Period leave : उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद की रहने वाली, ‘पैड वूमन’ के नाम से पहचान बनाने वाली शिक्षिका राखी गंगवार ने कामकाजी महिलाओं के लिए #पीरियड_लीव को अनिवार्य करने की पुरज़ोर मांग की है. यह मुद्दा इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में है. उनका कहना है कि मासिक धर्म के दौरान कई महिलाओं को असहनीय पेट दर्द, सिरदर्द, उल्टी, कमजोरी तथा बार-बार पैड बदलने जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है. ऐसे में महिलाओं को मजबूरी में कैजुअल लीव लेनी पड़ती है, जिससे उन्हें अपराधबोध और मानसिक दबाव झेलना पड़ता है. राखी गंगवार का मानना है कि #पीरियड_लीव कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि महिलाओं का अधिकार है और उन्हें यह मिलना ही चाहिए.
भारत में लंबे समय से पेड पीरियड लीव की मांग उठती रही है, लेकिन इस पर कभी व्यापक सहमति नहीं बन सकी. केंद्र सरकार ने भी पेड पीरियड लीव का समर्थन नहीं किया है.
पिछले वर्ष दिसंबर में स्मृति ईरानी ने संसद में कहा था कि महिलाओं को पीरियड लीव की आवश्यकता नहीं है. उनका तर्क था कि इस तरह की छुट्टी से महिला कर्मचारियों के साथ भेदभाव बढ़ सकता है, क्योंकि इससे कार्यबल में उनकी भागीदारी कम होने का खतरा है. भारत में पीरियड लीव को लेकर व्यापक बहस जारी है. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस विषय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है.
वहीं दूसरी ओर अभिनेत्री आयशा खान ने हाल ही में फिल्म ‘धुरंधर’ के आइटम सॉन्ग ‘शरारत’ की शूटिंग से जुड़ा एक अनुभव साझा किया. उन्होंने बताया कि शूटिंग के दौरान उन्हें पीरियड्स थे और उन्होंने पहले दिन ही यह गाना शूट किया. उन्हें तकलीफ थी, लेकिन यह प्रोजेक्ट उनके लिए महत्वपूर्ण था, इसलिए उन्होंने इसे पूरा किया. कई महिलाएं इस आधार पर पीरियड लीव का विरोध करती हैं और मानती हैं कि इससे उनके कार्यक्षेत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.
दरअसल, पीरियड लीव को कुछ लोग विशेषाधिकार नहीं मानते. पीरियड हर महिला के जीवन का एक स्वाभाविक शारीरिक चक्र है, जो प्रत्येक महिला को अलग-अलग प्रकार से प्रभावित करता है. ऐसे में इसे अनिवार्य अवकाश के रूप में लागू करने पर कई प्रश्न उठते हैं.
हायरिंग में भेदभाव (Hiring Bias)
यदि किसी कंपनी को यह लगे कि महिला कर्मचारी पुरुषों की तुलना में वर्ष में 12–15 दिन अधिक छुट्टी लेंगी, तो समान योग्यता होने पर भी वे पुरुष उम्मीदवार को प्राथमिकता दे सकते हैं. विशेषकर छोटी कंपनियों में प्रत्येक कर्मचारी की उपस्थिति महत्वपूर्ण होती है. ऐसे में महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित हो सकते हैं.
वेतन असमानता (Wage Gap)
नियोक्ता अतिरिक्त छुट्टी का हवाला देकर महिलाओं के वेतन में असमानता या प्रमोशन में देरी को उचित ठहरा सकते हैं. वे यह तर्क दे सकते हैं कि “चूंकि आप कम दिन कार्य कर रही हैं, इसलिए आपका मूल्यांकन अन्य कर्मचारियों जैसा नहीं हो सकता.”
