Family Kahani: मधु कल ही बाजार से एक खूबसूरत पर्पल कलर का सूट ले कर आई थी. उसे इस सूट को पहन कर किसी को दिखाने की ऐक्साइटमैंट बहुत ज्यादा थी. वैसे तो नए कपड़े पहन कर बाहर निकलने और लोगों की तारीफ भरी नजरों का सामना करने का अलग ही मजा होता है मगर यहां बात और थी. मधु को अपने पति, सहेलियों, रिश्तेदारों या परिचितों के तारीफ की चाहत नहीं थी. उसे तो बस अपने घर के सामने वाले घर के बरामदे में खड़े शख्स की आंखों में अपने लिए तारीफ देखनी थी. मधु ने सुबह जल्दीजल्दी अपने सारे काम निबटा लिए. उस का पति 9 बजे के करीब औफिस के लिए निकल जाता था.
मधु ने टिफिन वगैरह तैयार कर दिया. बच्चे को नहला और खिलापिला कर प्ले स्कूल छोड़ आई. फिर पति के जाने के बाद उस ने अपने बाल धोए. दरअसल, धोने के बाद उस के बाल बेहद खूबसूरत लगते थे. घने, काले और लंबे होने के साथसाथ उस के बालों में अलग ही चमक थी. बालों को उस ने खुला छोड़ दिया था. अब मधु ने जल्दी से अपना नया सूट पहना और बालों को सुखाने के बहाने बालकनी में आ कर खड़ी हो गई.
उसे पता था कि 10 बजे के आसपास सामने रहने वाला वह शख्स जिम से आ जाता है और कुछ देर के लिए बालकनी में खड़ा हो कर इधरउधर आतेजाते लोगों को देखता रहता है या बैठ कर मोबाइल चलाता है. यही वक्त था जब मधु अकसर कपड़े सुखाने या पौधों में पानी डालने के लिए बालकनी में निकलती थी. उस की वाशिंगमशीन भी बालकनी में ही रखी थी इसलिए वह करीब आधा घंटा बालकनी में कपडे़ धोने का काम भी रोज करती थी. आज भी जैसे ही मधु बाहर निकली लड़के की आंखों से उस की नजरें टकराईं. उन आंखों में अपने लिए तारीफ और आकर्षण देख कर उस का दिल खिल उठा.
वह बेपरवाह हो कर कपड़े सुखाने का दिखावा करने लगी मगर नजरें बारबार उस से टकरा जातीं. पिछले 1 सप्ताह पहले मधु के सामने के घर यानी गली की दूसरी तरफ वाली बिल्डिंग की चौथी फ्लोर पर यह शख्स और उस की बूढ़ी मां नए किराएदार के रूप में आए थे. वह खुद भी चौथी फ्लोर पर ही रहती थी इसलिए सामने रहने वालों को अच्छी तरह देख सकती थी. तब से वह उस शख्स को देख रही थी. देख क्या रही थी उस की आंखों में खो गई थी. उस शख्स की उम्र भी लगभग मधु के समान ही थी. गठीला बदन, घुंघराले बाल, डौलेशौले और उन सब के बीच चमकती हुई 2 कातिल निगाहें. उन निगाहों ने गजब ढाया था. उन निगाहों से निगाहों का मिलना और मिलते ही दिल का धड़कना, यह एहसास मधु को बेकाबू किए जाता था.
वह जानती थी कि वह शख्स भी उसे पसंद करता है और उसे एक नजर देखने के लिए 1-1 घंटे तक भी बाहर बालकनी में खड़ा रहता है. फिर जैसे ही मधु निकलती दोनों की नजरें मिलतीं और नजरों ही नजरों में बातें होतीं. उस के बाद मधु का पूरा दिन बहुत खूबसूरत गुजरता. वह लड़का दोपहर के बाद बाइक निकालता और अपने काम पर चला जाता. मधु भी घर के काम निबटा कर 2-3 बजे बाहर बालकनी में आती क्योंकि उसे पता था कि यही वह समय है जब लड़का बाइक ले कर अपनी जौब पर निकलता है. उस की ड्रैस, बैग और बाकी चीजों को देख कर मधु को अंदाजा हो गया था कि वह जोमैटो में काम करता है. 3 बजे के बाद उस की शिफ्ट शुरू होती और देर रात घर लौटता. इधर मधु का पति दिनभर काम के बाद 5-6 बजे के करीब वापस आता. पूरा दिन मधु उस लड़के को देखने की चाह में बालकनी में आतीजाती रहती. वे एकदूसरे को देख कर सुकून पाते.
