लेखिका – गायत्री
Social Story : काव्या तुम तो बारिश में भी इतनी सिंसियर हो… मुझे तो लगा था इस बारिश में कोई क्लाइंट नहीं आएगा लेकिन तुम तो पूरी प्रोफैशनल हो.’’
काव्या बांद्रा की एक स्टाइलिश कौफी शौप में मेज पर बैठी लैपटौप पर कुछ देख रही थी कि उस के कानों ने यह परिचित आवाज सुनी.
‘‘विक्रांत, तुम यहां’’ काव्या ने हैरानी से उस की ओर देख कर पूछा,’’ ‘‘अरे मैं तो वाकई एक क्लाइंट का इंतजार कर रही थी लेकिन वह शायद बारिश में कहीं फंस गया,’’ और काव्या ने मुसकराते हुए लैपटौप बंद कर दिया, ‘‘अरे, तुम बैठो न, खड़े क्यों हो?’’ विक्रांत को सामने की कुरसी पर बैठने का इशारा किया है.
बैरा जो काव्या की टेबल के पास से 2 चक्कर लगा चुका था. काव्या ने उसे वापस बुला कर अपने और विक्रांत के लिए कौफी और्डर की.’’
‘‘मुंबई की बारिश और तुम्हारा साथ इस से अधिक और क्या चाहिए,’’ विक्रांत ने बेहद मजाकिया अंदाज में कहा और फिर सामने की कुरसी पर बैठ गया, ‘‘आज तो सचमुच बचपन की यादें ताजा हो गईं, अनाथालय में बारिश में भीगना तो जैसे रोज का ही काम था,’’ उस ने कहा, ‘‘कितना सुकून भरा माहौल है न यहां… खिड़की से बारिश का नजारा, कौफी की भीनीभीनी खुशबू, तुम्हें यह कौफी शौप बहुत पसंद है न?’’
‘‘हां, यह जगह सचमुच खास है,’’ जवाब में काव्या ने कहा और कांच की दीवारों से बारिश की टपकती बूंदों को देखने लगी. बाहर सड़क पर गाडि़यों की रोशनी बारिश में रहरह कर चमक उठती थी.
‘‘वैसे तुम यहां कैसे? तुम ने बताया नहीं?’’ काव्या ने बाहर सड़क की ओर से ध्यान हटा कर विक्रांत की ओर देखा.
‘‘तुम्हारा पीछा करते हुए,’’ विक्रांत ने कहा और हंस दिया, ‘‘नहीं… नहीं तुम इसे सच मत समझलेना. सच बताऊं, मैं ने सुना था तुम इस कौफी शौप में अकसर आती हो. सोचा, शायद आज तुम से मुलाकात हो जाए,’’ और एक बार फिर से खिलखिला कर हंस पड़ा.
कौफी शौप में इस वक्त बहुत कम लोग थे. थोड़ी ही दूरी पर कौर्नर की टेबल पर एक लड़का अपनी गर्लफ्रैंड के साथ बैठा था. दोनों इस ओर ही देख रहे थे. विक्रांत की बात पर लड़के ने मुसकराते हुए लड़की की ओर देखा. लड़की अपनी हथेलियों से मुंह को ढक कर अपनी हंसी दबाती हुई दीवार की ओर देखने लगी.
काव्या को कुछ नहीं सूझकि जवाब में क्या कहे, इसलिए खामोशी से उस की ओर देखती रह गई. तभी बैरा कौफी के 2 कप टेबल पर रख गया. काव्या शक्कर कौफी में डाल कर चम्मच से घोलने लगी. कौफी के कप में चम्मच घुमाती हुई काव्या ने महसूस किया, विक्रांत अपलक उसे ही निहार रहा था. उस ने पलके उठा कर विक्रांत की ओर देखा और होंठों के साथसाथ उस की आंखें भी मुसकरा दीं.
विक्रांत ने कौफी का एक घूंट भर लिया और वापस कप को टेबल पर रख कर गंभीरता से काव्या की ओर देखते हुए बोल पड़ा, ‘‘काव्या, मैं बहुत समय से तुम से एक बात कहना चाहता हूं पर सोचता हूं कैसे कहूं.’’
‘‘हां कहो,’’ काव्या ने कौफी को होठों से छुआ और कप को टेबल पर रख उसी गंभीरता के साथ विक्रांत की ओर देखने लगी.
‘‘हां तो मैं यह कह रहा था कि तुम्हारे बाल खुले हुए ज्यादा अच्छे लगते हैं… और… तुम इस नीली साड़ी में बिलकुल अच्छी नहीं लगती, इस रंग की साड़ी मत पहना करो, तुम पर गुलाबी रंग बहुत जंचता है… उस दिन पार्टी में तुम ने गुलाबी रंग ही तो पहना था.’’
‘‘गुलाबी रंग मुझे कुछ खास पसंद नहीं,’’ जवाब में काव्या ने कहा.
‘कमाल है, इतनी सी बात कहने के लिए इतनी बड़ी भूमिका,’ काव्या ने मन ही मन कहा और फिर बिना कुछ कहे कौफी पीती हुई बाहर सड़क की ओर देखने लगी.
‘‘काव्या, मैं तुम्हें पसंद करने लगा हूं मैं… मैं तुम से शादी करना चाहता हूं,’’ विक्रांत ने एक सांस में अपनी बात कह दी.
काव्या को यह बात एक पल के लिए किसी चलचित्र की तरह लगी मानो
जो कुछ उस ने अभीअभी सुना वह उस के लिए नहीं, किसी फिल्म का डायलौग हो जिसे फिल्म का नायक अपनी नायिका के लिए कह रहा है. उस की नजरें बाहर सड़क की ओर से हट कर सामने की कुरसी पर आ कर टिक गईं, विक्रांत प्यारभरी निगाहों से उसे ही देख रहा था. उस ने अपनी बात कह दी थी, अब उसे काव्या के जवाब की प्रतीक्षा थी.
काव्या खामोशी से विक्रांत की ओर देखती रही. वह भावनाओं की रौ में बह कर जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना चाहती थी क्योंकि यह कोई 16-17 वर्ष की उम्र वाली. कोरी भावुकता की बात तो थी नहीं. ‘45’ की उम्र में लिया जाने वाला एक परिपक्वतापूर्ण फैसला था.
ऐसा नहीं कि काव्या के मन में विक्रांत के प्रति ऐसा कोई भाव नहीं था, मन ही मन वह भी विक्रांत को पसंद करने लगी थी लेकिन वह सिर्फ भावनाओं में नहीं बहना चाहती थी. अच्छी तरह से सोचविचार कर के निर्णय लेना चाहती थी. पर प्रेम चीज ही ऐसी है कि जिस के आगे परिपक्वता, सोचनेविचारने की शक्ति को सभी को घुटने टेकने ही पड़ते हैं. काव्या भी इस से अछूती नहीं थी प्रेम की धारा उस के मन में भी हिलोरें मार रही थी
कुछ पल दोनों चुप कौफी पीते रहे. फिर बैरा जब कप उठा कर ले गया तो विक्रांत ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘मुझे तुम्हारे जवाब की प्रतीक्षा रहेगी काव्या,’’ विक्रांत ने कहा और काव्या के हाथों को हलके से स्पर्श किया.
