Hindi Kahaniyan : छोटी सी अंशु अपनी मां सीमा के साथ मार्केट आई हुई थी. मार्केट में जगहजगह रंग, अबीर और पिचकारियों की छोटीछोटी दुकानें लग गई थीं. होली आने में बस कुछ ही दिन बाकी थे. अंशु की नजरें कभी इधर तो कभी उधर जातीं. रंगबिरंगे कपड़े, पिचकारियां, गरमगरम बनती जलेबियां, मठरी… वाह अंशु के चेहरे पर इन सभी चीजों के लिए गहरा आकर्षण देखा जा सकता था.

‘‘मां… चलो उस पिचकारी वाले के पास. देखो न… कितनी सुंदर है– मु झे वह वाला चाहिए,’’ अंशु सीमा का हाथ खींचते हुए उधर ले जाने की कोशिश करने लगी है.

‘‘क्यों इतना परेशान कर रही है? पहले कुछ जरूरी सामान खरीद लेने दे फिर चलूंगी,’’ कह कर सीमा बरतन की दुकान की तरफ बढ़ने लगी.

‘‘नहीं, पहले मेरी पिचकारी खरीदो. देखो… देखो… मु झे जो पिचकारी पसंद है उसे दूसरा लड़का उठा कर देख रहा है. कहीं वह खरीद न ले,’’ अंशु सीमा को फिर खींचने लगी.

इस बार सीमा को अंशु की बात माननी पड़ी. वह पिचकारी वाले के पास चली गई. अधिक दाम होने के कारण उस लड़के ने पिचकारी छोड़ दी. उस के छोड़ते ही अंशु ने पिचकारी को अपने हाथों में उठा लिया.

‘‘हाथ में लेने पर यह तो और भी अच्छी लग रही है. देखो मां… मैं इस में रंग भर कर इसे यों चलाऊंगी और सारे लोग रंग से भीग जाएंगे,’’ कह कर अंशु पिचकारी से होली खेलने का अभिनय करने लगी.

सीमा दुकान वाले से दाम कम करवाने लगी और पिचकारी खरीद ली. अंशु के प्यार भरी जिद के आगे सीमा को  झुकना पड़ा था. सामान खरीद कर सीमा अंशु के साथ घर लौट आई. डोरबैल बजाने पर रितिका ने दरवाजा खोला. रितिका सीमा की बेटी है जो घर से नहीं निकलती. खुद को घर के अंदर कैद कर रखा था.

दरअसल, अंशु रितिका की ही बेटी है. सीमा अंशु की नानी है. बात पहले की है, रितिका तब 12वीं कक्षा में थी. पढ़ने में बहुत तेज. स्कूल की मेधावी छात्रा के रूप में उस की पहचान थी. सिर्फ पढ़ने में ही नहीं बोलने में भी बहुत तेज थी, एकदम हाजिरजवाब और बेबाक. उस के पिता मनोज भले ही किराने की दुकान चलाते थे मगर बेटी को एक डाक्टर बनाने का सपना देख रहे थे. रितिका भी डाक्टर बन कर अपने मातापिता की उम्मीद पर खरी उतरना चाहती थी.

कभी रसोई में काम करते हुए सीमा की उंगली कट जाती या गरम बरतन छू लेती तो रितिका तुरंत ऐंटीसैप्टिक क्रीम ले कर आती, ‘‘घबराइए नहीं सीमा देवी. डाक्टर रितिका आप को मिनटों में ठीक कर देगी,’’ कहते हुए रितिका अपनी कालर ऊपर करते हुए कंधे उचका देती.

उस की बात पर सीमा हंसने लगती, ‘‘हां… हां… डाक्टर मैडम के रहते मु झे क्या कष्ट होगा?’’

मगर रितिका की यह मस्ती वक्त ने छीन ली. आज वह न तो कुछ बोलती है न हंसती है. चेहरे पर मुसकान देखे तो मानो जमाना बीत गया. सीमा रितिका को संभालतेसंभालते अंशु को भी संभालने लगी. अंशु रितिका की बेटी थी जो खुद बच्ची थी वह एक बच्ची की मां… नियति ने यह कैसा मजाक किया उस के साथ?

