Kahaniyan :  मुसकान  ने एक बार फिर वेस्टसाइड में अपना कार्ड स्वैप किया, 5 हजार की ड्रैस ननद को दिला दी. मगर फिर भी मुसकान की ननद चांदनी का मुंह सीधा नहीं हुआ था.

दरअसल, चांदनी को उम्मीद थी कि भाभी इस बार उसे कोई सोने की आइटम जरूर देगी. मगर महीने में 3 लाख कमाने के बाद भी भाभी  रहेगी नंबर वन कंजूस ही.

रात में खाने की टेबल पर जब पुष्पाजी सब को खाना सर्व कर रही थीं तभी चांदनी भुनभुनाते हुए बोली, ‘‘मम्मी आप को तो भाभी के आने के बाद भी कोई आराम नहीं है. आप के ही बलबूते पर वह नौकरी कर पा रही है. मगर आप के लिए जरा भी एहसास नहीं है.’’

पुष्पाजी धीरे से बोलीं, ‘‘ऐसा क्यों बोल रही हो तुम? भाभी रात दिन दफ्तर के काम में लगी रहती हैं और उस की नौकरी के कारण ही तेरा भाई यह फ्लैट खरीद पाया है.’’

चांदनी आंखों में आंसू लाते हुए बोली, ‘‘तभी तो एक करोड़ का फ्लैट लेने के बाद भी ननद के लिए एक चांदी का छल्ला भी नहीं दिलवा पाई आप की बहू रानी.’’

पुष्पाजी को चांदनी की बात में वजन लगा और फिर उस के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, ‘‘जब तक तेरे मांबाप जिंदा हैं तू क्यों फिक्र करती है. कल ही तुझे सोने के झुमके दिलाती हूं.’’

रात को मुसकान के पति सिद्धार्थ उस से कहा ‘‘यार चांदनी को कुछ अच्छा गिफ्ट ही दिला देती. बाहर उस ने इतना तमाशा किया है कि अब मम्मी कल उसे सोने के झुमके दिलवा रही हैं.’’

मुसकान ने प्रेजैंटेशन से नजरें हटाए बिना कहा, ‘‘सिद्धार्थ, चांदनी और उस के बच्चों के ऊपर पूरे 20 हजार खर्च हो गए है. कल घर की लोन की किस्त जाएगी और 2 दिन बाद पीयू की स्कूल फीस भी. इस से ज्यादा नहीं कर सकती थी मैं.’’

सिद्धार्थ ठंडी सांस छोड़ते हुए बोला, ‘‘हर किसी को बस हमारी तनख्वाहें दिखती हैं. उन से जुड़ा स्ट्रैस नहीं दिखाई देता. चाह कर भी मैं शादी के बाद से तुम्हें एक सोने का छल्ला भी नहीं बनवा पाया हूं.’’

मुसकान लैपटौप बंद करते हुए बोली, ‘‘कल हमारा हैल्थ चैकअप है इसलिए सुबह जल्दी उठ जाना.’’

सिद्धार्थ को समझ आ गया था कि मुसकान इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहती है.

सुबह जब मुसकान दफ्तर के लिए तैयार हो रही थी तभी पुष्पाजी सूजी आंखें लिए दरवाजे पर खड़ी हो गईं और सुबकती हुई बोलीं, ‘‘हम बूढ़े मांबाप के भी कभी टैस्ट करवा दिया करो.’’

मुसकान अचकचाती हुई बोली, ‘‘मम्मी यह हैल्थ चैकअप तो कंपनी की तरफ से है.’’

चांदनी पीछे से बोली, ‘‘भाभी ,अगर

आप लोगों का फ्री में होता है तो मम्मीपापा का तो पैसों से करवा देते. बेचारी मम्मी का वजन कम होता जा रहा हैं. रातदिन घर के कामों में लगी रहती हैं.’’

मुसकान से रुका नहीं गया, ‘‘दीदी, घर के कामों के लिए हाउस हैल्प है.’’