‘महंगी संसाधन’ (Expensive Resource) के रूप में देखे जाने का खतरा
यदि पेड पीरियड लीव दी जाती है, तो कंपनियां इसे अतिरिक्त लागत के रूप में देख सकती हैं. वे CTC (Cost to Company) और ROI (Return on Investment) के आधार पर निर्णय लेती हैं. यदि वर्ष में 12–24 अतिरिक्त छुट्टियां जुड़ती हैं, तो इसे उत्पादकता में कमी के रूप में देखा जा सकता है.
अनावश्यक प्रतिस्पर्धा (Competition)
कार्यस्थल पर यह मानसिक दबाव उत्पन्न हो सकता है कि “यदि मैंने छुट्टी ली, तो मेरी सहकर्मी आगे निकल जाएगी.” इससे महिलाओं के बीच सहयोग की भावना प्रभावित हो सकती है. कुछ महिलाएं यह भी सोच सकती हैं कि “जब मैं दर्द में भी काम कर सकती हूं, तो दूसरी क्यों नहीं?” इस प्रकार एक-दूसरे के प्रति समर्थन की जगह प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है.
समानता बनाम जीवविज्ञान (Equality vs Biology)
यदि मासिक धर्म को बीमारी के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो यह महिलाओं के दशकों के संघर्ष—कि वे पुरुषों के बराबर कार्य कर सकती हैं—को कमजोर कर सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मासिक धर्म से जुड़े अंधविश्वास प्रचलित हैं. कई स्थानों पर महिलाओं को इन दिनों ‘अशुद्ध’ मानकर अलग रखा जाता है. नेपाल में ‘छौपड़ी प्रथा’ इसका उदाहरण है, जहां पीरियड के दौरान महिलाओं को अलग झोपड़ी में रखा जाता है. समाज ने लंबे संघर्ष के बाद इन कुरीतियों को कम करने का प्रयास किया है.
‘डबल बर्डन’ (Double Burden)
ऑफिस से छुट्टी लेने का अर्थ यह नहीं कि जिम्मेदारियां समाप्त हो जाती हैं. अक्सर महिलाओं को घरेलू कार्य—खाना बनाना, बच्चों की देखभाल, सफाई—जारी रखने पड़ते हैं. ऐसे में पीरियड लीव केवल कार्यालयीन कार्य से राहत देती है, घरेलू दायित्वों से नहीं.
“महिलाएं मैनेज कर लेती हैं”
अधिकांश महिलाएं दर्द या असहजता के बावजूद अपने कार्यों का संतुलन बना लेती हैं. वे जानती हैं कि कब दवा लेनी है, कब कार्य की गति धीमी करनी है और कब पूरी ऊर्जा से काम करना है. यह उनकी क्षमता और आत्मनियंत्रण को दर्शाता है.
क्या पीरियड लीव से कार्य प्रभावित होगा?
कुछ प्रश्न उठते हैं—
- क्या यह महिलाओं को कार्यबल से दूर करेगा?
- क्या कंपनियों को इससे नुकसान होगा?
- क्या इससे उन्हें कम पेशेवर समझा जाएगा?
जब समाज में इस विषय पर खुलकर चर्चा नहीं होती, तो कार्यस्थल पर इसे लागू करना और भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
पीरियड बीमारी या विकलांगता नहीं है
अधिकांश महिलाओं के लिए पीरियड एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है, जिसमें हल्की असहजता होती है. हालांकि लगभग 10–20% महिलाओं को गंभीर समस्याएं (जैसे एंडोमेट्रियोसिस) हो सकती हैं. समस्या तब होती है जब गंभीर दर्द को भी “सामान्य” कहकर नकार दिया जाता है. यदि इसे बीमारी घोषित किया जाए, तो नियोक्ता इसे नकारात्मक दृष्टि से देख सकते हैं.
पीरियड लीव: सुविधा या शर्मिंदगी?
कई महिलाएं अपने पीरियड को निजी रखना चाहती हैं. यदि इसे औपचारिक अवकाश के रूप में दर्ज किया जाएगा, तो इससे गोपनीयता प्रभावित हो सकती है. संकीर्ण सोच रखने वाले सहयोगियों के भद्दे कमेंट या उपहास से शर्मिंदगी की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है.
