Family story : औफिस में आ कर आन्या अनमनी सी अपनी डैस्क पर बैठ गई. 5 मिनट तक तो उसे सूझ ही नहीं कि क्या काम करे, कहां से शुरू करे. आसपास की सब डैस्क पर लोग आते जा रहे थे और काम में लगते जा रहे थे. बगल वाली डैस्क पर वृंदा आई और आते ही अपना कंप्यूटर औन कर काम में जुट गई.
आन्या इन सब से बेखबर आज अपने ही विचारों में खोई हुई थी. कल रात में वेदांत फिर रोंआसा हो कर कह रहा था, ‘‘मम्मा, अभिजीत भी अपनी नानी के घर जा रहा है पहले दिव्या भी अपने नानू के घर गई थी. वे वहां जा कर कितना ऐंजौय करते हैं, कितनी बातें बताते हैं कि वहां नानानानी ने, मामामामी ने कितना प्यार किया, मस्ती की. कितने सारे गिफ्ट्स मिलते हैं उन्हें. मम्मा हम क्यों नहीं नानी के घर जाते? मेरी तो दादी या बूआ भी नहीं हैं.’’
‘‘अरे वह तो साल में कुछ ही दिनों के लिए नानी के घर जाते हैं मगर तुम्हें तो और खुश होना चाहिए कि तुम्हारी नानी तो पूरा साल तुम्हारे पास ही रहती हैं.’’
आन्या ने हर बार की तरह उसे बहला दिया मगर नन्हा वेदांत अनमना सा ही रहा. खुद उस का मन भी तो करता है कि एकरस जीवन में कभी तो कहीं जाने को मिले. बाहर घूमने तो वे लोग जाते ही रहते हैं. मगर मायके जा कर मां के आंचल में एकदम निश्चित से घर में रहने का सुख शायद अलग ही होता होगा जो उसे कभी नहीं मिल पाया. पिता के असमय गुजर जाने के बाद रिश्तेदारों ने आंखें फेर लीं. मां ने स्कूल में पढ़ा कर अकेले ही उसे पालपोस कर बड़ा किया. जब वह एमबीए करने बैंगलुरु आई तब मां 2 साल घर में अकेली रह गई.
आन्या का भी मां के बिना मन नहीं लगता था. दूरी और पैसे की तंगी के कारण वह बारबार मां के पास भी नहीं जा पाती थी. जब एमबीए पूरा हुआ तो बैंगलुरु में ही उसे एक अच्छी कंपनी में नौकरी लग गई. तब उस ने मां की नौकरी छुड़वा कर घर किराए पर रखवा दिया और एक बैडरूम वाला फ्लैट किराए पर ले कर मां को यहीं ले आई.
2 साल बाद जब संजय से उस की पहचान प्यार में बदली और प्यार शादी तक तब उन्होंने 2 बैडरूम वाला बड़ा फ्लैट किराए पर ले लिया. मां ने तब उज्जैन का घर खाली करवा कर वापस जाने की बात कही लेकिन उस ने मां को जाने नहीं दिया. अब मां बढ़ती उम्र में अकेली कैसे रहतीं. संजय को भी मां के साथ रहने से कोई आपत्ति नहीं थी उलटा वह बहुत खुश था क्योंकि उस की मां का निधन उस के बचपन में ही हो गया था और 1 साल पहले उस के पिताजी भी चल बसे थे. वह भी एकदम अकेला था.
आन्या को ही कभीकभी मां के रहते थोड़ा संकोच रहता. वह बंद कमरे के अलावा संजय के साथ घर में खुल कर रह नहीं पाती थी, हंसबोल नहीं पाती थी. मां भरसक कोशिश करती कि उन दोनों को प्राइवेसी मिले इसलिए वे उन दोनों के घर में रहने पर अधिकांश समय अपने कमरे में ही रहतीं. मगर तब भी आन्या को अजीब तो लगता ही.