चांदनी बोली, ‘‘पर मम्मी तो एक टांग पर खड़ी हो कर आप के घर के काम ही करवाती हैं. एक हमारी सास है जो बिस्तर से नीचे पैर नहीं रखती हैं.’’

मुसकान चुप रह बिना बात बढ़ाए घर से निकल गई. उसे पता था कि अब सिद्धार्थ और उसे रात मे सब को बाहर डिनर कराना पड़ेगा.

ऐसा हुआ भी, जब मुसकान घर पहुंची तो सब लोग तैयार बैठे थे.

चांदनी हंसते हुए बोली, ‘‘आज सोचा

मम्मी का मूड ठीक करने के लिए बाहर डिनर करवा देते हैं.’’

डिनर करने के बाद चांदनी को सोने की बालियां दिलाई गई.

रात में सिद्धार्थ ने चैक किया बस उस के अकाउंट में 10 हजार की राशि शेष थी.

रात में चांदनी उन के कमरे में आई और मुसकान को गले लगाते हुए बोली, ‘‘भाभी, देखो आप के नौकरी करने के कारण ही आज भैया मु?ो सोने की बालियां दिला पाए हैं.’’

मुसकान का मन तो कर रहा था कि चीखचीख कर बोले कि हमारी सारी कमाई ऐसे ही लूट ली जाती है. जितनी कमाई नहीं हैं उस से अधिक खर्चा, दोनों घर वालों के लिए बेटाबहू कम एटीएम मशीन अधिक थे.

अभी मुसकान चांदनी के खर्च से उभर भी नहीं पाई थी कि तभी मुसकान घर से उस की मम्मी की काल आई, ‘‘बेटे, दक्ष का एमबीए में एडमिशन हो गया है. मगर 3 लाख की कमी पड़ रही है, तेरी तो एक माह की सैलरी ही 3 लाख है, तू उधार सम?ा कर ही दे दे.’’

मुसकान यह सोच ही रही थी कि मम्मी को क्या बताए कि तभी मम्मी बोलीं, ‘‘बेटे, आजकल तो बेटियां भी मांबाप का सहारा होती हैं, यही सोच कर फोन कर दिया. मगर शायद तुम इसे अपना घर नहीं मानती हो, तुम्हारा घर तो अब तुम्हारी ससुराल ही है.’’

मुसकान बोली, ‘‘मम्मी मेरे हाथ आजकल लोन की किस्तों की वजह से बंधे हुए हैं. मगर मैं कुछ न कुछ बंदोबस्त करती हूं.’’

मुसकान यह बात अगर सिद्धार्थ को बताती तो वह उसे ताने देता

और बोलता  कितुम्हारे मम्मीपापा और मेरे परिवार में क्या फर्क है. इसलिए मुसकान ने चुपचाप अपना एक म्यूचुअल फंड तोड़ दिया और अपने भाई की फीस भर दी.

अभी मुसकान जोड़तोड़ कर के इस नुकसान की भरपाई कर ही रही थी कि मैडिकल रिपोर्ट में एक ऐसा खुलासा हुआ कि मुसकान के पैरों तले की जमीन खिसक गई.

दरअसल, मुसकान के बाएं हाथ की कुछ उंगलियां कुछ दिनों से ठीक से काम नहीं कर रही थीं. मुसकान को लगा लगातर लैपटौप में काम करने के कारण ऐसा हो रहा है. मगर जब मालिश और ऐक्सरसाइज करने के बाद भी कोई फर्क नहीं पड़ा तो डाक्टर की सलाह पर मुसकान ने नर्व टैस्ट कराए और हमेशा के लिए दवाइयों का महंगा खर्च उस के सिर पर आ गया.

यह एक ऐसा रोग था जो कभी भी किसी को हो सकता है. मगर जब महीने के 15 हजार मुसकान के इलाज में खर्च होने लगे तो और खर्चों में कटौती होने लगी.

सास के जिम्मे कुछ और काम आ गए तो घर का तनाव बढ़ने लगा. दबी जबान में सास बोल देतीं, ‘‘बहू का आधा पैसा तो बीमारी और आधा पैसा मायके वालों की इच्छाओं को पूरी करने मे चला जाता है और मैं हूं इन की मुफ्त की नौकरानी.’’

