Poor road maintenance : सड़कों का मैनेजमैंट देशभर में बद से बदतर होता जा रहा है. न केवल सड़कों पर गड्डे जब मरजी आ जाते हैं, सड़कों के मोड़, उन पर खुदाई, उन पर मलबा डालना भी जानलेवा होता जा रहा है. दिल्ली में पिछले माह 2 युवाओं की मौत सिर्फ इसलिए हुई कि सड़क किसी गहरे गड्डे में जा रही है, चलाने वालों को पता ही नहीं चला.

नोएडा में एक कार एक बिल्डिंग के बेसमैंट के लिए खुदे गहरे गड्ढे में जा गिरी, जिस में कितने ही फुट पानी भरा था और भीड़ के सामने धीरेधीरे युवा चालक के साथ कार डूब गई. दूसरे मामले में सड़क पर जलबोर्ड के खोदे 15 फुट गहरे गड्ढे में बाइक समेत युवा चालक जा गिरा.

चाहे दोनों मामलों में थोड़ी गलती चालकों की हो, यह पक्का है कि देशभर में सड़क मैनेज करने वाले यूज करने वालों की तकलीफों के  प्रति बेखबर ही रहते हैं. अब एयरकंडीशंड कमरों में बैठे रोड इंजीनियरों को टैंडरों की ज्यादा चिंता रहती है, यूजर्स की कम. सड़कों पर दुर्घटनाओं के लिए रोड इंजीनियरिंग और रोड मैनेजमैंट ज्यादा जिम्मेदार हैं बजाय ड्राइवरों की गलती के.

हमारे यहां सड़कें गरीब की लुगाई, सब की भौजाई की तरह हैं जिन्हें किसी भी तरह बरबाद किया जा सकता है. सड़कों के नामकरण के लिए हल्ला मचाने वाले सड़कों के मैनेजमैंट की नहीं सोचते. सड़कों पर रातोंरात मंदिर उग आते हैं. सड़क मरम्मत करने के नाम पर हफ्तों सड़क पर रोड़ी, ईंटें, पत्थर पड़े रहते हैं. जल, बिजली, फोन विभाग जब मरजी, जहां मरजी एक छोटा सा सावधान का बोर्ड लगा कर या तो मलबा डाल देते हैं या उसे खोद डालते हैं.

कहीं तो इंजीनियरिंग इतनी बेवकूफी की होती है कि ब्रिज को अधूरा छोड़ दिया जाता है और वही फ्लाईओवर अचानक

90 के कोण पर मोड़ पर मुड़ जाता है. वहीं सड़क के बीच में अचानक आइलैंड बना कर उसे 2 हिस्सों में बांट दिया जाता है तो कहीं यू पिन मोड़ को बेहद नुकीला बना दिया जाता है.

सब से ज्यादा दोषी सरकारी इंजीनियर होते हैं पर सब से ज्यादा सुरक्षित वे ही रहते हैं और सब से ज्यादा सजा उन घरों को मिलती है जिन के परिवार बेबात में इंजीनियरों के कारण अपने परिवार के एक दुलारे को खो बैठते हैं. जहां मरने वाला इकलौता कमाऊ हो वहां तो इस का दंश वर्षों पत्नियां, बच्चे, पेरैंट्स ?ोलते हैं. सरकारी इंजीनियरों को कभी पकड़ा नहीं जाता. उन की कारगुजारी या निकम्मापन फाइलों में दबा रह जाता है.

सड़कें शहरी जीवन के लिए लाइफलाइन हैं और इन का सही मैनेजमैंट पहली प्रायोरिटी होना चाहिए पर ये सब से ज्यादा इग्नोर की जाती हैं. न सही सड़कों के लिए शाबाशी मिलती है, न खराब सड़कों के लिए सजा. ठेकेदारों का और्डर कैंसिल हो जाता है. प्राइवेट बिल्डर कहीं मिल जाए तो उसे जेल में ठूंस दिया जाता है पर उस से रोते परिवारों को क्या मिलता है? अगर कहीं 2-4 लाख अखबारी सुर्खियों में आने के लिए कोई नेता दे भी दे तो कुछ बनता नहीं है.

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