रोज की तरह रितिका उस दिन भी स्कूल गई थी. उसे खूब पढ़ना था. डाक्टर बनना था. इसलिए सारा ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित करती. उस के दोस्त बोलते, ‘‘रितिका 12वीं कक्षा के बोर्ड में हम सभी को पीछे छोड़ने वाली है. देखो… अभी से कितना फोकस कर रही है स्टडी पर.’’

रितिका दोस्तों की बातें सुन कर हंस पड़ती, ‘‘अच्छा, तुम सब मेरी खिंचाई कर रहे हो?’’

‘‘रितिका तुम्हें प्रिंसिपल सर ने औफिस में बुलाया है,’’ चपरासी ने आ कर कहा तो रितिका उठ कर प्रिंसिपल के औफिस में चली गई.

‘‘मे आई कम इन सर?’’

‘‘यस प्लीज. ये हैं विपुल. पुणे में रह कर एमबीए कर रहे हैं, साथ में थिएटर भी करते हैं. कुछ दिनों के लिए यहां आए हुए हैं. इस बार इन के मार्गदर्शन में 12वीं के स्टूडैंट्स के लिए फेयरवैल प्रोग्राम होगा. इन्हें प्रोग्राम करने वाले बच्चों से मिलवा दो.’’

‘‘ओके सर,’’ कह कर रितिका विपुल को ले कर क्लास के बच्चों से मिलवाने के लिए चली गई. फेयरवैल प्रोग्राम में रितिका को भी बच्चों को गाइड करना था क्योंकि पिछले कार्यक्रमों का उसे अनुभव था. बच्चों को विपुल गाइड करता और उन से रिहर्सल भी करवाने लगा था. रितिका अपनी पढ़ाई के साथ फेयरवैल संबंधी काम पर भी ध्यान दे रही थी.

एकदिन विपुल रितिका को उस की स्पीच? और फैशियल ऐक्सप्रैशन को ले कर उसे बता रहा था. वह बता रहा था कि बच्चों को कैसे सम झाना चाहिए. बताते हुए उस ने रितिका के शरीर को स्पर्श किया जिस से वह थोड़ी असहज हो गई. लेकिन इसे भूलवश हुआ मान कर इग्नोर कर दिया. थोड़ी देर बाद विपुल ने प्यार की थपकी पीठ पर लगाते हुए उस के गालों पर चिकोटी काट ली और अपने हाथ हटाते हुए उस के सीने का स्पर्श किया. फिर मुसकराते हुए वहां से बढ़ गया.

यह रितिका को बुरा लगा. वह विपुल की तरफ बढ़ी और नाराज होते हुए बोली, ‘‘क्या आप में कोई तमीज नहीं है? लड़कियों के साथ शालीनता रखना जानते हैं या नहीं?’’

‘‘रितु, तुम बहुत प्यारी लड़की हो लेकिन इस प्रकार का उपदेश मु झे मत दो.’’

यह सुन कर रितिका उखड़ गई. उस का चेहरा देख कर विपुल अंदर से मुसकराते हुए बोला, ‘‘ओके सौरी… मु झे तुम गलत मत सम झो. इट वाज आल बाइ मिस्टेक.’’

विपुल की बात सुन कर रितिका उसे डांटने के बाद वहां से चली गई. लेकिन उसे कहां पता था कि अगले पल क्या होगा. 2 दिन बाद रितिका प्रिंसिपल औफिस में कुछ पेपर लेने गई. संयोग से विपुल वहां बैठा मिल गया. वह प्रिंसिपल सर का इंतजार कर रहा था. रितिका को देख कर उस के नजदीक चला गया, ‘‘रितु, मैं तुम्हें पसंद करता हूं. मेरे साथ घूमने चलोगी स्कूल खत्म होने के बाद?’’

विपुल के हावभाव देख कर रितिका घबरा गई. उस ने इस प्रकार के व्यवहार की उम्मीद नहीं की थी. वह औफिस से निकलने के लिए मुड़ी ही थी कि विपुल ने  झटके में दरवाजा लौक कर दिया और रितिका को अपनी तरफ खींच लिया.

