Suparna Mitra : फरवरी, 2026 में टीमलीज सर्विसेज लिमिटेड की प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (एमडी और सीईओ) के तौर पर अपना कार्यभार संभालने वाली सुपर्णा मित्रा आज किसी परिचय की मुहताज नहीं हैं. वे टाइटन कंपनी के एक डिवीजन की पूर्व चीफ ऐग्जीक्यूटिव औफिसर हैं, जिन्होंने अपनी काबीलियत, आत्मविश्वास और दूरदर्शिता के बल पर इस कंपनी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया था.
पिछले साल टाइटन से इस्तीफा दे कर उन्होंने टीमलीज जौइन की है. इस के आलावा वे स्विगी से भी जुड़ी हुई हैं. वे स्विगी की स्वतंत्र निदेशक हैं जहां वे अपने मार्केटिंग और ब्रैंड मैनेजमैंट के ऐक्सपीरियंस का उपयोग करते हुए कंपनी की ग्रोथ स्ट्रैटेजी को गाइड करती हैं.
सुपर्णा मित्रा को मोस्ट पावरफुल वूमन इन बिजनैस अवार्ड 2021 ऐंड 2023 मिल चुका है. उन्हें टाइटन की वाचेज और वियरेबल्स डिवीजन को फाइनैंशियल ईयर 2024 में 5 हजार करोड़ से ज्यादा की बिक्री तक ले जाने के लिए सम्मानित किया गया. उन की बेहतरीन लीडरशिप और इंडस्ट्री में प्रभाव के लिए उन्हें फौर्च्यून इंडिया की लिस्ट में शामिल किया गया.
सुपर्णा के नेतृत्व में टाइटन ने कई इनोवेशन किए थे. 2024 में टाइटन ने अपनी 40वीं सालगिरह के अवसर पर खास लिमिटेड ऐडिशन कलैक्शन पेश किया, जिस में फ्लाइंग टूरबिलान वाच शामिल थी. यह भारत में निर्मित पहली टूरबिलान वाच थी. सुपर्णा की लीडरशिप के दौरान टाइटन ने बहुत ज्यादा फाइनैंशियल ग्रोथ की. उन्होंने कंपनी को वैश्विक मान्यता दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
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सुपर्णा मित्रा का जन्म भिलाई में हुआ. उन के फादर स्टील अथौरिटी औल इंडिया लि. में काम करते थे. उन से बड़ी 2 बहनें हैं. वे पेरैंट्स की तीसरी और सब की लाडली बेटी थीं. फादर की जौब ट्रांस्फरेबल थी इस वजह से बचपन में वे कई शहरों में रहीं. वे बताती हैं कि एलकेजी से क्लास 12वीं की जो 12-13 साल की पढ़ाई थी वह अलगअलग स्कूलों में की है. किसी भी स्कूल में 2 साल से ज्यादा पढ़ाई नहीं की. बाद में पेरैंट्स कोलकत्ता शिफ्ट हो गए. कोलकत्ता में उन्होंने 11वीं और 12वीं कक्षा की पढ़ाई की और फिर इंजीनियरिंग की. जादवपुर यूनिवर्सिटी से इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग करने के बाद उन्हें आईआईएम कोलकत्ता में दाखिला मिल गया. एमबीए करने के बाद उन्होंने अपना कैरियर 1992 में शुरू किया.
पहले ट्रेनी के रूप में हिंदुस्तान लीवर जौइन किया. वहां 2 साल रहने के बाद 1994 में उन्होंने टाइटन जौइन की. फिर 1994 से 1998 तक वह टाइटन में थी. बड़ी बेटी का जन्म हुआ तो 2 साल वे घर पर थीं. वापस 2001 में उन्होंने जौब जौइन की. इस दौरान उन्होंने 2 कंपनीज में थोड़ेथोड़े समय के लिए काम किया. पहले तालिस्मा कौर्प में प्रोडक्ट मार्केटिंग के निदेशक के रूप में और फिर अरविंद ब्रैंड्स में ‘रुद्गद्ग’ ब्रैंड की बिजनैस हैड. बाद में 2006 में उन्होंने फिर से टाइटन में शामिल हो कर टाइटन के ग्लोबल मार्केटिंग हैड के रूप में कार्य किया जहां उन के पास भारत और अंतर्राष्ट्रीय मार्केट्स में सभी मार्केटिंग कार्यों की जिम्मेदारी थी. टाइटन में वे 20 साल तक रहीं. लास्ट के 5 साल वे वाचेज डिवीजन की सीईओ थीं.
