Female empowerment : कहते हैं बेटियां घर की रौनक होती हैं लेकिन कई घरों में वही रौनक एक दिन सहारा बन जाती है जब किसी कारणवश पिता घर में नहीं रहते. चाहे असमय निधन हो, बीमारी हो या कोई और स्थिति तो अकसर घर की बड़ी बेटी अचानक बेटी से ‘जिम्मेदार अभिभावक’ की भूमिका में आ खड़ी होती है. यह बदलाव आसान नहीं होता पर इसी में उस की असली ताकत भी छिपी होती है.
अचानक बदल जाती है जिंदगी
बाप के साए में पलने वाली बेटी जो कल तक अपने सपनों, पढ़ाई और छोटीछोटी खुशियों में व्यस्त थी, आज वही घर का बजट संभालती है, छोटे भाईबहनों की पढ़ाई देखती है और मां का हौसला बनती है. समाज भी उस से उम्मीदें बढ़ा देता है कि अब तुम्हें ही संभालना है. हालांकि इन शब्दों में भरोसा भी होता है और दबाव भी.
भावनाओं का संघर्ष
बेटी बाहर से मजबूत दिखती है पर भीतर कहीं न कहीं डर, थकान और असुरक्षा भी होती है. उसे रोने का समय भी कम मिलता है क्योंकि घर को उस की मुसकान की जरूरत होती है. कई बार वह अपने सपनों को टाल देती है पर मन के किसी कोने में उन्हें सहेज कर रखती है.
जिम्मेदारी नहीं अवसर भी
यह सच है कि जिम्मेदारी भारी होती है लेकिन यही जिम्मेदारी बेटी को आत्मनिर्भर बनाती है. वह पैसों की कद्र सम झती है, फैसले लेना सीखती है और रिश्तों को संभालना भी. धीरेधीरे वही घर की रीढ़ बन जाती है.
समाज को भी चाहिए कि वह ऐसी बेटियों को बो झ न सम झे बल्कि उन के साहस की सराहना करे.
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