अचानक हुए इस व्यवहार से रितिका सहम गई. वह संभलती उस से पहले ही विपुल रितिका को खींच कर औफिस से अटैच्ड बाथरूम में ले गया. रितिका का मुंह बंद करने के साथ ही वह उस पर हावी हो गया. रितिका ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस के साथ कभी ऐसा भी होगा. अभी तो वह बचपन को पार करते हुए युवावस्था में कदम ही रखने वाली थी. पूर्ण यौवन को पाया भी नहीं था उस ने. किताबें और दोस्तों की दुनिया में मचलती नदी की लहरों सी बहने वाली रितिका अचानक गंदे नाले में जा गिरी थी.

प्रिंसिपल औफिस थोड़ा साइड में था और स्कूल आवर में उधर किसी का आनाजाना कम ही हो पाता था. विपुल अपनी गलत मंशा पूरी करने में कामयाब हो गया. वह रितिका को वहीं छोड़ कर तेजी से निकल गया. रितिका बदहवास सी अपनी ड्रेस ठीक करते हुए औफिस से बाहर निकली और एक टीचर को सारी बात बताई. प्रिंसिपल और स्कूल प्रशासन तक बात पहुंची तो सभी भौचक हो गए. स्कूल प्रशासन स्कूल की बदनामी के डर से मामले को दबाने का प्रयास करने लगा.

रितिका को इस हालत में देख कर उस के मातापिता के दुख की सीमा नहीं थी. एक ही तो बेटी थी उन की. कितने लाड़ से उस की परवरिश और पढ़ाई करवा रहे थे. बेटी को इस हाल में देखना उन के लिए असहनीय था. उन्होंने विपुल के खिलाफ थाने में केस दर्ज करवाया. स्कूल अपनी तरफ से रितिका के मातापिता को किसी भी प्रकार का सहयोग देने से कतरा रहा था.

इधर रितिका मानसिक रूप से टूट चुकी थी. उसे कुछ देर के लिए भी अकेले रहने पर भय महसूस होता मानो विपुल उसे पास आ कर फिर से रौंदने की कोशिश कर रहा हो. वह घबरा कर मां के समीप ही रहती.

‘‘छोड़ो मु झे, बचाओ… हैल्प मी… बचाओ…’’ सोते हुए अचानक रितिका उठ कर चीखनेचिल्लाने लगती.

रितिका को डाक्टर के ट्रीटमैंट में रखा गया लेकिन अब उसे काउंसलर की भी जरूरत थी. सीमा रितिका को बारबार बाहर ले जाने से बचना चाह रही थी.

‘‘देखोजी, मु झे तो रितु को इतना बाहर ले जाना बरदाश्त नहीं हो रहा. मेरी बेटी को कितना कष्ट है. यह इन महल्ले वालों को क्या महसूस होगा? घर से निकल कर औटो में बैठने तक महल्ले वालों की घूरती नजरें और उन के तीखे बोल… मेरी बेटी को एक चोट तो ये लोग भी दे रहे हैं. आप काउंसलर को घर पर ही बुलाइए,’’ सीमा अपने पति मनोज से बोली.

मनोज ने सीमा की बात मान ली. हालांकि घर आने पर काउंसलर का चार्ज थोड़ा बढ़ गया था लेकिन फिर भी वह बेटी के लिए सब करने के लिए तैयार था.

इधर मनोज की आमदनी कम हो गई थी, क्योंकि उस की किराने की दुकान पर अब आसपास के लोगों ने आना और सामान खरीदना बंद कर दिया था. कुछ लिहाजवश लेते भी तो वह भी यदाकदा ऊपर से काउंसलर से ले कर वकील तक की फीस. रितिका के पिता मनोज का हाथ खाली होता जा रहा था.

एक दिन रितिका की मां सीमा ने कहा, ‘‘अभी हाथ तंग है तो मेरे कुछ जेवर हैं उन्हें बेच देते हैं. वैसे भी बेटी के चेहरे की खिलखिलाहट जैसे कीमती जेवर के जाने पर अब मेरे उन आभूषणों का क्या काम? बस, उस दुष्ट को उस के किए की सजा मिल जाए.’’

