Social Media : रिंकी कालेज जाने के लिए जल्दीजल्दी तैयार हो रही थी. फोन पर मैसेज का नोटिफिकेशन आया, उस ने देखा, किस का मैसेज है. देखते ही सिर पकड़ लिया. किचन में जा कर देखा उस की मम्मी मधु एक हाथ से कलछी चला रही थीं, दूसरे हाथ में फोन था.
रिंकी ने कहा, ‘‘मम्मी, अभी यह गुड मौर्निंग का मैसेज फैमिली ग्रुप में भेजना इतना जरूरी था? आप का हाथ भी जल सकता है. ऐसी क्या आफत है. अभी बाकी रिश्तेदारों की भी गुड मौर्निंग शुरू हो जाएगी. यह जो रोज गुड मौर्निंग की सुनामी आती है न, मैं तो थक गई हूं. मैं ग्रुप छोड़ दूंगी.’’
‘‘न, न, ग्रुप मत छोड़ना. तेरी चाची, ताई सोचेंगी कि तु झे किसी से मतलब नहीं. एक तो तुम बच्चे लोग ग्रुप पर कोई रिस्पौंस नहीं देते, बुरा लगता है.’’
‘‘तो आप लोग कभी सोचना कि हम क्यों रिस्पौंस नहीं देते. पूरा दिन मैसेज ही तो फौरवर्ड करते हो आप लोग,’’ रिंकी झींकती हुई चली गई.
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आज का युग डिजिटल युग है, स्मार्टफोन और इंटरनैट के साथ व्हाट्सऐप जैसे मैसेजिंग प्लेटफौर्म ने सूचनाओं का आदानप्रदान तेज, सस्ता और व्यापक बना दिया है लेकिन इसी सुविधा ने एक और संकट को जन्म दिया है– फौरवर्ड मैसेज का अंधाधुंध प्रसार. कई खूबियों और सुविधाओं के साथ आज की तकनीक की एक सब से बड़ी परेशानी बनती जा रही है, फौर्वर्डेड मैसेज. रोजाना दर्जनों संदेश, जिन में से अधिकतर बेतुके, पुराने घिसेपिटे या संदिग्ध जानकारी या फालतू ज्ञान से भरे होते हैं. उन्हें पढ़ने, सम झने और आगे भेजने में लगने वाला समय हमारी दिनचर्या में अनदेखी बरबादी है.
इस में सिर्फ हमारा समय ही बरबाद नहीं हो रहा है बल्कि मानसिक ऊर्जा भी नष्ट हो रही है. बेकार के संदेश दिमाग में सूचना का शोर पैदा करते हैं जिस से जरूरी सूचनाओं को पहचानना मुश्किल हो जाता है. धीरेधीरे यह आदत डिजिटल अव्यवस्था में बदल जाती है जिस में न तो व्यक्ति सही जानकारी पर ध्यान केंद्रित कर पाता है और न ही अपनी क्रिएटिविटी बनाए रख पाता है.
अगर हम कोई भी मैसेज फौरवर्ड करने से पहले ज्यादा नहीं बस 30 सैकंड रुक कर ही सोच लें कि क्या यह सच है? क्या यह भेजना जरूरी है? तो हम न केवल अपने समय बल्कि अपनी मानसिक ऊर्जा को भी बचा सकते हैं और कुछ और सार्थक काम कर सकते हैं.
देखा गया है कि आमतौर पर मध्यम और बुजुर्ग आयु वर्ग (लगभग 40-65+वर्ष) के लोग धार्मिक मैसेज ज्यादा फौरवर्ड करते हैं. इस के पीछे कई कारण हैं:
परंपराओं से जुड़ाव: इस उम्र के लोग ज्यादा परंपरावादी होते हैं. वे सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों से गहरे जुड़े होते हैं, इसलिए ऐसे संदेश उन्हें भावनात्मक रूप से प्रभावित करते हैं.
खाली समय और दिनचर्या: रिटायरमैंट के करीब या रिटायर हो चुके लोग या जिन की जिम्मेदारियां हलकी हो चुकी हैं उन के पास मैसेज पढ़ने और भेजने का अधिक समय होता है.