‘‘मुझे सोचने के लिए थोड़ा वक्त चाहिए विक्रांत,’’ काव्या ने बेहद शांत स्वर में कहा.
दोनों के बीच कुछ पलों के लिए मौन पसरा रहा. विक्रांत काव्या के चेहरे की ओर देखता रहा और मन ही मन सोचता रहा शायद काव्या ने जानबूझकर चुप्पी ओढ़ी है. वह उसे यह एहसास दिलाना चाहती है कि अचानक प्रपोज कर वह अपनी सीमाएं लांघ गया है.
कुछ पलों के बाद दोनों कौफी शौप के बाहर थे. बरसात अब थम चुकी थी. पार्किंग एरिया तक साथ चलते हुए विक्रांत ने एक बार फिर से साहस जुटाते हुए काव्या के हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा, ‘‘काव्या, मैं तुम्हें सच्चे दिल से चाहने लगा हूं, मेरा यकीन करो,
मेरे दिल में पहली बार किसी के लिए यह एहसास जागा है. जो 45 वर्षों में न हुआ वह अब हो रहा है.’’
काव्या मंत्रमुग्ध सी देखती रही. विक्रांत कहता गया और वह खामोशी से सुनती रही. काव्या बरबस मुसकराने पर मजबूर हो गई. किंतु विक्रांत का कहा एकएक शब्द उस के अंतर को गहरे तक छू गया. हाथ अभी भी विक्रांत के हाथों में थे. उस ने इस बंधन को सहज ही स्वीकार कर लिया था परंतु खामोशी बरकरार रही.
विक्रांत ने काव्या के लिए कार का दरवाजा खोलते हुए जब कहा कि मु?ो उम्मीद है तुम्हारा जवाब ‘हां’ ही होगा तब काव्या ने जवाब में मुसकरा कर सिर्फ बाय कहा और ड्राइविंग सीट पर जा कर बैठ गई.
कार ड्राइव करती हुई काव्या की स्मृति धीरेधीरे पिछले कुछ महीनों में विक्रांत के साथ हुई मुलाकातों के दृश्यों के पन्ने पलटने लगी…
विक्रांत से काव्या का परिचय कोई बहुत ज्यादा पुराना नहीं था. मुश्किल से कुछ महीने पुराना था. इस में भी उन की मुलाकात 4-5 बार ही हुई थी. विक्रांत से काव्या की पहली मुलाकात से 5 महीने पहले मुंबई के एक फाइवस्टार होटल में इत्तफाकन हुई थी.
उस दिन जब काव्या मुंबई के फाइवस्टार होटल ताज लैंड्स ऐंड में पहुंची तो रात के 8 बज चुके थे. वह कार की चाबी वैलेट पार्किंग अटैंडैंट को सौंप कर होटल लौबी की तरफ बढ़ी ही थी कि उस का मोबाइल वाइब्रेट करने लगा. पर्स से मोबाइल निकाल कर देखा तो आरोही का मैसेज फ्लैश हो रहा था.
‘‘मम्मा, चिल यार, महाबलेश्वर में मस्ती करने जा रही हूं. आई एम 19, आई गौट दिस…’’
‘‘उफ, फिर से वही जिद,’’ काव्या की भौंहें सिकुड़ गईं और होंठ बुदबुदा उठे, ‘‘आरु, यह क्या मस्ती है? अभी मुंबई आओ, अनसेफ है, डिटेल्स दो,’’ काव्या मैसेज टाइप करती हुई
लौबी से होते हुए लिफ्ट की ओर बढ़ी. लेकिन उस का ध्यान फोन पर होने के कारण गलत दिशा में मुड़ गई.
उस दिन होटल में एक ही समय पर 2 बड़ी पार्टियां हो रही थीं. एक काव्या के सहकर्मी की फेयरवेल पार्टी और दूसरी एक भव्य प्रोजैक्ट लौंच पार्टी, जोकि पुणे के मशहूर बिल्डर विक्रांत देशमुख की थी.
‘‘उफ मम्मा, रिया, सिद, अंश के साथ हूं. विला बुक्ड है. संडे तक बैक. प्लीज रिलैक्स.’’
‘‘आरोही, नो. यह सिद कौन है? कैंसिल करो वरना मैं आऊंगी…’’ काव्या मैसेज टाइप करने में इतनी मशगूल हो गई कि उसे इस बात का एहसास भी नहीं रहा कि वह किसी गलत बालरूम में प्रवेश कर चुकी है. अचानक उस का कंधा किसी से टकरा गया तो चौंक कर उस ने फोन से नजरें हटाईं. सामने एक लंबा आकर्षक पुरुष जिस की उम्र लगभग 40 से 45 के बीच होगी खड़ा था.
उस ने नीले रंग का सूट पहना था बोला, ‘‘माफ कीजिएगा,’’ उस शख्स के चेहरे पर एक हलकी सी मुसकान तैर गई. ‘‘लगता है, आप किसी और पार्टी की तलाश में हैं, गलती से मेरी पार्टी में आ गईं.’’
काव्या ने हड़बड़ाहट में अपना फोन पर्स में रख लिया. फिर आसपास के माहौल पर नजर दौड़ाई. जल्द ही उसे अपनी गलती का एहसास हो गया कि यहां का माहौल फेयरवैल पार्टी से बिलकुल अलग है. दीवारों पर बड़ीबड़ी डिजिटल स्क्रीन लगी थीं, जिन पर एक शानदार रियल स्टेट प्रोजैक्ट की तसवीरें और वीडियो चल रहे थे. मंच पर एक बैनर था, जिस पर लिखा था, ‘देशमुख रियल्टर्स न्यू होराइइन प्रोजैक्ट लौंच.’
‘‘उफ, माफ कीजिए, मैं तो अपने सहकर्मी की फेयरवैल पार्टी में आई थी.
लगता है गलत बालरूम में चली आई,’’ मुसकराने के क्रम में काव्या ने होंठ फैला दिए. लेकिन आवाज से असहजता साफ ?ालक रही थी.
‘‘कोई बात नहीं, यह होटल इतना बड़ा है कि यहां की भूलभुलैया में खो जाना आसान है. वैसे मैं विक्रांत देशमुख, यह मेरे नए प्रोजैक्ट की लौंच पार्टी है और आप?’’ उस ने कहा और अपना हाथ आगे बढ़ा दिया.
‘‘काव्या,’’ काव्या ने भी हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ा दिया, ‘‘मैं बैंक में काम करती हूं, सौरी मैं सचमुच गलत जगह आ गई.’’
‘‘अरे, गलत जगह नहीं, शायद सही वक्त पर सही जगह. आप पुणे से हैं? मैं ने आप की साड़ी के स्टाइल से अंदाजा लगाया… ऐसी साडि़यां पुणे की महिलाओं के बीच बहुत लोकप्रिय हैं.’’
काव्या को हंसी आ गई है, ‘‘नहीं, मैं मुंबई की हूं लेकिन मेरी बेटी पुणे में पढ़ती है.’’
तभी काव्या का फोन फिर से वाइब्रेट किया है, ‘‘ऐक्सक्यूज मी,’’ कह काव्या फिर से अपना फोन देखने लगी.