मनोज ने गहने बेच कर कुछ रुपयों की व्यवस्था कर ली और विपुल को सजा दिलवाने के लिए न्यायालय के चक्कर लगाने लगा. इधर रितिका की काउंसलिंग भी चलती रही. इसी दरम्यान उस के गर्भवती होने की जानकारी मिली.

यह सुन कर सीमा के होश उड़ गए. ‘‘उफ्फ, क्या कुदरत ने हमें तकलीफ देने की ठान रखी है? इस बच्ची को… उफ्फ…’’

रितिका के मातापिता उस का गर्भपात करवाना तय करते हैं. सीमा ने इस के लिए डाक्टर से बात की.

रितिका का पूरा चैकअप करने के बाद डाक्टर बोली, ‘‘मैं आप की तकलीफ को सम झ सकती हूं लेकिन मु झे लगता है कि गर्भपात से इस की तकलीफ बढ़ न जाए.’’

‘‘मतलब? मैं कुछ सम झी नहीं?’’

‘‘देखिए इस की उम्र कम है साथ ही इस में ऐनीमिया के भी लक्षण हैं. ऐसे में अबौर्शन से इस की जान को खतरा हो सकता है. कम उम्र में किए गए गर्भपात से अत्यधिक रक्तस्राव और संक्रमण का खतरा ज्यादा रहता है.’’

डाक्टर की बात सुन कर सीमा बोली, ‘‘ऐसा मत बोलिए मैडम. आप सम झ नहीं रहीं कि इस का पूरा जीवन खराब हो जाएगा. इस के जख्म भरने के बजाय हरे हो जाएंगे और फिर पाप से जन्मे बच्चे को कौन अपनाएगा?’’

‘‘आप भावनाओं में बह कर बोल रही हैं मगर मैं इस की जांच करने के बाद बोल रही हूं. इस के हैल्थ इशू के कारण मैं अबौर्शन का रिस्क नहीं लेना चाहती. आप की बेटी की जान को खतरा है.’’

सीमा बेटी को खोना नहीं चाहती थी. उस ने सोचा कि बेटी को संभाल लेगी. उसे दुख से उबार लेगी. विपुल को सजा दिलाने के लिए केस चल रहा था. उस का वकील पैसे के बल पर मामले को दबाने की कोशिश कर रहा था. लेकिन गर्भवती रितिका की मैडिकल रिपोर्ट और अन्य सुबूतों के आधार पर विपुल को

10 साल की सजा और जुरमाना सुनाया गया.

इन परिस्थितियों से गुजरना सीमा और मनोज के लिए आसान नहीं था. समाज बलात्कारी से अधिक बलात्कार पीडि़ता का जीवन दुष्कर कर देता है. महल्ले वाले सीमा और मनोज से दूरी बना कर रहने लगे थे. पहले जो लोग सामान लेने के साथ मनोज की दुकान पर शाम के समय कुछ गप्पें लड़ाने भी आ जाया करते थे, आज वही लोग उस की दुकान के आगे से तेज कदमों से गुजर जाते थे. मनोज की दुकान से होने वाली आमदनी न के बराबर हो गई थी. सीमा के गहने भी अब नहीं बचे थे. गर्भवती रितिका की काउंसलिंग अभी भी चल रही थी. डाक्टर का खर्च देने के बाद घर चलाने में परेशानी भी होने लगी.

‘‘सुनो, मैं दुकान बंद करने की सोच रहा हूं,’’ मनोज ने कहा.

‘‘बंद करने से क्या होगा? दो पैसे आने की उम्मीद भी खत्म हो जाएगी,’’ सीमा बोली.

‘‘पेट भरने के लिए सिर्फ उम्मीद से काम नहीं चलता सीमा. मैं ने सोच लिया है कि दुकान बंद कर के अब किसी दूसरे काम की तलाश करूंगा. एक गार्ड की नौकरी भी कर लूंगा. कम से कम महीने की पगार तो आ जाएगी.’’

दुकान बंद होने की सोच कर सीमा का दिल भर आया. का तो मनोज का भी कचोट रहा था. उस दुकान ने उस के जीवन को आधार दिया था. अच्छीखासी बिक्री होती थी उस से. लेकिन अब… यहां से दूर मुख्य बाजार में दुकान खोलना मनोज के वश की बात भी तो नहीं थी. कहां से लाता वह इतना महंगा किराया और पगड़ी के रुपए?