वीकैंड पर बाहर लंच पर, डिनर पर या 4-5 दिनों के लिए आसपास घूमने जाते हुए मां को छोड़ कर चले जाना भी बुरा लगता था और साथ चलना मां को अटपटा लगता. इस ऊहापोह के कारण अकसर ही वे बाहर जा ही नहीं पाते थे. मगर शादी के शुरुआती सुनहरे दिन जब नवविवाहित जोड़ा एकांत में एकदूसरे के साथ समय बिताते हुए अपनी बौंडिंग मजबूत कर एक परिपक्व व सामंजस्य पूर्ण रिश्ते की नींव रखता है वे खो गए. आन्या शादी के बाद न विदा हो कर ससुराल जा पाई और न अब मायके जा पाती है. कहते हैं मायका मां से होता है लेकिन यहां तो पिता के न रहने से ही उस का मायका खो गया है. वस्तुत: दोनों ही समान रूप से जीवन के लिए जरूरी है.
एक गहरी सांस ले कर आन्या ने 2 घूंट पानी पीया और काम में मन लगाने की कोशिश करने लगी. वह देख रही थी वृंदा जब से आई है काम में जुटी हुई है. पिछले घंटेभर से उस ने आंख तक ऊपर नहीं उठाई.
‘‘बहुत बिजी हो आज तो गुड मौर्निंग भी नहीं किया, क्या कोई खास काम है?’’ आन्या ने उस से पूछा.
‘‘भाई की शादी है यार तो मां ने हफ्तेभर पहले से बुलाया है. मायके जा रही हूं न 15 दिनों के लिए तो ज्यादा से ज्यादा काम निबटा कर जाना है,’’ क्षणभर के लिए स्क्रीन से आंखें ऊपर उठा कर वृंदा ने आन्या की ओर देखते हुए बताया. उस के चेहरे पर यह बताते हुए अपार खुशी और लंबी मुसकराहट थी.
‘‘अरे वाह,’’ मन की पीड़ा को छिपा कर ऊपर से खुशी दिखाते हुए आन्या ने कहा और उदास हो कर दोबारा काम में मन लगाने की कोशिश करने लगी.
अभी आन्या थोड़ाबहुत ही काम कर पाई थी कि उस के बौस अंकित ने उसे अपने
कैबिन में बुलाया. आने वाले सप्ताह में एक विदेशी कंपनी के महत्त्वपूर्ण लोगों से मीटिंग होनी थी. आन्या वही जरूरी फाइल तैयार कर रही थी. उस ने सोचा शायद इसी बारे में बात करने के लिए सर ने उसे बुलाया होगा. वह कागजों के प्रिंट निकलवा कर उन्हें फाइल में लगा कर अंकित के कैबिन में आ गई.
अंकित ने उसे बैठने को कहा. 2 मिनट लैपटौप पर काम करने के बाद उस ने आने वाली मीटिंग से संबंधित प्रगति की जानकारी ली. आन्या ने उसे फाइल दे कर विस्तार से सब बताया. बातचीत के दौरान ही अंकित ने 2 कप कौफी मंगवा ली. अपने कर्मचारियों के साथ उस का व्यवहार बहुत ही सहज व अच्छा था. वह उन्हें अपने परिवार के सदस्य समान ही मानता था. वह दूसरे बौसेज जैसा कठोर नहीं था. कौफी सिप करते हुए वह देख रहा था कि आज आन्या अनमनी सी है.
‘‘क्या बात है आन्या आज कुछ उदास लग रही हो? घर में सब ठीक तो है न?’’ अंकित ने अपनेपन से पूछा.
‘‘हां सब ठीक है सर,’’ आन्या ने मुसकराने की कोशिश करते हुए कहा.
मगर अंकित उस के उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ. उस ने दोबारा सहानुभूति से पूछा तो आन्या ने उसे अपने मन की स्थिति के बारे में सचसच बता दिया. सुन कर अंकित के चेहरे पर भी मायूसी छा गई.
‘‘ऐसा ही कुछ हाल मेरा भी है. अपनी मां को मैं बचपन में ही खो चुका हूं तरसता रहा हूं मां के प्यार के लिए, मां के हाथ के खाने के लिए, मां की गोद में सिर रख कर लेटने के लिए. स्कूलकालेज में जब दोस्त अपनी मां के बारे में बातें करते थे तो मेरा कलेजा दुख से फट जाता था,’’ अंकित का स्वर भावुक हो आया और आंखें छलछला आईं.