‘‘मम्मा, ये सब मेरे कालेज फ्रैंड्स है, सिगनल जा सकता है, बाय.’’
‘‘आरु, फोन औफ मत करना, वापस पुणे अपने होस्टल जाओ, नाऊ…’’
आरोही का कोई जवाब नहीं आया. काव्या के चेहरे पर चिंता की हलकी लकीरें खिंच गईं.
‘‘लगता है किसी बात से परेशान हैं,’’ विक्रांत ने पास की कुरसी खींच कर बैठने का इशारा कर पूछा. फिर कुछ दूर खड़े वेटर को सौफ्ट ड्रिंक सर्व करने का इशारा किया.
‘‘नहीं वह मेरी बेटी… किसी बात के लिए जिद कर रही है, मैं उसे समझरही हूं.’’
विक्रम के आग्रह करने पर काव्या ने सिर्फ पानी की बोतल ले ली.
‘‘आप की बेटी पुणे में रहती है न, पुणे के हवापानी में ही यह बात है जो बच्चों को जिद्दी बना देते हैं, मैं भी पुणे से ही हूं,’’ विक्रांत हंसने लगा.
काव्या भी हलके से मुसकरा दी.
‘‘वैसे एक बात कहना चाहूंगा, आप बहुत सख्त मां लगती हैं.’’
‘‘सख्त होना पड़ता है, अकेली मां होना आसान नहीं, मेरा मतलब है मेरी बेटी आरोही के पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं, 2 साल पहले उन की रोड ऐक्सीडैंट में मृत्यु हो गई थी.’’
‘‘उफ, मुझे खेद है,’’ विक्रांत ने अफसोस जाहिर किया.
‘‘मां और पिता दोनों की भूमिका मुझे एकसाथ निभानी पड़ती है, मां की तरह प्यार भी करती हूं और पिता की तरह सख्ती भी,’’ न जाने किन भावनाओं में बह कर काव्या ये सारी बातें विक्रांत को बता रही थी. एक पल के लिए उस ने खुद महसूस किया, अपने पति रोहन की मृत्यु के बाद यह पहला मौका था जब उस ने किसी से इस तरह खुले दिल से बात की. शायद विक्रांत के व्यक्तित्व में ही कुछ था जो उसे अपनेपन का एहसास दिला रहा था.
‘‘आप बहुत मजबूत हैं. आप की बेटी को गर्व होगा कि उसे आप जैसी मां
मिलीं,’’ विक्रांत के चेहरे पर गंभीरता आ गई थी.
‘‘आप ने अपने विषय में तो कुछ बताया नहीं, आप के घर में कौनकौन हैं, आप के बच्चे, आप की पत्नी?’’
‘‘इन में से कोई नहीं है,’’ विक्रांत ने कहा और हंस पड़ा, ‘‘दरअसल, मैं अब तक कुंआरा हूं, कोई रिश्तेदार नहीं, अनाथालय में बड़ा हुआ हूं, रिश्तेदार के नाम पर एक चाची है, जो इस वक्त पुणे में है. मेरा यह प्रोजैक्ट ही मेरी फैमिली है.’’
‘‘वैसे आप का प्रोजैक्ट है क्या? इतनी भव्य पार्टी देख कर लगता है कुछ बड़ा है.
‘‘हां, यह पुणे में हमारा नया रियल ऐस्टेट प्रोजैक्ट है. लग्जरी अपार्टमैंट्स, स्मार्ट होम्स और कुछ ऐसा जो पुणे में पहले नहीं हुआ. अगर आप की बेटी पुणे में है तो शायद उसे हमारा प्रोजैक्ट देखना चाहिए.’’
काव्या को विक्रांत की बात पर हंसी आ गई, ‘‘शायद, लेकिन पहले मुझे अपनी पार्टी
ढूंढ़नी होगी.
‘‘काव्या, मैं आप के बैंक से लोन के लिए अप्लाई करने की सोच रहा हूं, लेकिन डर है कि आप मु?ो रिजैक्ट न कर दें.’’
‘‘अगर आप के प्रोजैक्ट्स की तरह आप के डौक्यूमैंट्स भी इतने भव्य हुए तो मैं रिजैक्ट कैसे कर सकती हूं. मगर हां, मेरी बेटी को आप के प्रोजैक्ट का ब्रोशर बहुत पसंद आएगा, इस की पूरी उम्मीद है.’’
‘‘तो क्या मैं यह सम?ां कि मेरी मार्केटिंग से आप की बेटी इंप्रैस हो सकती है. फिर
तो मां को इंप्रैस करने में कोई दिक्कत नहीं,’’ विक्रांत ने मजाक के अंदाज में कहा और फिर हंस पड़ा.
काव्या के चेहरे पर हलकी सी मुसकान बिखर गई.
‘‘विक्रांत, आप की मार्केटिंग स्किल्स बेशक अच्छी हैं लेकिन मां को इंप्रैस करने के लिए आप को बहुत मेहनत करनी पड़ेगी,’’ कह कर काव्या ने अपनी कलाई घड़ी की ओर देखा. विक्रांत के साथ बातचीत में उसे पता ही नहीं लगा आधा घंटा कब निकल गया. वैसे आदमी बुरा नहीं है, काफी रोचक बातें करता है. काव्या ने अपने मन में कहा और वहां से चलने को हुई, ‘‘अच्छा तो मैं चलना चाहूंगी, मेरे कलीग्स मेरा इंतजार कर रहे होंगे .’’
‘‘चलिए, मैं आप को सही बालरूम तक छोड़ आता हूं और अगर आप चाहें तो बाद में हम कौफी के लिए मिल सकते हैं.’’
‘‘जी शुक्रिया, सही बालरूम तक जाने में मुझे शायद कोई परेशानी नहीं होगी, फिर मिलेंगे.’’
वहां से निकल कर काव्या ने एक बार फिर से आरोही के लिए मैसेज टाइप किया, ‘‘आरोही, यह आखिरी वार्निंग है, फोन औन रखो और मुझे डिटेल्स दो.’’
विक्रांत पीछे खड़ा मुसकराता हुआ काव्या को जाता देखने लगा.
‘‘हम फिर जरूर मिलेंगे,’’ काव्या के पीछे पलट कर देखने पर उस ने हाथ हिलाते हुए कहा.
इस मुलाकात के कुछ दिनों बाद ही पुणे में काव्या की मुलाकात फिर से विक्रांत से हो गई. काव्या के पति ने कुछ साल पहले पुणे में प्लाट खरीदा था. प्लाट काफी समय से खाली पड़ा था. अब उस प्लाट पर कुछ स्थानीय दबंगों की नजर थी. वे लोग उसे अवैध पार्किंग के लिए इस्तेमाल कर रहे थे. पहले भी उस प्लाट पर किसी ने कब्जा कर लिया था. तब उस के पति इस मामले को हैंडल करते थे. उन के नहीं रहने पर यह जिम्मेदारी भी काव्या के कंधों पर आ गई थी. इसी समस्या के समाधान के लिए वह पुणे गई थी.
