राइटर – डा. सरस्वती
बारिश के बाद आज सुबहसुबह नीरजा की जब आंख खुली तो बंद खिड़की के खुले हुए हिस्से से एक छोटे से धूप के टुकड़े को अंदर आते देख वह खुशी से उछल पड़ी. दौड़ कर उस ने परदा खोला और खिड़की पूरी खोल दी. अब धूप का एक बड़ा टुकड़ा खिड़की से उतर कर कमरे के अंदर फर्श पर आ गया था. गुनगुनाते हुए नीरजा उस धूप के टुकड़े के साथ खेलने लगी.
नीरजा उन लोगों में है जो छोटीछोटी खुशियों में खुश हो जाते हैं और फिर आज तो नीरजा के साथ उस की 3 दिनों से बंद खिड़की जो अभीअभी खुली थी वह भी खुश थी, खिड़कियों के परदे भी खुश थे, कमरा भी खुश था, अस्तव्यस्त बिस्तर, चादर, तकिए, दरवाजे, दीवार, दीवार पर टंगी हुई. बड़ी सी पेंटिंग सब खुश थे.
चादरबिस्तर को करीने से लगाते हुए नीरजा ने मन ही मन दिनभर का प्लान बना लिया. आज रविवार की छुट्टी है, इसलिए आज बहुत से काम उसे करने हैं. अभी सब से पहले एक बढि़या सी कौफी पीनी है, नाश्ते के लिए ब्रैड बटर तो है ही. उस के बाद कपड़े धो कर छत पर सुखाने हैं क्योंकि बारिश में कपड़ों में जो नमी सी रहती है वह उसे बिलकुल पसंद नहीं, फिर पूरे घर को गीला पोंछा मारना है जो उस ने 3 दिनों से नहीं किया था. आज तो दालखिचड़ी और पापड़ से काम चलना पड़ेगा क्योंकि फ्रिज में कोई सब्जी ही नहीं है. लंच के बाद थोड़ी देर आराम करना है जो उसे पिछले पूरे सप्ताह औफिस के प्रोजैक्ट के कारण नहीं मिला था, बाद में शाम को सुपर मार्केट में जा कर सप्ताहभर का राशन का सामान भी लाना है क्योंकि आज बंपर छूट का आखिरी दिन है. ओह कितना काम है, नीरजा व्यस्त सी हो उठी.
आप सोच रहे होंगे आखिर यह नीरजा है कौन? तो मैं आप को बता ही देती हूं कि नीरजा मेरा ही नाम है और यह नाम मुझे बेहद पसंद है. मैं दिन में बारबार अपना ही नाम ले सकती हूं. खैर पूरे दिन की प्लानिंग करने के बाद न्यूजपेपर और कौफीब्रेड ले कर मैं बैठी ही थी कि दरवाजे पर घंटी बजी. यार, सुबहसुबह कौन आ गया? मैं भुनभुना उठी.
‘‘एस्क्यूज मी, सौरी टु डिस्टर्ब यू मैडम,’’ दरवाजे पर एक युवक मुसकराते हुए खड़ा था.
‘‘यस, यू हैव डिस्टर्ब्ड मी, बाइ द वे व्हाट डू यू वांट?’’ तुरंत मैं ने अपना प्रश्न दागा. बाद में मुझे लगा कि इतनी रूखाई से नहीं पूछना चाहिए था पर बात तो निकल चुकी थी. युवक को शायद इस की अपेक्षा नहीं थी. वह सकपका गया, ‘‘दरअसल मैं यहां दिल्ली में आप के घर के सामने कल रात को ही रहने आया हूं. सिर में बहुत दर्द हो रहा था. पता नहीं यहां आसपास चाय या कौफी की दुकानें कब तक खुलती हैं? आज सुबह दूर तक चक्कर मारने के बाद भी मुझे कहीं कोई होटल क्या एक चायबिस्कुट की दुकान तक नहीं मिली, आप को दरवाजे पर दूध की थैली और न्यूजपेपर लेते हुए देखा तो सोचा 1 कप कौफी मुझे आप के यहां मिल जाएगी. इसलिए चला आया. अगर आप को कुछ तकलीफ हो तो मैं जाता हूं.’’ एक सांस में बोल कर वह चल पड़ा.
मुझे उस भले से लगने वाले युवक पर दया आ गई, ‘‘अरे सुनिए, कोई बात नहीं, आइए भीतर आइए,’’ मैं ने कहा. युवक तुरंत पलटा जैसे कुछ हुआ ही न हो. ‘‘यह हुई न बात, थैंक यू नीरजा मैडम. वैसे मेरा नाम रोहित है. आप का नाम तो मैं ने नेमप्लेट में देख ही लिया था’’ युवक आ कर सोफे पर बैठ चुका था. मुझ से कौफी का मग ले कर हाथ में पेपर ले कर ध्यानपूर्वक पढ़ रहे रोहित को देख कर मैं थोड़ी सी चिढ़ गई. गुस्सा इस बात का था कि इस बिनबुलाए मेहमान की वजह से मेरा आज का टाइमटेबल खराब हो रहा था पर यह बंदा तो मेरे घर को लाइब्ररी समझ कर बैठ गया है.
खैर, न चाहते हुए भी मैं ने रोहित को पूछा, ‘‘नाश्ते में केवल ब्रेडबटर है, करेंगे.’’
‘‘हां जी कर लूंगा, नेकी और पूछपूछ, जोरों से भूख लगी थी,’’ बिना सर को उठाए पेपर पर नजर गड़ाए हुए बेतकुल्लफी से सामने से जवाब आया.
इस बार मैं मुसकरा दी, ‘‘मां कहती हैं कि भूखे को भोजन कराने से अच्छा होता हैं… सोचते हुए मैं ने रोहित की ओर प्लेट बढ़ाई. नाश्ता कर के रोहित उठ खड़ा हुआ, ‘‘शुक्रिया मैडम, आप की बढि़या सी कौफी ने मेरा दिन बना दिया, ‘‘कह कर अपने घर की ओर चलते हुए वह मुड़ा, ‘‘वैसे आप को कभी कोई सहायता की जरूरत हो तो बंदे को याद कीजिएगा…’’
दरवाजा बंद कर के मैं एक बार फिर चिढ़ गई, ‘एटिट्यूड तो देखो बंदे का. मुझे क्या जरूरत है इस के मदद की? बड़ा आया, चलो हटाओ इस को, बहुत काम है आज मुझे.’