महल्ले वालों के ताने और पुलिस, कोर्ट, वकील के सवाल. रितिका की

तकलीफ बढ़ाने वाली परिस्थितियां बन ही जातीं. उस घटना का जिक्र होते ही वह खुद को गहरी अंधेरी खाई में होना महसूस करने लगती. अब उस ने स्वयं को पूरी तरह घर में कैद कर लिया था. कोर्ट ने भले ही विपुल को जेल की सजा दी थी लेकिन समाज ने एक कैद रितिका के लिए भी मुकरर कर दी.

मनोज काम की तलाश में लग गया. लेकिन यह आसान नहीं था. कोई भी उस के विषय में जानने वाला काम देने से बच रहा था.

‘‘मु झे लगता है अब यहां से दूर कहीं अनजान जगह जा कर काम तलाशना होगा. हमारा समाज आज भी लड़की को ही गलत सम झता है. पता है महल्ले वाले अब क्या कहते हैं? रितिका ही खराब चालचलन की रही होगी और हम पैसे पाने के लालच में बेटी का इस्तेमाल कर रहे हैं. उस दुष्ट विपुल से पैसे ऐंठने के लिए बेटी को गर्भवती पाल रहे हैं. छिं…’’ मनोज गुस्से में बोला.

‘‘हां मु झे तो यह भी सुनने में आया है कि हम बेटी का गर्भपात इसलिए नहीं करवा रहे हैं कि बच्चे के आधार पर ब्लैकमेल कर के उस विपुल से रितिका की शादी करवा देंगे. लोग कितनी गंदी सोच रखते हैं? उन्हें मेरी बेटी का दर्द नहीं दिखता क्या?’’ सीमा का बोलते हुए गला भर आया.

‘‘हम इस घर को बेच कर दूसरे शहर में चले जाएंगे. अब आगे का जीवन सही से कटे इस के लिए यही सही होगा.’’

‘‘लेकिन…’’ मनोज की बात सुन कर सीमा बोली, ‘‘नए शहर में अनजान लोगों के बीच कैसे रह पाएगी मेरी बेटी? जाने आसपास के लोग कैसे हों?’’

‘‘चाहे जैसे हों, इस पर इतना मत सोचो. अब यही एक मात्र रास्ता है.’’

‘‘ठीक है… रितिका की डिलिवरी का समय नजदीक आ गया है. सब सही से हो जाए उस के बाद दूसरे शहर जाने की सोचते हैं,’’ सीमा बोली.

काउंसलिंग तो चल रही थी मगर रितिका के मन का डर

और अवसाद पूरी तरह से हटा नहीं था. उस ने खुद को घर के अंदर कैद कर लिया था. समाज के अव्यक्त ताने जो लोगों के हावभाव या देखने के अंदाज से महसूस होते थे, वह भी किसी गहरी चुभन से कम नहीं होता. मानसिक दर्द  झेलती रितिका अब प्रसवपीड़ा भी महसूस करने लगी. शरीर के उस अवस्था में होने वाले दर्द को वह कहां सम झ सकती थी कि यह क्यों हो रहा है. इन सब से अनभिज्ञ वह पीड़ा के कारण बेचैनी महसूस कर रही थी.

रितिका की बेचैनी देख कर सीमा भांप गई और उसे डाक्टर के पास ले गई. रितिका की हालत देख कर डाक्टर को सिजेरियन करना पड़ा. एक स्कूल की बच्ची ने बच्ची को जन्म दिया. उस मां के रिश्ते में प्रवेश किया. प्राय: घर में नन्ही किलकारियों की गूंज सारस्वत स्वर का आभास करवाती है जिसे सुन कर लोग आनंद के उच्चतर स्तर को महसूस करते हैं. किंतु रितिका के बच्ची की किलकारियां सीमा और मनोज की टीस को बढ़ा रही थीं. रितिका रोए जा रही थी. उसे अपने जीवन से घोर निराशा हो चली थी. कहां वह डाक्टर बनने का सपना पाले थी और अब…  अब उस की आंखों ने आंसुओं से नाता जोड़ लिया था.