सुपर्णा बताती हैं, ‘‘पुराने बौस के रिटायर होने पर मु?ो लगा कि अब यहां मेरा काम हो गया है, अब कहीं और कुछ और काम करते हैं ताकि कुछ चेंज हो. 2-3 साल ही रिटायरमैंट को बचे थे. ऐसे में बहुत से लोग सोचते हैं कि यह समय ऐसे ही निकाल दो लेकिन मु?ो तो लगा कि अब टाइम है कुछ बड़ा और कुछ अलग करने का.
मैं टाइटन से निकल गई तो फिर टीमलीज में बहुत अच्छी अपौर्च्यूनिटी मिल गई. यह भी बहुत बड़ी करीब 12 हजार करोड़ की कंपनी है. टीमलीज सर्विसेज कंपनी फौर्च्यून इंडिया 500 कंपनी है और बीएसई और एनएसई में लिस्टेड है. यह स्टाफिंग सौल्यूशंस और एचआर सौल्यूशंस की फील्ड में काम करती है. इस के काफी सारे प्रोडक्ट्स और सर्विसेज हैं. इस कंपनी के थ्रू साढ़े 3 लाख लोगों को अपौइंटमैंट मिलती है. यह इंडिया की वन औफ द लार्जैस्ट स्टाफिंग कंपनी है.
पसंद आया प्रोफाइल
इन के यहां के जो फाउंडर्स थे वे ऐक्चुअली 2-3 साल से कोई प्रोफैशनल सीईओ ढूंढ़ रहे थे जिस को वे काम हैंड ओवर कर के निश्चिंत हो जाएं. मेरे किसी परिचित ने मुझे उन से मिलवाया. इनिशियल बातचीत में ही मुझे वहां सबकुछ बहुत इंटरैस्टिंग लगा. मुझे महसूस हुआ कि फाउंडर्स और कंपनी बहुत हाई ऐथिकल स्टैंडर्ड के हैं जो मुझे बहुत अच्छा लगा.
उन को भी मेरा प्रोफाइल पसंद आया. फिर हम ने काफी जल्दी मतलब 2-3 महीने में ही डिसीजन ले लिया.
इसी फरवरी में मैं ने यह कंपनी जौइन की है. यह एक सर्विसेज कंपनी है. अभी तक तो मैं प्रोडक्ट कंपनीज में काम कर रही थी. यह बी टू बी कंपनी है मतलब यह दूसरी कंपनीज के साथ काम करती है. उस के पहले हिंदुस्तान लीवर हो या टाइटन हो वे सब बी टू सी कंपनीज हैं जहां कंज्यूमर्स को हम डाइरैक्ट बेचते हैं. यहां काम काफी इंटरैस्टिंग है और चैलेंजिंग भी है. इन का भी मैंडेट है कि इस को और बड़ा और मौडर्न बनाया जाए तो उसी पर अभी मैं काम कर रही हूं.
‘‘मैं 2 साल पहले मार्चअप्रैल, 2024 में इंडिपैंडैंट डाइरैक्टर के रूप में स्विगी से भी जुड़ी हूं. वहां भी बहुत इंटरैस्टिंग काम है और बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है. बहुत ज्यादा टैक्नोलौजी का यूज होता है और हाइपर कंपीटिटिव स्पेस में है. स्विगी से बहुत सी लर्निंग्स मैं टीमलीज में लागू करती हूं.’’
सुपर्णा फिलहाल सिंगल मदर हैं. उन की दोनों बेटियां बड़ी हो चुकी हैं और दोनों यूएस में हैं. एक जौब कर रही है और दूसरी अभी पढ़ाई कर रही है.
टैक्निकल बैकग्राउंड की लड़की के लिए कौरपोरेट की दुनिया में पहला कदम रखने के बार में सुपर्णा बताती हैं, ‘‘जब इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग कर रही थी तो मैं ने इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग से जुड़ी कंपनीज में समर इंटर्नशिप की. उस दौरान मुझे लगा जैसे मैं यहां उतनी फिट नहीं हो पा रही हूं. तब मैं ने इंजीनियरिंग के थर्ड ईयर में डिसाइड कर लिया था कि मैं आगे एमबीए करूंगी और मैनेजमैंट की फील्ड में चली जाऊंगी. उसी हिसाब से मैं ने कैट ऐग्जाम की प्रिपरेशन की और इंटरव्यू, गु्रप डिसकशंस वगैरह का अभ्यास किए.