दोपहर के बाद जब वह लड़का निकल जाता तब मधु के लिए बालकनी में निकलने की ऐक्साइटमैंट खत्म हो जाती. कभी कुछ खाने की जरूरत होती मधुर तुरंत मंगा देता. मधु का एक फोन और वह सामान हाजिर हो जाता. मधु की विनोद के साथ अरेंज्ड मैरिज हुई थी. शादी से पहले दोनों एकदूसरे से अनजान थे और शायद आज तक एकदूसरे को समझ नहीं सके थे. विनोद अलग ही स्वभाव का था. उस में थोड़ा ऐटीट्यूड और थोड़ा सनकीपन था.
विनोद उम्र में भी मधु से काफी बड़ा था. पैसे अच्छेखासे कमा लेता था पर हमेशा मधु से ज्यादा अपने दोस्तों को अहमियत देता था. उस की जिंदगी में मधु से ज्यादा दूसरे लोग महत्त्वपूर्ण थे. रात में वह मधु के करीब आता मगर बस एक रूटीन पूरा करने के लिए. दिल से उन दोनों के बीच कोई जुड़ाव नहीं था. विनोद को मधु से कोई कहने लायक शिकायत नहीं थी क्योंकि वह अच्छा खाना बनाती थी, घर संभाल कर रखती थी, सारी चीजें सही जगह साफ सुथरी कर के रखती. गाहेबगाहे कभी विनोद का कोई रिश्तेदार आ जाए तो उस की खातिरदारी में भी कोई कमी नहीं रखती. दोनों का एक बेटा भी हो गया था.
उस का नाम अंशुल रखा था. अंशुल की देखभाल करना, उसे स्कूल भेजना, उस के लिए नाश्ता बनाना, उसे पढ़ाना सारे काम मधु बिना किसी शिकायत के करती. वह ज्यादा पढ़ीलिखी भले ही नहीं थी मगर घर संभालने का सलीका आता था. एक दिन मधु ने देखा सामने के घर में कोई डाक्टर आया है और वह बुजुर्ग महिला को चैक कर रहा है. थोड़ी देर में डाक्टर चला गया और वह लड़का बालकनी में आया तो मधु ने पूछ लिया, ‘‘कोई बीमार है क्या आप के यहां? आंटी की तबीयत सही नहीं है?’’ ‘‘जी मम्मी को 2 दिन से फीवर है. खाना बनाते हुए कल रात चक्कर आ गया सो डाक्टर को बुलाया था मैं ने.’’ ‘‘फिर उन के लिए आज कुछ हलकाफुलका खाना बनाना होगा. उन के और आप के लिए खाना कौन बनाएगा? क्या आप को आता है बनाना?’’ ‘‘नहीं बस चावल बना सकता हूं और कुछ नहीं,’’ उस ने झिझकते हुए बताया. ‘‘कोई बात नहीं मैं खाना बना कर लाती हूं,’’ मधु ने मुसकराते हुए कहा तो उस लड़के का चेहरा खिल उठा.
यह उन के बीच पहली बातचीत थी और उस दिन पहली दफा खाना ले कर मधु उस के घर पहुंची. उस ने बूड़ी मां को अपने हाथों से खाना खिलाया और फिर लड़के की तरफ मुखातिब हुई, ‘‘आप के लिए स्पैशल मटरपनीर की सब्जी बनाई है. खा कर बताइएगा कि कैसी बनी है.’’ ‘‘जरूर बताऊंगा और थैंक्स आप ने मेरे लिए इतना किया,’’ कहते हुए वह मधु के करीब खड़ा हो गया. मधु की धड़कन बढ़ गई और दिल की ख्वाहिशें जवां हो उठीं. थोड़ी देर बातचीत करने के बाद मधु घर लौट आई मगर अपना दिल वहीं छोड़ आई. समय के साथ दोनों के बीच फोन पर लंबी बातें होने लगीं. उस लड़के का नाम मधुर था. नाम में समानता के साथ दोनों के स्वभाव और सोच में भी समानता थी.
मधु को लगने लगा जैसे मधुर को उस के लिए ही बनाया गया है. यही हाल मधुर का भी था. उसे मधु का साथ बहुत पसंद था. अब उन के बीच का फासला काफी कम हो चुका था. दोनों फोन पर अपने एहसासों को शब्दों के जरीए एकदूसरे को बताने लगे थे और इस से मधु की जिंदगी का खालीपन खत्म हो चुका था. पति के जाते ही मधु मधुर के खयालों में खो जाती. कभी फोन पर बातें होतीं तो कभी आंखों ही आंखों में. मधु किसी भी बहाने उस के घर जाती रहती. मधुर की मां भी मधु को काफी पसंद करने लगी थीं.
