Dating : महिमा और प्रखर लंबी डेटिंग के बाद विवाह बंधन में बंधने को इच्छुक थे. दोनों इस बात से बेखबर नहीं थे कि वे अलगअलग के जाति हैं. फिर भी यह भरोसा था कि परिवार वालों की सोच ऐसी नहीं है कि वे कोई ऐतराज जताएं. महिमा के परिवार की ओर से हरी झंडी मिल भी गई लेकिन आशा के विपरीत प्रखर के मातापिता की ओर से बात अटक गई. प्रखर की मां इन दिनों एक प्रवचक के विचार सुनने प्रतिदिन किसी आश्रम में जाती थीं. वहां जाने के बाद से ही उन की मानसिकता संकीर्ण होती चली गई और प्रखर के दूसरी जाति में विवाह न करने पर वे अड़ गईं. पिता ने भी उन का साथ दिया.
महिमा प्रखर को एक विवेकशील साथी के रूप में देखती थी, उसे विश्वास था कि प्रखर मातापिता का विरोध करेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं. यह जानते हुए भी कि जाति प्रथा समाज का कलंक है, परिपक्वता व साहस की कमी के कारण प्रखर मातापिता के खिलाफ नहीं जा पाया और दोनों विवाह बंधन में नहीं बंध सके.
प्राय लंबी डेटिंग या प्रेम में कई वर्ष बिताने के बाद अधिकतर जोड़े विवाह की राह चुन ही लेते हैं क्योंकि वे एकदूसरे को जान चुके होते हैं. कभीकभी दोनों परिवारों के बीच रहनसहन, सोच आदि को ले कर कुछ ऐसे अंतर आड़े आने लगते हैं जो उन को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने को मजबूर करने लगते हैं. इस प्रकार के अंतर युवकों की तुलना में युवतियों पर ज्यादा असर डालते हैं क्योंकि उन्हें नए परिवार में आना होता है. ऐसे में विवाह के लिए ‘हां’ की ओर बढ़ते अपने कदमों को वे रोक लेती हैं. इन अंतरों को पहचान कर भी कोई लड़की डेट कर रहे युवक को शादी के लिए तभी हां कह पाती है जब लड़के में वे गुण हों जो उसे आगे बढ़ने का रिस्क लेने दें. लड़की के कदमों को रोकते अंतर व उन अंतरों से निबटने में लड़के के वे गुण जो लड़की को आगे बढ़ कर रिस्क लेने को उत्साहित करते हैं.
विचारों में अंतर
2 परिवारों के विचार उन की पृष्ठभूमि पर निर्भर करते हैं. कोई परिवार उदार विचारधाराओं वाला तो दूसरा संकीर्ण विचारों का हो सकता है. कहीं पैसा कंजूसी से खर्च किया जाता है तो कोई परिवार खुले हाथ से खर्च करने में संकोच नहीं करता. किसी परिवार में नौकरी के लिए विदेश जाना अच्छा सम?ा जाता है तो कहीं परिवार के सदस्य दूसरे शहर जा कर नौकरी करने से भी बचते हैं.
2 परिवारों के बीच इस प्रकार के अंतर निश्चित रूप से लड़की पर असर डालते हैं. यदि डेटिंग के दौरान इस विषय में दोनों स्पष्ट संवाद कर लें और लड़का खुल कर लड़की के प्रश्नों के उत्तर दे दे, देख लेंगे कह कर टालने की कोशिश न करे तो लड़की को अपने कदम आगे बढ़ाने में आसानी होगी, जैसे नमित ने शुभ्रा के साथ खुल कर बात की.
शुभ्रा के मातापिता ने उस के पालनपोषण में कोई कमी नहीं होने दी थी. होटल मैनेजमैंट की पढ़ाई करने के बाद वह एक फाइवस्टार होटल में फ्रंट डैस्क रिसैप्शनिस्ट के पद पर कार्य कर रही थी. नमित से दोस्ती फिर डेटिंग शुरू हुई. बातों ही बातों में उसे पता चला कि नमित के घर शुभ्रा के परिवार की तरह खुला खर्च नहीं किया जाता. पार्लर जाना भी फुजूल खर्च माना जाता है. अपनी जौब के कारण शुभ्रा को आकर्षक बने रहना जरूरी था और इस के लिए पार्लर जाना ही पड़ता था. नमित ने शुभ्रा की बात सुन कर उसे सम?ा और विश्वास दिलाया कि इस बात के लिए वह परिवार की ओर से कोई टोकाटाकी नहीं होने देगा, किसी के कुछ पूछने पर जवाबदेही नमित की होगी. शुभ्रा संतुष्ट हो गई और फिर उस से विवाह के लिए हामी भर दी.