मुसकान क्या करती, वह रातदिन कोशिश कर रही थी मगर उस की प्रमोशन नहीं हो पाई थी. उधर सिद्धार्थ का भी इंक्रीमैंट नाम मात्र का ही हुआ था.

मुसकान इन्हीं सोचों में डूबी थी कि उसे बौस की काल आई. चह जब अंदर पहुंची तो बौस बोले, ‘‘ मुसकान प्रमोशन होनी या न होनी मेरे हाथ में नहीं था मगर इस 3 सालों के आफशोर प्रोजैक्ट के लिए मैं ने तुम्हारे नाम का प्रस्ताव भेजा है और अगर तुम चाहो तो आस्ट्रेलिया में हैड बन कर हमेशा के लिए  प्रोजैक्ट लीड कर सकती हो क्योंकि तुम बेहद मेहनती और ईमानदार हो, बिलकुल वैसी जैसी चाहिए.’’

मुसकान बोली, ‘‘सर मेरा परिवार मुझे जाने नहीं देगा, मेरा बच्चा भी कैसे रहेगा?’’

सर बोले, ‘‘यहां से तिगुना पैकेज हो जाएगा, एक बार गहराई से सोचो इस औफर के बारे में.’’

मुसकान मन ही मन सोच रही थी कि सौदा तो फायदे का है, मगर सिद्धार्थ उसे जाने नहीं देगा. कितना प्यार करता है. उसे और फिर पीयू कैसे रहेगी उस के बिना.

सिद्धार्थ हमेशा कहता मुसकान मैं उन पतियों में से नहीं हूं जो पत्नी को पैसों की खातिर उसे दूर दूसरे शहर या देश भेज दे. अरे पत्नी के बिना क्या घर और कैसा संसार.

इन्हीं सब बातों पर मनन करते हुए जब मुसकान घर पहुंची तो खाने की टेबल

पर उस ने यह बात छेड़ी.

पुष्पाजी खुश होते ही बोलीं, ‘‘अरे भई मिठाई क्यों नहीं लाई.’’

मुसकान थोड़ी असमंजस से बोली, ‘‘मम्मी, आप पर घर के कामों का इतना बो?ा है और फिर पीयू की देखभाल कौन करेगा?’’

सास बोलीं, ‘‘अरे अपने पोतापोती किस दादादादी को भारी लगते हैं? मैं उन सासों में नहीं हूं जो बहू के कैरियर में रोड़ा अटकाएं.’’

तभी सिद्धार्थ बोला, ‘‘कौन सी मिठाई

और्डर करूं?’’

मुसकान को समझ नहीं आ रहा था कि यह खुशी उस की तरक्की की है या हर माह एकमुश्त पैसे बढ़ने की है.

आज मिठाई का स्वाद मुसकान को न जाने क्यों कसैला लग रहा था. रात में सिद्धार्थ मुसकान को बांहों में भरते हुए बोला, ‘‘मैं नहीं तो तुम ही सही कामयाबी ने आखिर हमारे घर का रास्ता तो देखा. सुनो वहां पर कम से कम खर्च करना, मैं ने पूरा हिसाब लगा लिया है, अगर तुम थोड़ा हाथ रोक कर खर्च करोगी तो 3 साल में ही यह घर लोन फ्री हो जाएगा.’’

मुसकान थोड़ा बुझे स्वर में बोली, ‘‘मगर मैं अकेले कैसे सब कर लूंगी सब से दूर? मेरा मन ही नहीं कर रहा.’’

सिद्धार्थ बोला, ‘‘अरे लड़कियों का सपना होता है ऐसी ससुराल मिले जो उन्हें उड़ने दे और एक तुम हो कि तुम्हारा मन नहीं कर रहा है.’’

मुसकान बोली, ‘‘सिद्धार्थ,

तुम रह लोगे मेरे बिना 3 साल तक और पीयू?’’

