जबलपुर के बरगी बांध में अभी हाल ही में हुए दर्दनाक क्रूज हादसे ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि यह एक भयानक लापरवाही का परिणाम था, जिस में 13 लोगों ने अपनी जान गंवा दी. प्रत्यक्षदर्शियों और खबरों के अनुसार, उस दिन मौसम पहले से ही खराब था, फिर भी क्रूज को पर्यटकों के साथ चलाया गया.
यों तकनीकी खराबी की अनदेखी करना हमारी आदत बन गई है. क्रूज के इंजनों में खराबी की जानकारी हफ्तों पहले संबंधित अधिकारियों को लिखित में दी गई थी, लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया गया. यात्रियों को पहले से लाइफ जैकेट नहीं पहनाई गई थी और हादसे के समय अफरातफरी में उन्हें खोजने की नौबत आ गई. क्रूज पर क्षमता से अधिक लोग सवार थे. वह ओवरलोड था. वहां सुरक्षा नियमों का अभाव था. स्टाफ को आपातकालीन स्थितियों से निबटने का उचित प्रशिक्षण नहीं था. ये सभी चीजें हैं जिस ने इस हादसे को निमंत्रण दिया.
हादसे होते नहीं होने दिए जाते हैं
मैंटेनेंस कल्चर का अभाव : हम जब भी कोई नई चीज बनाते हैं तो उस के इंटीरियर और भव्य इमारतों पर करोड़ों रुपए खर्च देते हैं. लेकिन जब बात उस की मैंटेनेंस की आती है, तो हमें कुछ हजार रुपए खर्च करना भी फालतू लगता है. जब तक झूला टूट न जाए, लिफ्ट अटक न जाए या शौर्ट सर्किट न हो जाए, तब तक हम उस पर ध्यान नहीं देते. हमें मैंटेन करना नहीं आता तो हमें नहीं पता कि बैलेंस क्या होता है. 6 लोग एक तरफ खड़े हो जाएंगे और दूसरी तरफ से बैलेंस बिगड़ जाएगा और वह हिलने लगेगा, बोट का बैलेंस खराब हो जाएगा. इन सब बातों के बारे में भी हमें नहीं पता.
हम प्रिवेंटिव मैंटेनेंस के बजाय ब्रेकडाउन मैंटेनेंस पर यकीन रखते हैं
यानि कि चीजों के खराब होने से पहले हम उसे सुधारने और सर्विस करने को बेकार का खर्च समझते हैं लेकिन जब चीजें खराब हो जाती हैं और कोई हादसा हो जाता है तो हम रोनापीटना भी खूब मचा देते हैं.
मैंटनेंस के हुनर की बहुत कमी है
हमारे यहां मैंटनेंस के हुनर की बहुत कमी है. हम चीजों को मैंटेन करना नहीं जानते. अगर आप अपने घर से निकल कर सड़क पर चलें, तो देखेंगे कि 10 में से 9 मोटरसाइकिल गंदी है. लोग साफ ही नहीं करते. अगर हमारे घर में कुछ चीजें खराब हो जाएं तो हम उसे खुद सही करने के बजाए हफ्तेभर मैकेनिक का इंतजार करेंगे, मुसीबत झेल लेंगे लेकिन खुद उसे ठीक करने की कोशिश तक नहीं करेंगे.
डिजिटल प्लेटफौर्म्स का उपयोग Reels/Shorts) के लिए ज्यादा और हुनर (Skills) के लिए कम आज की डेट में इतने यूट्यूब भरे पड़े हैं जो हुनर सीखा रहे हैं. यूट्यूब पर हर चीजें सीखने के ट्यूटोरियल मौजूद हैं. चाहे वह बिजली का बोर्ड ठीक करना हो या बाइक की सर्विस, लेकिन हम उस का इस्तेमाल केवल टाइम वेस्ट करने के लिए करते हैं, कुछ नया सीखने के लिए नहीं. अलबत्ता फालतू के रील्स बना कर या देख कर समय जरूर बरबाद कर देते हैं.
अब इलैक्ट्रिक ग्रिल मशीन जैसी चीजें चलाना इंसान सीखता ही नहीं है. मैंटनेंस हमारे जीवन का हिस्सा नहीं है. यह जो हादसे हो रहे हैं, इसी की वजह से हो रहे हैं.
सोसायटियों में फायर ऐक्सटिंग्विशर (अग्निशमन यंत्र) टंगे तो होते हैं, लेकिन 90% लोगों को पता ही नहीं होता कि उन्हें चलाना कैसे है. कई बार यह उपकरण सिर्फ औडिट पास करने या चालान से बचने के लिए लगाए जाते हैं. साल में एक बार भी सुरक्षा अभ्यास (Mock Drill) न होना यह सुनिश्चित कर देता है कि आपदा के समय लोग घबराहट में गलतियां करेंगे.