ऐसे ही कुछ अन्य मुद्दे जैसे विवाह के बाद दोनों को परिवार के साथ रहना होगा या अलग भी रहा जा सकता है, लड़की की जिम्मेदारियां विवाह के बाद क्याक्या होंगी, दोनों में से कोई भी विदेश या अन्य शहर में जा कर नौकरी कर सकेगा क्या? इन बातों पर भी डेटिंग के दौरान स्पष्ट संवाद होना चाहिए.
जीवन परिपाटी का अलग होना
2 परिवारों की जीवन परिपाटी में अंतर दिखने में मामूली लगता है. मगर इस से जुड़ी छोटीछोटी बातें भी आपसी मतभेद का कारण बन सकती हैं. किसी परिवार में समयसमय पर गैटटूगैदर, पार्टियां होती हैं, साथ ही क्लब आदि जाने का भी चलन होता है तो कुछ परिवार इन सब से दूरी बना कर रखते हैं. रिश्तों व दोस्ती को निभाने का ढंग और मेहमाननवाजी के तरीके भी अलगअलग हो सकते हैं.
ऐसा कोई अंतर यदि लड़की को पशोपेश में डाल रहा हो कि विवाह के बाद युवक उस अंतर को पाटने का प्रयास करेगा या युवती को उस माहौल में ढलने को मजबूर करेगा तो वह लड़के से बात करेगी ही. लड़के को चाहिए कि इसे मामूली बात न सम?ा कर धैर्यपूर्वक लड़की की बात सुने और कोई रास्ता निकालने की कोशिश करे. ऐसा होने पर ही लड़की रिश्ते में आगे बढ़ सकेगी.
आरव के परिवार में मेहमानों के आने पर पैर छूने का चलन था. अमायरा को यह पसंद नहीं था. आरव ने अमायरा के विचार जाने और वह सम?ा गया कि अमायरा किसी के सम्मान में कमी नहीं कर रही लेकिन पैर छू कर इज्जत देने की पक्षधर वह नहीं है. तब आरव ने कहा कि अमायरा की जिंदगी उस की अपनी है, इसलिए वह जैसे चाहे वैसे रिश्ते निभा सकती है. अमायरा को यह अच्छा लगा कि आरव जैसे व्यक्ति का साथ पा कर वह नए परिवार में कहीं खो नहीं जाएगी, उस का एक अलग अस्तित्व होगा. अत: वह आरव को जीवनसाथी बनाने के लिए खुशीखुशी तैयार हो गई.
खानपान
मांसाहारी या शाकाहारी होना 2 परिवारों के बीच का बड़ा अंतर है. इस के अतिरिक्त किसी परिवार में पारंपरिक खाना पसंद किया जाता है तो कहीं आधुनिक व फास्ट फूड. 2 परिवारों के बीच खानेपीने का अंतर भोजन करने के समय, तरीके और परोसने के बरतन आदि में भी हो सकता है.
मांसाहार या शाकाहार प्रत्येक की व्यक्तिगत पसंद हो सकती है और यह अंतर पहली या दूसरी डेट पर ही पता लग जाता है. कुछ अंतर मामूली हो सकते हैं लेकिन कुछ अन्य अंतर जिन का पता जल्दी नहीं लग पता, वे भी विवाह के लिए लड़की के बढ़ते कदमों की रुकावट बन सकते हैं.
ऐसी स्थिति में डेट कर रहा युवक यदि युवती की समस्या को उसी के नजरिए से सम?ाने वाला हो, उस के स्वभाव में लचीलापन हो तथा ‘तुम बदलो की जगह मैं सीखता हूं’ की सोच रखता हो तो बात बिगड़ने की जगह बन सकती है, रक्षित की तरह ही.
ऋचा रक्षित के साथ लगभग 1 साल से डेटिंग कर रही थी. बात विवाह तक पहुंचने लगी तो ऋचा विवाह के बाद अपने नाश्ते में बदलाव को ले कर बेहद चिंतित हो गई क्योंकि वह ओट्स, चिया सीड्स, फ्रू ट्स और नट्स से अपने दिन के पहले मील की शुरुआत करती थी लेकिन रक्षित के घर पर सभी नाश्ते में परांठे खाते थे. रक्षित ने ऋचा की फिट रहने वाली प्रकृति को सम?ा लिया और उसे आश्वासन दिया कि वह मनमुताबिक खा सकेगी, इतना ही नहीं उस ने स्वीकार किया कि इस मामले में ऋचा की आदतें उस के परिवार वालों से बेहतर हैं, इसलिए परिवार के सदस्यों को सप्ताह में 1 या 2 दिन ऋचा की पसंद का नाश्ता करने को कहेगा.
