणिमा बहुत काबिल लड़की है.
इस घटना पर अरुणिमा कहती हैं कि जीवन में क्रिटिसीज्म करने वाले ऐसे लोग न आएं तो हम को खुद भी पता न चले कि हम कितने काबिल हैं. लाइफ में ऐसे क्रिटिसाइज करने वाले लोग होने जरूरी हैं तभी आप चैलेंजेस लेते हैं. कहीं न कहीं उस क्रिटिसीज्म की वजह से ही एक पैर कटने के बाद अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए अरुणिमा सिन्हा ने ऐसा संकल्प लिया जिसे ज्यादातर लोग असंभव मानते थे. 2013 में उन्होंने यह कर दिखाया और ऐसा करने वाली पहली विकलांग भारतीय महिला बनीं.
कैसे था प्रोस्थेटिक लैग
अरुणिमा कहती हैं, ‘‘अमेरिका के राकेश कुमार श्रीवास्तव ने मु?ो प्रोस्थेटिक नौर्मल लैग डोनेट की थीं जिस से मैं ने ऐवरैस्ट पर चढ़ाई की. प्रोस्थेटिक लैग्स कई तरह की होते हैं. एक बेसिक पैर होता है. जयपुर फुट नौर्मल होता है जो चलने या दैनिक काम करने के लिए होता है. मेरा पैर बेसिक था मगर अच्छा वाला था. खुद राकेश कुमार का भी राइट पैर नहीं था. उन के भाई शैलेश कुमार श्रीवास्तव हैं. दोनों डाक्टर हैं. वे भी सरप्राइज थे कि इस पैर से ऐवरैस्ट क्लाइंब कैसे किया. वह पैर एकडेढ़ लाख का होगा. आज जो प्रोस्थेटिक लैग्स मेरे पास हैं करीब 13-14 लाख की हैं. ये काफी सुविधाजनक हैं. मगर उस समय बेसिक लैग थी जो बारबार निकल जाती थी. टूट जाती थी.’’
क्लाइंबिंग की तैयारी
पहले तो आर्टिफिशियल लैग के साथ चलना सीखा. उस के बाद मैं ने बर्फ में उत्तराखंड, लेह लद्दाख और नेपाल में बहुत सारी ट्रेनिंग ली है. फिर बछेंद्री मैम के अंडर रह कर आगे बढ़ना सीखा. स्टार्टिंग में जब मैं क्लाइंबिंग के लिए गई तो सब कहते थे कि यह तो पागल है. इस से नहीं होगा. मेरे पैरों से ब्लड आने लगता था क्योंकि नईनई प्रोस्थेटिक लैग लगी थी. प्रोस्थेटिक लैग के कारण फ्रैक्शंस की वजह से ऊपर की पूरी चमड़ी निकल जाती थी. नौर्मल इंसान नए शूज पहनता है तो भी नीचे ऐंकल्स पर छिल जाता है. तब आप उन्हें निकाल कर अलग रख देते हैं.
मेरे साथ समस्या यह थी कि मैं उन्हें निकाल भी नहीं सकती थी. कभीकभी यह होता था कि नकली पैर पहन के रखे हैं मगर रगड़ की वजह से चमड़ी निकल गई और जगह गुलाबी हो जाती थी. यह सब देख कर सब यही कहते थे कि ऐसे में चल कैसे रही है. लेकिन मैं फिर अगले दिन तेल लगा कर चल देती थी. दर्द होता था मगर मन के हारे हार होती है. मन का घाव ज्यादा गहरा था और उसे ठीक करने के लिए फिजिकल तकलीफ सहनी ही थी.
कैसा रहा ऐवरैस्ट फतह करने का अनुभव
मेरा मन कर रहा था दोनों हाथ ऊपर कर के चिल्लाऊं. मैं टौप औफ द वर्ल्ड पर थी. माइनस टैंप्रेचर में कैमरे की बैटरी काम नहीं करती इसलिए मैं कैनन का छोटा सा कैमरा और कुछ डिस्पोजल कैमरा ले कर गई थी. बैटरी बौडी से टच कर के ले गई थी. फिर शेरपा से फोटो निकलवाए थे.