‘‘आई एम सौरी सर,’’ आन्या ने कहा, ‘‘आप के पिताजी…’’
‘‘पिताजी को बगीचे, पेड़पौधों और सब्जियां उगाने का बहुत शौक है जो यहां बैंगलुरु में फ्लैट में रहते हुए पूरा नहीं हो सकता तो वे अपने कानपुर स्थित पुश्तैनी घर में ही रहते हैं. ढेर सारी सब्जियोंफलों के पेड़ और अन्य पौधे लगा रखे हैं उन्होंने वहां. लेकिन मु?ो हर समय उन की चिंता तो बनी रहती है कि वे वहां अकेले हैं,’’ अंकित ने बताया.
‘‘अरे वाह मेरी मां को भी पेड़पौधों का बहुत शौक है. उज्जैन के हमारे घर में मां ने छोटे से आंगन और छत पर ही ढेर सारे पौधे लगा रखे थे. यहां भी ड्राइंगरूम के साथ वाली बड़ी बालकनी में ही उन्होंने गमले में तरहतरह के पौधे लगा रखे हैं,’’ आन्या ने बताया.
‘‘आन्या बुरा न मानो तो एक बात कहूं?’’ अंकित ने अचानक संजीदा होते हुए पूछा.
‘‘जी कहिए न सर,’’ आन्या ने कहा.
‘‘क्या मैं कभी तुम्हारे घर आ सकता हूं मांजी से मिलने?’’ अंकित के स्वर में संकोच था.
‘‘हां क्यों नहीं सर मोस्ट वैलकम. संडे आप लंच पर आइएंगे न. संडे को मां सब के लिए कुछ न कुछ स्पैशल बनाती हैं,’’ आन्या बोली.
‘‘यह तो सोने में सुहागा हो गया, मांजी से मिलना भी हो जाएगा और उन के हाथ का बना खाना भी,’’ अंकित के चेहरे पर प्रसन्नता छा गई.
अंकित से बात कर के आन्या का भी मन हलका हो गया था. कुछ देर बाद
वह अपनी टेबल पर आ गई और काम में मगन हो गई.
संडे को नियत समय पर अंकित आन्या के घर आ गया. संजय से हाथ मिला कर उस ने मांजी को बड़े आदर से हाथ जोड़ कर नमस्ते किया. रत्नाजी से मिल कर वह भीतर से भावुक हो उठा.
तभी वेदांत आ गया. अंकित ने उस के लिए लाया चौकलेट का बड़ा सा डब्बा उसे दिया तो वह खुश हो गया. संजय और अंकित बातें करने लगे. आन्या रसोई में मां की मदद कर रही थी. रत्ना ने आज आलू टिक्की की खास चाट बनाई थी खूब सारा दही.
अनारदानेअमचूर की खट्टीमीठी चटनी वाली चाट देखते ही अंकित चहक कर बोला, ‘‘अरे वाह आंटीजी आप को कैसे पता चला मु?ो यह चाट पसंद है?’’
‘‘मैं जानती हूं तुम्हारा बचपन कानपुर में बीता है तो यह चाट तुम्हें जरूर पसंद होगी बेटा,’’ रत्ना ने स्नेह से कहा.
‘‘मैं जब भी कानपुर जाता हूं जितने दिन भी रहता हूं रोज चाट खाता हूं लेकिन आप के हाथ की बनी चाट का स्वाद लाजवाब है. मुंह में रखते ही घुल जाती है,’’ अंकित ने चटकारा लेते हुए कहा.
रत्ना ने आग्रह से उसे एक प्लेट चाट और खिला दी. अब तक सभी आपस में घुलमिल गए थे. अंकित के आत्मीय व्यवहार ने सब का मन जीत लिया था. खाने में हींग के तड़के वाली चने की दाल, रायता, बेसनगट्टे की सब्जी खा कर तो अंकित का पेट भर गया लेकिन मन नहीं भर रहा था. उस पर भरवा मिर्च का अचार और आम का छुंदा.
‘‘ऐसा लग रहा है मांजी कि न जाने कितने वर्षों बाद मैं ने मन भर कर खाना खाया है,’’ भावुकता में अंकित ने रत्ना को आंटी की जगह मांजी ही कह दिया.
‘‘तुम्हारा ही घर है बेटा जब मन करे आ जाया करना,’’ हलवे की कटोरी उस की ओर बढ़ाते हुए रत्ना ने स्नेह से कहा.