रक्षित के स्वभाव में लचीलेपन से ऋचा प्रभावित हुई और स्वयं भी महीने में 1 दिन परांठे खाने की इच्छा जता दी.विवाह की ओर अपने बढ़े हुए कदमों को ले कर ऋचा को सुखद अनुभूति हो रही थी.
आदतों में अंतर
परिवारों की आदतों में अंतर कई प्रकार का हो सकता है जैसे कहीं जल्दी सोना व जागना जरूरी सम?ा जाता हो तो कहीं जरूरत न हो तो देर तक सोया या जागा जा सकता है. किसी परिवार में घर का खाना खाने पर जोर दिया जाता है तो कहीं अकसर बाहर से खाना मंगवा लिया जाता है. तीजत्योहार मनाते हुए कुछ परिवार मौजमस्ती करते हैं तो कुछ परंपराओं को बो?ा की तरह स्वयं पर लाद उन्हें निभाना अपनी आदत बना लेते हैं और बिना सोचेसम?ो उसी ढर्रे पर चलते रहते हैं. देर तक सोनाजागना, घर या बाहर खाना आदि कुछ ऐसी आदतें हैं जो लड़की के निर्णय पर ज्यादा असर नहीं डालतीं लेकिन बात त्योहारों पर देर तक होने वाली पूजा या फिर व्रत आदि की हो तो लड़की को हां या न का फैसला करते हुए सोचना पड़ता है.
सोनाली विवाहित महिलाओं को विभिन्न पर्वों पर व्रत रखते हुए देखती थी. भूखे रहने से पति या संतान की उम्र लंबी नहीं होती, उलटे व्रत रखने वाली मांएं निढाल, बेजान सी हो जाती हैं, यह सम?ा गई थी वह. सोनाली के घर पर त्योहारों को मेलजोल बढ़ाने, आनंद लेने और खोई ऊर्जा व शक्ति को वापस पाने का माध्यम सम?ा जाता था. बौयफ्रैंड अक्षय के परिवार में त्योहारों पर व्रत रखने की परंपरा चली आ रही थी. अक्षय से उस ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि विवाह के बाद वह कोई उपवास नहीं रखेगी. अपने निर्णय को उस ने तर्क दे कर भी सम?ा दिया. अक्षय उस से पूरी तरह सहमत हुआ तो सोनाली उस में भावी जीवनसाथी देखते हुए आगे बढ़ने को तैयार हो गई.
सोनाली की तरह ही हर लड़की चाहती है कि लड़का अपने परिवार का सम्मान अवश्य करे लेकिन लड़की की मानसिकता को भी सम?ो. विवाह के बाद परिवार की ओर से युवती पर जबरन नियम लादे नहीं जाएंगे ऐसा आश्वासन मिले तो लड़की संतुष्ट होने पर अंतरों के बावजूद हां पर मुहर लगा देती है.
बौद्धिक स्तर पर अंतर
शिक्षा या बौद्धिक स्तर पर 2 परिवार अलग तरह के हो सकते हैं. यदि लड़की इंटेलैचुअल हो तो लड़के को चाहिए कि वह लड़की से कुछ सीखने में संकोच न करे. उस के लिए विद्वान बनना जरूरी नहीं, लेकिन जिज्ञासु अवश्य बने. यदि करण की तरह लड़की के बुद्धिजीवी होने का सम्मान करने के बजाय वह चाहेगा कि लड़की आने वाले समय में उस के पारिवारिक माहौल में ढल जाए तो रिया की तरह ही हर युवती विवाह के लिए मना ही करेगी.
रिया और करण को डेट करते हुए कुछ समय बीत गया था. इतने लंबे समय में रिया ने यह जान लिया कि करण के घर पुस्तकों, पत्र व पत्रिकाओं को पढ़ने का चलन बिलकुल नहीं है. वहां फिल्में व सीरियल आदि देख कर या व्हाट्सऐप जैसे साधनों से ज्ञानवर्धन कर लिया जाता है. रिया को सरिता, गृहशोभा जैसी पत्रिकाएं पढ़ना बहुत अच्छा लगता था क्योंकि इन से वह बहुत कुछ सीखती थी. इस के अलावा वह कंटैंट राइटर की जौब कर रही थी और किताबों से उसे बहुत लगाव था. करण से जब इस बारे में रिया ने कुछ कहना चाहा तो उस ने ‘विवाह से पहले और अब में थोड़ा फर्क तो होगा ही, शादी के बाद भी किताबों में डूबी रहोगी क्या?’ कह कर बात पूरी होने से पहले ही खत्म कर दी. रिया के लिए इस स्तर पर स्वयं को बदलना संभव नहीं था. नतीजतन वह करण से अलग हो गई.