अब मेरे बारे में. मैं नई दिल्ली के करोलबाग में एक अपार्टमेंट में अकेले ही रहती हूं जो मेरे औफिस से नजदीक है. मेरे मातापिता फरीदाबाद में रहते हैं. पिताजी रिटायर हो चुके हैं पर शौकिया एक प्राइवेट स्कूल में गणित पढ़ाते हैं. मां का और्थराइटिस की समस्या कारण चलनाफिरना बहुत कम हो गया है. अकसर घुटने के तेज दर्द से वे बिस्तर से भी उठ नहीं पाती हैं, ऐसे में मुझे ही छुट्टी ले कर मां को संभालना पड़ता है. पिताजी अकेले घर और स्कूल को संभालते थक जाते हैं.
वैसे तो मेरी बड़ी बहन कल्पना, फरीदाबाद के पास ही वल्लभगढ़ में पति राजेश और 2 छोटे बच्चों के साथ रहती है पर जरूरत पढ़ने पर वह कभी फरीदाबाद तुरंत नहीं जा पाती क्योंकि उस का पति राजेश आज भी 100 साल पीछे की सोच को पाले हुए है कि लड़की की एक बार शादी हो जाए तो उसे अपने मायके को भूल कर ससुराल वालों के लिए 24 घंटे समर्पित रहना चाहिए.
मु?ो यह बात बहुत नागवार लगती है कि क्या वह जिंदगीभर रसोईघर में कैद रहने के लिए बनी है? पत्नी का भी एक परिवार है, उन के लिए भी उसे कुछ करने का अधिकार है, यह बात पति को सम?ाता क्यों नहीं? पर मुझे राजेश की मानसिकता से ज्यादा तकलीफ इस बात की है कि कल्पना दीदी इतनी स्वार्थी क्यों है? उस को इस बात का कोई एहसास क्यों नहीं है कि उस का अपने अभिभावकों के लिए भी कोई फर्ज बनता है? वह अपने सासससुर, पतिबच्चों की सेवा अच्छी तरह से करे उस से मुझे कोई शिकायत नहीं, पर कभी जरूरत पड़ने पर वह अपने मांबाप की कोई मदद क्यों नहीं कर सकती? पूछने पर उस का कहना है कि अपने पति का विरोध कर के घर में कोई अशांति नहीं लाना चाहती है. आगे वह यह भी कहती है कि सब की अपनीअपनी विवशताएं और व्यस्तताएं होती हैं, तुम नहीं सम?ागी क्योंकि तुम्हारी अभी शादी नहीं हुई है.
खैर, नीरजा को अपने घरपरिवार की जिम्मेदारियों को निभाने से कोई गुरेज नहीं. उस ने कई बार पापा को कहा भी कि काम छोड़ कर यहां दिल्ली में आ जाएं पर पिताजी हमेशा इस बात को टाल जाते हैं. उन को गणित पढ़ाना बेहद पसंद है और उन के कई छात्र वक्तवेवक्त गणित की समस्याएं ले कर उन के पास आ जाते हैं, जिस से उन का समय कट जाता है.
उन का कहना है कि इतने साल निकाल लिए अब थोड़ा और सही फिर तो घर में ही रहना है. ऊपर से उन का एक ही राग रहता है कि बेटा, शादी कर ले, कामवाम तो चलता रहेगा. ‘मु?ो शादी के लिए मनाही नहीं है पर मैं चाहती कि मेरा पति राजेश जीजाजी जैसा स्वार्थी और इंसेंसिटिव न हो. वह मेरे साथ मेरे परिवार को भी अपना माने. पर ऐसा लड़का मिलना आसान नहीं है, फिर मु?ो भी अपनी नौकरी से फुरसत नहीं है, इसलिए मामला आगे बढ़ता जा रहा है.
खैर खाना खा कर 04 बजे तक बाकी सब काम निबटा कर मैं ने थोड़ी सी झपकी ली ही थी कि मोबाइल की घंटी बजी. अनमने भाव से मैं ने फोन उठाया. कौल पिताजी की थी.
‘‘बोलिए पापा सब ठीक?’’ मैं ने कहा.
‘‘नहीं बेटा, सवेरे तुम्हारी मम्मी सीढि़यों से गिर गई, पैर में बहुत सूजन है, रविवार होने की वजह से पास की क्लीनिक बंद है और डाक्टर भी फोन नहीं उठा रहे हैं. मैं ने बाम लगा कर क्रेप बैंडेज बांधा है. थोड़ी देर सो गई थी पर अभी उठने के बाद उसे बहुत तकलीफ है. मुझे लगता है, माइनर फैक्चर हुआ होगा. संभव हो तो आ जाओ प्लीज.’’
लगता था पापा जैसे रो पढ़ेंगे, ‘‘आप चिंता मत करो पापा मैं मैट्रो पकड़ कर आती हूं.’’ मैं ने उन्हें दिलासा दी, जल्दी से बैग में कुछ कपड़े, लैपटौप और जरूरी समान लिए. ‘हो सकता है 4-5 दिन वहां रहना पड़े, कोई बात नहीं वर्क फ्रौम होम की परमिशन ले लूंगी…’ अपनेआप से बातें करते हुए मैं डोर लौक कर ही रही थी कि सामने वाले घर से रोहित निकला, ‘‘गुड ईवनिंग’’ मुसकराते हुए उस ने अभिवादन किया, जिस का जवाब दे कर मैं जल्दी से लिफ्ट की ओर बढ़ गई.