चलता एटीट्यूड मुश्किलें लाता है
“हलका सा तार ही तो खुला है, चल जाएगा” या “झूले से थोड़ी आवाज ही तो आ रही है, कुछ नहीं होगा,” “बीच रास्ते में गड्डा है, तो क्या हुआ बच कर निकल जाएंगे,” यही छोटा सा ‘चलता है’ कह कर टालना एक दिन बड़े हादसे में बदल जाता है.
जवाबदेही की कमी
जब फरीदाबाद में झूला टूटने, वृंदावन में अभी हाल ही में स्टीमर डूबने और जबलपुर जैसा हादसा होता है, तो औपरेटर भाग जाता है, मालिक पल्ला झाड़ लेता है और प्रशासन जांच बैठा देता है. अगर मैंटेनेंस न होने पर भारी जुरमाना और जेल का प्रावधान सख्ती से लागू हो, तो लोग अपनेआप उपकरणों की जांच करवाना शुरू कर देंगे.
डू इट योरसेल्फ कल्चर का अभाव
पश्चिमी देशों में लोग अपने घर की पेंटिंग, नल ठीक करना या छोटीमोटी ड्रिलिंग खुद करना गर्व की बात समझते हैं. हमारे यहां पेचकस उठाना या ड्रिल मशीन चलाना कई लोग छोटा काम समझते हैं और सोचते हैं कि इस के लिए मिस्त्री ही आएगा. हम ₹200 का काम करवाने के लिए 2 दिन मिस्त्री का इंतजार कर लेंगे, लेकिन खुद ₹500-1000 की ड्रिल मशीन ला कर उसे चलाना सीखने की जहमत नहीं उठाएंगे.
टूलकिट का न होना
यह एक कड़वा सच है कि अधिकांश भारतीय घरों में एक बेसिक टूलकिट (पेचकस, प्लास, टेप, हथौड़ी) तक नहीं होती. हम अपनी सुरक्षा और सुविधा को दूसरों के भरोसे छोड़ देते हैं.
अगर घर में एक पेचकस नहीं है, तो इस का मतलब है कि हम किसी भी छोटी तकनीकी समस्या के सामने पूरी तरह असहाय हैं.
हम बस खुद को बचाते हैं
हमलोग एकदूसरे की सहायता नहीं करते, अपनेआप को बचाते हैं बस.
जबलपुर में क्रूज वाला गायब हो गया और जो मजदूर पुल पर काम कर रहे थे उन्होंने 4-5 लोगों को बचाया. इस हादसे में 15 लोग मारे गए. नाव वाले की जिम्मेदारी थी कि वह लोगों की जान बचाता लेकिन वह खुद ही भाग गया. संकट के समय सब से पहले भागना कायरता की पराकाष्ठा है और यह दिखाता है कि हम ने काम को सिर्फ पैसा कमाने का जरीया मान लिया है, उसे एक जिम्मेदारी या सेवा नहीं समझा जबकि मजदूरों ने अपनी जान की परवाह किए बगैर इतने लोगों को बचाया, जिस से पता चलता है कि बड़ेबड़े डिग्रीधारी या रसूखदार लोग अकसर हादसे के दौरान वीडियो बनाने में व्यस्त हो जाते हैं, जबकि एक साधारण मजदूर बिना सोचेसमझे पानी में कूद जाता है.
इस मानसिकता को कैसे बदलें
पश्चिमी देशों में लोग अपने घर की पेंटिंग, नल ठीक करना या छोटीमोटी ड्रिलिंग खुद करना गर्व की बात समझते हैं. लेकिन हम ऐसा करना अपनी तौहीन समझते है. हमें लगता है कि इन कामों को करना हमारे शान के खिलाफ है. इन के लिए तो कर्मचारी हैं ही- पैसा फेंको तमाशा देखो. इसलिए जब तक मैंटेनेंस हमारे ऐजुकेशन सिस्टम और डेली लाइफ का हिस्सा नहीं बनेगा, ये हादसे नहीं रुकेंगे.
सुरक्षा उपकरणों का होना उतना जरूरी नहीं है, जितना उन का ‘वर्किंग कंडीशन’ में होना और लोगों का उन्हें ‘चलाने में सक्षम’ होना जरूरी है.
ड्रिल मशीन या ग्रिल मशीन चलाना सिर्फ एक काम नहीं, एक जरूरी लाइफ स्किल है. यह आत्मनिर्भरता की पहली सीढ़ी है. जिस तरह हम अपने रोजमर्रा के काम करते हैं वैसे ही अपनी मशीनों और औजारों को साफ और दुरुस्त रखना हमारी दिनचर्या का हिस्सा होना चाहिए. बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान न दे कर घर के छोटेमोटे काम (जैसे साइकिल साफ करना या पेंच कसना) सिखाना चाहिए. इस से उन में चीजों को मैंटेन करने का संस्कार पैदा होता है.
