Stories :  टिकटिक  करती नीले रंग की दीवार घड़ी बता रही थी कि शाम के 4 बजने वाले हैं. यह छोटा सा कमरा जो सफेद रंग में रंगा था, इस में बड़ीबड़ी 2 खिड़कियां थीं, एक बालकनी और 2 दरवाजे. एक दरवाजा घर के दूसरे भागों से जोड़ता था और दूसरा बालकनी में खुलता था. सुहाना अपनी आरामकुरसी पर बैठ कर पंखे को निहार रही थी. गरमियां अपनी चरम पर थी और पंखे से आती हवा बस खानापूर्ति सा व्यवहार कर रही थी.

अपने माथे से टपकती पसीने की बूंदों की अपने ही दुपट्टे से पोंछती हुई सुहाना ने एक लंबी सांस ली और आंखें बंद करने की कोशिश की. पर अभी कुछ पल ही बीते थे कि झटके से उस की आंखें खुलीं और वह चौंक कर कुरसी से उठी. सामने किसी ने दवाजे पर दस्तक दी थी. उस ने कुछ पल इंतजार किया कि कहीं उसे नींद में भ्रम तो नहीं हुआ, पर एक बार और दस्तक की आवाज आई तो वह लपक कर गई और दरवाजा खोला.

सामने मां खड़ी थीं. हाथों में चाय की ट्रे लिए और होंठों पर मुसकान. दरवाजा खुलते ही मां ने अंदर कदम बढ़ाए और ट्रे को मेज पर रखते हुए कहा, ‘‘सारा दिन बस कामकाम और बस काम. मु?ो तो कभीकभी लगता है कि इस बड़े से घर में बस मैं ही अकेले रहती हूं.’’

सुहाना मां के सामने वाली कुरसी पर बैठते हुए बोली, ‘‘आप की भी शिकायतें न मां कभी खत्म ही नहीं होतीं. पहले जब बाबा थे तो उन से शिकायतें, फिर जब मैं औफिस में काम करती थी तो उस की शिकायतें और अब इस नए वर्क फ्रौम होम के दौर में काम की शिकायतें.’’

मां ने चाय की चुसकी लेते हुए कहा, ‘‘हां, बस शिकायतें ही तो रहती हैं, कभी किसी ने उन्हें दूर करने की कोशिश ही कहां की.’’

सुहाना ने मां की कही बात को अनसुना कर बालकनी की तरफ नजर डाली

तो होंठों पर एक मुसकान उभर आई. उस ने मां को बाहर की तरफ इशारे से दिखाया और कहा, ‘‘इतने दिनों की गरमी के बाद आज बादल चढ़ आए हैं, शायद बारिश होगी.’’

मां ने भी उमड़ते बादलों को देखा और कहा, ‘‘हां, आज सुबह ही तो न्यूज में बोल रहे थे कि मौनसून की दस्तक के साथ बारिश के आसार हैं. चलो इस चिलचिलाती गरमी से थोड़ी तो राहत मिलेगी.’’

सुहाना ने चाय खत्म की और मां का हाथ पकड़ कर बालकनी में जा खड़ी हुई. बादल धीरेधीरे गहरा रहे थे और हवा में गति और ठंडक दोनों शुमार हो रहे थे. हवा के थपेड़े जो चेहरे से टकरा रहे थे तो एक अलग ही सुकून मन को छू रहा था. तभी बारिश की पहली बूंद ने उन के चेहरे को छुआ और दोनों के चेहरों की मुसकान बड़ी हो गई. जल्द ही नीचे से मिट्टी की सोंधी खुशबू आई और मां ने एक गहरी सांस ले कर उसे अपनी रूह तक पहुंचाने की कोशिश की. मां के मुंह से अनायास हीं निकल पड़ा, ‘‘यह बरसात मु?ो बहुत पसंद है.’’

सुहाना ने मां की तरफ थोड़ा चकित होते हुए देखा और कहा, ‘‘पर आप तो अकसर कहती थीं कि आप को बारिश पसंद नहीं?’’

मां ने सुहाना की तरफ देखा और धीमे स्वर में कहा, ‘‘हां, अब पसंद नहीं. पर कभी बहुत पसंद थी.’’

इस से पहले कि सुहाना अपना अगला प्रश्न मां के सामने रखती, मां तेजी से उस के सामने से निकलीं और चाय की खाली प्यालियां ट्रे में रख कर कमरे से बाहर चली गई.