मैट्रो स्टेशन तक तो औटो में जाना ही पड़ेगा नीरजा ने सोचा. गेट पर आ कर चारों
ओर नजर दौड़ाई पर दूरदूर तक कोई औटो दिख नहीं रहा था. अभी तक बाहर बारिश के बिलकुल आसार नहीं थे पर अचानक बारिश धीरेधीरे शुरू हो गई. तभी रोहित कार से आता दिखाई दिया. ‘‘नीरजा मैडम, आप को मैट्रो स्टेशन जाना है क्या? आइए छोड़ देता हूं,’’ कहते हुए उस ने कार का दरवाजा खोल दिया. मु?ो जल्दी घर पहुंचना था इसलिए न चाहते हुए भी मैं कार में बैठ गई.
‘‘बेल्ट लगा लीजिए मैडम वरना फाइन लग जाएगी,’’ हंसते हुए रोहित ने कहा. मैं ने चुपचाप बेल्ट लगा लिया.
गाड़ी चलाते हुए रोहित ने बात शुरू कर दीं, ‘‘आज छुट्टी के दिन भी लैपटाप ले कर औफिस, एक दिन भी आराम नहीं.’’
‘‘अरे नहीं,’’ मैं ने कहा ‘‘ऐक्चुली मुझे तत्काल फरीदाबाद जाना पड़ रहा है. मेरे पेरैंट्स वहां रहते हैं. मेरी मां बाथरूम में फिसल कर गिर गई है. पिताजी अकेले बहुत परेशान हो रहे हैं. हो सकता है, कुछ दिन वहां रहना पड़े इसलिए अपना लैपटौप और कुछ सामान भी ले कर जा रही हूं.’’ मेरे स्वर में चिंता झलक रही थी.
‘‘अरे वाह मैं भी फरीदाबाद ही जा रहा हूं. वहां पर मेरी बहन रहती है. कल उस के बेटे का पहला जन्मदिन है. शाम को एक छोटी सी पार्टी है. आप चाहें तो मेरे साथ कार में फरीदाबाद चल सकती हैं आप को घर छोड़ दूंगा, ‘‘रोहित ने कहा.
मैं ने खिड़की के कांच से बाहर देखा. मूसलाधार बारिश शुरू हो चुकी थी और जल्दबाजी में मैं ने छाता भी नहीं लिया था. मैट्रो स्टेशन उतर कर घर तक जाने में मैं भीग सकती थी और समय भी लग सकता था. मैं ने तुरंत हां कर दिया.
रास्तेभर रोहित अपने औफिस की, स्कूलकालेज की और अपने घर की बातें करता रहा. उसी से पता चला कि वह स्टेट बैंक में अधिकारी है और यहां पदोन्नति पर स्थानांतरण में आया है. उस के परिजन आगरा में रहते हैं, छोटा भाई रोहन कंप्यूटर इंजीनियर है जो कैलिफोर्निया में गूगल में काम करता है. नौकरी लगने के बाद रोहित थोड़े दिन फरीदाबाद में अपनी बड़ी बहन के साथ ही रहता था, अब प्रमोशन के बाद दिल्ली में शिफ्ट हो गया है.
मैं जानती थी कि मैं जिस बिल्डिंग में रहती हूं उस में स्टेट बैंक ने कई घर अपने अधिकारियों के लिए किराए पर लिए हैं. लगता है उन में से एक घर उसे बैंक ने अलाट किया होगा इसलिए यहां आया है, अब मैं समझ.
थोड़ी सी देर में मैं भी खुल गई थी. मैं ने भी उसे अपने परिवार के बारे में बताया. मैं खुद आश्चर्यचकित थी कि आज सुबह ही जानपहचान हुई और शाम तक इतनी आत्मीयता कैसे आ गई हमारे बीच? मां की चिंता के बीच यह सफर यादगार बन गया था. रोहित की बहन का घर हमारे मोहल्ले के पास ही था. रात होने को थी, इसलिए वह मुझे घर तक छोड़ कर अपनी बहन के घर चला गया.
मां के पैर की हालत सचमुच खराब थी, बहुत सूजन भी था. पर मुझे देख कर उन के चेहरे पर जैसे राहत के भाव आ गए. बाहर तेज बारिश हो रही थी. मैं ने तुरंत पास के अस्पताल से सवेरे का अपौइंटमेंट ले लिया. मां को एक पेनकिलर दिया, थोड़ी बर्फ से सिंकाई की, जिस से उन्हें आराम मिला. फिर खाना बना कर उन को और पिताजी को खिलाया और पापा को सोने के लिए बोल कर मैं अपना लैपटौप ले कर मां के पास आ बैठी. बीच में रोहित को मैं ने फोन पर धन्यवाद संदेश भी भेज दिया. इस के बाद कब मेरी आंख लगी मुझे पता ही नहीं चला.
अगले दिन सुबहसुबह 8 बजे रोहित हमारे घर आया.
‘‘मैं ने आज की छुट्टी ले रखी है. शाम की तैयारी रहेगी तो मैं व्यस्त रहूंगा इसलिए मैं ने सोचा अभी मांजी का हालचाल पूछ लूं.’’
पापा के प्रश्नसूचक नजरों को सम?ा कर मैं ने तुरंत दोनों का परिचय कराया, ‘‘पापा
यह दिल्ली में मेरे नए पड़ोसी हैं. इन के कारण ही कल मैं समय पर यहां पहुंच सकी.’’ पापा ने प्रसन्न हो कर रोहित को धन्यवाद दिया. मां को अस्पताल ले कर जाने में रोहित ने हमारी बहुत मदद की. डाक्टर ने तुरंत ऐक्सरे लेने कहा और जैसी हमें आशंका थी, ऐंकल में हेयरलाइन फैक्चर निकला. डाक्टर ने मां के पैर पर बड़ा सा बैंडेज बांध दिया और 3 सप्ताह तक पैर को न हिलाने की हिदायत भी साथ में दे दी.