मैं ने वीडियो भी बनवाया था और बोला था कि आज ऐसी हालत होने के बाद भी मैं टौप औफ द वर्ल्ड पर आ सकती हूं तो आप क्यों नहीं. जरूरत सिर्फ एक सोच और गोल की है. मैं ने खुद को साबित कर दिया था. 2011 में ऐक्सीडैंट हुआ था 2013 में मैं ने ऐवरैस्ट समिट किया था.
ऐवरैस्ट की चढ़ाई में टोटल 52 दिन लगे थे. ट्रेनिंग का पार्ट अलग था. जब भी पीक पर जाते हैं तो लोकल गाइड लेते हैं जिन्हें शेरपा कहा जाता है. शेरपा ने मु?ो देखा तो यही कहा था कि इस लड़की का एक पैर नहीं है दूसरे में भी रौड है जो माइनस टैंप्रेचर में क्रैक हो जाएगा. यह नहीं जा पाएगी. तब बछेंद्रीजी ने उसे डांटा और कहा कि अरुणिमा समिट करेगी. मेरी ट्रैनिंग करीब 2 साल चली थी.
ऐवरैस्ट पर जाने के लिए 4 कैंप लगते हैं. कैंप 3 से औक्सीजन लगनी शुरू हो जाती है. लास्ट चौथा कैंप है. अंत में समिट है. कैंप 4 से जब समिट यानी टौप की तरफ जाते हैं तो पानी की बोतल, मैट्रेस, खाने पीने की चीजें ले जाते हैं. नौर्मल लोगों को 16-17 घंटे लगते हैं मगर प्रोस्थेटिक लैग की वजह से मु?ो 28 घंटे लगे थे. ऐवरैस्ट की चढ़ाई के लिए जाते समय बहुत सामान जैसे स्लीपिंग बैग, थोड़ाबहुत खाने की चीजें, मैट्रेस आदि होते हैं जिन्हें खुद ले कर जाना होता है. टैंट शेरपा ले लेते हैं. बेस कैंप के ऊपर असली कहानी शुरू होती है. आप के पास जितनी ताकत है उतनी खाने की चीजें लो. ताकत नहीं है तो मत लो. शेरपा आगेआगे जाता है और रूट क्लियर करता जाता है.
खाने के लिए केवल सर्वाइवल की चीजें लेते हैं जैसे चौकलेट, रैडी टू ईट, सप्लिमैंट्स आदि. पानी के लिए वहीं का बर्फ गरम कर पानी बनाते हैं. खाने की ऐसी चीजें लेते हैं जो ऐनर्जी दें मगर वजन ज्यादा न हो. प्रोटीन शेक वगैरह. इस के अलावा औक्सीजन सिलैंडर, हौट बोतल, टैंट वगैरह होते हैं. बेस कैंप के ऊपर करीब 15 किलोग्राम तक का सामान ले जाना पड़ता है. बीचबीच में कैंप में सामान कम करते जाते हैं.
महिलाओं को क्लाइंबिंग करते समय पीरियड्स के दौरान काफी कठिनाई आती है. नौर्मल दिनों में ही हम पीरियड्स के समय कितना अनकंफर्ट फील करते हैं. वहां पर पीरियड्स होते हैं तब आप को मैनेज करना बहुत कठिन होता है और वह भी तब जब आप का एक पैर नहीं है. नकली पैर के साथ पीरियड्स मैनेज कर पाना आसान नहीं होता. इतने दर्द में क्लाइंबिंग करना होता है. मगर सच यह है कि अगर मकसद क्लियर है तो आप को कोई भी प्रौब्लम रोक नहीं सकती. अपने माइंड को ट्रेंड करना जरूरी होता है. तभी आप ऐक्सट्रीम प्रौब्लम्स फेस कर पाते हैं.
