Hindi Fictional Story: अच्छी सी खुशबू तैर रही थी कमरे में. नीबू जैसी ताजगी लिए. कमरा छोटा था, एक तरफ डबलबैड, साइड टेबल, दूसरी तरफ कौफी टेबल और 2 आरामदेह कुरसियां, खिड़की के पास सोफा. 1 घंटा पहले होटल के इस कमरे में चैक इन किया है रागिनी और पल्लवी ने. आते ही रूम सर्विस से चाय और पकौडि़यां मंगवाईं. इतनी प्यारी बारिश हो रही है तो पकौडि़यां तो बनती ही हैं, पल्लवी ने कहा था.

इस समय दोनों गरम चाय के कप ले कर खिड़की के पास खड़ी हैं, कौफी टेबल पर पकौडि़यों की प्लेट है. दोनों कुछकुछ देर बाद एक पकौड़ी उठा कर हलके से चुबलाने लगती हैं. दोनों के लिए यह अनुभव नया है. अकेले, अपने परिवार के बिना इस तरह घूमने आना.

रागिनी रास्ते भर गुमसुम रही. चलने से पहले जरूर वह परेशान थी अपनी 6 साल की बेटी त्रिशा को ले कर. हालांकि उस की सास साथ रहती थी, पर रागिनी को आदत थी त्रिशा का हर काम खुद करने की. पल्लवी को आश्चर्य भी हुआ कि कैसे रागिनी इस ट्रिप में उस के साथ आने को मान गई. वे दोनों एक ही कालोनी में रहती थीं. अच्छी दोस्ती थीं. त्रिशा और पल्लवी की बेटी पन्ना एक ही क्लास में थे. यह भी वजह थी कि उन का मिलना ज्यादा होता था.

रागिनी हाउसवाइफ थी और पल्लवी बैंक में काम करती थी. 2-3 महीने पहले दोनों ने मिल कर तय किया था अकेले घूमने जाने का. लंबी प्लानिंग की, अपने लिए कुछ वक्त निकालने के बारे में खूबखूब बातें कीं, यह भी न जाने कितनी बार कहा कि हमारे पति तो साल में हमारे बिना

3-4 ट्रिप ले ही लेते हैं, भले औफिस का ट्रिप हो, मस्ती कर के तो आते ही हैं. एक हम हैं जो जहां जाते हैं परिवार के साथ जाते हैं, कभी मी टाइम नहीं मिलता. बातें करतेकरते, शिकायतें सुनतेसुनाते तय किया था 6 दिन के लिए हम बाहर जाएंगे, बस हम दोनों, खूब घूमेंगे, कालेज स्टूडैंट की तरह. बैग पैकर्स की तरह. घरवर सब भूल जाएंगे. हमें भी तो चाहिए एक ऐडवैंचर्स ब्रेक.

पल्लवी ने पहले अपने पति से बात की. पल्लवी के श्रीमान रितुराज

फौरन मान गए. वे तो कहते रहते थे कि पल्लवी को अकेले दुनिया घूमनी चाहिए. एड कंपनी में काम करते थे रितुराज. उन्हें लगता था पल्लवी एकदम घर घुस्सू होती जा रही है. बैंक में नौकरी शुरू करने के बाद तो बोल्डनैस एकदम खत्म हो गई. वे संभालेंगे न बच्चों को. इस तरह कुछ सालों बाद बच्चों को भी अकेले भेजा करेंगे ऐडवैंचर्स ट्रिप में.

रागिनी के परिवार की कहानी थोड़ी अलग है. थी तो उस की लव मैरिज, पर पिछले 7 सालों में रागिनी ने पल्लवी से कई बार कहा है कि अच्छा होता जो मैं रमन से शादी न करती. कालेज में जिस रमन से डूबडूब कर इश्क किया, जिस के लिए अपने परिवार वालों से लड़?ागड़ कर सब को छोड़ कर चली आई वह रमन तो कहीं है ही नहीं. जिस के साथ मैं रहती हूं, वह एक अधेड़ होता हुआ, अपने काम से ऊबा और अपनी जिम्मेदारी के बो?ा तले दबा कुंठित आदमी है. मेरा वजूद जैसे कुछ रह ही नहीं गया. बस यही कि मैं ने अपनी मरजी से शादी की थी. इसीलिए की थी न कि मैं अपनी मरजी से अपने तरीके से अपने प्रिय पुरुष के साथ जिंदगी जी सकूं. पर यहां तो शादी के बाद जैसे जिंदगी रुक सी गई.

