EMI trap: बाहर का जंक फूड मंगा कर खाना या बाहर के खुलते नएनए रेस्तराओं में खाना खाना आज की जेन जी को इतना ज्यादा पसंद आने लगा है कि वह 30-40 हजार की सैलरी में से कुछ बचाने की जगह जम कर लोन लेने लगी है. ब्रैंडेड कपड़े और ब्रैंडेड रेस्तरां इस कदर बिक रहे हैं और साफ दिखता है कि उन के ग्राहक ज्यादातर युवा और जेन जी ही होती है जिसे अपने फ्यूचर की नहीं प्रेजैंट की पड़ी रहती है.
इस का बड़ा दोष उस अधेड़ पीढ़ी को जाएगा जिस ने कमाया तो सही पर बच्चों पर लाडप्यार में इस कदर लुटा दिया कि आज की युवा पीढ़ी लोन को ही बचत समझती है और ईएमआई के शिकंजे में फंसी रहती है. क्रैडिट कार्ड कंपनियां अगर 2000 रुपए के रेस्तरां के बिल पर ईएमआई पर दिनोंदिन औफर देने लगती हैं तो इसीलिए न कि उन्हें मालूम है कि यह पीढ़ी आसानी से उन के झांसे में फंस जाएगी.
इस तरह का ट्रैप पहले नहीं होता था, ऐसा नहीं है. बस शक्ल दूसरी थी. उस समय इस जन्म के नहीं अगले जन्म के सुखों के नाम पर पंडोंपुजारियों की भीड़ हर दरवाजे पर खड़ी रहती थी और लोग फटे कपड़ों और बासी खाना खाने के बावजूद धार्मिक ईएमआई देना नहीं भूलते थे. कुछ ही समझदार लोग होते थे जो इन पंडों की चालाकियां समझते थे पर उन्हें भी विवाह, मृत्यु, जन्म, होली, दीवाली पर घेर लिया जाता था.
आज यह घेराबंदी वैलेंटाइनडे, बर्थडे, ऐनिवर्सरी, मैरिज, बाजार में नए ब्रैंड के मोबाइल, लैपटौप, बाइक, कार के नाम पर हो रही है. धार्मिक और कमर्शियल दोनों ईएमआई में लंबाचौड़ा फर्क नहीं है. दोनों में पैसा बरबाद हो रहा है. कमाने वाला पैसा फूंक रहा है पहले धर्म के नाम पर आज मौजमस्ती के साथ अच्छे बढि़या रेस्तरां या ब्रांड पर.
असली पाठ जो पेरैंट्स को पढ़ाना चाहिए था वह था बचत का, भारी बचत का, लेकिन 1990 के आसपास वयस्क हुई पीढ़ी ने अपनी संतानों को लाडों से पाला, जम कर उन पर लुटाया और कम बच्चे होने का सुख दिया. नतीजा यह हुआ है कि 25-30 साल बाद एडल्ट हुई जैनरेशन आज डेट ट्रैप में फंसी हुई है, ठीक वैसे ही जैसे एक पंडे को खाना खिलाने के लिए 1930 के आसपास लिखी गई प्रेमचंद की कहानी ‘डेढ़ सेर गेहूं’ की याद दिलाती है.
आज का ऐक्सपैंस कल का पेन है, आज का लोन कल की प्रौब्लम है, आज का मौमेंटरी प्लैजर परमानैंट बर्डन है. यह हर युवा को समझना होगा. नेता जितनी मरजी नारेबाजी कर लें कि देश आगे बढ़ रहा है, यह याद रखें कि ईएमआई ऐसी गहरी टनल है जिस के दरवाजे पर चमकदार रोशनी है, परफ्यूम है, फ्लौवर्स हैं, मगर अंदर बदबू है, अंधेरा है. चुन लो जो चाहो.