कुछ देर और बातें करने के बाद आन्या सब के लिए कौफी बना लाई. कौफी पी कर जब अंकित विदा ले कर अपने घर जाने लगा तो रत्ना ने उस के लिए शाम का भी टिफिन पैक कर के दे दिया. अंकित ने मन ही मन महसूस किया कि मां ऐसी ही तो होती हैं… पराया होने के बाद भी कितना स्नेह है उन के मन में.
इस के बाद अकसर ही रत्ना अंकित को शनिवार रात या रविवार को खाने पर बुला लेतीं या कभी अंकित अपनी कुक से खाना बनवा कर उन सब को अपने घर बुला लेता. वेदांत भी अंकित से खूब घुलमिल गया था. संजय से भी अंकित की खूब गप्पे होती.
रत्ना को तो अंकित अब मांजी कह कर ही बुलाने लगा था. रत्ना के मन में भी उस
के लिए एक स्वाभाविक स्नेह उत्पन्न हो गया था. उस के लिए खाना बनाते हुए वे अतिरिहवत स्नेह से उस की पसंद का ध्यान रखते हुए खाना बनातीं. औफिस में भले ही अंकित उस का बौस हो लेकिन घर पर रहते हुए आन्या के मन में भी अंकित के प्रति धीरेधीरे वही स्नेह पनप गया था जो एक बहन के मन में छोटे भाई के प्रति रहता है. उस के मन में रिश्तों के न रहने से जो एक खालीपन था, एक अकेलापन सा था वह कुछ हद तक दूर हो गया था क्योंकि अंकित एक बौस या मात्र परिचित की तरह व्यवहार नहीं करता था बल्कि एक आत्मीय, एक भाई की तरह का ही उस का व्यवहार था. उसे जो सब्जी पसंद होती थी वह बाजार से खरीद लाता और बिना संकोच रत्ना से बनाने को कहता.
कई बार अंकित देखता कि आन्या और संजय को प्राइवेसी नहीं मिलती है तो वह वेदांत और रत्ना के साथ घर पर रह कर उन्हें फिल्म देखने या शौपिंग करने भेज देता या उन्हें घर पर स्पेस देने के लिए रत्ना और वेदांत को घुमाने ले जाता. सभी के मन का एकाकीपन दूर हो गया था. अंकित को भी जीवन में पहली बार एक भरेपूरे परिवार का सुख मिल रहा था. बस उसे पिताजी की कमी खलती, उसे लगता काश पिताजी भी यहां होते. वह बेसब्री से शनिवाररविवार की प्रतीक्षा करता.
एक दिन जब बातों ही बातों में अंकित ने रत्ना को मांजी कहा तो नन्हे वेदांत ने उस से पूछा, ‘‘आप नानी को मांजी क्यों कहते हैं?’’
‘‘क्योंकि ये मेरी मां समान हैं न इसलिए,’’ अंकित ने बताया, ‘‘तो मेरी नानी के बेटे मेरे क्या हुए?’’ वेदांत ने उत्सुकता से पूछा.
‘‘तुम्हारे मामा हुए,’’ अंकित ने हंसते हुए कहा.
‘‘तो मैं क्या आप को मामा कहूं?’’ वेदांत
ने पूछा.
‘‘हां मेरे भानजे तुम मु?ो मामा ही कहो,’’ वेदांत को गोद में उठाते हुए अंकित ने स्नेह से कहा, ‘‘चलो इसी खुशी में हम सब आइसक्रीम खाने चलते हैं.’’
इसी तरह हंसीखुशी दिन बीत रहे थे. अंकित ने जिद कर के कुछ दिनों के लिए अपने
पिता प्रकाश को भी अपने पास बुला लिया. वे अपना बगीचा छोड़ कर आने के लिए तैयार नहीं थे लेकिन बेटे की जिद पर आ गए. अंकित के औफिस चले जाने के बाद वे यों भी दिनभर अकेले बोर हो जाते. शनिवार को अंकित उन्हें आन्या के घर ले गया. अपरिचितों के बीच पहले तो कुछ समय वे असहज रहे लेकिन जल्द ही सब से खासकर वेदांत से खूब हिलमिल गए. शाम तक तो वे भी परिवार का ही एक सदस्य बन गए.