विक्रांत का प्रोजैक्ट का काम भी काव्या के प्लाट से कुछ ही दूरी पर चल रहा था. वहीं फिर से उस की मुलाकात विक्रांत से हुई. उस के साथ उस का लंबा वार्त्तालाप भी हुआ. विक्रांत उसे उस दिन आग्रहपूर्वक अपने घर ले गया और अपनी चाची से मिलवाया. लौटते वक्त वे दोनों आरोही के होस्टल गए और फिर वहां से वह मुंबई वापस आ गई.
उस के बाद 3-4 और ऐसी ही मुलाकातें हुईं. स्मृति के पन्ने उलटते हुए काव्या ने विक्रांत के व्यक्तित्व के हर पहलू को गंभीरता से विश्लेषित किया और उस के बाद विक्रांत के विषय में उस की राय थी कि विक्रांत एक बहुत ही ईमानदार और प्यारा इंसान है. उस की सैंस औफ ह्यूमर कमाल की है. वह एक अच्छा जीवनसाथी साबित होगा. शादी के लिए उसे हां कर देनी चाहिए.
अगले दिन ही काव्या और विक्रांत फिर से उसी कौफी शौप में मिले. इस बार
काव्या ने धड़कते दिल से विक्रांत के शादी के प्रस्ताव पर अपनी हामी की मुहर लगा दी. इस के 1 महीने बाद ही उन दोनों ने बड़ी ही सादगी के साथ कुछ मित्रों की उपस्थिति के बीच कोर्ट मैरिज कर ली. शादी में आरोही नाराजगी के कारण नहीं आई. आरोही को अपनी मौम से यह शिकायत थी कि उन्होंने उस के पापा को बहुत जल्दी भुला दिया.
खैर, आरोही की यह नाराजगी ज्यादा दिन नहीं रही. विक्रांत ने उसे बहुत जल्दी मना लिया. काव्या ने धीरेधीरे यह बात भी नोटिस की कि आरोही अब काव्या से ज्यादा विक्रांत के करीब है. प्रोजैक्ट का काम पुणे में होने के कारण विक्रांत अधिकांशतया पुणे में ही रहता और आरोही की सभी छोटीबड़ी जरूरतों के वक्तत आरोही के पास पहुंच जाता. आरोही भी अपनी जरूरतों के लिए काव्या से अधिक विक्रांत पर डिपैंड रहने लगी.
काव्या अपनी इस नई जिंदगी में बहुत खुश थी. उसे लगता विक्रांत उस की जिंदगी में काफी शुभ संकेतों को ले कर आया है क्योंकि इस शादी के बाद ही बैंक में उसे प्रमोशन मिली. हालांकि यह प्रमोशन उसे अपनी काबिलीयत पर मिली थी लेकिन इस प्रमोशन के साथ मिली नई जिम्मेदारियों, नई चुनौतियों ने उस की व्यस्तता में और भी वृद्धि कर दी.
इधर कुछ दिनों से आरोही का व्यवहार काव्या के प्रति काफी बदल सा गया था. लेकिन अपनी अत्यधिक व्यस्तता के कारण काव्या ने इस ओर अधिक ध्यान नहीं दिया. इसी बीच काव्या को एक ट्रेनिंग के लिए अमेरिका जाना था. उस ने सोचा वहां से वापस आने के बाद आरोही को अपने पास बैठा कर शांतिपूर्वक इस विषय पर उस से बात करेगी.
जिस दिन काव्या की अमेरिका के लिए फ्लाइट थी, उस दिन विक्रांत उसे छोड़ने उस के साथ एअरपोर्ट तक गया, किंतु आरोही नहीं आई, जबकि उन दिनों उस की छुट्टियां चल रही थीं. फिर भी उस ने पुणे से मुंबई आने के लिए मना कर दिया. काव्या जानती थी आरोही बहुत जिद्दी है, इसलिए उस ने उस से ज्यादा कुछ नहीं कहा.
काव्या ने विक्रांत के समक्ष आरोही के प्रति अपनी चिंता को जब जाहिर किया तो विक्रांत ने उसे सम?ाते हुए कहा, ‘‘काव्या, तुम बेवजह उस की चिंता कर रही हो, तुम्हारी जिंदगी में यह कितना बड़ा मौका है. इसे ऐंजौय करने की जगह मुंह लटकाए हुए हो, तुम इस तरह उदास चेहरा ले कर जाओगी तो मु?ो भी यहां बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा. देखना जब तुम 1 महीने बाद लौटोगी तो सबकुछ ठीक हो जाएगा.’’
विक्रांत ने सामान को ट्रौली में रख कर ट्रौली काव्या को पकड़ाते हुए महसूस किया कि काव्या सामान्य दिनों की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही चुप है. काव्या का इस तरह से खामोश रहना उसे परेशान कर गया. उस ने जाती हुई काव्या को हाथ हिला कर ‘बाय’ कहा. जवाब में काव्या ने भी उस की ओर देख कर हाथ हिलाया.
तब विक्रांत ने फिर से उस से कहा, ‘‘मैं समझाऊंगा उसे,’’ और फिर कुछ पल उसे अंदर जाते देखता रहा.
थोड़ी देर बाद काव्या सुरक्षा जांच की
कतार में खड़ी थी और विक्रांत पुणे के लिए निकल पड़ा था.
काव्या को अमेरिका आए हुए 2 हफ्ते से भी ज्यादा का वक्त हो गया था. इस
बीच उस ने जब भी आरोही से फोन पर बात करनी चाही, आरोही ने उस का फोन तक नहीं उठाया. काव्या ने उस के इस व्यवहार को अपने प्रति नाराजगी सम?ा. सोचा, इंडिया लौटने पर उसे मना लेगी. एक अच्छा सा क्वालिटी टाइम उस के साथ स्पैंड करेगी.
इंडिया लौटने से पहले काव्या ने आरोही के लिए खूब खरीदारी की, उस की पसंद की ड्रैसेज, ऐक्सैसरीज खरीदीं और आरोही को फोन कर के यह जानना चाहा कि उसे और भी किसी चीज की जरूरत तो नहीं. लेकिन आरोही ने उस का फोन रिसीव नहीं किया.
तब काव्या ने आरोही की दोस्त रिया को फोन किया लेकिन रिया से जो जानकारी मिली वह उसे परेशान कर देने के लिए काफी थी. आरोही काफी समय से अपने क्लासेज अटैंड नहीं कर रही थी. काफी तनाव एवं चिंता के बीच वह इंडिया तय समय से 2 दिन पहले ही लौट आई. एअरपोर्ट पर उसे लेने विक्रांत नहीं आया. उस ने अपने आने की कोई सूचना विक्रांत को नहीं दी. कैब बुक कर के मुंबई एअरपोर्ट से सीधा अपने घर के लिए निकल पड़ी. रास्ते में काव्या को किसी का फोन आया. अपने घर जाने की जगह वह उस शख्स से मिलने चल दी. जब लौटी तो उस के हाथ में एक लिफाफा और कुछ कागजात थे, जिन्हें देखने के बाद उसे लगा जैसे उस के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई हो. उस के हाथों में जो सुबूत थे उन से विक्रांत की सारी सचाई आईने की तरह साफ थी. उसे स्वयं पर भी गुस्सा आ रहा था कि उस से इतनी बड़ी बेवकूफी कैसे हो गई. वह इंसान पहचानने में इतनी बड़ी भूल कैसे कर गई. काव्या लिफ्ट में खड़ी यही सब सोच रही थी. उसे यह तक ध्यान नहीं रहा कि पिछले 5 मिनट से वह वैसे ही लिफ्ट में खड़ी है. उस ने अब तक अपने घर 10वीं मंजिल पर जाने के लिए लिफ्ट का बटन तक नहीं दबाया है. जब किसी ने 7वें मंजिल पर जाने के लिए लिफ्ट का बटन प्रैस किया तो उस की चेतना लौटी.