फैमिली लाइफ
अरुणिमा सिन्हा बताती हैं कि शादी के बाद जिंदगी काफी बदल गई है. उन की गौरव सिंह के साथ शादी हुई है जो लव कम अरैंज्ड मैरिज है. गौरव हरियाणा से हैं और पैराओलिंपिक में मैनेजमैंट में थे. अरुणिमा वहां खेलने जाती थी तो मुलाकात वगैरह हुई. घर वालों को पता चला तो उन्होंने शादी करा दी. अब अरुणिमा 2 बच्चों की मां हैं जिन में बड़ा बेटा 3 साल का और बेटी डेढ़ साल की है. अब अरुणिमा का ज्यादा समय बच्चों को संभालने में बीतने लगा है.
मगर फिर भी उन्होंने अपने काम से मुंह नहीं मोड़ा है. वे अभी मोटिवेशनल स्पीकर हैं और जगह जगह स्पीच देने जाती हैं. उन्हें माउंटेनिंग से दूर हुए 3 साल हो गए हैं लेकिन सपनों की उड़ान की तैयारी अभी भी है. फिलहाल उन्होंने साउथ पोल समिट पर जाने की तैयारी करनी शुरू कर दी है.
कैसे बनें माउंटेनियर
माउंटेनियर के रूप में आगे बढ़ने के बहुत मौके हैं. जहां भी आप मेहनत करेंगे वहां अवसर बनते हैं. बिना प्रौब्लम के अवसर नहीं आते हैं. चुनौतियां ही आप को मौका देती हैं. माउंटेनियरिंग में आप का कौन्फिडैंट बहुत जबरदस्त बिल्ड होता है. आप को किसी भी अकादमी में ये सब चीज नहीं बताई जाती हैं. यह आप को नेचर बताता है. कैसे कम चीजों में सरवाइव करना है, कैसे आप के पास कुछ भी नहीं है फिर भी आप को जिंदा रहना है, अपने टारगेट को पाना है, विषम से विषम परिस्थितियां लाइफ में आएंगी मगर वह सब ओवर कम कर के आप को टारगेट पर फोकस करना है और उसे अचीव करना है. माउंटेनियरिंग में यह सब डायरैक्ट नेचर सिखाता है.
नौर्मल लाइफ में आप गलतियां करते हैं, फिर सौरी बोलते हैं और आगे निकल जाते हैं. मगर इस फील्ड में ऐसा नहीं है. आप ने गलती की है तो सजा मिलेगी. कोई गलती करने का चांस नहीं है. सौरी नहीं होती. गलती बहुत भारी पड़ती है. कभीकभी लोगों की जान भी चली जाती है. प्लानिंग, लीडरशिप, रिस्क लेना ये सारी चीजें माउंटेनियरिंग सिखाता है. कभीकभी लाइफ में कोई और नहीं होता आप के आसपास सम?ाने या बताने वाला क्योंकि आप बड़े हो गए हैं.
जब तक आप छोटे थे पैंसिल से लिखते थे जिसे आप इरेजर से मिटा सकते थे. लेकिन अब आप पैन से लिखने लगे हैं. अब आप का लिखा मिटेगा नहीं भले ही फट जाएगा. इसलिए लिखिए मगर पूरी प्लानिंग से, ढंग से सोच कर लिखिए तो वे चीजें जब छपेंगी तो दुनिया को दिखेंगी.
भविष्य की योजनाएं
अभी मैं ने साउथ पोल के लिए ट्रेनिंग की शुरुआत कर दी है. स्लैब खींचने की ट्रेनिंग स्टार्ट हो चुकी है क्योंकि वहां पर स्की पर चलना है. आप को स्टिक ले कर कंटीन्यू चलना होगा. अंटार्कटिका में 6 महीने दिन 6 महीने रात रहती है. वाच में टाइमिंग के अनुसार आप सो जाएंगे. आप को उसी टाइमिंग के अनुसार उठना होगा. डे वाले समय में मैं वहां जाऊंगी. डे टाइम में ही अचीव कर के वापस आना है. दोढाई महीने का समय लगेगा.