मां अपने कमरे की खिड़की से बूंदों को टकराते देख रही थीं, नजरें तो उन बूंदों पर थीं पर जहन न जाने कहां गोते खा रहा था. उन्होंने खिड़की से नजर फेरी और अपनी ही लंबाई के आईने पर नजर डाली. अपने खुद के प्रतिबिंब का मूल्यांकन उन के खुद के चेहरे पर एक कटु हंसी बन कर उभरा. उन्होंने अपने चेहरे और सफेद होते बालों पर हाथ फेरा तो सालों पुरानी खुद की छवि उन की आंखों के सामने नाच गई. गेंहुए रंग और काले बालों के साथ सामान्य आंखों वाली और सामान्य कदकाठी वाली समृद्धि. आंखों में नई उम्र का जोश और होंठों पर मुसकान भी उन की एक योग्यता ही हुआ करती थी.

दरवाजे पर हुई जोर की दस्तक ने समृद्धि का ध्यान खींचा और वे वर्तमान

की धरा पर गिरीं. सुहाना दरवाजे पर खड़ी थी और उस ने पूछा, ‘‘मां, रात के खाने के लिए क्या बना रही हैं? मेरे कुछ दोस्त आने वाले हैं या तो कुछ बना दो या मैं कुछ और्डर कर देती हूं.’’

समृद्धि ने कुछ पलों के लिए सुहाना को देखा, देखने में वह बिलकुल उन्हीं के जैसी थी पर युवा समृद्धि उस के आसपास कहीं भी नहीं थीं. शायद यह आधुनिकता का असर था कि सुहाना में समृद्धि को ढूंढ़ना नामुमकिन सा लगता था. समृद्धि ने एक गहरी सांस ली और कहा, ‘‘तुम्हें तो हमेशा बाहर का खाना खाने का कोई न कोई बहाना चाहिए होता है. मुझे बस बता दो कितने लोग आ रहे हैं. मैं घर पर ही सब के लिए कुछ बना देती हूं.’’

सुहाना ने मुंह बनाते हुए कहा, ‘‘मैं तो बस आपकी परेशानी कम करना चाहती थी पर आप को तो मजा आता है न गरमी में भी किचन के गैस स्टोव के आगे तो बनाओ. खैर, आप को जो अच्छा लगे बना दो मुझे और आप को ले कर कुल 5 लोग हुए.’’

समृद्धि ने हामी भरी और किचन की तरफ बढ़ गईं. अगले 3 घंटे समृद्धि किचन में लगातार काम करती रहीं और जब अंतत: डाइनिंगटेबल पर खाना लगा दिया तब जा कर उस के चेहरे पर संतुष्टि के भाव आए. समृद्धि अपने कमरे में चली गईं और बाहर होती बारिश को निहारने लगीं. बारिश की बूंदों की आवाज में कब उन की आंख लग गई, एहसास नहीं रहा. अभी शायद 1-2 घंटे ही बीते थे कि सुहाना की आवाज से एक बार फिर ?ाटके से उन की आंख खुली, ‘‘मां, खाना निकाल दो.’’

समृद्धि आंखें मलती हुईं बिस्तर से उठीं. आईने में एक बार खुद को देखा और फिर डाइनिंगरूम की दिशा में बढ़ीं. डाइनिंगटेबल के पास पहुंचने पर समृद्धि ने सुहाना के दोस्तों की तरफ देखा- रवि, काजल और सत्यम. ये तीनों अकसर घर आया करते थे पर एक नए दोस्त को देख कर समृद्धि थोड़ी ठिठक सी गई. जाने क्यों वे उसे बहुत ही जानापहचाना सा लग रहा था. समृद्धि पर नजर पड़ते ही वह लड़का तेरजी से उन की तरफ बढ़ा और पैरों को छू कर समृद्धि को थोड़ा चकित कर दिया.

समृद्धि ने सुहाना की तरफ देखा तो उसने मां को हंसते हुए कहा, ‘‘मां, यह अनुराग है. इस ने अभी कुछ महीने पहले ही हमारे साथ काम करना शुरू किया है.’’

फिर उस ने मां के कानों में फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘यह थोड़ा आप के जैसा है, ओल्ड स्कूल वाला.’’

