Hindi Short Story : ‘‘हामीद, अब्बा को इस माह कुछ पैसों की जरूरत है तो अगर इस महीने कार की ईएमआई तुम भर देते तो अच्छा होता…’’ निगार ने सहज स्वर में हमीद से कहा.
‘‘मैं कैसे भर दूं, मुझे घर पर पैसे नहीं देने क्या…’’ हामीद बेशर्मी से बोला.
‘‘कैसी बातें कर रहे हो, तुम हर महीने अपने घर पैसे दे सकते हो और मैं 1 महीने की सैलरी अपने पापा को नहीं दे सकती?’’ निगार आहत होती हुई सी बोली.
‘‘देखो निगार, यह बात पहले ही हो गई थी कि कार की ईएमआई तुम ही भरोगी और फिर मैं घर के किराए में हिस्सा देता हूं न.’’
‘‘अरे, तो कोई एहसान करते हो क्या? घर का किराया तो देना ही होगा न, बल्कि हिस्सा क्या तुम्हें पूरा किराया देना चाहिए.’’
‘‘ऐसा है निगार, पहले तो तुम ने निकाह की जल्दी मचाई और अब जब निकाह हो गया है तो तुम से निभाया नहीं जा रहा है …’’
‘‘तुम भी जानते हो कि हम ने जल्दी
निकाह का फैसला क्यों लिया, उसके लिए क्या
मैं ही अकेली जिम्मेदार हूं?’’ निगार की आंखें
भर आईं.
‘‘तो इमरजैंसी पिल नहीं खा सकती थी क्या?’’ हामीद क्रोधित हो बोला.
‘‘क्या तुम नहीं जानते कि पिल ने काम नहीं किया और हामिद मेरी उम्र भी तो देखो, अगर किसी वजह से अबौर्शन नहीं हुआ तो हमें बच्चा पैदा करने में प्रौब्लम क्या है? क्या कैरियर, तरक्की, सारी सुखसुविधाएं जुटाने में तुम ने कभी अपनी और मेरी वक्त के साथ गुजरती उम्र पर ध्यान दिया है? उस से ज्यादा उम्र में बच्चा पैदा करने का प्लान करेंगे तो हम दोनों को ही कई तरह की मुश्किलों से गुजरना होगा.’’
‘‘इन बातों में कुछ नहीं रखा है, सीधी सी बात है अपनी सैलरी अपने घर देनी है तो अपने घर जा कर ही रहो.’’
‘‘क्या निकाह के बाद मेरे अब्बाअम्मी
का मु?ा पर कोई हक नहीं रहा? क्या इसलिए उन्होंने मुझे इतनी तकलीफों से पढ़ालिखा अपने पैरों पर खड़ा किया है कि शादी के बाद मैं उन्हें भूल जाऊं?’’
‘‘जो सोचना है सोचो, मुझे जो कहना था मैं ने कह दिया,’’ कह कर हामीदऔफिस जाने के लिए सीढि़यां उतर गया.
निगार ने आज औफिस से छुट्टी ली और अपने घर जाने के लिए कैब बुलाई. कैब बुक करते वक्त एक व्यंग्यात्मक मुसकान उस के चेहरे पर आ गई.
‘कार का पूरा इस्तेमाल करे हामीद और हर महीने ईएमआई भरूं मैं, पिछली बार मेरी चाची की बेटी आई थी तो कैसे महंगे पैट्रोल का वास्ता दे कर उसे कार में शहर घुमाने से मना कर दिया था और अपनी खाला और उस के मंगेतर को घुमाने में तो कार जैसे पानी से चलने लगती है,’ इन्हीं सोचों में गुम निगार की कैब उस के घर के आगे रुकी. 8वां माह चल रहा था उस का. सुबह की बहस से काफी तनाव में थी वो. चाह कर भी हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी कैब से उतर कर एक कदम भी चलने की. तभी ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया घूम रही हो, वह कैब में ही बेहोश हो गई.
होश में आई तो देखा कि बच्चे का जन्म हो चुका है. उस की अम्मी उस के पास ही थीं. उन्होंने मुसकराते हुए उस के सिर पर हाथ फेरा और उसे प्यारी सी बिटिया होने की बधाई दी. आंतरिक खुशी से उस की रुलाई फूट पड़ी.
‘‘अठमासी है न इसलिए डाक्टरों की देखरेख में है पर घबराना बिलकुल नहीं, बच्ची ठीक है,’’ अम्मी उसे पूर्ण दिलासा दे रही थीं.
कई घंटे गुजरने के बाद भी जब हामीद नहीं आया तो निगार ने अम्मी से उस के बारे में पूछा.
अम्मी हिचकिचा सी गईं, ‘‘अम्मी, क्या बात है, साफसाफ बताइए न?’’ निगार किन्हीं अनदेखे अंदेशों की आशंका महसूस कर के बोली.
अम्मी ने बहुत हिम्मत कर के उसे पूरी बात बताई.
उसे कैब में बेहोश देख ड्राइवर ने तुरंत उस के घर पर बताया और उसी कैब में निगार के अब्बाअम्मी उसे हौस्पिटल ले कर पहुंचे. निगार की मम्मी ने हामीद को फोन कर के सीधा हौस्पिटल आने को कहा.