मैं ने औफिस में इस की सूचना भेज दी और 1 सप्ताह तक घर से ही काम करने की अनुमति ले ली. अब मैं मां को पूरी तरह ठीक कर के ही जाना चाहती थी. रोहित हमें अपनी गाड़ी में अस्पताल से घर तक छोड़ कर चला गया. बाद में भी वह हर दूसरे दिन फोन पर मां का हालचाल पूछ लेता था. इस के अलावा और कोई बात हमारे बीच में नहीं होती थीं. 15-20 दिन पूरी तरह आराम करने से मां को बहुत राहत मिली. उन का बैंडेज भी अब खुल गया था. घर में मैं ने एक नौकरानी लगा दी थी जिस से मां को काम करने की अब जरूरत नहीं थी. बीच में 1-2 बार कल्पना दीदी औपचारिकतावश आ कर मां का हालचाल पूछ कर चली गई थीं. मैं ने मां को भोजन और दवाइयां समय पर लेने के निर्देश दे कर और नौकरानी को भी 2 महीने का ऐडवांस पैसा दे कर, जरूरत पढ़ने पर रात में रुक कर मां का खयाल रखने के लिए बोला और दिल्ली का रुख किया, फिर अगले दिन औफिस भी जौइन कर ली.
अब मैं और रोहित अच्छे मित्र बन चुके थे.
कभीकभी शाम को मैं उसे कौफी पीने बुला लेती, उस के बाद बैठ कर हम साथ में टीवी देखते, मु?ो वह अपने औफिस के कई किस्से सुनाता था और मैं सुनती हुई गरमगरम रोटीसब्जी बनाती थी. हम साथ में खाना खाते थे फिर वह घर चला जाता था. कभीकभी लगता था कि एक हंसमुख, मिलनसार और सम?ादार मित्र मिल जाए तो शाम और भी सुंदर हो जाती है.
एक बार रविवार के दिन शाम को रोहित के बुलाने पर मैं उस के घर गई. बैचलर होने के बावजूद उस ने घर को बहुत व्यवस्थित ढंग से रखा था. रोहित को पढ़ने और संगीत का बहुत शौक था, यह सामने रखे रिकौर्ड प्लेयर्स और किताबों से लग रहा था.
‘‘मैडमजी हर बार आप ने ही मुझे खिलायापिलाया है, चलिए इस बार मैं आप को इस खूबसूरत भीगेभीगे मौसम में पकौडि़यां खिलाता हूं और चाय पिलाता हूं,’’ रोहित ने कहा. मेरे हामी भरने पर उस ने स्टूटियो में गजल दिया और किचन की ओर जाते कहा, ‘‘आप सोफे में बैठ कर संगीत का आनंद लीजिए, मैं काम कर लूंगा.’’
कुछ ही देर में रोहित चायनाश्ते सहित हाजिर था. पकौड़े वाकई कुरकुरे बने थे और चाय भी बढि़या थी. चाय पीते हुए मैं ने मुसकरा कर कहा, ‘‘आप की शादी जिस से होगी वह लड़की बहुत सुखी रहेगी क्योंकि वह जब औफिस से आएगी तो आप उस को अपने हाथ से बना कर गरमगरम नाश्ता देंगे,’’ मेरी बात सुन कर रोहित का चेहरा थोड़ा सा उतर गया जिसे मैं ने साफ नोट किया.
‘‘क्यों क्या हुआ, आप मेरी बात पर आज कुछ बोले नहीं.’’ मैं ने कहा.
इस पर रोहित ने उदास स्वर में कहा, ‘‘नहीं नीरजाजी, ऐसी कोई बात नहीं. मैं तो रेवा के लिए सबकुछ करने की तैयार था पर वह मेरी छोटी सी भी बात मानने को तैयार नहीं थी, इसलिए मैं ने दिल से शादी का खयाल ही छोड़ दिया.’’
‘‘कौन रेवा?’’ मेरी उत्सुकता बढ़ गई थी. रोहित ?ोंप गया, ‘‘अरे हां, मैं ने तो आप को शुरुआत तो बताई नहीं,’’ सीधे कहानी का अंत बता दिया. दरअसल, रेवा मेरे पिताजी की तरफ से एक रिश्तेदार की बेटी है. 2 साल पहले मेरी बहन की शादी के बाद मेरी बात उस के साथ चली. रेवा अच्छी लड़की थी, दिखने में सुंदर थी आईटी इंजीनियर भी थी. मैं सचमुच उस से शादी करना चाहता था. उसे भी मैं पसंद था. पर इकलौती बेटी होने के कारण उस के पिता चाहते थे कि मैं घरजमाई बन कर उन के साथ नागपुर में रहूं. उन का कहना था कि मेरा छोटा भाई तो है मेरे मातापिता के पास, वह संभाल लेगा यहां आगरा में. हम ने उन को बहुत समझाया कि रोहन शुरू से महत्त्वाकांक्षी रहा है, वह अमेरिका में ही सैटल होना चाहता है.
‘‘आप के रिटायरमैंट को सिर्फ 1 साल बाकी हैं उस के बाद हमारे पास यहीं पर आ जाएं, पर वे लोग माने नहीं. रेवा भी जिद पर अड़ी रही. वह भी मांबाप का घर छोड़ कर ससुराल नहीं आना चाहती थी. मु?ो शुरू में ही उन लोगों का अडि़यल रुख अच्छा नहीं लगा, इसलिए मैं ने शादी से मना कर दिया और ट्रांसफर ले कर दिल्ली आ गया. 1 साल तक तो मैं उस घटना से उबर नहीं पाया पर फिर सम?ा गया कोई बात नहीं, जिंदगी इस के आगे भी है,’’ रोहित अपनी रौ में बोले जा रहा था.
मैं ने थोड़ा सा बीच में टोका, ‘‘पर आप रेवा के घर पर क्यों नहीं रह सकते थे? जब एक लड़की शादी के बाद पूरी जिंदगी ससुराल में सभी के साथ एडजस्ट कर के रह सकती है तो आप भी उस के घर रह सकते थे. अपने मांबाप के लिए वहीं दूसरा एक घर ले लेते?’’