अंशु को जन्म लिए कुछ महीने बीत गए थे. इधर मनोज घर को बेचने का प्रयास कर रहा था. आसपास के लोग मनोज का मकान खरीदने की चाह पाल रहे थे. विडंबना देखिए कि दुख की घड़ी में उस परिवार से दूरी बना कर रखने वाले लोग उस के मकान को लेने की मंशा पाल रहे थे. लेकिन मनोज ने महल्ले वालों को घर बेचने से इनकार कर दिया और अंत में किसी अन्य को अपना मकान बेच दिया.

घरको छोड़ते हुए मनोज और सीमा का हृदय मानो चीत्कार कर उठा. एकएक रुपया जोड़ कर उन्होंने यह छोटा सा घर बनाया था. रितिका का जन्म भी तो इसी घर में हुआ था. वह मकान मनोज के लिए उस के पारिवारिक सदस्य के समान था. आज वह अपने घर को छोड़ कर जा रहा था हमेशा के लिए.

मनोज अपने परिवार को ले कर दूसरे शहर में आ गया था. यहां एक कपड़े के दुकान में उसे काम मिल गया. एक छोटा सा घर भी उसे किराए पर मिल गया. यहां सीमा और मनोज ने अंशु को अपनी बेटी बताया. सीमा का सारा समय घर के काम में और अंशु को संभालने में बीत जाता. कुछ महीनों तक वह पासपड़ोस के लोगों से मिलने से बचती रही. अपने पिछले अनुभव को ध्यान में रख कर वह खुद को लोगों से दूर ही रखती. लेकिन धीरेधीरे लोग उन से कुछकुछ बोल कर परिचय आगे बढ़ाने लगे और फिर सीमा जो सोच कर उन से दूरी बना कर रह रही थी वह यहां भी शुरू हो गया.

‘‘तुम्हारी दोनों बेटियों में उम्र का बहुत फासला है. इतनी अधिक देरी के बाद दूसरा बच्चा क्यों प्लान किया?’’ उर्वशी ने बातोंबातों में पूछा.

सीमा अचानक आए इस सवाल को मुसकरा कर टाल गई. तभी दूसरा सवाल भी आ गया, ‘‘तुम अपनी बेटी को पढ़ाती क्यों नहीं? बड़ी बेटी को घर में बैठा कर रखी हो, स्कूल क्यों नहीं भेजती?’’

‘‘अभी हम लोग नएनए आए हैं न, यहां के स्कूलों की अधिक जानकारी नहीं है. थोड़ा सैटल होते ही उस का नाम लिखवा देंगे,’’ सीमा थोड़ा  झेंपते हुए बोली और फिर कोई अगला सवाल न आए इसलिए वह काम का बहाना बना कर वहां से हट गई.

इधर सीमा और मनोज बेटी की पढ़ाई को जारी रखने की कोशिश करने लगे. रितिका का स्कूल में एडमिशन करवाने के लिए सीमा को बहुत परेशानी हो रही थी. पिछले स्कूल से टीसी भी नहीं लिया था. अब यहां के स्कूल में नाम लिखवाने में दिक्कत हो रही थी. मनोज के मालिक का एक स्कूल में नजदीक का परिचय था. करीबी परिचय था तो कुछ जानपहचान और दबाव के कारण एक स्कूल में रितिका का एडमिशन हो गया और उस की पढ़ाई शुरू हो गई. लेकिन वह रैग्युलर क्लास नहीं कर पा रही थी.

बाहरी दुनिया में फिर से खुद को जोड़ना रितिका के लिए इतना आसान नहीं था. घर में ही रह कर वह किताबों के पन्ने पलटने लगी. 12वीं कक्षा पास कर के उस ने आगे की पढ़ाई के लिए कौरेस्पौंडैंस कोर्स द्वारा पढ़ना जारी रखा. समय गुजर रहा था. अब अंशु भी स्कूल जाने लायक हो गई थी. वह नहीं जानती थी कि उस की असली मां कौन है. रितिका को वह दीदी कहती. छोटी अंशु जब भी खेलने के लिए जिद करती तो रितिका उसे पास के पार्क में ले कर चली जाती. धीरेधीरे रितिका अंशु के साथ सक्रिय हो रही थी.

