Family story : औफिस  में आ कर आन्या अनमनी सी अपनी डैस्क पर बैठ गई. 5 मिनट तक तो उसे सूझ ही नहीं कि क्या काम करे, कहां से शुरू करे. आसपास की सब डैस्क पर लोग आते जा रहे थे और काम में लगते जा रहे थे. बगल वाली डैस्क पर वृंदा आई और आते ही अपना कंप्यूटर औन कर काम में जुट गई.

आन्या इन सब से बेखबर आज अपने ही विचारों में खोई हुई थी. कल रात में वेदांत फिर रोंआसा हो कर कह रहा था, ‘‘मम्मा, अभिजीत भी अपनी नानी के घर जा रहा है पहले दिव्या भी अपने नानू के घर गई थी. वे वहां जा कर कितना ऐंजौय करते हैं, कितनी बातें बताते हैं कि वहां नानानानी ने, मामामामी ने कितना प्यार किया, मस्ती की. कितने सारे गिफ्ट्स मिलते हैं उन्हें. मम्मा हम क्यों नहीं नानी के घर जाते? मेरी तो दादी या बूआ भी नहीं हैं.’’

‘‘अरे वह तो साल में कुछ ही दिनों के लिए नानी के घर जाते हैं मगर तुम्हें तो और खुश होना चाहिए कि तुम्हारी नानी तो पूरा साल तुम्हारे पास ही रहती हैं.’’

आन्या ने हर बार की तरह उसे बहला दिया मगर नन्हा वेदांत अनमना सा ही रहा. खुद उस का मन भी तो करता है कि एकरस जीवन में कभी तो कहीं जाने को मिले. बाहर घूमने तो वे लोग जाते ही रहते हैं. मगर मायके जा कर मां के आंचल में एकदम निश्चित से घर में रहने का सुख शायद अलग ही होता होगा जो उसे कभी नहीं मिल पाया. पिता के असमय गुजर जाने के बाद रिश्तेदारों ने आंखें फेर लीं. मां ने स्कूल में पढ़ा कर अकेले ही उसे पालपोस कर बड़ा किया. जब वह एमबीए करने बैंगलुरु आई तब मां 2 साल घर में अकेली रह गई.

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