1 मिनट मुझे लगा जैसे रोहित परेशान हो गया है, ‘‘नहीं नीरजाजी, आप समझ नहीं रही हैं. मैं
घरजमाई बनने का विरोध नहीं कर रहा हूं, पर आगरा में हमारा पुश्तैनी घर है, जिस में मांपिता, दादीदादाजी सभी हैं और पास ही मथुरा में मेरे मामाचाचा, बुआ सभी रिश्तेदार रहते हैं. फिर मेरी बहन भी कुछ ही घंटों की दूरी पर फरीदाबाद में हैं. मेरे मातापिता बहुत पुराने संस्कारों वाले हैं. वे अपने वयोवृद्ध मातापिता और भाईबहनों को छोड़ कर नागपुर आने के बारे में सोच भी नहीं सकते. मैं ने तो रेवा के पिता से यहां तक कहा कि यदि भविष्य में दादीदादाजी के जाने के बाद मेरे पेरैंट्स मेरे घर रहने आ जाएं तो फिर आप के लिए पास ही हम एक दूसरा घर ले लेंगे, जिस से मैं आप का और अपने परिजन दोनों का खयाल रख सकूंगा, इतने पर भी बात जमी नहीं,’’ कह कर रोहित ने एक लंबी सांस ली, ‘‘खैर, आप नाश्ता कीजिए, मैं थोड़ी और चाय गरम कर के लाता हूं.’’
हाथ में ट्रे ले कर किचन की ओर जाते हुए रोहित की आंखों की नमी मु?ा से छिपी नहीं रही. बेवजह मैं ने रोहित को दुखी कर दिया. पूरी बात जाने बिना मु?ो इतना ओवर रिएक्ट करने की जरूरत नहीं थी. खैर, थोड़ी देर बाद मैं घर आ गई. उस रात नींद मेरी आंखों से कोसों दूर थी. रोहित का उदास चेहरा मेरे सामने घूम रहा था. मन में विचारों की उथलपुथल सी थी. क्या नहीं है रोहित के पास? अच्छाखासा शिक्षित, सुदर्शन, उच्चपदस्थ, हंसमुख, खानदानी बंदा है. कैसे रेवा ने इस को इनकार किया होगा? क्या उस को रोहित से अच्छा लड़का मिल गया होगा? और क्या मु?ो ऐसे ही किसी हमसफर की तलाश नहीं है? यह मैं क्या सोच रही हूं? क्या रोहित के मन में भी मेरे लिए कुछ भावनाएं हैं. पर उस ने कभी ऐसा कुछ कहा तो नहीं, न ही उस के हावभाव से ऐसा लगा भी कि वह मु?ो पसंद करता है. सोचतेसोचते मैं कब नींद के आगोश में चली गई, पता ही नहीं.
अगले दिन सवेरे औफिस जाते समय सूटबूट पहने रोहित मिला. ‘‘क्या बात है, आज बहुत हैंडसम लग रहे हैं…’’ मैं ने प्रशंसनीय दृष्टि से रोहित को देखते हुए कहा तो मुसकराते हुए उस का जवाब था. ‘‘आज मेरा बर्थडे है. औफिस में सैलिब्रेशन है. मेरे दोस्तों ने मुझे तैयार हो कर आने बोला है.’’
मैं ने तुरंत उसे विश किया और हंसते हुए पूछा, ‘‘फिर मेरी पार्टी कहां है?’’ जवाब तैयार था, ‘‘शाम को पक्का,’’ हाथ में कार की चाबी घुमाते तेजी से सीढि़यां उतरते स्मार्ट रोहित को मैं मुग्ध भाव से देखती रही.
‘‘यह मु?ो क्या हो गया है.’’ मैं अपनेआप पर झुंझला गई. सोमवार को औफिस में इतना काम रहता है और मेरा ध्यान किधर जा रहा है? स्कूटी उठा कर मैं भी चल पड़ी.
सोमवार की लंबी मीटिंग के बाद मैं अपना मेल चैक कर ही रही थी कि मां का फोन आ गया. वहां से वे कुछ बोलें उस के पहले ही मैं शुरू हो गई, ‘‘मम्मी सुबह ही पापा से बात हुई, बता रहे थे कि अभी आप का दर्द कम है, कामवाली रोज आती है न? ज्यादा काम मत करो, अभी और थोड़े दिन आराम करो,’’ मेल का रिप्लाई देते हुए मैं बोलती रही, पर उधर से कोई जवाब नहीं था, ‘‘अरे मां कुछ बोलो, क्या हुआ.’’ मां की थकी हुई आवाज थी, ‘‘क्या बोलूं बेटा शरीर तो स्वस्थ हो गया है पर मन ठीक नहीं.’’ सुन कर मैं हंस पड़ी. अब मन को क्या हुआ, पापा से कुछ बहस हुई क्या? मां की आवाज में परेशानी साफ झलक रही थी, ‘‘बेटा जब तक तुम्हारी शादी नहीं हो जाती मैं ठीक कैसे रह सकती हूं.’’
तो यह बात है परेशानी की. मैं ने बात टालने की कोशिश की, ‘‘मां जब वक्त आएगा तब हो जाएगी शादी भी, अब मु?ो काम करने दो, तुम भी आराम करो,’’ पर वे कहां मानने वाली थीं, ‘‘अरे सुन तो सही, आज तेरे पापा के स्कूल के प्रिंसिपल शैलेश अपने बेटे का रिश्ता ले कर आए थे. उन का एक ही बेटा है. जरमनी में बड़ी कंपनी में इंजीनियर है और अभी आया हुआ है. मैं चाहती हूं कि तू इस शनिवार यहां आ जा और उस से मिल ले. रविवार को एक छोटी सी सगाई की रस्म कर लेंगे फिर सर्दियों में शादी की तैयारी के लिए हमें टाइम भी मिल जाएगा.’’
मां मेरे विवाह की पूरी योजना बना चुकी थी.