महिलाओं की सुरक्षा
अरुणिमा कहती हैं कि लड़की को सबकुछ सिखाओ जो लड़के को सिखाते हैं. कराटे सिखाओ, फाइटिंग करना सिखाओ. जब तक आप स्वयं की सुरक्षा स्वयं नहीं करेंगे यकीन मानिए कोई और आप को बचाने नहीं आएगा. अपनी लाज खुद ही बचानी होगी. आप अपना महिला जीवन मत भूलिए. मेकअप कीजिए मगर अपनी बौडी को खूबसूरत बनाने के साथसाथ उसे मजबूत भी बनाएं ताकि गलत नजर डालने वाले को मजा चखा सकें.
हर घर में ऐसा होना चाहिए. लड़की को सोनाचांदी मत दो मगर डाइट अच्छी दो और सबल बनाओ ताकि वह सैल्फ डिफैंस कर सके. उसे आत्मनिर्भर और ताकतवर बनाइए. उस के पास पावर होनी चाहिए क्योंकि लड़की को समाज की प्रताड़ना झेलने के लिए तैयार होना पड़ता है.
प्रेरणास्रोत
मेरी प्रेरणास्रोत मेरी मां, बछेंद्रीजी और विवेकानंद हैं. मां मेरी सब से बड़ी प्रेरणास्रोत हैं. जिस की बेटी का पैर कटा हो ऐसा नहीं है कि वह दुखी जरूर होगी. लेकिन मु?ो उन्होंने हमेशा यह कहा कि देख जो होना था वह हो गया और उस को ऐक्सैप्ट कर के जीवन को आगे बढ़ाने की सोच. मेरे जीवन में हमेशा उन का बहुत सहयोग रहा है.
ऐवरैस्ट समिट के समय जब स्पौंसर नहीं मिल रहा था उन्होंने कहा कि अपना घर तक बेच देंगे लेकिन तुझे ऐवरैस्ट क्लाइंब करवाएंगे. उन्होंने हर समय मुझे सपोर्ट किया. इसी तरह बछेंद्रीजी ने भी मुझे बहुत प्रेरित किया है. उन की बातों से मुझे हौसला मिलता था. विवेकानंद भी मेरे प्रेरणास्रोत हैं. आप के पूरे जीवन में चुनौतियां आती रहती हैं. आप भाग नहीं सकते हैं. परेशानियां आप के जीवन में आती रहेंगी लेकिन रूप बदल जाते हैं. आप को उन्हीं चुनौतियों से प्रेरणा ढूंढ़ कर आगे बढ़ना होता है.
पन्नों पर उतरते रहे अनुभव
अरुणिमा बताती हैं कि ऐवरैस्ट समिट के दौरान मैं सारा अनुभव लिखती थी. कब कहां पहुंची और कैसा फील हो रहा है यह सब डायरी के पन्नों पर लिखती रहती थी. डायरी हमेशा मेरे साथ रहती थी. मैं ने सिंपल भाषा में लिखा था. फिर उसे इंग्लिश में अनुवाद किया गया और ‘बोर्न अगेन इन द माउंटेन’ नाम से किताब आई. यह किताब करीब 7-8 लैंग्वेज जैसे गुजराती, तमिल, बंगाली, कन्नड़ आदि में भी छपी है. यह बैस्ट सेलर किताब है. इस का प्रधानमंत्री के हाथों विमोचन हुआ था. अब मेरी एक और किताब आने वाली है.
अरुणिमा को बहुत सारे पुरस्कार मिले हैं जिन में मुख्य हैं-
पद्म श्री (2015)- भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार.
तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार (2014)- यह भारत का सर्वोच्च साहसिक पुरस्कार है.
सर्वश्रेष्ठ महिला पर्वतारोही का राष्ट्रीय पुरस्कार (2013)- पर्वतारोहण में उन के असाधारण साहस और उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया गया.
सत्यजीत रे पुरस्कार- उन की प्रेरणादायक कहानी और समाज में योगदान के लिए.
अंतर्राष्ट्रीय महिला संघ द्वारा वूमन औफ द ईयर पुरस्कार- साहसिक खेलों में एक महिला के रूप में उन की उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए.