‘‘ऐक्चुअली टैक्निकल फील्ड में 30-40 साल का कैरियर मु?ो इतना ऐक्ससाइटिंग नहीं लग रहा था. मेरे फादर जो खुद इंजीनियर थे उन्होंने भी बोला कि मैनेजमैंट करना बेहतर है. मेरी मां का भी कहना था कि मुझे एमबीए करना चाहिए.’’

कौरपोरेट फील्ड की चुनौतियां
सुपर्णा कहती हैं, ‘‘पहले के मुकाबले कौरपोरेट फील्ड में आज लड़कियों की स्थिति फिर भी बेहतर है. मेरे समय में इस फील्ड में बहुत कम लड़कियां आती थीं. लोगों की सोच थी कि लड़कियां तो शादी और बच्चों के बाद जौब छोड़ ही देंगी. इसलिए उन्हें कोई सीरियसली भी नहीं लेता था. मुझे अपनी जर्नी में बहुत से लोगों को कन्विंस करना था, खुद को भी कन्विंस करना था. मैं शुक्रगुजार थी कि मुझे इतना सब कुछ मिला है, फैमिली सपोर्ट और कैपेबिलिटी, ट्रेनिंग और ऐजुकेशन.
‘‘इसलिए यह मेरा फर्ज बनता था कि मैं काम करती रहूं. दोनों बेटियों के टाइम पर भले ही मु?ो कुछ समय के लिए ब्रेक लेना पड़ा. जैसे बड़ी बेटी के टाइम पर 2 साल और छोटी वाली के टाइम पर 9 महीने काम छोड़ा था मगर मु?ो वापस तो आना ही था. मु?ो काम करना अच्छा लगता है. काम करने से मु?ो बहुत सैटिस्फैक्शन मिलती है और सैकंड फाइनैंशियल्स स्टैबिलिटी के लिए भी यह जरूरी है. फाइनैंशियल इंडिपैंडैंस हमेशा मेरी लाइफ में बहुत इंपौर्टेंट थी.’’
इफ शी कैन डू इट देन आई कैन आल्सो डू इट
बकौल सुपर्णा, ‘‘आप को हमेशा मोटिवेटेड रहने के लिए यह सोचना चाहिए कि इफ शी कैन डू इट देन आई कैन आल्सो डू इट. मैं अब अपने फिफ्टीज में हूं लेकिन टाइटन से निकल कर मुझे लगा कि नहीं अभी मुझे कुछ करना है खुद के लिए भी और औरों के लिए भी. हार मान कर डिस्करेज हो कर रहने से क्या फायदा. हमेशा कुछ अच्छा और बड़ा सोचो. यह बात मैं अपनेआप को भी बोलती रहती हूं. मुझे लगता है यह मेरा फर्ज है कि मैं अब इस मुकाम तक पहुंची हूं और रोल मौडल बनी हूं तो नई पीढ़ी की महिलाएं मुझे देख कर मोटिवेटेड हों, उन्हें हौसला मिले कि जो मैं कर सकती हूं वे भी कर सकती हैं. मेरी तरह वे भी इस मुकाम तक पहुंच सकती हैं.
‘‘एक लेगेसी ब्रैंड को रिवाइव करना और नए ब्रैंड लौंच करना दोनों में क्या ज्यादा मुश्किल था? पूछने पर सुपर्णा कहती हैं, ‘‘लेगेसी ब्रैंड रिवाइव करना ज्यादा मुश्किल है. आप कहीं भी कुछ नया करोगे और अगर उस का फौर्मूला ठीक है, कंज्यूमर जो चाहता उस को आप अच्छे से प्लान करोगे तो नए ब्रैंड को लौंच करना आसान होता है. लेकिन कोई ब्रैंड इमेज जो कंज्यूमर्स के दिमाग में आलरैडी सैट है, उसे चेंज करना ज्यादा मुश्किल होता है.