पहनावे का अंतर
कुछ परिवारों में आधुनिक व फैशनेबल कपड़े ज्यादा पसंद किए जाते हैं तो कुछ इन से दूर रहते हैं और पारंपरिक पहनावे में विश्वास रखते हैं. ब्रैंडेड और साधारण कपड़ों का चुनाव भी 2 परिवारों के बीच अंतर के रूप में दिख जाता है.
यदि लड़की को लगेगा कि लड़के का परिवार ‘हम बेहतर हैं’ की सोच वाला होगा और लड़की की पसंद को दरकिनार अपनी पसंद के अनुसार पहनावा चुनने को बाधित करेगा तो निश्चय ही वह विवाह की ओर अपने बढ़ते कदमों को रोक लेगी.
इस के विपरीत यदि लड़के की सोच संतुलित होगी कि दोनों परिवारों में से कोई भी गलत नहीं है, हां एकदूसरे से अलग जरूर हैं, वह लड़की के परिवार को बराबरी का दर्जा देते हुए उन की पसंद को भी महत्त्व देगा तो लड़की संतुष्ट होगी कि भविष्य में उसे बदला नहीं जाएगा, स्वीकार किया जाएगा.
मानसिकता
विभिन्न मानसिकता लिए परिवारों का परिवेश एकदूसरे से विपरीत होता है. कुछ परिवारों में हर बात एकदूसरे से कहने का चलन होता है, निर्णय भी सभी की सहमति से लिए जाते हैं तो कहीं सभी सदस्य अपने तक सीमित रहते हैं और अपनेअपने निर्णय लेने को स्वतंत्र होते हैं. कुछ परिवारों में ऐसा भी होता है कि घर के बड़े सदस्य जो भी निर्णय लें उसे मानने को सभी बाधित होते हैं. महिलाओं का परिवार में स्थान, उन की नौकरी व स्वतंत्रता को ले कर भी परिवारों की मानसिकता अलग हो सकती है.
निकिता को डेटिंग के दौरान ही पता लग गया कि मनीष के घर में अधिकतर नियम बुजुर्गों के अनुसार ही होते हैं, इस कारण महिलाओं को नौकरी की स्वतंत्रता नहीं थी. निकिता ने ऐतराज जताया तो मनीष भी परिवार वालों के शब्द ही बोला कि जब पति खासा कमा लेता है तो पत्नी के लिए नौकरी की आवश्यकता ही क्यों? निकिता ने विवाह की ओर बढ़ते अपने कदम पीछे कर लिए.
प्रियंका और रोहित की लंबी डेटिंग भी टूट में बदल जाती यदि रोहित भी अपने परिवार का अंधानुकरण करता पर उस ने ऐसा न करते हुए सही रास्ता चुना तो बात बन गई. डेटिंग से बात जब शादी की ओर जा रही थी तो प्रियंका को पता लगा कि रोहित के मातापिता का ज्योतिष विद्या पर अटूट विश्वास है. विवाह भी वे जन्मकुंडली मिला कर ही करना चाहते थे. प्रियंका इस से सहमत नहीं थी. बात यह नहीं थी कि दोनों की कुंडली मिलेगी या नहीं पर प्रियंका पाखंडों से दूर रहने वाली लड़की थी. उस के परिवार वाले भी ऐसे अंधविश्वासों का विरोध करते थे.
रोहित ने इस विषय में प्रियंका की 1-1 बात सुनी और प्रियंका के गहरे, परिपक्व व तार्किक विचार रोहित को कुंडलीमिलान जैसे अतार्किक चलन से विमुख कर पाए. उस ने विश्वास दिलाया कि अपने मातापिता को कुंडली मिलाए बिना विवाह करने को तैयार कर लेगा.
यह सच है कि वैवाहिक रिश्ते में बंधने जा रहे किसी भी युवकयुवती के परिवारों के बीच लाइफस्टाइल को ले कर विभिन्न अंतर हो सकते हैं. जब यह फर्क शादी के बाद पता लगे तो सम?ाते या टूट में से कोई भी रास्ता चुनना पड़ सकता है. डेटिंग करते हुए यदि इस अंतर का अंदाज होने लगे तो लड़की की हां या न को ले कर दुविधा स्वाभाविक है. लड़के की स्वयं को थोपने की जिद की जगह सीखने और सिखाने की मानसिकता लड़की को हां की ओर बढ़ने के लिए उत्साहित करती है. लड़का केवल लड़की को बदलने की बात न करे बल्कि स्वयं व अपने परिवार में बदलाव लाने की बात रखे तो लड़की विवाह के लिए कदम बढ़ाने का रिस्क लेने को तैयार हो जाती है.