समृद्धि ने सुहाना को एक डांट वाली नजर से देखा और फिर अनुराग के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘अरे बेटा, खुश रहो, इस की जरूरत नहीं.’’

अनुराग ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘सम्मान की जरूरत कैसे नहीं है आंटी, आप बड़ी हैं, आप का आशीर्वाद जरूरी है हमारे लिए.’’

अनुराग की मुसकराहट में न जाने क्या बात थी जिस ने समृद्धि की धड़कनों को रोक सा दिया. यह इतना पहचानापहचाना सा क्यों लग रहा है. अनुराग का चेहरा और उस की आवाज उसे बेचैन कर रही थी.

समृद्धि ने कुछ क्षणों तक जब कुछ भी नहीं कहा तो सुहाना ने आवाज दी, ‘‘मां, क्या हुआ? मैं ने कहा था न, यह बिलकुल आप के जैसा है और आप को पता है यह भी कोलकाता से है.’’

समृद्धि ने उत्साहित हो कर कहा, ‘‘अच्छा मैं भी कोलकाता से हूं. दूसरे शहर में अपने शहर के लोगों से मिल कर कितना अपनापन लगता है न.’’

अनुराग ने हामी भरी और चमकीले कागज में बंधा एक तोहफा समृद्धि के हाथ में रखते हुए कहा, ‘‘वह आंटी मैं पहली बार आप से मिलने आया था तो मैं ने आप के लिए एक गिफ्ट लिया है.’’

समृद्धि ने मना करते हुए कहा, ‘‘पर इस की क्या जरूरत है बेटा? यह सब ठीक नहीं है.’’

‘‘अरे आंटी आप देखिए तो सही मैं ने सुहाना से बहुत कुछ सुना है आप के बारे में? मु?ो यकीं है आप को यह जरूर पसंद आएगा. प्लीज रख लीजिए.’’

समृद्धि ने झिझक भरी मुयकराट के साथ उस तोहफे को लिया और अनुराग के कहने पर उसे खोला. समृद्धि की आंखें आश्चर्य से बड़ी हो गईं और अगले ही पल उन में नमी आ गई. उन्होंने अपनी भावनाएं छिपाते हुए अनुराग की तरफ देखा तो उस ने कहा, ‘‘यह मेरी पसंदीदा किताब है. सुहाना ने बताया था कि आप को भी रविंद्र नाथ की किताबें बहुत पसंद हैं तो मैं यह ले आय. रविंद्र नाथ की ‘चित्रांगदा.’’

समृद्धि जैसे नि:शब्द सी कुछ क्षण खड़ी रहीं, फिर खुद को संभालते हुए कहा, ‘‘थैंक यू बेटा. यह किताब मुझे बहुत पसंद है.’’

सब को खाना परोस कर समृद्धि अपने कमरे में वापस गईं और खिड़कियां खोल कर ठंडी हवा को खुद से टकराने दिया. उन्हें अजीब सी बेचैनी हो रही थी, जिस से उन्हें सांस तक लेने में परेशानी हो रही थी. हवा के झोंके ने उन्हें राहत पहुंचाई और फिर एक पल को अपनी आंखें बंद कीं. फिर न जाने उसे क्या याद आया कि उन्होंने अपनी पुरानी अलमारी खोली और कुछ ढूंढने लगीं.

धुल और सीलन की महक ने उन्हें खांसने पर विवश कर दिया. उस ने अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी नाक को ढका और फिर अलमारी के निचले भाग में हाथ डाल कर कुछ ढूंढ़ने लगीं. जब उस ने हाथ बाहर निकाला तो सफेद कपड़े में बंधी एक छोटी सी पोटली निकली.

समृद्धि ने बहुत ही संभाल कर उस पोटली को खोला तो उस में 1-2 पुराने कपड़ दिखे, कुछ स्टांप वाले कागज और सब से नीचे दिखी, रविंद्र नाथ टैगोर की किताब ‘चित्रांग्दा.’

समृद्धि ने उस किताब को उठा कर अलग रखा और बाकी सारा का सारा सामान ज्यों का त्यों संभाल कर रख दिया.