गैलरी में जब उन्होंने रत्ना के लगाए पौधे देखे तो जा कर दिलचस्पी से उन का निरीक्षण करने लगे. छोटी सी बालकनी में भी रत्ना ने अपनी रुचि और कुशलता से ऐसे पौधे लगाए थे कि एक सुंदर सा हराभरा बगीचा तैयार हो गया था वहां. रत्ना उन्हें चाय देने गईं तो वे उत्साह से पौधों के बारे में बातें करने लगे. बहुत सालों बाद रत्ना को भी समान रुचि का कोई मिला था. वे भी खुश हो कर उन से बातें करने लगीं. दोनों देर तक पेड़ पौधों के बारे में बालकनी में बैठ कर बातें करते रहे.
प्रकाश 6-7 दिनों के लिए ही वहां आए थे लेकिन 15 दिन रह गए. इतने दिनों में अकसर ही वे दोपहर को रत्ना से मिलने आ जाते. कभीकभी शाम को उन सब को अपने घर बुला लेते. अंकित भी खुश था कि पिताजी का मन लगा हुआ है. वर्षों बाद उस ने उन्हें हंसतेमुसकराते हुए खुश देखा था. एक दिन वह औफिस में बैठा हुआ अपने पिताजी के इस बदले हुए व्यवहार के बारे में सोच रहा था कि तभी किसी काम से आन्या उस के कैबिन में आई.
कुछ देर औफिशियल बातें करने के बाद अचानक अंकित ने कहा, ‘‘पता है
आन्या वर्षों बाद मैं ने पिताजी को खुल कर हंसतेमुसकराते हुए देखा है. अब तक तो वे सदा ही चुपचाप और गंभीर बने रहते थे. मैं ने तो पहली बार जाना कि वे इतने हंसमुख और खुशमिजाज हैं. यह नया रूप है पिताजी का मेरे लिए.’’
‘‘यही मैं भी सोच रही हूं अंकित. मैं ने भी पहली बार मां को इतना खुश देखा है. अभी तक तो हमेशा ही एक उदासी की परत उन के चेहरे पर छाई रहती थी लेकिन पिछले कुछ दिनों में उस परत को ?ारते देखा, मां को स्वाभाविक रूप से हंसतेबोलते देखा और तो और जीवन में पहली बार उन्हें ठीक से तैयार होते हुए भी देखा. मेरे लिए भी यह मां का नया रूप है,’’ आन्या बोली.
‘‘यू नो आन्या हर व्यक्ति को अपने हमउम्र व्यक्ति की कंपनी की जरूरत होती है. वह उस की कंपनी में ही सहज महसूस करता है. उन की रुचियां, उन की थिंकिंग समान जो होती है. हम चाहे मांपिताजी के साथ कितनी ही बातें करें लेकिन एक जैनरेशन गैप तो बीच में होता ही है न. एक हमवयस्क साथी की आवश्यकता सब को होती है,’’ अंकित दार्शनिक अंदाज में बोला.
‘‘तुम ठीक कह रहे हो. हम तो अपनी जौब में, घर में, जीवन में व्यस्त हो जाते हैं लेकिन वे तो आयु के इस मोड़ पर साथी बिना एकदम अकेले रह जाते हैं. वास्तव में तो जीवन के सभी उत्तरदायित्वों को पूरा करने के बाद इस आयु में साथी की जरूरत सब से अधिक होती है. कितनी कमी खलती होगी मां को पिताजी की,’’ अब आन्या का स्वर भावुक हो आया मां के दर्द से.
‘‘किसी तरह यदि मांजी और पिताजी की शादी हो जाए आन्या तो सब की समस्याओं का हल निकल आए,’’ अचानक अंकित ने कहा.
‘‘पागल हो गए हो तुम? इस उम्र में शादी?’’ आन्या हैरान रह गई.
‘‘क्यों अभी तो तुम ने कहा न कि इसी उम्र में एक साथी की जरूरत सब से ज्यादा पड़ती है तो सोचो उन्हें एक हमसफर मिल जाएगा तो उन के जीवन का सूनापन दूर हो जाएगा. मु?ो पिताजी की चिंता नहीं रहेगी, मांजी को बड़ा सा बगीचा मिल जाएगा और सब से बड़ी बात मु?ो परिवार और तुम्हें मायका मिल जाएगा,’’ अंकित ने उत्साह से कहा.