उसे ऐसा लग रहा था जैसे उस के पैरों को किसी ने जंजीरों से जकड़ दिया है, उस
के शरीर की सारी ऊर्जा, सारी ताकत जैसे खत्म हो गई हो. बो?िल कदमों से खुद के शरीर को लगभग खींचती हुई वह घर के अंदर दाखिल हुई. पूरे घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था. वह अंदर कमरे में नहीं गई. बड़ी मुश्किल से अपने आंसुओं को नियंत्रित करती हुई वह वहीं सोफे पर धम्म से बैठ गई. उस के दिल में जैसे तूफान मचा था. इतने समय से यह सब चल रहा था और उसे भनक तक न लगी. उस के मोबाइल पर विक्रांत के साथ आरोही की तसवीरें थीं जो अलगअलग होटलों की थीं, कुछ तसवीरें स्विमिंग पूल की थी, कुछ में दोनों पार्क में थे. काव्या को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी ने बड़ी बेदर्दी से उस के मन को चाकू से चीर डाला हो.
इतना बड़ा धोखा… संपत्ति के लिए. पहले भी अपनी 2-2 पत्नियों को अब उस का अगला शिकार कहीं वह और उस की बेटी तो नहीं. इस खयाल के आते ही काव्या का दिल धक से रह गया. यह आदमी नहीं, राक्षस है, 2-2 पत्नियों को मौत के घाट उतार कर भी कैसे सामान्य जिंदगी जीता रहा. कहता था अभी तक कुंआरा है, शादी नहीं की. झूठ बोलता रहा, प्यार का ढोंग करता रहा और मैं उसे पहचान न सकी काव्या का मन विक्रांत के प्रति घृणा से भर उठा.
काव्या की आंखों से आंसू बह निकले, कैसे, कैसे, मैं इतनी अंधी हो गई? कैसे मैं उस की असलियत को पहचान न सकी? काव्या ने लिफाफे से निकाल कर गिफ्ट डीड की कौपी पर एक बार फिर से नजर डाली. आंसुओं से भरी पलकों के धुंधलके में गिफ्ट डीड की कौपी काव्या को किसी नश्तर से कम नहीं लगी. उस ने मेरी बेटी को बरगला लिया, प्रौपर्टी हड़प ली लेकिन मेरी बुद्धि को क्या हो गया था. वह मेरे सामने झूठे प्रेम का दिखावा करता रहा, मुझे छलता रहा. मैं उस के द्वारा बिछाए गए जाल को समझही नहीं सकी. इस से पहले भी मुझे अकेली और कमजोर औरत समझकर कई लोगों ने मेरा फायदा उठाना चाहा. मगर मैं उन सब की असलियत को पलक झपकते पहचान जाती थी पर विक्रांत. विक्रांत तो उन सब से कुछ ज्यादा ही शातिर निकला. काव्या ने गहरी सांस खींची और सिर को सोफे पर टिका दिया. आंखें बंद कीं तो पल भर में अतीत से निकल कर एकएक कर वे सारे चेहरे उस की आंखों के सामने घूम गए…
पति की मौत के बाद से ही काव्या का सामना ऐसे लोगों से काफी बार हुआ था, जिन की लालची नजरें उस की प्रौपर्टी पर रहती थीं, जो अपनी चिकनीचुपड़ी बातों से, उसे अकेली और कमजोर औरत समझकर फांसने की कोशिश करते आए थे. उस के पति की मृत्यु के कुछ महीनों बाद ही उस के दूर के रिश्तेदार राकेश ने उसे यह कहते हुए कि अकेली औरत इतनी बड़ी जिंदगी कैसे संभालेगी, कैसे प्रौपर्टी को सुरक्षित रख सकेगी. उस के आगे सीधेसीधे शादी का प्रस्ताव रख दिया था.
उस ने तो यहां तक कह दिया था कि अकेली औरत के लिए इतनी बड़ी प्रौपर्टी
संभालनी बहुत मुश्किल होगी. लेकिन काव्या ने सख्त आवाज में उसे जवाब दे दिया था कि आप की चिंता के लिए शुक्रिया. मैं अकेली नहीं हूं. मेरी बेटी है मेरे पास. एक कलीग ने तो उस के आगे जौइंट अकाउंट का प्रस्ताव ही रख दिया था कि इतनी बड़ी प्रौपर्टी आप से मैनेज करना मुश्किल होगा. आप इतनी खूबसूरत हैं, अकेली इतनी लंबी जिंदगी कैसे काटेंगी? डिनर पर चलें, मैं सब संभाल लूंगा.
तब काव्या ने गुस्से में उसे फटकार लगाते हुए कहा था कि मैं अकेली हूं, कमजोर नहीं, खूब अच्छी तरह पहचानती हूं, आप जैसे लोगों को. इस तरह की कितनी ही बातें आए दिन ही सुनती आई थी वह. कितने तरीके. सब प्रौपर्टी के पीछे लेकिन वह नहीं झुकी, उस ने सब को पहचान लिया, सब जाल बिछाते थे लेकिन विक्रांत…’’
खट… खट… खट, अचानक दरवाजे पर आवाज सुनाई पड़ी तो काव्या सचेत हो गई. लगता है बाहर विक्रांत ही है. काव्या ने फौरन बिखरे कागजातों और लिफाफे को सोफे के गद्दे के नीचे छिपा दिया. फिर खुद को सामान्य करती हुई सीधी बैठ गई.
कमरे में काव्या को सामने पा कर विक्रांत चौंक पड़ा, विक्रांत को देख कर
काव्या खड़ी हो गई और मुसकराते हुए बोली, ‘‘सरप्राइज. अचानक पहुंच कर मैं तुम्हें सरप्राइज देना चाहती थी,’’ काव्या बड़ी मुश्किल से खुद को नियंत्रित कर पा रही थी. एक बार उस के मन में तो आया कि सामने खड़े इस शख्स की जम कर धुलाई कर दे. उस के कौलर को पकड़ कर उसे झकझाड़ती हुई पूछे कि उस ने नीचता की ये सारी हदें पार कैसे कीं? लेकिन उस के सामने खड़ा यह शख्स बेहद शातिर किस्म का है, यह वह जान चुकी है. उस के द्वारा हुई एक छोटी सी भी चूक उसे नुकसान पहुंचा सकती है. अत: अपने अंदर के क्रोध को दबाती हुई वह जबरन मुसकराती रही.
‘‘अभी कुछ देर पहले ही यहां पहुंची हूं. मैं तुम्हारे आने का इंतजार कर रही थी. सोचा था, तुम मुझे अचानक घर में देख कर खुश होंगे. लेकिन ऐसा जान पड़ता है तुम मेरे आने से खुश नहीं हुए.’’