आस्था शेयर करने वाले: इन्हें लगता है कि धार्मिक मैसेज भेज कर वे पुण्य कमा रहे हैं या दूसरों का भला कर रहे हैं. व्हाट्सऐप उन्हें आस्था फैलाने का आसान मंच लगता है क्योंकि एक क्लिक में कई लोगों तक संदेश पहुंच जाता है.
सत्यता पर कम सवाल: धार्मिक संदेशों को अकसर बिना परखे श्रद्धा के साथ स्वीकार कर लिया जाता है इसलिए इन्हें आगे भेजने में हिचकिचाहट नहीं होती. उम्र बढ़ने के साथ धार्मिक मैसेज फौरवर्ड करने का प्रतिशत बढ़ता है जबकि मजाकिया मैसेज का झुकाव युवा उम्र में ज्यादा होता है और राजनीतिक मैसेज मिडऐज ग्रुप में सब से ज्यादा फौरवर्ड किए जाते हैं. फैमिली ग्रुप पर जब युवाओं को जोड़ा जाता है, वे बेचारे धार्मिक मैसेज से बोर हो कर छटपटाते रह जाते हैं, न उन से ग्रुप छोड़ते बनता है न वहां के धार्मिक और राजनीतिक ज्ञान हजम करते बनता है.
ऐसा नहीं है कि धार्मिक या कोई भी मैसेज फौरवर्ड करने का शौक हमें ही है, विदेशों में भी धार्मिक मैसेज फौरवर्ड होते हैं लेकिन उन का पैटर्न और तीव्रता देश, संस्कृति और वहां के डिजिटल इस्तेमाल की आदतों पर निर्भर करता है.
भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका जैसे देशों से जुड़े प्रवासी समुदाय विदेशों में भी धार्मिक मैसेज काफी भेजते हैं क्योंकि यह उन्हें अपनी संस्कृति और भाषा से जोड़े रखता है.
अरब देशों में इस्लामी शिक्षाओं, कुरआन की आयतों के रमजान से जुड़े फौरवर्ड बहुत आम हैं.
ईसाई बहुल देशों में क्रिसमस, ईस्टर या बाइबिल के वचन फौरवर्ड किए जाते हैं.
अमेरिका और यूरोप में व्हाट्सऐप का इस्तेमाल तो है ही, फेसबुक, मैसेंजर, टैलीग्राम और ईमेल पर भी धार्मिक संदेश भेजे जाते हैं.
लैटिन अमेरिका में स्पेनिश और पुर्तगाली भाषा में धार्मिक मैसेज खासकर कैथोलिक परंपरा से जुड़े मैसेज बहुत फौरवर्ड किए जाते हैं.
उम्र का पैटर्न
विदेशों में भी 40+ उम्र के लोग धार्मिक संदेश अधिक फौरवर्ड करते हैं जबकि युवा इन्हें कम भेजते हैं. युवा अकसर मीम्स या न्यूज पर ध्यान देते हैं.
सत्यता की जांच का रुझान
पश्चिमी देशों में धार्मिक फौरवर्ड कम तथ्यहीन होते हैं क्योंकि वहां लोग स्रोत को परखने की आदत रखते हैं जबकि एशियाई प्रवासी समूह में भावनात्मक जुड़ाव ज्यादा हावी रहता है.
60 साल के रमेशजी सुबहसुबह मंदिर जाते तो वहां से फोटो ले कर अपने कई ग्रुप्स में भेज देते, 10 मिनट के अंदर वही फोटो उन के पास पहुंच जाते और साथ ही लिखा होता इस फोटो को 11 लोगों को भेजो वरना…
उन के बेटे ने जब यह सुना तो वह बहुत हंसा, कहने लगा, ‘‘आप को तो व्हाट्सऐप के अपने मैसेज पर आशीर्वाद का रिटर्न गिफ्ट भी मिलता है और वह भी हाथ के हाथ.’’