‘‘टाइटन के मामले में देखा जाए तो इस को एक बहुत ही औसत मूल्य वाला ब्रैंड माना जाता था. लेकिन टाइटन एक प्रीमियम ब्रैंड है और प्रीमियम वाच बना कर बेच सकता है, यह इमेज कायम करना आसान नहीं था. खरीदार लाखों के प्राइस टैग की टाइटन वाच खरीदें और शान से पहनें, यह जो इमेज प्रौब्लम है, इसे ब्रेक करने में कई साल लगे.
‘‘अभी तो टाइटन वाच का औसत मूल्य भी बढ़ गया है और बहुत से कंज्यूमर्स प्रीमियम टाइटन वाचेज ढूंढ़ कर लेते हैं. इंडिया में कई सारे फौरेन ब्रैंड्स भी हैं फिर भी अगर कंज्यूमर्स टाइटन को चूज कर रहे हैं तो इस का मतलब उन को इस ब्रैंड में और इस वाच में कुछ खास दिख रहा है. तभी तो उस के लिए वे हाई प्राइस देने को तैयार हो रहे हैं. दरअसल, वाचेज की डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग, डिटेल्स और मैटीरियल इन सब पर बहुत ध्यान दिया गया. बहुत से कोलैब्रेशन से क्वालिटी इंप्रूव की गई और मार्केटिंग में भी बहुत इनोवेटिव तरीके अपनाए गए. यह जर्नी आसान नहीं थी.’’
लीडरशिप का मूलमंत्र
सुपर्णा मित्रा एक दृढ़, लक्ष्य केंद्रित और इनोवेशन को बढ़ावा देने वाली नेता के रूप में पहचानी जाती हैं. उन्होंने अपनी नीतियों में हमेशा ग्राहकों की बदलती प्राथमिकताओं को ध्यान में रखा और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए कंपनी को एक नई दिशा दी.
लीडरशिप का मूल मंत्र पूछने पर सुपर्णा कहती हैं, ‘‘मेरे हिसाब से लीडरशिप के लिए सब से जरूरी है लोगों पर विश्वास करना क्योंकि कोई लीडर सबकुछ अकेले नहीं कर सकता. आप की टीम का हर मैंबर कुछ खास जानता है, आप उन पर भरोसा करो और उन को उत्साहित करो. टीम को एकसाथ ले कर चलो. जैसे मैं ने बोला कुछ बड़ा करेंगे, कुछ ऐसा करेंगे कि बिजनैस तो होगा ही पर उस में गर्व भी होगा. तो यह जो टीम कैमिस्ट्री आप ले कर आएंगे और टीमवर्क करेंगे तो सफलता मिलेगी ही. टीमवर्क पर मेरा पूरा विश्वास है.’’
टौप लैवल पर आज भी क्यों कम हैं महिलाएं
सुपर्णा कहती हैं, ‘‘टौप लैवल पर आज भी महिलाएं कम हैं क्योंकि उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ता है. कौरपोरेट लाइफ में काम कर रही महिलाओं की भी फैमिली होती है और जिम्मेदारियां भी होती हैं. इन पारिवारिक जिम्मेदारियों की वजह से बहुत सी महिलाएं जौब छोड़ देती हैं. जब तक उन को लगता है कि अब मैं वापस आऊं तब तक काफी कुछ बदल जाता है और वे वापस नहीं आ पाती हैं. उन की कौापोरेट लाइफ में रीऐंटर करना मुश्किल हो जाता है. ऐसा नहीं है कि महिलाओं में टेलैंट कम है. अगर महिलाएं कौरपोरेट वर्ल्ड में रह जाती हैं तो वे आगे बढ़ती हैं. मगर कई कारणों से उन्हें अपनी जर्नी अधूरी छोड़नी पड़ती है.’’
वे लोग जिन्होंने सोच बदली और सपोर्ट किया ऐसे कुछ लोग हैं जिन्होंने मुझे नई सोच दी, आत्मविश्वास दिया.
सब से पहले तो जो पुराने एमडी थे भास्कर भट्टजी जो हमेशा से मेरे बौस, मैंटर और गाइड थे, अभी भी हैं, उन्होंने हमेशा मुझे बोला कि तुम बड़ा सोचो. हमेशा उन्होंने बहुत सपोर्ट किया और एडवाइस दी. बाकी मैं बोलूंगी मेरी मदर और मेरी बेटियों ने बहुत सपोर्ट किया है. जब बेटियां छोटी भी थीं तभी भी वे हमेशा कहती थीं कि आप काम करो और आगे बढ़ते जाओ. बाकी हम मैनेज कर लेंगे.