‘‘खुश. खुश तो मैं हूं लेकिन फिर भी तुम ने अपने आने का प्रोग्राम बताया होता तो मैं तुम्हें लेने एअरपोर्ट आ जाता,’’ विक्रांत ने जबरदस्ती मुसकराने की कोशिश करते हुए कहा. मन ही मन काव्या को अचानक आया देख कर परेशान हो उठा था.
‘‘तुम वह सब छोड़ो,’’ काव्या विक्रांत को अत्यधिक सोचने विचारने का समय नहीं देना चाहती थी, ‘‘आज शाम के लिए मैं ने बहुत कुछ सोच रखा है. तुम्हें तो आज का दिन याद भी नहीं, इस दिन को सैलिब्रेट करने के लिए मैं अमेरिका से भागी चली आई और तुम कहते हो कि तुम्हें कुछ याद नहीं,’’ काव्या ने बनावटी नाराजगी दिखाई, ‘‘आज का यह खास दिन तुम्हें याद नहीं. चलो, इस के लिए तुम्हें माफ किया,’’ और फिर दोनों हाथों से विक्रांत के कंधों को पड़क कर कहने लगी, ‘‘ओ विक्रांत, आज मैं बहुत खुश हूं, मैं इस दिन को सैलिब्रेट करना चाहती हूं.’’
विक्रांत यह सोच कर मन ही मन परेशान होता रहा कि भला आज कौन सा खास दिन है जिसे वह भूल गया है. दिमाग पर बहुत जोर डालने के बाद भी जब उसे कुछ याद नहीं आया तो वह इस विषय पर अधिक सोचना बंद कर के काव्या की खुशी में खुश होने का झूठा नाटक करने लगा.
‘‘चलो, सब से पहले तुम अपनी आंखें बंद करो, मैं तुम्हारे लिए एक खास चीज अमेरिका से ले कर आई हूं.’’
विक्रांत चुपचाप आंखें बंद कर खड़ा हो गया. काव्या ने व्हिस्की की बोतल उस के हाथों में पकड़ा दी. काव्या जानती थी विक्रांत की सब से बड़ी कमजोरी व्हिस्की है, ‘‘तुम इसे एक बार चख कर तो देखो, यह वहां की सब से बैस्ट क्वालिटी की व्हिस्की है.’’
‘‘काफी ऐक्सपैंसिव भी लग रही है,’’ विक्रांत बोतल हाथ में ले कर मूल्य देखने लगा.
‘‘दुनिया में पैसे से बढ़ कर भी कोई चीज होती है, विक्रांत. नहीं, मेरा मतलब है, प्रेमपूर्वक दिए गए उपहार की कीमत नहीं पूछी जाती,’’ काव्या अपनी ही वाणी में अचानक उभर आए इस कटाक्ष के भाव को महसूस कर फौरन बात को संभालने की कोशिश करती हुई बोली.
विक्रांत ने एक पल के लिए काव्या की आंखों में इस तरह से देखा जैसे वह उस के दिमाग की भीतरी परतों को बेधना चाह रहा हो.
विक्रांत अपनी ओर इस तरह देखता देख काव्या एक पल के लिए घबरा
सी गई लेकिन तुरंत ही चेहरे के भाव को मुसकराहट के पीछे धकेलती हुई बोल पड़ी, ‘‘अरे तुम इसे एक बार चख कर तो देखो, अमेरिका में मैं ने इस व्हिस्की की बड़ी तारीफ सुनी. तभी मु?ो तुम्हारा खयाल आया कि तुम्हें व्हिस्की बहुत पसंद है और मैं ने बहुत प्यार से इसे तुम्हारे लिए गिफ्ट के तौर पर खरीद लिया.’’
काव्या की बात पर विक्रांत ने भी मुसकराते हुए व्हिस्की के लिए उसे धन्यवाद कहा और फिर बोतल का ढक्कन खोलने लगा.
‘‘अरे नहीं, ऐसे नहीं,’’ काव्या व्हिस्की की बोतल विक्रांत के हाथों से ले कर डाइनिंग एरिया की तरफ चली गई.
‘‘विक्रांत, तुम ने कभी व्हिस्की में कोला मिला कर ट्राई किया? मैं ने लोगों से सुना है, कोला के साथ व्हिस्की का स्वाद दोगुना बढ़ जाता है,’’ ‘हाईबौल ग्लास’ मे बर्फ के टुकड़ों के ऊपर व्हिस्की डालती हुई काव्या ने विक्रांत की ओर देखते हुए पूछा.
‘‘नहीं,’’ विक्रांत ने न में सिर हिला दिया, किंतु विक्रांत के हांठों पर एक विचित्र सी मुसकान तैर रही थी.
‘‘इस बार ट्राई कर के देखो. मु?ो उम्मीद है इस का स्वाद तुम्हें बहुत पसंद आएगा,’’ कहती हुई काव्या किचन की ओर चल दी. जाते हुए उस ने एक नजर विक्रांत पर भी डाली. विक्रांत इस वक्त अपनी ही धुन में मग्न कुछ सोच रहा था. उस का ध्यान काव्या की तरफ बिलकुल नहीं था.
काव्या ने कोला के साथ ही बेहद नशीला पदार्थ विक्रांत की नजर से छिपा कर व्हिस्की में डाल दिया.
इधर सोफे पर बैठा विक्रांत मन ही मन अपनी जीत की खुशी में इस कदर मग्न था कि खुद के साथ हो रहे इस धोखे का उसे एहसास भी नहीं हुआ.
थोड़ी देर में काव्या अपने लिए सौफ्ट ड्रिंक और विक्रांत के
लिए व्हिस्की ले कर ड्राइंगरूम में पहुंच गई. व्हिस्की पीते हुए विक्रांत बड़ी ही उपहासभरी नजरों से काव्या की ओर देख रहा था और मन ही मन सोच रहा था कि यहां इस की पूरी प्रौपर्टी इस की बेवकूफ बेटी ने मेरे नाम गिफ्ट डीड कर दी है और यह जश्न मनाने के मूड में है, ‘बेवकूफ औरत’ उस ने मन ही मन कहा और मुसकरा दिया.
काव्या भी विक्रांत की ओर देख कर मुसकराती रही और एक के बाद एक ड्रिंक बना कर उसे बेहद प्यार से पिलाती गई. विक्रांत पर अब धीरेधीरे नशा चढ़ने लगा था.
‘‘विक्रांत, तुम्हें वह जगह याद है, जहां हम और तुम एक बार… काव्या ने बात अधूरी छोड़ विक्रांत की तरफ ध्यान से देखा. उस ने महसूस किया कि विक्रांत पर उस नशीले पदार्थ का असर होना शुरू हो गया है.
काव्या ने नोटिस कि कि उस की किसी भी बात का जवाब देते वक्त विक्रांत की जबान लड़खड़ा रही है. वह कहना कुछ चाहता और कहने कुछ लगता.
काव्या को लगा कि यही वह सही वक्त है जब वह विक्रांत के सामने बाहर चलने का प्रस्ताव रख सकती है.