समय की गति थोड़ी सहज होने लगी थी कि रितिका के जख्म फिर से कुरेद दिए गए. एक दिन पार्क में टहलती महिला ने रितिका की तरफ इशारा करते हुए अपनी महिला साथी से कहा, ‘‘यह लड़की है न, उस छोटी लड़की की मां है.’’

‘‘अच्छा, बहुत प्यारे हैं दोनों,’’ महिला मित्र स्नेहिल भाव से बोली.

‘‘अरे सुनो तो उस लड़की की शादी नहीं हुई है. वह बिन ब्याही मां है,’’ पहली महिला बोली.

‘‘जरूर बौयफ्रैंड ने प्रैगनैंट कर के छोड़ दिया होगा,’’ दूसरी महिला बोली.

‘‘अरे नहीं, एक लड़के को अपने हुस्नजाल में फांस कर सम्मोहित कर लिया और गर्भवती हो गई. उस से कुछ ऐंठा नहीं गया तो उस पर रेप का केस कर दिया. सुना है बड़े चालबाज हैं इस के घर वाले. पहले यह जहां रहती थी वहां के मेरे एक रिश्तेदार ने इस के बारे में बताया.’’

महिलाओं की आवाज रितिका के कानों तक पहुंच रही थी. उस की दबी टीस तेज दर्द बन कर उभरने लगी. उस ने  झटके से अंशु का हाथ पकड़ा और घर लौट आई.

‘‘मां… मु झे बाहर नहीं जाना,’’  रितिका की आंखें डबडबा गईं.

‘‘क्या हुआ रितु? अंशु ने परेशान किया क्या?’’ मां बोली.

रितिका ने धीरे से डबडबाई आंखों से मां को सारी बात बताई, ‘‘मां, मेरा क्या दोष है जो हर जगह लोग मु झे ही नोचने लगते हैं? उस दोषी को तो कोई कुछ नहीं कहता.’’

‘समाज कितना भी आधुनिक होने का ढोंग कर ले लेकिन स्त्री के प्रति लोगों का नजरिया जाने कब बदलेगा?’ मन में सोचते हुए सीमा चुप रह गई. क्या कहती बेटी से?

अभी तो रितिका जिंदगी की तरफ मुड़ने लगी थी. कुछ जख्म शायद वक्त के मरहम से ही ठीक हों, यह सोच कर सीमा ने रितिका पर बाहर निकलने के लिए दबाव डालना बंद कर दिया. सीमा अंशु का नाम स्कूल में लिखवाने का प्रयास करने लगी. किसी भी स्कूल में अंशु का आधार कार्ड और जन्म प्रमाणपत्र मांगा जाता. बिना इस के एडमिशन फौर्म भी नहीं मिल पा रहा था, एडमिशन तो दूर की बात है.

अंशु के जन्म प्रमाणपत्र में पिता का नाम नहीं था और उन्हें दिखा कर सीमा रितिका के अंधियारे जीवन को यहां ज्यादा प्रकट नहीं करना चाहती थी. वैसे भी उस ने लोगों को बताया था कि अंशु उन की बेटी है. अब अंशु के एडमिशन के लिए कुछ रास्ता नहीं मिल पा रहा था. आधार कार्ड बनवाने में भी मुश्किल आ रही थी.

‘‘देखिए मैडम, बिना जन्म प्रमाणपत्र के आधार कार्ड नहीं बनेगा. पहले इस का जन्म प्रमाणपत्र लाइए उस के बाद ही आप को आधार कार्ड बनवाने के लिए फार्म देंगे,’’ औफिस के कर्मचारियों ने सीमा से कहा.

अंशु का जन्म प्रमाणपत्र सीमा नकली बनवाना चाह रही थी जिस में अंशु के मातापिता का नाम सीमा और मनोज हो. लेकिन यहां भी किसी कर्मचारी ने गलत तरीके से जन्म प्रमाणपत्र बनाने से मना कर दिया.

‘‘अब अंशु की पढ़ाई कैसे होगी? इस आधार कार्ड और जन्म प्रमाणपत्र में हम उल झ गए,’’ सीमा मनोज से बोली.