रेहाना रोज एक मैसेज अलगअलग ग्रुप में भेजती थीं. उन की यह बात उन की बेटी से छिपी नहीं थी. बेटी एक दिन कहने लगी, ‘‘मम्मी, क्यों करती हैं आप ऐसा? कुदरत भी सोचती होगी, यह औरत हर रोज एक ही फाइल क्यों अपलोड कर रही है? वह भी बोर होती होगी.’’
रमेश और रेहाना की तरह कई लोगों को लगता है कि धार्मिक मैसेज भेज कर वे बहुत पुण्य कमा रहे हैं.
कई युवा सचमुच अपने पेरैंट्स की मैसेज फौरवर्ड करने वाली आदत का मजाक बना रहे हैं, उन्हें सम झा भी रहे हैं पर पेरैंट्स हैं कि उन का सारा भक्तिभाव फौरवर्ड करने में जागा रहता है, अपना टाइम भी खराब करते हैं, दूसरों का भी.
ऐसे धार्मिक या चेन टाइप व्हाट्सऐप मैसेज फौरवर्ड करते रहने के कई नुकसान होते हैं जो व्यक्तिगत, सामाजिक और तकनीकी- तीनों स्तर पर असर डालते हैं.
व्यक्तिगत नुकसान
समय की बरबादी: रोजरोज बेकार के मैसेज पढ़ने और भेजने में मिनट नहीं, घंटे बरबाद होते हैं. यही समय कुछ रचनात्मक करने या अच्छी किताबें पढ़ने अथवा अपनी सेहत का ध्यान रखने में बिताया जा सकता है.
मानसिक अव्यवस्था: लगातार आने वाले नोटिफिकेशन और मैसेज दिमाग को थकाते हैं और ध्यान भटकाते हैं. मन की एकाग्रता कम होती है. 50 साल की माया अपने पति सुमित की आदत से परेशान हैं, कहती हैं, ‘‘सुमित से चैन से बैठ कर बात करना मुश्किल होता जा रहा है, उन के फोन पर नोटिफिकेशन आता है तो सारी बात रोक कर पहले मैसेज देखते हैं. पूछती हूं किस का मैसेज है तो बताते हैं कि कोई बेकार का फौरवर्ड था. मु झे गुस्सा आता है कि हर नोटिफिकेशन पर लपक कर फोन देखना इतना जरूरी भी नहीं और भेजने वाला तो मूर्ख है ही. बात करने का सारा मूड चला जाता है.’’
विश्वसनीयता पर असर: बारबार बेस्रोत या अजीबोगरीब मैसेज भेजने से लोग आप को गंभीरता से लेना बंद कर देते हैं.
सामाजिक नुकसान
अफवाह और भ्रम फैलना: बिना सत्यता परखे भेजा गया धार्मिक या अंधविश्वासी मैसेज समाज में डर, गलतफहमी और तनाव फैला सकता है.
धार्मिक संवेदनशीलता: कभीकभी ऐसे मैसेज अनजाने में किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकते हैं.
ग्रुप में असंतोष: हरकोई धार्मिक मैसेज पसंद नहीं करता, लगातार ऐसे मैसेज भेजने से लोग परेशान हो जाते हैं और अपना समय बचाने के लिए चुपचाप ग्रुप छोड़ सकते हैं.
तकनीकी नुकसान
मोबाइल के स्टोरेज और डेटा का नुकसान: रोजाना आने वाली भारीभरकम तसवीरें और वीडियो मोबाइल की मैमोरी भर देते हैं.
स्कैम और फिशिंग का खतरा: कुछ धार्मिक चेन मैसेज के साथ लिंक आते हैं जो असल में स्कैम या डेटा चोरी का जरीया होते हैं.
नैटवर्क पर दबाव: अनावश्यक मीडिया फाइलें डेटा खपत और बैटरी दोनों बढ़ाती हैं.
सुबह उठते ही दूसरों को निरर्थक मैसेज भेजने की आदत से बचना होगा. इस के बजाय खाली समय में कुछ ऐसा करें जिस से व्यक्तित्व का विकास हो, कुछ पढ़ने की आदत बनाएं, सैर पर जाएं, अच्छा संगीत सुनें, लोगों से मिलेजुलें.