खिड़की से लगी मेज और कुरसी पर बैठ कर समृद्धि ने उस किताब को न जाने कितनी देर तक निहारा और फिर कांपते हाथों से उस के पन्नों को पलटा. वे सीधे उसी पन्ने तक पहुंचीं जहां एक पुराना खत और एक सूखा गुलाब रखा था. आंखों के सामने एकटक से सालों पुराना वह दिन आ गया. उस दिन भी मौनसून की पहली बारिश ने कोलकाता की सड़कों को छुआ था और हर तरफ बारिश की बूंदें संगीत बन बिखर रही थीं.

समृद्धि उस दिन अपने आर्ट कालेज से निकल कर बिना छत वाले बसस्टौप पर पहुंची ही थीं कि बारिश ने उन्हें घेर लिया. एक तरफ तो पसीने वाली उमस के बाद पड़ती ठंडी बूंदें सुकून दे रही थीं वहीं अपने कपड़ों का गीला हो कर पारदर्शी होना उन के चेहरे पर शिकन ला रहा था. वे अपनी चुन्नी को खोल कर खुद को उस में छिपाने की कोशिश कर ही रही थीं कि किसी ने उन के ऊपर एक नीला छाता लगा दिया.

समृद्धि ने चौंकते हुए उस शख्श पर निगाह डाली तो उसे एक हमउम्र युवक दिखा जो उन्हें कुछ जानापहचाना तो लगा पर वे पूरी तरह से उस युवक से अवगत नहीं थीं. इस से पहले कि समृद्धि कुछ कहतीं उस युवक ने उन्हें छाता थमाते हुए कहा, ‘‘बारिश बहुत तेज है, छाता ले लीजिए नहीं तो बीमार हो जाएंगी.’’

समृद्धि ने हिचकिचाते हुए कहा, ‘‘क्या मैं आप को जानती हूं?’’

उस युवक ने मुसकराते हुए अपनी शर्ट की स्लीव्स मोड़ते हुए कहा, ‘‘मैं अमन हूं. आप मु?ो नहीं जानतीं पर मैं आप को जानता हूं. वह मैं ने अभीअभी कालेज जौइन किया है और मैं आप की सिंगिंग का फैन हूं. मेरी फैकल्टी अलग है पर मैं ने आप को कई बार सिंगिंग क्लास में सुना है.’’

समृद्धि ने मुसकरा कर कहा, ‘‘अच्छा, आई एम सौरी. मैं ने कभी ध्यान नहीं दिया.’’

‘‘मु?ा में ध्यान देने जैसा कुछ है ही नहीं तो आप ध्यान क्यों देंगी?’’

समृद्धि को अमन की सरलता भा गई और उन्होंने उसे ऊपर से नीचे तक देखा अमन का व्यक्तित्व, शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों में आकर्षक था. उस की आंखों में एक दयालुता भरी चमक थी और एक ईमानदार सी मुसकान जो उस के व्यक्तित्व को और भी आकर्षक बना रही थी. समृद्धि ने उस से उस के बारे में सबकुछ जानने की कोशिश की तो पता चला कि अमन उन्हीं के महल्ले में शिफ्ट हुआ है.

उस के पापा का हाल ही में कोलकाता स्थानांतरण हुआ है और वह अपने

परिवार के साथ यहां आ बसे हैं. दोनों ने साथसाथ सफर शुरू किया और ऐसे ही कालेज के दिन लड़कपन में निकलते चले गए. साथ आतेजाते दोनों को एहसास भी नहीं हुआ कि कब उन्हें एकदूसरे की आदत लगी और अंतर्मन से दोनों ने एकदूसरे के साथ जीवन बिताने का फैसला कर लिया.

ऐसे ही एक बरसाती सांझ में हुगली के किनारे घूमते हुए अमन ने एक लाल गुलाब और एक चिट्ठी समृद्धि के प्रिय लेखक रवींद्र नाथ टैगोर की किताब ‘चित्रांग्दा’ में रख कर उन की तरफ बढ़ा दी. समृद्धि के लिए यह चकित होने वाले बात नहीं थी. बस उन्हें यह शिकायत थी कि उस ने इतनी देर क्यों कर दी. बहरहाल, एक मुसकान के साथ दोनों ने मित्रता से आगे की सीढ़ी चढ़ी और प्रेम के नए रंगों ने उन के आसमान को और भी नीला कर दिया.