सिद्धार्थ बोला, ‘‘मैं तुम से प्यार करता हूं मगर इस का यह मतलब नहीं कि तुम से तुम्हारा वज़ूद छीन लूं.’’

मुसकान सुनना चाहती थी कि सिद्धार्थ उसे रोक ले, उसे गले लगा कर बोले, तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसे करो, मैं हूं न, जिंदगी की लड़ाई लड़ने के लिए.’’

मम्मी को फोन करके बताया तो वे हुलस कर बोलीं, ‘‘पीयू को मैं अपने पास रख लूंगी, तू अपना सब पैसा बचाना. तेरे पापा की बाइपास सर्जरी के लिए अब मैं निश्चिंत हूं.’’

हर रिश्ते से स्वार्थ की बू आ रही थी, हरकोई मुसकान की

तरक्की के साथ अपना फायदा देख रहा था.

मुसकान के जाने में बस 1 हफ्ता रह गया था. जाने से पहले उस ने तय कर लिया था कि वह अब इस ?ाठी मुसकान को और नहीं पहनेगी.  वह जा कर सब से पहले पीयू को अपने पास बुलाएगी और अब यहां वापस नहीं आएगी. उस ने हमेशा के लिए आस्ट्रेलिया में रहने का फैसला कर लिया था. उस के करीबी रिश्तों को पैसे चाहिए… रिश्ते नहीं, उस की उड़ान में उन

सब का फायदा है इसलिए पूरा परिवार उसे घायल पंखों के साथ भी उड़ाना चाहता है और इस उड़ान मे चाहे उस के सारे पंख टूट कर बिखर जाएं.

जाने से एक दिन पहले रात बहुत भारी थी. सिद्धार्थ जल्दी सो गया पर मुसकान की आंखों में नींद नहीं थी.

पीयू के कमरे में जा कर उस ने उसे देखा, नन्ही सी बच्ची गहरी नींद में थी, होंठों पर हलकी मुसकान थी.

मुसकान ने धीरे से उस के माथे को चूमा और धीरे से बोली, ‘‘तू मेरी वजह है और शायद मेरी ताकत भी.’’

सुबह की उड़ान थी. एअरपोर्ट पर किसी की आंखों में आंसू नहीं थे. न सिद्धार्थ की, न सास की. सब के शब्दों में बस व्यावहारिक बातें थीं, ‘‘खयाल रखना. पैसे का ध्यान रखना… पीयू को वीडियो काल कर लिया करना.’’

मुसकान मुसकरा रही थी, पर अब वह मुसकान सच्ची नहीं थी. वह संस्कारों से सिली हुई एक आदतभर मुसकान थी.

आस्ट्रेलिया पहुंच कर जब होटल के कमरे का दरवाजा बंद हुआ तो पहली बार उसने गहरी सांस ली. कमरे की खामोशी में उसे कोई रोकने वाला नहीं था, न कोई कहने वाला कि थोड़ा हाथ रोक कर खर्च करना. उस ने शीशे में खुद को देखा, थकी हुई, पर सशक्त, अकेली, पर अपने निर्णय खुद लेती हुई एक महिला.

रात को उस ने पीयू की वीडियो काल की, स्क्रीन के उस पार सिद्धार्थ और सास मुसकरा रहे थे.

मुसकान ने भी मुसकराने की कोशिश की पर इस बार उस के भीतर कुछ बदल चुका था. वह अब किसी की पत्नी या बहू नहीं, सिर्फ मुसकान थी अपनी उड़ान की बागडोर खुद तय करने वाली. एक औरत, जिस ने तय किया कि अब वह अपने लिए जीएगी, चाहे कीमत कुछ भी हो. एक माह के भीतर ही मुसकान ने पीयू के वीजा की काररवाही करनी शुरू कर दी. पीयू के खर्च के नाम पर अब वह खुद को और नहीं लुटाएगी.

रास्ता मुश्किल और लंबा था मगर मुसकान ने यह रास्ता अपनी खुशी से अपनी मुसकान वापस पाने के लिए चुना था.

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...