भविष्य में किस रूप में याद किया जाना चाहेंगी किसी एक अचीवमैंट के लिए नहीं बल्कि मेरी मेरी यह जो प्रोफैशनल लाइफ में एक सैंस औफ इंटीग्रिटी, प्रोफैशनल ऐक्सीलैंस और लोगों के साथ काम करने की क्वालिटी है यह बहुत खुशी देती है कि जो भी काम किया है बैस्ट किया है. अभी भी वीकैंड्स में कुछ न कुछ पढ़ती हूं और ट्राई करती रहती हूं. इंसान को हमेशा सीखना चाहिए वरना आप स्टैगनैंट हो जाते हो. तो सीखने का जो जनून है और लोगों के साथ अच्छे से पेश आना, रिस्पैक्ट देना मु?ो लगता है ये सब ज्यादा इंपौर्टैंट हैं.
कौरपोरेट वर्ल्ड में महिलाओं को आने के लिए टिप्स
सुपर्णा कहती हैं, ‘‘इस के लिए एक तो डिटर्मिनेशन बहुत जरूरी है. बहुत सारी यंग लेडीज भी आती हैं तो मैं उन से कहती हूं कि आप काम छोड़ो मत जब तक कोई बहुत बड़ा कारण न हो. एक बार छोड़ दोगे न तो वापस आना बहुत मुश्किल है. दूसरा मैं कहूंगी हमेशा कुछ नया सीखना और लगातार आगे बढ़ते रहना. आप जो 5 साल पहले कर रहे थे, 10 साल पहले कर रहे थे अभी वह जमाना ही बदल गया है. अगर आप खुद को नहीं बदलेंगे तो इर्रेलैवैंट हो जाओगे. सो खुद को बदलो. लगातार लर्न कीजिए और आगे बढिए. खुद को प्रेजैंट करना भी एक आर्ट है कि कैसे, कब किस को आप का जो काम है वह अच्छे से प्रेजैंट करो वह भी इंपौर्टैंट है.’’
आगे बढ़ने के लिए पढ़ना कितना जरूरी है
सुपर्णा कहती हैं, ‘‘पढ़ना बहुत इंपौर्टैंट है. आजकल लोग पढ़ना चाहते भी हैं तो 2-3 पेज के बाद पढ़ नहीं पाते हैं क्योंकि हर चीज डिजिटल होने के कारण हमारे ब्रेन का सर्किट्री बदल गया है. मैं तो बहुत पढ़ती हूं. बचपन से ही किताबी कीड़ा रही हूं. आप को डिफरैंट टाइप्स के सब्जैक्ट्स में रुचि लेनी चाहिए. ऐसा नहीं है कि आप अगर टैक्निकल फील्ड से हो तो टैक्निकल पढ़ाई ही कर रहे हो. अपनी फील्ड में तो अच्छा होना चाहिए पर पूरी दुनिया की एक नौलेज भी होनी चाहिए.’’
सुपर्णा के अचीवमैंट्स उन के कुछ कर गुजरने के जनून को दिखाते हैं. उन्होंने न सिर्फ अपने टेलैंट से लोगों को प्रभावित किया बल्कि जिस भी ब्रैंड के साथ जुड़ीं उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. उन्होंने यह साबित किया कि अगर महिलाएं कुछ ठान लें तो शिखर पर पहुंचना उन के लिए जरा भी मुश्किल नहीं. सुपर्णा के नेतृत्व में टाइटन ने कई इनोवेशन किए थे. 2024 में टाइटन ने अपनी 40वीं सालगिरह के अवसर पर खास लिमिटेड ऐडिशन कलैक्शन पेश किया, जिस में फ्लाइंग टूरबिलान वाच शामिल थी. यह भारत में निर्मित पहली टूरबिलान वाच थी. सुपर्णा की लीडरशिप के दौरान टाइटन ने बहुत ज्यादा फाइनैंशियल ग्रोथ की. उन्होंने कंपनी को वैश्विक मान्यता दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी…
