सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला समाज की उस सोच पर करारी चोट है जो अक्सर महिलाओं के निजी फैसलों को चरित्र के तराजू में तौलती है. कोर्ट ने साफ कहा कि दो बालिग, अविवाहित लोगों के बीच आपसी सहमति से बना संबंध किसी के चरित्र पर दाग नहीं है.
इस फैसले का मतलब क्या है
1. निजता का सम्मान : शादी न होना किसी रिश्ते को गलत नहीं बना देता. हर वयस्क को अपनी पसंद का साथ चुनने का हक है बशर्ते वो सहमति से हो.
2. चरित्र-हनन पर रोक : अब नौकरी, पढ़ाई या समाज में किसी व्यक्ति को उस के अतीत के रिश्ते के आधार पर चरित्रहीन कहकर खारिज नहीं किया जा सकेगा. तेलंगाना पुलिस भर्ती का मामला इसका उदाहरण है- कोर्ट ने उम्मीदवार की नियुक्ति रद्द करने को गलत ठहराया.
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3. धोखे की परिभाषा बदली : सिर्फ इसलिए कि रिश्ता शादी तक न पहुंचा इसका मतलब ये नहीं कि किसी ने धोखा दिया. रिश्ते कई रूप लेते हैं और हर रिश्ते की मंजिल शादी हो यह जरूरी नहीं.
वरिष्ठ जजों की नई सोच काबिले तारीफ
इस फैसले को देने वाली बेंच में जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे- ऐसे वरिष्ठ न्यायाधीश जिनकी उम्र 60-65 के आसपास थे यह सोच यह दिखाता है कि उम्र तजुर्बे की निशानी होती है, सोच की सीमा नहीं. आज भी कई वरिष्ठ जज हैं जिनकी सोच नए युवा भारत के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती हैं. उनका ये प्रगतिशील नजरिया तारीफ के काबिल है क्योंकि वही असल में कानून को जमीन से जोड़ता है.
हमारी सोच अक्सर ‘लोग क्या कहेंगे’ पर अटक जाती है. पर सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि कानून का आधार सबूत और व्यावहारिक है, समाज की वाहवाही या निंदा नहीं. जब तक कोई आरोप साबित न हो तब तक हर व्यक्ति निर्दोष है –
ये सिद्धांत महिलाओं पर भी उतना ही लागू होता है जितना पुरुषों पर. एक स्वस्थ समाज वही है जहां महिला या पुरुष अपने जीवन के फैसले डर के बिना ले सके.
सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला और यह फैसला देने वाले प्रगतिशील जजों की सोच – उसी दिशा में एक मजबूत पहल है. कुछ जज तथाकथित संस्कारों के नाम पर पौराणिक ज्ञान बांचते रहते है जबकि धर्म ग्रंथ सैंकड़ों कहानियों से भरे हैं जिन में पुरुषों ने विवाहित अविवाहित औरतों से संपर्क किया है. बहुतों में स्त्रियों ने पहल की है.