मैं ने उन को बीच में टोका, ‘‘सुनो मां, मैं आप को और पापा को यहां छोड़ कर कहीं विदेश में शादी कर के नहीं जाना चाहती हूं. कल्पना दीदी पर मुझे कोई भरोसा नहीं, आप लोगों को अचानक कभी कुछ जरूरत पड़ी तो मैं कैसे आ पाऊंगी इतनी दूर से,’’
पर मां तो जैसे आज कुछ भी सुनने के मूड़ में नहीं थीं, ‘‘देख नीरजा कब तक हमारे लिए तू अपनी जिंदगी खराब करेगी? यदि कोई अच्छा लड़का तेरे औफिस में है तो हमें बता वरना लड़का अच्छा पढ़ालिखा है, घरपरिवार भी अच्छा है, हम उस को फाइनल कर देंगे. मेरे हाथपैर चलते तेरी शादी हो जाए हो हमारी जिम्मेदारी खत्म,’’ अब मैं सचमुच झल्ला गई थी, ‘‘मां शाम को बात करती हूं, बहुत काम है,’’ और मैं ने फोन रख दिया.
पर अब काम में मेरा मन नहीं लगा. व्हाट्सऐप मैसेज खोल कर देखा जिस में रोहित ने केक काटते हुए अपनी एक तसवीर भेजी थी और नीचे लिखा था, ‘‘देखो मेरे औफिस का सैलिब्रेशन.’’
मैं ने ‘बहुत बढि़यां’ लिख कर जवाब दिया. फिर आगे मैं ने मैसेज भेजा, ‘‘आज शाम हम 6 : 00 बजे मेरे घर पर मिल रहे हैं,’’ तुरंत उस का जवाब आया, ‘हां तैयार रहना, बाहर चलेंगे.’
हम दोनों के मैसेज और उस में छिपे अधिकारभाव को समझ कर मैं हंस पड़ी. मैं ने स्वयं से पूछा, ‘क्या इस अधिकार को कोई नाम नहीं दिया जा सकता?’ अंदर से आवाज आई, ‘दिया जा सकता है और आज से अच्छा दिन इस के लिए और क्या हो सकता है.’ बस जैसे मेरे सिर पर से पूरा टैंशन उतर गया. सच है, एक बार जब मंजिल का पता मिल जाता है तो रास्ते अपनेआप खुल जाते हैं. मैं ने औनलाइन आधे दिन की छुट्टी का आवेदन किया जो तुरंत स्वीकृत भी हो गया. मैं ने अपना बैग उठाया
और औफिस से निकल गई. सब से पहले सैंट्रल मौल में जा कर एक अच्छी सी टीशर्ट खरीदी, कुछ चौकलेट्स लिए. मैं जानती हूं चौकलेट्स रोहित को बहुत पसंद है, फिर फ्लावर शौप में लाल गुलाबों से सजा गुलदस्ता लिया और घर को चल पड़ी.
शाम को मैं ने एक अच्छी सी गुलाबी रंग की साड़ी पहनी, थोड़ा सा मेकअप किया. आईने में अपनेआप को देख कर मैं लजा गई, मैं सचमुच सुंदर लग रही थी. मैं ने अपनेआप से पूछा, ‘क्या रोहित को भी मैं अच्छी लगूंगी?’ ‘देखा जाएगा’ मैं ने अपने सिर को ?ाटका दिया. टेबल पर टीशर्ट, चौकलेट और गुलदस्ते को सजा कर रखा. अब मु?ो रोहित का इंतजार था.
ठीक 6 बजे शाम को रोहित दरवाजे पर हाजिर था. वह ड्राइंगरूम में सजी हुई टेबल देख कर मुसकरा दिया, ‘अरे वाह, मेरे लिए इतना सुंदर बुके. गुलदस्ता एक हाथ में ले कर रोहित ने दूसरे हाथ से चौकलेट मुंह में डाल भी लिया. मैं ?ां?ाला गई ‘इस लड़के में कुछ रोमांटिक फीलिंग्स है ही नहीं, कितने कैजुअली बुके ले लिया, मेरे देने का इंतजार भी नहीं किया और मैं क्याक्या सोच रही थी इस के लिए.’
मैं ने कहा, ‘‘अरे रुको तो, बाहर से आए हो मुंहहाथ तो धो लेते, फिर चौकलेट खाते,’’ जवाब तैयार था, ‘‘नो फौर्मेलिटी मैडम, शेरों ने कभी मुंह धोएं हैं? फिर मुड़ कर रोहित ने मुझे ध्यान से देखा? ‘‘अरे हां, सुनो बुके के साथ तुम भी तो बड़ी सुंदर लग रही हो…’’ कहते हुए उस ने बुके से एक लाल गुलाब निकाला और घुटनों पर बैठ कर मेरी ओर बढ़ा कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘खूबसूरत मोहतरमा क्या आप मुझ से शादी करेंगी?’’
यह सबकुछ इतना अप्रत्याशित था कि मुझे तुरंत कुछ जवाब न सूझा, हालांकि सचाई तो यह थी कि मैं इसी पल का ही इंतजार कर रही थी. रोहित मेरी स्थिति समझझे और छेड़ते हुए बोला, ‘‘देखिए आप यह फूल नहीं लेंगी तो मैं यह शर्ट जो बड़े प्यार से आप मेरे लिए लाई हैं, नहीं लूंगा.’’
‘‘अरे नहीं…’’ कहते हुए मैं ने जल्दी से उस के हाथ से फूल ले लिया.
‘‘तो शादी पक्की न? मैं तुम्हारे सामने पुराना शर्ट उतार कर नया टीशर्ट पहन लूं, चलेगा न?’’ हंसते हुए रोहित ने कहा.