‘‘अंशु का जन्म प्रमाणपत्र तो हौस्पिटल से मिला है लेकिन उस में मां का नाम रितिका है. अब उसे सब के सामने ला कर रितिका के जीवन में किसी नई परेशानी को नहीं लाना चाहता,’’ मनोज बोला.

सीमा और मनोज अंशु के जन्म प्रमाणपत्र और आधार कार्ड बनवाने के लिए औफिस का चक्कर लगा रहे हैं, यह बात रितिका की काउंसलर को मालूम हुई तो उस ने सीमा और मनोज को समझाया, ‘‘आप दोनों बड़े धैर्यवान और साहसी अभिभावक हैं. आप कोई भी गैरकानूनी कार्य करने से स्वयं को बचाइए. भावुकता में बह कर गलत फैसला लेना उचित नहीं.’’

‘‘तो हम क्या करें?’’

‘‘रितिका एक साहसी लड़की है. बस, इसे थोड़ी हिम्मत और रखनी होगी. सिंगल मदर के रूप में उसे जो कानूनी अधिकार प्राप्त हैं उन का सदुपयोग कर के उस के जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है.’’

काउंसलर रितिका को अपने पास बैठाया और उसे सम झाया, ‘‘रितु, क्या तुम्हें अपने नाम का मतलब पता है? रितिका का अर्थ होता है आनंद. इस का एक दूसरा अर्थ होता सुंदर प्रकाश. तुम सत्य की वह रोशनी हो जो अपनी ऊर्जा के साथ प्रवाहित होती है.’’

‘‘लेकिन मेरे जीवन में आनंद बचा ही कहां है? मैं तो जीवन के अंधियारे पल को जी रही हूं. फिर किस ऊर्जा को प्रवाहित करूं?’’ बोलते हुए रितिका मायूस हो गई.

‘‘तुम एक साहसी बुद्धिमान लड़की हो जो किसी भी परिस्थिति का डट कर मुकाबला कर सकती है जो सम झदारी और धैर्य के साथ जीवन को आगे बढ़ा सकती है. तुम्हें अपने नाम के अनुकूल बनना पड़ेगा. गलत किसी और ने किया और उस की सजा तुम्हें, तुम्हारे अभिभावकों को और इस नन्ही अंशु को जीवन भर क्यों मिले? तुम सच को स्वीकार करो और साहस के साथ जीवन में आगे बढ़ो.’’ काउंसलर ने बहुत अच्छे तरीके से रितिका को सम झाया.

रितिका अपने मन को दृढ़ करते हुए बोली, ‘‘मैं अंशु की सिंगल मदर बन कर रहूंगी. कब तक लोगों के तानों से डरती रहूं? मेरे मम्मीपापा कहांकहां जगह बदलेंगे? बस, अब और नहीं… कुछ स्याह पन्ने पूरी किताब का अस्तित्व नहीं मिटा सकते. मैं भी अपने जीवन के उन स्याह पन्नों को हाशिए पर छोड़ कर आगे बढूंगी.’’

रितिका के इस फैसले को सुन कर सीमा अपनी बेटी को सीने से लगा लिया. अब अंशु का आधार कार्ड भी बन गया और पैरेंट्स के नाम की जगह पर रितिका का नाम दर्ज हो गया. अंशु का एक स्कूल में एडमिशन भी हो गया है.

सीमा और मनोज रितिका और अंशु का हाथ दृढ़ता से थामे थे. और अब वे हर चुनौती को पार करने के लिए तैयार थे. रितिका की काउंसलर उसे एक भरोसेमंद मित्र की तरह स्नेह देती और हर कदम पर मार्गदर्शक की तरह साथ बने रहने का आश्वासन भी देती.

आज रितिका बेहतर जीवन जीने की तरफ कदम बढ़ा चुकी है. हालांकि अंशु अभी भी रितिका को दीदी कहती है. वह छोटी है इसलिए अभी उस के बचपने को सजानेसंवारने में सीमा, मनोज लगे हैं और रितिका अंशु के साथ धीरेधीरे खिलखिलाहट और मस्ती के रंग को आत्मसात करने लगी है.

राइटर रेखा भारती मिश्रा 

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