निगार का ब्लड प्रैशर काफी लो हो गया था. डाक्टर के अथक प्रयास से बहुत मुश्किल से बच्ची का जन्म हुआ.
हामीद भी अपनी अम्मी के साथ पहुंच चुका था. जब हामीद की अम्मी को बेटी होने की मुबारक दी तो उन्होंने वहीं जैसे सारा जहर उगल दिया, ‘‘लड़की की क्या बधाई दे रही हैं आप समीनाजी, एक तो आप की उम्रदराज बेटी को अपनी बहू बनाया जबकि न कोई खास शक्ल है उस की, हामीद के लिए तो कितनी जवान और सुंदर लड़कियों के रिश्ते आ रहे थे. इस के मामू की बेटी शाहिदा किस कदर खूबसूरत है. मैं दिलोजान से चाहती कि रिश्ता वहां हो पर हामीद की बेफुजूल की जिद की वजह से येह निकाह हुआ है. मैं निगार और उस की बच्ची को बिलकुल नहीं कबूलूंगी.’’
‘‘यह इतना खुशी के मौके पर आप कैसी बातें कर रही हैं और हामीद और निगार की उम्र तो एकदूजे के लिए सही है.’’
‘‘अरे, मर्द की उम्र नहीं देखी जाती, वह तो हमेशा जवान ही रहता है, किसी भी उम्र में बच्चा कर सकता है,’’ हामीद की अम्मी ने बेवकूफी भरे घमंड में यह बात कही.
‘‘एक औरत होने के बावजूद आप की कैसी सोच है, आज हमारे बच्चों के जीवन में एक नया रिश्ता जुड़ा है, आप को तो खुश होना चाहिए, आइए अपनी बहू से, अपनी पोती से मिलिए.’’
‘‘हुंह, मिलना तो दूर मैं तो निगार की बेटी की शक्ल भी नहीं देखना चाहती. सुनिए शाहिदाजी, निगार अब यहां से हामीद के घर नहीं जाएगी, अपनी बेटी और उस की बेटी को आप अपने ही घर ले जाइएगा.’’
‘‘हामीद बेटा, तुम चुपचाप सुन रहे हो, यह तुम्हारी बीवी और तुम्हारी औलाद के बारे में कहा जा रहा है और तुम खामोश हो,’’ शाहिदा ने हैरानी से हामीद को देखा.
हामीद तो इधरउधर देखने लगा जैसे वह अपनी अम्मी की हर बात से सहमत हो.
निगार चुपचाप सब सुनती जा रही थी.
शाहिदा उस के पास आईं और बोलीं, ‘‘बेटी, तू हामीद से बात कर, अभी हो सकता है मां के जोर की वजह से चुप हो.’’
‘‘यह क्या सीख दे रही हो शाहिदा अपनी बेटी को,’’ ये अकरम थे निगार के अब्बा.
‘‘जो इंसान इतनी गिरी हुई हरकत कर सकता है कि अपनी नवजात बच्ची का चेहरा
देखे बिना लौट गया हो, क्या वह किसी के सम?ाने से सम?ोगा…’’
‘‘किसी के नहीं उस की बीवी है निगार.’’
‘‘तो क्या वह इसे बीवी का दर्जा दे रहा है?’’
‘‘शादीशुदा जिंदगी में ये सब चलता
रहता है.’’
‘‘जिन्हें अपनी बेटियों को ऐसे बददिमाग, जाहिल और खुदगर्ज शौहर के साथ जिंदगी गुजारने को मजबूर करना है, ऐसे वालिदेन के साथ मेरी पूरी हमदर्दी है पर मेरी बेटी ऐसा जिंदगी नहीं जीएगी.’’
‘‘वह जिंदगी अपनी शर्तों पर जीने की कवायद रखती है, खुल कर जीएगी, घुट कर नहीं, हमारी बेटी के साथ हमेशा हमारी दुआएं रहेगी और दुआएं केवल तकल्लुफ या दिखावे के चलते नहीं दी जातीं, दुआओं का असली मतलब उन के लफ्जों में छिपा जोर होता है जो हर हालात में औलादों को अपनी जिंदगी बेहतर तरीके से चलाने की हिम्मत देती हैं, उन्हें आफताब तक पहुंचने के काबिल बनाती है.’’
इस के बाद जब निगार के हाथों में उस की नन्ही परी आई तो खुदबखुद उस के मुंह
से निकल पड़ा, ‘‘मेरी बच्ची, हमेशा खुश रहना, सही राह पर चलना और हिम्मत से काम लेना.’’
तभी अकरम और शाहिदा उस के नजदीक आए और निगार से हंसते हुए पूछने लगे, ‘‘कुछ नाम सोचा है इस चांद के टुकड़े का.’’
‘‘हां, सोचा है, दुआ नाम रखूंगी,’’ कह कर निगार ने उस की पेशानी पर एक बोसा दे दिया.
‘‘दुआ, कभी अकेला मत सम?ाना खुद को, तुम्हारी अम्मी सदा तुम्हारे साथ है,’’ निगार नन्ही सी दुआ को एकटक देखते हुए बोली.
‘‘और हम भी,’’ अकरम और शाहिदा के मुंह से निकला और फिर सभी खुल कर हंस दिए.
निगार की आंखों में आत्मविश्वास की चमक देख कर उस के अब्बूअम्मी के चेहरे खुशी से चमक उठे.
रेखा टंडन