मधु अपने बच्चे को कभीकभी मां के पास छोड़ जाती. कभी मधु को कहीं जाना होता तो वह मधुर से कह देती. वह बाइक ले कर उसे छोड़ आता और उसे ले कर भी आता. उस के काम करता. उस के लिए खाना मंगाता. मधु भी कई बार अपने हाथों से बढि़या खाना बना कर मधुर के यहां दे आती. कभी उस की मां की तबीयत खराब होती तो उन की देखभाल करती. उन की मालिश करती. इस तरह दोनों को करीब रहने का मौका मिल जाता. उधर विनोद को धीरेधीरे एहसास होने लगा था कि मधु की जिंदगी में उस के सिवा कोई और आ चुका है और यह समझने में भी उसे ज्यादा वक्त नहीं लगा कि वह कोई और कौन है. एक दिन वह औफिस से जल्दी आ गया और तब उस ने देखा कि मधु सामने वाली बिल्डिंग से निकल रही है.
मधु के घर की खिड़कियों के शीशे ऐसे थे जिन से बाहर का नजारा दिखता था मगर बाहर वालों को यह पता नहीं चलता कि अंदर से कोई देख रहा है. कई बार विनोद ने बंद खिड़की से देखा कि कैसे सामने वाला लड़का मधु को निहार रहा है और मधु भी आंखों ही आंखों में बातें कर रही है. यही नहीं एक दिन जब वह दोस्तों के साथ लंच टाइम में किसी काम से औफिस से बाहर निकला और पास के बाजार में पहुंचा तो उस ने देखा कि मधु उसी लड़के के साथ बाइक पर बैठी कहीं जा रही है.
घर आ कर जब विनोद ने मधु से उस लड़के के बारे में सवाल किया तो मधु ने साफ जवाब देते हुए कहा, ‘‘वह लड़का सामने रहता है तुम जानते ही हो. उस की मां मुझ से अकसर बातें करती रहती हैं. आज मुझे अंशुल की दवा लेने जाना था इसलिए उस से मदद ले ली.’’ विनोद के पास कोई ऐसा पौइंट नहीं था कि वह मधु को डांटताफटकारता या अवैध संबंधों का शक करता. पड़ोसी के रूप में कोई सामने रहता हो तो इतनी दोस्ती तो हो ही जाती है. मगर जो आकर्षण उस ने दोनों की आंखों में देखा था एकदूसरे के लिए वह बात विनोद की नींदें उड़ा रही थी. समय बीतता गया.
मधु और मधुर के बीच का रिश्ता गहरा होता गया और विनोद को इस बात का पूरा एहसास था. वह जानता था कि उन के बीच बहुत कुछ चल रहा है. कई बार विनोद ने देखा मधु अब ज्यादा अच्छे से तैयार होती है. संडे को या किसी और दिन सुबहसुबह विनोद की आंखें खुलतीं तो देखता मधु बालकनी में खड़ी है और सामने वह लड़का भी है. विनोद को समझते देर नहीं लगती कि उन के दिलों में क्या चल रहा है. मगर साफसाफ ऐसा नहीं था जिस के लिए वह एतराज जता सके. न तो मधु को घर से निकाल सकता था और न मधु पर बेवजह आरोप लगा सकता था. मधु उस का हर काम समय पर पहले की तरह करती थी.
विनोद को रोज सुबह औफिस जाना होता था और औफिस जाने के बाद घर में क्या हो रहा है वह नहीं जानता था. दरअसल, वह जानना भी नहीं चाहता था. कहीं न कहीं उसे पता था कि मधु उस से उतनी खुश नहीं है जितना होना चाहिए. ऐसे में अगर कहीं और से उसे खुशी मिल रही है तो फिर वह गलत कहां है. विनोद अपने मन को समझ लेता कि दोनों अच्छे पड़ोसी की तरह एकदूसरे की हैल्प कर देते या बातें कर लेते हैं. इस से ज्यादा तो कुछ नहीं करते. मगर फिर एक दिन विनोद ने मधु को उस लड़के के साथ सिनेमाहाल के बाहर देखा और तब उस का माथा ठनका कि उन का रिश्ता तो काफी आगे बढ़ चुका है. यह सोचसोच कर वह रातभर बेचैन रहा.