खुले विचारों के परिवार का होना भी जीवन में किसी वरदान से कम नहीं होता और समृद्धि भी खुद को खुशहाल मानती थीं क्योंकि वे अपने बाबा और मां से अपने दिल की हर बात खुल कर कर सकती थीं. जैसे ही अमन को अपनी नौकरी का पहला बुलावा आया उस ने अपने घर में भी समृद्धि की बात कर डाली और दोनों परिवारों ने सहमति और खुशीखुशी दोनों की मरजी को अहमियत देते हुए उन के रिश्ते के लिए हामी भर दी.

हवा का एक तेज झोंका समृद्धि को अचानक वर्तमान में खींच लाया और हलके हाथों से उन्होंने उस गुलाब और पीले पड़ चुके उस खत को सहलाया. अनायास ही उन की आंखों से बाहर होता बारिश का पानी दिखने लगा और उस की एक बूंद उस किताब पर जा गिरी.

यादों का कारवां एक बार फिर अतीत के गलियारों में जा पहुंचा और समृद्धि ने खुद को अमन की आंखों में मुसकराता हुआ देखा. दोनों कोलकाता की लोकल बस में बैठे थे और अमन उन्हें मुसकराते हुए एकटक देखे जा रहा था. अगले कुछ दिनों में ही उन की शादी थी और परिवार की तरफ से अब न मिलने की बात को अनसुना कर दोनों सब से छिप कर मिलने आए थे. दोनों अपनीअपनी बातें कर ही रहे थे की आसमान में भरे बादलों ने उन का ध्यान खींचा और समृद्धि ने कहा, ‘‘चलो अब मैं चलती हूं नहीं तो बारिश में फंस जाऊंगी.’’

अमन ने सीट से उठती समृद्धि का हाथ पकड़ा और कहा,

‘‘तो बारिश तो तुम्हें बहुत पसंद है न. थोड़ा भीगने से क्या परहेज? वैसे भी मैं तो साथ ही हूं और यह बारिश तो हमारी सारथी समान है हमारे प्रेम की शाश्वत गवाह.’’

समृद्धि अपनी जगह पर दोबारा से बैठती हुई बोलीं, ‘‘हां मुझे बारिश बहुत पसंद है और तुम साथ हो तो फिर डर कैसा, पर शायद तुम यह भूल रहे हो कि हमारे घर वालों को पता चला कि हम ने उन की बात काटी है तो वे फिर बात का बतंगड़ बनाएंगे और हर तरफ से मुझे ही सब की बातें सुननी होंगी. तो अब यह हमारी ऐसी आखिरी मुलाकात है.’’

अमन ने मुंह बनाते हुए कहा, ‘‘आखिरी?’’

‘‘हां, मेरा मतलब ऐसे अब हम शादी के बाद ही फिर से घूमेंगे, समझें.’’

अमन ने समृद्धि का हाथ थाम कर उन की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘ठीक है मैडम. मैं सब समझ गया.’’

घर के पास दोनों अलग हुए और अमन ने मुसकराते हुए उन्हें अलविदा कहा. समृद्धि ने उसे इशारे से कहा कि अब जाओ, पर अमन काफी देर तक उसे देखता रहा बारिश अब अपनी रफ्तार में थी और अंतत: अमन जाने को मुड़ा. उसे मुड़ता देख समृद्धि भी पलट कर जाने लगी कि तभी एक शोर ने उस के पांव जमा दिए. समृद्धि ने पलट कर देखा, तो उस की सांसें रुक गईं. एक डबलडैकर बस सड़क के बीच रुकी थी और कई सारे लोगों ने उसे घेर रखा था. सड़क पर भीड़ बढ़ने लगी और समृद्धि अमन को ढूंढ़ने लगी कि अभीअभी तो वह यहीं था. उस ने भी शोर सुना होगा वह भी परेशान होगा.

समृद्धि भाग कर उस ठहरी सड़क पर गईं और अमन को हर तरफ तलाशने लगीं. तभी उन की नजर उस भीड़ के बीच से आते दृश्य पर पड़ी. वहां कोई अचेत पड़ा था. उस ने उसी रंग की पैंट पहन रखी थी जो अमन ने पहनी थी. समृद्धि लोगों की भीड़ से टकराती हुई उस जगह पहुंची तो उन के चेहरे का रंग उड़ गया. अमन उस डबलडैकर बस के आगे अचेत पड़ा था. उस की आंखें आधी खुली थीं और चेहरा और शरीर खून से लथपथ. समृद्धि भाग कर उस के पास पहुंचीं और मदद के लिए चीखने लगीं. कुछ लोग आगे आए, यहां तक कि पास से गुजरते एक डाक्टर ने जल्दीजल्दी आ कर उस की नब्ज देखी और फिर समृद्धि की तरफ देख कर ‘न’ में सिर हिला दिया. बारिश के पानी के साथ एक तरफ तो अमन का खून मिल कर बह रहा था, वहीं दूसरी तरफ समृद्धि के आंसू.