‘‘शटअप रोहित’’ मैं शरमा गई थी, ‘‘मैं ने तुम्हारे लिए मिल्कशेक बनाया है. घर में थोड़ी मठरियां भी हैं, ठहरो लाती हूं.’’ मेरे आने तक रोहित टीशर्ट पहन चुका था जो उस पर बहुत जंच भी रहा था. मठरी खाते हुए रोहित सहसा गंभीर हो गया था. ‘‘नीरजा, सोचता हूं 2 दिन छुट्टी लूं और आगरा जा कर अपने मांपिताजी को ले आऊं, तुम भी एक काम करो अपने पेरैंटस को यहां बुला लो. ज्यादा तामझाम की जरूरत नहीं. अगले हफ्ते यहीं पास में शादी कर लेते हैं फिर शाम को एक छोटा सा रिसेप्शन अपने औफिस वालों को दे देते हैं. क्या खयाल है तुम्हारा?’’ मैं अभी तक सपनों की दुनिया से बाहर नहीं आई थी. मैं ने मुसकरा कर सिर्फ सिर हिला दिया. पहली बार रोहित ने अधिकारपूर्वक मेरा हाथ पकड़ा और कहा, ‘‘चलो इसी खुशी में चलते हैं लौंग ड्राइव पर फिर डिनर भी बाहर ही ले लेंगे.’’
वह शाम मेरे जीवन की सब से खूबसूरत शाम थी. घर पर आ कर देर रात तक हम मोबाइल पर एकदूसरे से बातें करते रहे और अपने सुनहरे भविष्य की योजनाएं बनाते रहे. सुबहसुबह रोहित आगरा निकल गया और मैं अपने औफिस. दोपहर लंच टाइम में मैं ने घर में फोन कर के पापा से बात की. उन्होंने खुशीखुशी मंजूरी दे दी पर मेरी आशा के विपरीत मम्मी एक बार में बात मान गई. लगता है, समय पर रोहित ने हमारी जो सहायता की थी वे उसे भूल नहीं पाईं थीं. पर अगले हफ्ते ही शादी करने की बात से वे चिंता में आ गईं. इस पर पापा का सु?ाव था कि इसी शनिवार को यहां फरीदाबाद में छोटा सा सगाई फंक्शन कर लेते हैं और फिर जल्दी ही एक अच्छा मुहूर्त देख कर दिल्ली में शादी करेंगे, जिस में हम दोनों के मित्रों और रिश्तेदारों को आमंत्रित करेंगे. मैं ने पापा की बात मान ली और रोहित को सूचित कर दिया. अपनी दीदी और जीजाजी को भी मैं ने फोन कर के सूचना दी. दीदी सुन कर बहुत खुश हो गईं, जीजाजी ने भी बधाई दी.
सगाई के दिन हमारा पूरा परिवार व्यस्त
था. राजेश जीजाजी ने भी इस बार मन से पापा की बहुत मदद की, जो मु?ो बहुत अच्छा लगा. समय पर पूरी तैयारियां हो चुकी थीं. शाम को पापा के साथ एक सज्जन दंपत्ति को फलफूल और मिठाई की बड़ी सी ट्रे हाथ में ले कर आते देख मैं असमंजस में थी. मैं उन्हें पहचान नहीं पाई थी.
पापा ने ही परिचय कराया, ‘‘बेटा, ये प्रिंसिपल शैलेशजी और उन की पत्नी हैं.’’
मैं प्रिंसिपल अंकल के बड़प्पन पर अभिभूत हो गई हालांकि मैं ने उन के बेटे का रिश्ता ठुकरा दिया था पर उसे भूल कर वे सब से पहले आए थे. उन के पीछे मुसकराते हुए रोहित, उन की बहन सविता, उन के पति और बच्चे थे. पर रोहित के अम्मां बाबूजी कहीं नहीं दिखे, ‘‘तो क्या रोहित उन्हें मना नहीं पाया और क्या वे इस शादी के लिए तैयार नहीं हैं?’’ मेरा दिल बैठ सा गया.
मेरी मम्मी ने आगे बढ़ कर रोहित को गले लगाया, पापा ने भी उस के हाथ में बुके दे कर उसे गले से लगा लिया. रोहित की बहन ने मेरे हाथ में उपहारों से सजी एक सुंदर डलिया थमा कर प्यार से मेरे हाथ पकड़ लिए. कल्पना दीदी ने सभी को घर के अंदर आमंत्रित किया.
मैं चुपचाप खड़ी थी. मेरी आंखें रोहित से कुछ पूछ रही थीं, पर वे तो जैसे निर्विकार कोल्डड्रिंक पी रहे थे. मैं अभी तक उलझन में थी. मेरा उतरा हुआ चेहरा देख कर कल्पना दीदी जोरों से हंस पड़ी, ‘‘अब बस भी कीजिए आपलोग, देखिए नीरू कितनी परेशान हैं, वे कैसे ऐंजौय करेंगी अपनी सगाई?’’ इस के पहले मैं कुछ समझ पाती पापा ने आगे बढ़ कर मेरे गालों को थपथपा दिया, ‘‘बेटा ये जो तुम्हारे रोहित हैं न, उन की बहन सविता प्रिंसिपल शैलेशजी की बहू हैं. मैं ने और तुम्हारी मम्मी ने तो पहली बार रोहित को शैलेशजी के घर पर देखते ही पसंद कर लिया था. पर तुम हमेशा शादी के लिए मना करती थी. इस के लिए हम ने तुम्हें पहले कुछ नहीं बताया. हम सोचते थे कि तुम लोग आपस में मिल लो, एकदूसरे को समझ लो, फिर हम बात आगे बढ़ाएंगे. संयोगवश तभी रोहित का ट्रांसफर फरीदाबाद से दिल्ली हो गया और उस की बैंक का क्वाटर्स भी तुम्हारी ही बिल्डिंग में था. उस दिन जब पहली बार तुम से मिलने जब रोहित यहां आया और अस्पताल में हमारी सहायता की उसी दिन हम ने शैलेशजी से शादी की बात भी कर ली थी. बस फिर एक के बाद एक घटनाएं होती गई और तुम्हारी मम्मी के फोन पर अल्टिमेटम देने के बाद तुम ने अपनेआप हमें अपनी शादी के फैसले के बारे में बताया. हमलोग यही तो चाहते थे. बस उस के बाद आज यहां हम मिले, क्यों कैसी रही…’’
तो यह बात थी. मैं ने आंखें तरेर कर रोहित को देखा और कहा, ‘‘तो सब मिल कर मुझे बुद्धू बना रहे थे.’’
