Power of education : दिल्ली जैसे ऐजुकेटेड लोगों के शहर में केवल 5 में से  1 औरत वर्किंग है और 75% ऐजुकेटेड युवतियों को भी घरों में किचन, इनलाज, बच्चों, हसबैंड की देखभाल के लिए रहना पड़ता है. जो कार्य कर रही हैं उन में से 2 तिहाई की समस्या कम्यूटिंग है क्योंकि दिल्ली में दूरियां बहुत बढ़ गई हैं और वर्क प्लेस जहां दिल्ली के सैंटर में ज्यादा हैं, रैजिडैंशियल इलाके मीलों दूर बिखरे हैं.

इस से ज्यादा बड़ी बात फिक्की के लेडीज और्गेनाइजेशन की यूनिट ‘वेदिका फौर वूमन’ के कराए गए सर्वे में पता नहीं की गई है. वह है कि दिल्ली धर्मका बड़ा गढ़ बन गया है, जहां मंदिरों, प्रवचनों, कथाओं, कीर्तनों, जुलूसों, कलश यात्राओं की भरमार होने लगी है और जिन में औरतों को धकेला जा चुका है. घर, बच्चों, सासससुर, पेरैंट्स की संभालने की ड्यूटी के साथ धर्म की मौजमस्ती मिल रही होती है तो वर्क प्लेस की बोरिंग लाइफ  छोड़ने की इच्छा पकड़ लेती है.

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ऐजुकेशन का पूरा ऐडवांटेज न लेने के पीछे बड़ा कारण यह है कि लड़कियों को बचपन से अब लाडप्यार ज्यादा मिलने लगा है और कैरियर व अपने पैरों पर खड़े होने की तमन्ना उन में कम होने लगी है. घरों की पैंपरिंग उन्हें वर्क प्लेस की बोरिंग, डिसिप्लिन्ड और प्रैशराइज लाइफ के लिए भी तैयार नहीं करती.

जिन बच्चों पर पेरैंट्स और खासतौर पर मदर्स अपने कीमती घंटे लगाती हैं, वे असल में वर्क प्लेस के लिए तैयार ही नहीं हो रहे. हर वर्क प्लेस 8-10 घंटे की कंसटे्रशन, रोजमर्रा की रूटीन लाइफ, हर पल का प्रैशर, डांटफटकार के लिए तैयार इंप्लोई चाहता है जो घरों और स्कूलों से निकलने वाले यूथ हैं ही नहीं.

घरों में बच्चों को पेरैंट्स हाथों में रुई के फाए की तरह रखते हैं, उन की जिदें पूरी करते हैं, स्कूल के अलावा कोई डिसिप्लिन नहीं होता है, पेरैंट्स बहुत समय व्यर्थ के पूजापाठ में लगाते हैं जो पहले बच्चों को बेवकूफी लगता है पर बाद में वे इसी में शैल्टर लेने लगते हैं और इस के बहाने मेहनत के काम इग्नोर कर डालते हैं.

आज सोसायटी को इंटैलिजैंट वर्क फोर्स की बहुत जरूरत है और लड़कियों की ऐजुकेशन पर जो खर्च किया जा रहा है वह उन्हें घर में रख कर बरबाद किया जा रहा है. बच्चे अच्छे हैं, जरूरी हैं पर उन्हें ही लाइफ का सैंटर नहीं माना जा सकता. उन्हें जहां लव अफैक्शन मिलना चाहिए, वहीं वर्क प्लेस की मुसीबतों के लिए भी तैयार करना जरूरी है.

फिक्की की रिपोर्ट काफी सरप्राइजिंग है कि दिल्ली में भी औरतें आज बिना काम किए रह सकती हैं. उन्हें खुदबखुद इस स्टैगनैंट लाइफ के खिलाफ रिवोल्ट करनी चाहिए. जिंदगी जीने में असली मजा तब है जब अपने पैसे से कुछ खरीदा जाए, कुछ बनाया जाए और खुद डिसीजन लिए जाएं

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