औफिस में भी दिनभर उस से काम नहीं हो पा रहा था. वह कल्पनाएं करने लगा कि दोनों क्याक्या कर रहे होंगे. विनोद मधु से सवाल करना चाहता था. मगर क्या कहता? मधु कहीं उसे पलट कर जवाब न दे दे यह सोच कर वह चुप रहता. कई बार उन पर नजर रखने के लिए जल्दी घर आ जाता या फिर औफिस जाने के बहाने ऐसे ही कहीं रुक कर देखता रहता कि दोनों क्या कर रहे हैं. एक दिन जब विनोद औफिस से जल्दी आया तो उस ने देखा कि मधु घर में नहीं है. फोन करने पर पता चला कि वह सामने मधुर के घर में है. मधु के लौटने पर जब विनोद ने सवाल किया तो मधु ने बिना घबराए कहा, ‘‘उस की मां की तबीयत खराब थी इसलिए मैं उन की देखभाल करने गई थी. फिर हमारा बच्चा भी तो अकसर उन के पास रहता है तो थोड़ा हमारा भी फर्ज बनता है कि मैं उन के लिए भी करूं.’’
विनोद के पास मधु को डांटने के लिए कोई वाजिब वजह नहीं थी सो वह चुप रहा. कहीं न कहीं यह सच था कि मधुर की वजह से घर अच्छी तरह संभल रहा था. सारे काम सही हो रहे थे. हाल यह था कि मधु को जब जरूरत होती अंशुल मधुर उस की मां रख लेती थी. जब खाना मंगाना होता तो मधुर जोमैटो से तुरंत मंगा देता. जब कोई बड़ा काम करने की जरूरत होती तो भी मधुर सहायता के लिए हाजिर रहता और तब विनोद भी ऐतराज नहीं कर पाता. कभी बच्चे की तबीयत खराब होती तो मधुर ही जल्दी से उसे मधु के साथ डाक्टर के पास ले जाता. विनोद खुद तो औफिस में होता. ऐसे में इमरजेंसी में अगर कोई हैल्प करने वाला है तो बुरा क्या है. विनोद की समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. वह मधुर को अपनी पत्नी से दूर तो रखना चाहता था मगर यह संभव भी नहीं दिखता था. अगर वह कहता तो मधुर सारे काम करना छोड़ देता. कई बार उस ने सोचा कि घर बदल ले लेकिन घर बदलना आसान नहीं था.
बहुत मुश्किल से यह घर कम किराए पर मिल गया था. विनोद को यह भी लगता कि अगर वह घर बदल भी ले तो क्या पता नए घर में मधु को कोई और मिल जाए. यही सब वजहें थीं कि आजकल विनोद काफी पशोपेश में रहने लगा था. कई बार उसे समझ ही नहीं आता वह क्या करे. न मधु को डांट सकता था और न उसे किसी और के करीब जाता देख सकता था. हर समय मधु से कटाकटा सा जरूर रहने लगा था मगर पूरी तरह रिश्ते को तोड़ना भी आसान नहीं था. एक दिन विनोद के मांबाप कुछ दिनों के लिए उस के पास रहने आए. विनोद को मौका मिल गया.
एक दिन जब मधु घर में नहीं थी तो उस ने अपनी मां से दिल की बात शेयर की और बताया कि मधु का सामने वाले लड़के के साथ चक्कर चल रहा है और वह घर बदलने की सोच रहा है. मधुर की सोच के विपरीत मां ने उसी पर सवाल दाग दिए, ‘‘अच्छा यह बता कितनी जगह घर बदलेगा? अरे जवान औरत है. उस की भी तमन्नाएं होंगी. अगर किसी को देख कर या किसी के साथ बातें कर खुशी मिलती है तो खुश रहने दे न उसे. ऐसा क्या गजब कर रही है वह? तेरा तो हर काम कर रही है न?’’ ‘‘अरे मां यह आप क्या कह रही हो? क्या इस तरह का रिश्ता रखना सही है? क्या मैं इस तरह का रिश्ता रख रहा हूं?’’ विनोद ने चिढ़े हुए स्वर में कहा. ‘‘तुझे कौन घास डालेगी बेटा अपनी उम्र तो देख. जबकि मधु तुझ से काफी छोटी है. उस की अपनी तमन्नाएं होंगी. वैसे भी बेटा ऐसा हर जगह होता रहता है. तू कितना भी भाग लेने की कोशिश कर, मधु को कितना भी रोक पर जो होना है वह तो होगा ही,’’ मां ने उसे समझने की कोशिश की.