मायके के नाम से क्षणभर के लिए आन्या के चेहरे पर चमक आ गई लेकिन
दूसरे ही पल वह मायूस हो कर बोली, ‘‘पर मु?ो नहीं लगता कि मां इस के लिए कभी भी राजी होंगी.’’
‘‘एक काम करते हैं अगले महीने 3 दिनों की लगातार छुट्टियां हैं, 2-3 दिन की छुट्टी और ले कर हम सब कानपुर चलते हैं. वहां मांजी और पिताजी को थोड़ा एकांत मिलेगा तब उन का व्यवहार देखते हैं. पिताजी के लिए तो मैं निश्चित कह सकता हूं कि उन्हें मांजी का साथ बहुत अच्छा लगा है क्योंकि वे 4 दिन में ही वापस जाने के लिए छटपटाने लगते थे लेकिन इस बार 15 दिनों तक रह गए तो सिर्फ मांजी की ही वजह से,’’ अंकित ने कहा.
आन्या भी सोचने लगी क्या बुरा है इस में, मां अपना घर छोड़ कर बेटी के यहां रहती हैं… कहीं न कहीं वे संकोच में तो रहती ही हैं. उसे और संजय को भी प्राइवेसी मिल जाएगी, मां और प्रकाशजी को भी साथी मिल जाएगा और सब से बड़ी बात सचमुच वह भी अपने मायके जा सकेगी छुट्टियों में.
रात में आन्या ने संजय का मन टटोला तो उसे भी यह उचित लगा. वह भी देख रहा था कि जब तक प्रकाशजी यहां थे मां खुश रहती थीं. अब उन के चले जाने के बाद फिर से गुमसुम सी रहने लगी हैं. आन्या घर पर अकसर मां के साथ प्रकाशजी की बागबानी, उन की बुद्धिमत्ता के बारे में बात करने लगती. वह देखती कि मां के चेहरे पर उन का नाम सुन कर खुशी की लहर तो छा ही जाती है.
देखते ही देखते 1 महीना बीत गया. औफिस से छुट्टी ले कर सब लोग कानपुर
पहुंचे. प्रकाशजी उन सब को देख कर बहुत खुश थे. रत्ना इतना बड़ा बगीचा और पेड़पौधे देख कर भावविभोर हो गईं. अब तो सुबहशाम की चाय भी वे बगीचे में ही पीतीं और प्रकाश के साथ बागबानी में मदद कराती रहतीं. दोनों हंसतेबतियाते साथ में काम करते. वेदांत बड़े से बगीचे में बौल खेलता रहता.
खेलते हुए एक दिन अचानक उस ने प्रकाश से पूछ लिया, ‘‘अंकल, मामा के पिताजी को क्या कहते हैं?’’
प्रकाश ने हंसते हुए कहा, ‘‘नाना कहते हैं बेटा.’’
‘‘तो आप ही मेरे नानाजी हैं?’’ वेदांत ने भोलेपन से कहा.
रत्ना और प्रकाश दोनों ही झेंप गए.
एक दिन मौका पा कर अंकित ने प्रकाश से रत्ना से विवाह की बात की तो वे सहज ही तैयार हो गए. तब आन्या और अंकित ने बड़ी मुश्किल से वादे दे कर सम?ा कर हर तरह से कोशिश कर के रत्ना को भी मना ही लिया प्रकाशजी से विवाह करने के लिए.
कानपुर से वापस आ कर 6 माह बीत चुके थे. वेदांत की परीक्षाएं समाप्त हो चुकी थीं. इस बार की गरमी की छुट्टियों में वह बहुत उत्साहित था. इधर औफिस में आन्या भी बहुत खुश थी और जल्दीजल्दी काम खत्म कर रही थी. वृंदा ने उस से खुशी की वजह पूछी तो वह चहक कर कर बोली, ‘‘इस साल मैं भी मायके जा रही हूं.’’
‘‘वह भी अपने भाई के साथ,’’ पीछे से अंकित ने आ कर कहा तो आन्या ने ढेर सारी कृतज्ञता के साथ मुसकरा कर उस की ओर देखा. आखिर उसे एक प्यारा सा मायका देने में सब से बड़ी भूमिका और मां को मनाने में सब से ज्यादा मेहनत तो उसी ने की थी.