तभी मां बोलीं, ‘‘अरे देखो समधीजी आ गए.’’ सामने कार से रोहित के दादाजी और बाबूजी उतर रहे थे. पीछेपीछे उन की मांजी और दादीजी थीं. अंदर आ कर दादी ने मुझे स्नेहपूर्वक अपने पास बुला कर सिर पर हाथ रखा और कहा ‘‘मेरे रोहित की पसंद ऐसी ही होगी मैं जानती थी : क्यों ठीक है न बहू?’’
‘‘जी बिलकुल.’’
मांजी ने भी मुझे प्यार से देखते हुए पास ही बैठा लिया.
आनंदपूर्वक सगाई समारोह संपन्न हुआ. 15 दिन बाद एक सादे समारोह में हमारी शादी हो गई और मैं अपने मायके (फ्लैट नंबर 501) से ससुराल (फ्लैट नंबर 504) में आ गई. अपना फ्लैट मैं ने पहले ही खाली कर के मकान मालिक को उस की चाबियां सौंप दी थीं. 2-3 दिनों में सभी रिश्तेदार भी अपनेअपने घर चले गए. बाद में औफिस से 1 सप्ताह की छुट्टी ले कर हम दोनों घूमने मसूरी में एक शानदार रिसोर्ट भी गए,जो मेरा रोहित के लिए गिफ्ट था. ट्रिप के दौरान मैं मांपापा से फोन पर कुशलता पूछती रही. बीच में अपने सासससुर का भी हालचाल जानना भी नहीं भूली, जिसे रोहित ने नोट भी किया. हालांकि यह मैं ने उस को खुश करने के लिए नहीं किया था, सभी अपनों का खयाल रखना मेरा सहज स्वभाव था और इस में मुझे आत्मिक खुशी मिलती थी.
दिल्ली पहुंच कर अगली सुबह जल्दी ही रोहित थोड़ी देर में आने की बात कह कर बैंक के किसी मीटिंग की तैयारी के लिए चले गए. मु?ो औफिस जाने में अभी समय था, मैं किचन के काम में लग गई. तभी सोसायटी के वाचमैन के साथ एक कुरियर वाले ने आ कर एक बड़ा लिफाफा दिया. लिफाफे पर नाम तो मेरा ही था, पर यह आया कहां से? मैं ने तो कुछ मंगाया ही नहीं, लगता है कोई शादी में नहीं आ पाया हो इसलिए गिफ्ट कुरियर से भेजा हो. मैं सोच में पढ़ गई कि इसे लूं कि न लूं? आजकल किसी चीज का कोई भरोसा नहीं है. तभी मेरा रिंग बजा, देखा तो रोहित का कौल था, ‘‘सुनो एक कुरियर वाला आएगा और एक लिफाफा देगा, मैं ने ही भेजा है, ले लेना और टाइम मिले तो देख जरूर लेना फिर बाद में बात करता हूं,’’ कह कर उस ने फोन रख दिया.
अब मु?ो थोड़ी तसल्ली हुई. कुरियर वाले को भेज कर मैं ने आराम से बैठ कर लिफाफा खोला. यह एक फाइल थी, जिस के पहले पृष्ठ पर एक एग्रीमेंट लेटर था जो रोहित और किसी आहूजा बिल्डर के बीच का अनुबंध था कि शुभम अपार्टमैंट का फ्लैट नंबर 501 अब रोहित और नीरजा के नाम आवंटित किया जाता है. मैं आश्चर्य में पड़ गई कि यह यह तो मेरे ही बिल्डिंग का नाम था यानि वह घर जहां मैं पहले किराए पर रहती थी उसे अब रोहित ने खरीद लिया था. कुछ समझ पाती तभी मोबाइल पर मैसेज आया, ‘मैडम, कैसा लगा मेरा सरप्राइज गिफ्ट. कृपया दरवाजा खोलिए.’
दरवाजे पर एक बड़ा गुलदस्ता और मिठाई का डिब्बा ले कर रोहित मुसकराते हुए खड़े थे, ‘‘बधाई हो मकानमालकिन,’’ मैं अभिभूत थी.
रोहित यह क्या है? कब किया यह सब? तो आज सुबह यही तुम्हारे बैंक का काम था क्या? डिब्बे में से लड्डू निकाल कर मेरे मुंह में डालते हुए रोहित मुसकरा कर बोले, ‘‘सुनो, अब हमें अपने पेरैंट्स के बारे में ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है. यह घर मैं ने उन के लिए ही लिया है. कम ब्याज दर पर लोन मु?ो बैंक से मिल रहा था तो मैं ने भी सोचा इनवेस्टमैंट करने के लिए यही सही समय है. इस 501 वाले फ्लैट में कुछ रोजमर्रा की जरूरतों के सामान हम ले कर रख देंगे. जब भी हमें अपनेअपने मातापिता की याद आएगी या उन्हें कोई जरूरत पड़ेगी, हम उन को बुला कर रख लेंगे. पर हम लोग अपने इसी घर में रहेंगे.
बैंक ने यह फ्लैट 5 साल के लिए मुझे दिया ही है और फिर तुम भी तो इसी घर में दुलहन
बन कर आई हो, इसलिए भाई मैं तो यहीं रहने वाला हूं, बाद में कहीं ट्रांसफर हुआ तो देखेंगे, अभी के लिए यह सही लगा मुझे. अरे यार, देख क्या रही हो? कुछ तो बोलो. अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करो.’’
मैं क्या ही बोलती? कुछ बोलने की स्थिति में ही नहीं थी मैं. मेरी आंखों से बहते हुए खुशी के आंसुओं ने सबकुछ व्यक्त कर दिया था. रोहित अपने औफिस कौल में व्यस्त हो चुके थे और मैं अपने आंसुओं को छिपा कर किचन में उन के लिए नाश्ता बनाने चली गई.
वह शाम मेरे जीवन की सब से खूबसूरत शाम थी. घर पर आ कर देर रात तक हम मोबाइल पर एकदूसरे से बातें करते रहे और अपने सुनहरे भविष्य की योजनाएं बनाते रहे…