काव्या विक्रांत के बिलकुल करीब जा कर बैठ गई है और बड़े प्यार से आग्रह करती हुई बोली,’’ विक्रांत, क्यों न हम इस दिन को सैलिब्रेट करें. कहीं बाहर चलें?’’
विक्रांत काव्या की बात पर पलभर चुप रह कर कुछ सोचता रहा और फिर हां में सिर हिला दिया. विक्रांत ने सोफे से उठने की कोशिश की लेकिन नशे के कारण शरीर पर उस का नियंत्रण नहीं था. काव्या ने तुरंत अपने हाथों का सहारा दिया. विक्रांत को सोफे से उठाती हुई बोली,
‘‘तुम इस हालत में ड्राइव तो नहीं कर पाओगे? कोई बात नहीं, कार मैं ड्राइव करूंगी, तुम आराम से बैठना.’’
‘‘तुम ने कहां जाने का सोचा है?’’ विक्रांत ने लड़खड़ाती जबान में ही काव्या से पूछा.
‘‘वह सब तुम मुझपर छोड़ दो. बहुत सारे सरप्राइज हैं जो मैं ने प्लान कर रखे हैं. तुम सिर्फ सफर का आनंद लेना,’’ काव्या ने कहा और बड़े प्यार से विक्रांत के लिए कार का दरवाजा खोल कर उसे ड्राइविंग सीट की बगल वाली सीट पर बैठा दिया और खुद ड्राइविंग सीट पर जा बैठी.
विक्रांत चुपचाप सीट पर बैठा रहा. बहुत अधिक नशे में होने के कारण उस की स्थिति न तो कुछ पूछने की थी न ही कुछ सोचने की. वह सिर्फ काव्या द्वारा दिए जा रहे निर्देशों का पालन कर रहा था.
कुछ ही देर में कार पनवेल होते हुए पुणे जाने वाले रास्ते पर थी. पुणे जाने के लिए 2 रास्ते हैं एक पुरानी टेढ़ीमेढ़ी पहाड़ी के रास्ते वाला और दूसरा मुंबईपुणे ऐक्सप्रैसवे. काव्या कलंबोली क्रौस करते ही खोपोली घाट की तरफ कार तेजी से बढ़ा लेती है. आगे तीखे मोड़ और ढलान भरे रास्ते पर कार को मध्यम गति से भगाती हुई वह बीचबीच में एक नजर विक्रांत की ओर भी डाल लेती थी. अचानक ही काव्या ने एक बेहद ऊंची ढलान वाली ऐसी जगह पर कार को खड़ी कर दिया, जिस के कुछ हिस्सों में रेलिंग टूटी हुई थी.
कार के अचानक रुकते ही बगल की सीट पर नशे में लेटे विक्रांत ने हैरत के साथ
काव्या की ओर देखा और लड़खड़ाती जबान में पूछा, ‘‘तुम ने… अ… अ… चानक… कार खड़ी क्यों कर दी?’’
‘‘मेरी पीठ अकड़ गई है. एक काम करो, तुम थोड़ी देर के लिए ड्राइविंग सीट पर आ जाओ. मैं थोड़ी देर पीठ सीधी करना चाहती हूं. बस, कुछ मिनट के लिए, उस के बाद मैं आ जाऊंगी ड्राइविंग सीट पर.’’
काव्या सीट चेंज करने के बहाने कार का दरवाजा खोल कर बाहर निकल गई और दूसरी तरफ से विक्रांत लड़खड़ाता हुआ
ड्राइविंग सीट की तरफ आ गया. इसी बीच काव्या ने विक्रांत की नजर बचा कर शराब की कुछ खाली बोतल अपने बड़े से बैग से निकाल कर सीट के नीचे लुढ़का दीं, जिन्हें वह घर से ही अपने साथ ले आई थी.
विक्रांत के ड्राइविंग सीट पर बैठते ही, ड्राइविंग सीट के बगल वाली सीट पर बैठी हुई काव्या विक्रांत की सीट बैल्ट ठीक करने के बहाने हैंड ब्रेक गिरा देती है और बड़ी ही फुरती के साथ कार का दरवाजा बंद करती हुई बाहर निकल गई. विक्रांत कुछ समझपाता उस से पहले ही काव्या ने गाड़ी को धक्का दे दिया. ऊंची ढलान की वजह से कार खाई की तरफ तेजी से सरकती चली गई.
विक्रांत घबरा कर चीखा, ‘‘काव्या, नहीं. क्या कर रही हो? रुको मैं… मैं… लेकिन गाड़ी फिसलती हुई नीचे गिर गई.
काव्या के कानों में विक्रांत की चीख सुनाई पड़ी, ‘‘काव्या नहीं…’’
काव्या ने दोनों हाथों से अपने कानों को बंद कर लिया. उस की आंखों से
आंसू बहने लगे, ‘विक्रांत, तुम ने मु?ो अपनी तरह हत्यारा बना दिया,’ वहां खड़ीखड़ी कांपते होंठों से यह बात वह अपनेआप में ही बुदबुदा रही थी. फिर अचानक काव्या ने महसूस किया कि उस का इस तरह खड़े रहना उचित नहीं. यदि किसी ने उसे देख या पहचान लिया तो वह मुसीबत में पड़ सकती है. हालांकि वह जगह इस वक्त बिलकुल सुनसान थी. शाम का अंधेरा घिरने लगा था लेकिन था तो आनेजाने का रास्ता ही, किसी
भी आतेजाते की उस पर नजर पड़ सकती थी. उस का वहां खड़ा होना ही सौ सवाल पैदा कर सकता था.
इस विचार के आते ही काव्या वहां से चल पड़ी. उस ने अपने चेहरे को साड़ी के पल्लू से कुछ इस तरह ढक लिया तथा साड़ी को भी कुछ इस तरह से बांध लिया कि यदि किसी की नजर पड़े भी तो वह उसे आसपास के गांव या बस्ती की महिला ही सम?ो.
पहाड़ी वाले रास्ते में पैदल तेजतेज चलती हुई काव्या जल्द से जल्द किसी ऐसे स्थान पर पहुंच जाना चाहती थी, जहां पहुंच कर उसे कोई बस या किराए की कोई गाड़ी मिल सके. पैदल चलते हुए उसे करीब 30- 35 मिनट हो गए थे लेकिन इस समय उस के दिमाग में एक खयाल बारबार आ रहा था जो उसे परेशान कर रहा था. उस ने गाड़ी को धक्का दिया और गाड़ी खाई के नीचे गिर भी गई इस सब के बावजूद अगर विक्रांत जिंदा बच गया तो. इस खयाल के आते ही अंदर ही अंदर वह कांप उठी. उस के मन में आया कि वापस जा कर वह देख आए कि सच में विक्रांत की मौत हुई है या नहीं. मगर उस का वापस उस स्थान पर जाना न सिर्फ रिस्की था बल्कि बेवकूफी भरा कदम भी होता.