न जाने कितने दिनों तक समृद्धि उस पल की यातनाओं में कैद हो कर रह गईर्ं.  उधर अमन दूसरे क्षितिज का यात्री बन चुका था. बस ड्राइवर ने अमन के ऊपर लापरवाही और तेज होती बारिश को ही उस की मौत की वजह बताया और बस चंद सालों की सजा का हकदार बना और इधर समृद्धि जीवनभर यादों की सजा से मुक्त नहीं हो पाईं. हर पल वे उस एक पल को उस एक दिन को मिटाने की सोचतीं और हर दिन, हर पल में खुद को हारा हुआ पातीं. जीवन किसी के लिए नहीं रुकता और समृद्धि ने भी अंतत: मां और बाबा की परेशानी और खुशियों की दुहाई के सामने सिर झुका कर कार्तिक से शादी कर ली.

यों तो कार्तिक बहुत ही सुलझा हुआ और सामान्य सा इंसान था पर शायद इतना भी नहीं कि समृद्धि के अतीत को स्वीकार कर सके तो समृद्धि ने अमन को बस अपने तक रख कर अपने जीवन को आगे बढ़ा लिया. कार्तिक ने अभी 2 साल पहले अपनी आखिरी सांस ली. उसे दिल की बीमारी थी और हृदयाघात उस के जाने का कारण बना.

अब समृद्धि के जीवन में वे और उन की बेटी सुहाना थी. समृद्धि अपनी यादों को काफी पीछे छोड़ चुकी थीं पर आज भी जब बारिश आती तो उन्हें अमन से हुई उस पहली मुलाकात और अमन के उस अंतिम दिन तक खींच कर ले जाती. एक तरफ तो आंखों में खुशी के लहर जागती वहीं दूसरी तरफ आंसुओं का सैलाब उन्हें बहा ले जाता. समृद्धि अभी भी उन्हीं यादों की जद्दोजहद में बेचैन थीं कि सुहाना की आवाज ने उन्हें यथार्थ के पास पहुंचाया.

‘‘मां, मेरे दोस्त जा रहे हैं. मैं उन्हें नीचे ड्रौप कर के आ रही हूं.’’

समृद्धि को तत्क्षण न जाने क्या एहसास हुआ कि वे अपने कमरे से

भागीभागी आई और अनुराग की तरफ देखते

हुए पूछा, ‘‘अनुराग, तुम ने बताया तुम कोलकाता से हो?’’

अनुराग ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हां, आंटी. मेरा जन्म और मेरी पूरी पढ़ाई वहीं हुई है. इन्फैक्ट मेरे मम्मीपापा भी वहीं से हैं.’’

समृद्धि ने कांपती आवाज में आगे पूछा, ‘‘तुम्हारे मम्मीपापा का क्या नाम है?’’

अनुराग के जवाब ने समृद्धि को एक बार फिर मूक कर दिया. उस ने मुसकरा कर अनुराग को विदा किया और अपने कमरे में आ कर फूटफूट कर रोने लगी.

अनुराग कोई और नहीं बल्कि अमन के बड़े भाई का बेटा था, जिसे कभीकभी अमन अपने साथ ले आता था. जब समृद्धि ने अनुराग को अंतिम बार देखा था तो वह 5 साल का था और आज वही अनुराग उस के समक्ष अमन का प्रतिरूप बन कर उसे देख रहा था.

इधर समृद्धि अतीत की बारिश में खुद को भीगो रही थीं और दूसरी तरफ बाहर हो रही बारिश अपनी गति से धरती को सराबोर किए जा रही थी, साथ ही न जाने कहांकहां कितनी ही मीठी यादें और कितने ही

आंसू उन के झंझावात के गवाह बन रहे थे.

Writer – मनीषा मंजरी           

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...