‘‘पर मां आप भी तो कभी मधु की उम्र के थे. आप ने तो ऐसा गलत नहीं किया. आप के और बाबूजी की उम्र में भी बहुत अंतर था. मगर गांव की औरतें इतनी हिम्मत नहीं कर सकतीं. तभी तो मैं सोच रहा हूं मधु को ले कर गांव रहने आ जाऊं.’’ ‘‘तुझे क्या पता बेटा गांवों में क्या नहीं होता है. तू मुझे कह रहा है कि मेरी भी उम्र थी तो बता दूं. मैं ने अपनी उम्र में बहुत गुल खिलाए हैं. तुझे मालूम है गांव में किस तरह के रिश्ते आगे बढ़ते रहते हैं, अरे साली के साथ, भौजाई के साथ, दोस्त की बहन के साथ, पत्नी की सहेली के साथ, पड़ोसी के साथ. वहां तो किसी के भी साथ ऐसे रिश्ते बन जाते हैं.
खेतों में जा कर देख क्याक्या होता है. मधु की क्या कहूं मैं तो खुद भी यह सब कर चुकी हूं. कोई था हमारे पड़ोस में और मैं उस पर लट्टू थी. हम कई बार मिले हैं. कभी बगीचे में घूमते रहते थे तो कभी खेतों में निकल जाते. एकदूसरे के हाथों में हाथ डाले घूमते रहते. सब जगह चलता है बेटा परेशान मत हो.’’ ‘‘मगर वह मुझे धोखा दे रही है और मैं चुप रहूं?’’ ‘‘तुझे क्या पता क्या धोखा दे रही है? किसी से बात कर लेने का मतलब धोखा देना नहीं हो जाता,’’ मां ने डपटते हुए कहा. ‘‘मुझे क्या पता वे लोग दिन में क्या करते हैं? कहां तक रिश्ता पहुंचा है? क्या पता उस के साथ सोई भी हो?’’ विनोद ने अपना शक जाहिर किया. ‘‘यह सब इतना आसान नहीं है बेटा. वह भी यहां शहर में इतनी भीड़ में. पता है तुझे मैं तेरे घर आती हूं तो रास्ते में ही 10 लोग मिल जाते हैं. कोई सीढि़यों पर, कोई गेट पर, कोई गली में.
अगर मधु बारबार उस के घर जाएगी तो क्या लोगों की नजर नहीं उठेगी? वह कभी जरूरत हो तो ही किसी काम से जाती होगी और फिर देख तेरा घर कितने अच्छे से संभाल रखा है. खाना भी इतना अच्छा बनाती है. कभी किसी काम के लिए मना नहीं करती. तू सैलरी ज्यादा लाए या कम उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. तू इतना बड़ा है उस से पर कभी उस ने कोई शिकायत नहीं की.
मेरी कितनी सेवा करती है जो भी कहो तुरंत कर देती है. मेरे लिए साडि़यां खरीद लाती है. सारे काम, घर की सारी जिम्मेदारियां उसी के ऊपर हैं. अगर वह लड़का उस की मदद कर देता है तो क्या बुरा है? और अगर इन दोनों के बीच कुछ चल भी रहा है तो तू क्या कर लेगा? अरे तू अपनी जिंदगी खराब करेगा क्या? आजकल लड़कियां मिलती कहां हैं? दूसरी शादी कहां से हो जाएगी तेरी? अभी सब संभला हुआ है. बच्चा भी है. उसे छोड़ देगा तो तू कहां जाएगा? तेरा क्या होगा? इसलिए मेरी मान और शांति से बैठ. मेरी बहू पर नजर रखना छोड़. अपने काम से काम रख. समझ?’’ मां ने समझया.
मां की बातें सुन कर विनोद को भी समझ आ गया कि वह नाहक मधु को ले कर इतना अपसैट है. थोड़ा भरोसा और थोड़े सब्र के साथ ही जीवननैया आगे बढ़ती है. जीवनसाथी से जितना मिल रहा है उसी में खुश रहना अच्छा है. बंधन ज्यादा कसने पर टूट ही जाता है. वैसे भी शादी के लिए लड़कियां आसानी से मिलती नहीं. जो मिली हुई है उस को खोने से जिंदगी बोझ बन जाएगी. Family Kahani