काव्या ने अपने चलने की रफ्तार को और भी तेज कर दिया. जल्द ही वह
ऐसी जगह पहुंच गई जहां से उसे एक बस आती दिखाई दे गई. उस ने अपने चेहरे को साड़ी के पल्लू से और भी अच्छी तरह कवर किया और बस में जा बैठी. बस में बैठे यात्रियों में से किसी ने उस पर कुछ खास ध्यान नहीं दिया. वह भी खुद को सामान्य करती हुई, खिड़की के पास वाली खाली सीट पर जा बैठी. करीब घंटे 2 घंटे बाद वह अपने घर पहुंच गई.
इस घटना के दूसरे दिन ही स्थानीय
पुलिस को दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी की सूचना मिली. गाड़ी को काफी मशक्कत के बाद तालाब से खींच कर निकाला गया है. गाड़ी के अंदर कुछ शराब की बोतलें और ड्राइविंग सीट पर विक्रांत की लाश मिली.
जांच रिपोर्ट में लिखा गया कि शराब पी कर गाड़ी चलाई और गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई ब्लड में हाई अल्कोहल लैवल, गाड़ी में शराब की बोतलें मिलीं, रोड ऐक्सीडैंट. ड्रंक ड्राइविंग और पुलिस ने इसे रोड ऐक्सीडैंट करार दिया.
विक्रांत की रोड ऐक्सीडैंट की खबर अखबार में छप चुकी थी. हैडलाइन थी,
‘शराब के नशे में बिल्डर की दर्दनाक मौत.’ काव्या ने भी यह खबर पढ़ी और एक ठंडी
सांस ली.
काव्या के जानने वालों और विक्रांत के दोस्तों ने जब काव्या के पास आ कर विक्रांत की इस दर्दनाक मृत्यु पर शोक प्रकट किए, तो काव्या भी लोगों के सामने आंखों में आंसूभर कर शोकाकुल दिखने का यत्न करती रही. लेकिन आरोही को अपनी मां के इन आंसुओं पर कतई विश्वास नहीं था. वह अंदर ही अंदर क्रोध की आग में जल रही थी.
विक्रांत की मौत की खबर से आरोही काफी दुखी थी. वह यह मानने के लिए तैयार नहीं थी कि विक्रांत की मौत सिर्फ एक रोड ऐक्सीडैंट था. लोगों के जाते ही वह अपनी मां पर बरस पड़ी, ‘‘मौम, आप ने विक्रांत को मरवा दिया. आप ने मेरे पापा को भी मारा था. मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगी,’’ आरोही की आंखों में आंसू थे और चेहरे पर गुस्सा.
काव्या उस के इस आरोप से हैरान हो उठी, ‘‘आरु, यह तुम क्या बोल रही हो? यह सच नहीं है. मैं ने तुम्हारे पापा को नहीं मारा… किस ने भरा तुम्हारे दिमाग में यह जहर?’’
‘‘विक्रांत ने मुझे सब सच बताया था, मौम तुम ने पापा को मरने दिया और अब तुम ने विक्रांत को भी…’’ आरोही गुस्से में चिल्लाई, ‘‘तुम लालची हो मौम, बेहद लालची हो तुम. हमारी प्रौपर्टी अपने नाम रखना चाहती थी, इसीलिए मैं ने सारी प्रौपर्टी विक्रांत को गिफ्ट
डीड कर दी थी. तुम ने विक्रांत को मार डाला, विक्रांत मुझसे प्यार करता था मौम, सच्चा प्रेम. उस ने मुझसे तुम्हारी सारी सचाई बताई थी,’’ आरोही रोती हुई यह सब कहे जा रही थी. गुस्से में उस का चेहरा तमतमा उठा था.
‘‘सच्चा प्रेम मतलब सम?ाती भी हो तुम?’’ काव्या ने स्तब्ध सी मेज
का सहारा लेते हुए खुद को संभाला. गहरी सांस ली. उस का चेहरा दुख और गुस्से से लाल हो गया. वह समझचुकी थी कि विक्रांत ने किस
हद तक उस की बेटी का ब्रेनवाश कर दिया था. वह चुपचाप अपने कमरे में चली गई और वहां से कुछ कागजात, दस्तावेज और तसवीरें ला कर आरोही के सामने रख दीं, ‘‘आरोही, यह देखो.’’
तसवीर में विक्रांत 2 अलगअलग औरतों के साथ शादी की पोशाक में था.
‘‘आरू, ये दोनों महिलाएं विक्रांत की पत्नियां हैं, यह पहली पत्नी है,’’ काव्या ने एक महिला की तसवीर की ओर उंगली से इशारा किया, ‘‘इस की रहस्यमय तरीके से मृत्यु हुई
थी और यह उस की दूसरी पत्नी. पहली पत्नी
की मृत्यु के कुछ समय बाद ही विक्रांत ने इस
से शादी कर ली थी. इस की भी मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी. वह मनुष्य नहीं,
राक्षस था.’’
‘‘यह क्या है मौम,’’ आरोही के स्वर में कंपन थी. उस ने तो शादी ही नहीं की. आरोही यकीन नहीं कर पा रही थी.
‘‘लेकिन यही उस की सचाई है बेटा,’’ आरोही के करीब आ कर उस के चेहरे को अपनी हथेली में थामते हुए काव्या ने कहा, ‘‘विक्रांत ने मुझसे ?ाठ कहा था कि उस ने अब तक शादी नहीं की, जबकि उस की 2-2 शादियां हुई थीं. उस ने संपत्ति के लिए ही इन दोनों को मार डाला, वह हमें भी मार डालता. हां, मैं ने उसे मरवाया, मैं ने ही उसे मरवाया. मेरे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था क्योंकि उसे नहीं मरवाती तो वह हम दोनों को मार देता.’’
‘‘मगर मौम तुम ने उसे क्यों मरवाया? पुलिस को क्यों नहीं बताया? आप के पास
उस के खिलाफ सुबूत थे तो आप पुलिस के पास जा सकती थीं,’’ आरोही रोते हुए कागजात देख रही थी.
‘‘पुलिस?’’ काव्या ने अपने आंसुओं को रोकते हुए गहरी सांस ली, ‘‘विक्रांत जैसे लोग पुलिस की पकड़ में नहीं आते आरोही. जिन के पास पैसा होता है, रसूक होते हैं उन का पुलिस भी कुछ नहीं करती,’’ कहती हुई काव्या थोड़ी देर के लिए उस ने अपनी आंखें बंद कर एक पल के लिए कुछ सोचा. फिर बोली, ‘‘मैं तुम्हें नहीं खो सकती थी बेटा… मैं ने आत्मरक्षा में यह सब किया.’’
आरोही कांपते स्वर में बोली, ‘‘लेकिन मौम मैं किस की बातों पर
विश्वास करूं, कैसे विश्वास करूं, मुझे कुछ समझमें नहीं आ रहा,’’ रोती हुई आरोही वहां से दूसरे कमरे में चली गई.
‘‘आरोही, तुम मेरी बातों का यकीन करो बेटा, मेरे पास उस के खिलाफ सुबूत है, फिर भी तुम्हें मुझ पर यकीन क्यों नहीं. एक दिन तुम मु?ो जरूर सम?ागी, मैं ने ऐसा क्यों किया, यह बात भी तुम सम?ागी,’’ काव्या टेबल पर सिर रख कर रोने लगी, ‘‘जरूर सम?ागी बेटा…’’ काव्या के स्वर धीमे से और धीमे होते गए.