बर्गनर इंडिया के प्रबंध निदेशक और सीईओ,
मिस्टर उमेश गुप्ता से की गई बातचीत के मुख्य अंश
आपको कुकवेयर इंडस्ट्री में अपनी जर्नी शुरू करने के लिए किस चीज ने प्रेरित किया ?
कुकवेयर इंडस्ट्री में मेरी जर्नी एक सिंपल औब्जर्वेशन से शुरू हुई. अधिकांश भारतीय घरों में इनग्रीडिएंट्स पर बहुत ध्यान दिया जाता है लेकिन रोजमर्रा में उपयोग किए जाने वाले कुकवेयर पर बहुत कम विचार करते हैं. जब हमने भारत में बर्गनर की शुरुआत की तो हमारा विजन भारतीय रसोई में ग्लोबल क्वालिटी वाले कुकवेयर लाने का था. समय के साथ यह विजन विकसित होता गया.
भारतीय रसोई में दशकों से एल्यूमीनियम कुकवेयर का उपयोग किया जाता रहा है. आप के द्वार ‘ट्राई प्ली अनकोटेड एल्यूमीनियम हटाओ, ट्राई प्ली लाओ’ अभियान शुरू करने के पीछे क्या मकसद था?
एल्यूमीनियम कुकवेयर का उपयोग लंबे समय से किया जाता रहा है क्योंकि यह सस्ता है. हालांकि लोग इस बात के प्रति जागरूक हो रहे हैं कि वे क्या खाते हैं मगर बहुत कम लोग इस बात पर विचार करते हैं कि वे किस बर्तन में खाना पकाते हैं. अभी भी इस बात की कम जागरूकता है कि अनकोटेड एल्यूमीनियम टमाटर, इमली या नींबू जैसे खट्टे पदार्थों के साथ ऊंचे तापमान पर कैसे रिएक्शन कर सकता है. ट्राई-प्ली कुकवेयर अपने तीन परतों के साथ यह सुनिश्चित करता है कि भोजन कभी भी एल्यूमीनियम के संपर्क में न आए.
स्वास्थ्य और खाना पकाने के नजरिए से आपको क्यों लगता है कि घरों के लिए अनकोटेड एल्यूमीनियम कुकवेयर से दूर जाना महत्वपूर्ण है?
किचन वह जगह है जहां सेहत बननी शुरू होती है और इस में कुकवेयर एक बड़ी भूमिका निभाता है. अनकोटेड एल्यूमीनियम रिएक्शन कर सकता है और रोजाना खाना पकाने के दौरान भोजन में रिस सकता है खासकर एसिडिक या नमकीन चीजों के साथ. एल्यूमीनियम अक्सर तेजी से खराब भी होता है. शुरू में यह सस्ता लगता है लेकिन फिर इसे बार बार बदलने की जरुरत पड़ती है. सेफ कुकवेयर में खाना बनाना एक लक्जरी नहीं है बल्कि सेहतमंद औप्शन है.
‘ट्राई प्ली अनकोटेड एल्यूमीनियम हटाओ, ट्राई प्ली लाओ’ कैम्पेन के लिए आपको अब तक कस्टमर्स से कैसा रिएक्शन मिला है?
रिएक्शन बहुत उत्साहजनक रहा है. लोग न केवल कैंपेन को देख रहे हैं बल्कि इससे जुड़ भी रहे हैं और सवाल पूछ रहे हैं. हम स्टोर स्तर पर भी इसे देख रहे हैं. लोग दैनिक खाना पकाने के लिए ट्राई-प्ली चुन रहे हैं. मास्टर शेफ इंडिया के साथ हमारी सा?ोदारी ने इस मैसेज को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में मदद की है.
भारत जैसे प्राइस सेंसिटिव बाजार में आप कस्टमर्स को कैसे सम?ाते हैं कि ट्राई प्ली कुकवेयर में इन्वेस्टमेंट एक सही लोंग टर्म डिसीजन है?
भारत में लोग कीमत को लेकर थोड़े सेंसिटिव होते हैं लेकिन अब लोग लोंग टर्म के बारे में सोच रहे हैं. कुकवेयर ऐसा आइटम है जिसका आप हर दिन इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में अगर ये ज्यादा दिन तक चलता है, अच्छा खाना पकाता है और हेल्थ के लिए भी ठीक है तो यह खर्च नहीं है बल्कि एक इन्वेस्टमेंट है.