मन को मनाने का काम किया था पल्लवी ने. बहुत मुश्किल से तैयार हुआ. तमाम दलीलों और शर्तों के बाद.

पल्लवी पलंग पर औंधी पसर गई. डायरी खोल कर पढ़ने लगी, डे वन, शाम को गोल्डन पार्क में लंबी वाकिंग, लौटते समय बड़ी मार्केट

में डिनर.

डे टू सुबह स्विमिंग, ब्रेकफास्ट, साइट सीइंग, राजाजी की हवेली से होते हुए वापस होटल, शाम को होटल के स्पा में मड मसाज, फिर पूल किनारे डिनर.

रागिनी ने उस के हाथ से डायरी ले कर कहा, ‘‘इतनी प्लानिंग मत कर. इतना बंध कर रहेंगे तो ट्रिप का मजा चला जाएगा.’’

‘‘पर कुछ तो प्लानिंग करनी होगी न रागिनी वरना तो दिनभर हम होटल के कमरे में सोते रहेंगे.’’

‘‘वैसे सोने का आइडिया बुरा नहीं है,’’ रागिनी ने धीरे से कहा.

‘‘तुम बेकार की बातें मत करो. जब बच्चे साथ में रहते हैं तो हमेशा उन की मरजी से चलना पड़ता है. मैं तो प्लानिंग के हिसाब से चलूंगी और इन 5 दिनों का पूरा मजा लूंगी.’’

रागिनी अचानक चुप हो गई. पल्लवी उठ कर अलमारी से शाम के पहनने के लिए कपड़े निकालने लगी.

लाल रंग की कुरती और नीली जींस. गले में सफेद स्टोल. वहीं से रागिनी से कहा, ‘‘तेरे कपड़े निकाल दूं? जींस पहनेगी न?’’

रागिनी ने जैसे उस की बात सुनी ही नहीं. वह खिड़की के पास खड़ी हो कर कुछ सोच रही थी. पल्लवी उस के पास पहुंची और लगभग ?ाक?ार कर कहा, ‘मैं भी देख रही हूं, जब से यहां आई हो, अजीब सा बिहेव कर रही हो. माजरा क्या है मुहतरमा?’

रागिनी ने उस की तरफ देख कर सिर हिलाया, ‘‘कुछ नहीं. बस अच्छा लग रहा है यों ही बाहर देखना. देखो, बारिश भी रुक गई है.’’

‘‘अच्छा हुआ. चलो फौरन तैयार हो जाओ. 5 बजने जा रहे हैं. गोल्डन पार्क यहां से लगभग 1 घंटा दूर है. टैक्सी करनी होगी.’’

पल्लवी तो तुरंत तैयार भी हो गई पर रागिनी जैसे गोंद लगा कर चिपक गई थी खिड़की से.

‘‘रागि, क्या बात है? तुम तब से खिड़की

से बाहर देखती हुई कुछ सोच रही हो. चलना नहीं है क्या?’’

रागिनी ने पल्लवी का हाथ पकड़ कर उसे पास के सोफे पर बैठाया, ‘‘चलेंगे. आज बहुत दिनों बाद समय हाथ में आया है. उसे संभाल कर खर्चना चाहती हूं.’’

‘‘तुम भी न रागि, गलत समय पर कविता कहने लगती हो. तैयार क्यों नहीं हो रही?’’

रागिनी बहुत अनमने ढंग से उठ कर कपड़े बदलने चली गई.

होटल के बाहर से उन्हें टैक्सी मिल गई. 6 बजे दोनों गोल्डन पार्क में थीं.

सुनहरे रंग से सजा हुआ पार्क. फूलों का मौसम था. हर तरफ फूल ही फूल. पल्लवी अपने मोबाइल से फोटो खींचने लगी. कभीकभी रागिनी को अपने पास खींच कर सेल्फी ले लेती. घंटाभर वहां बिताने के बाद दोनों चलते हुए बड़ा बाजार तक आ गईं. पल्लवी के पास शौंपिंग की पूरी लिस्ट थी. बच्चों के लिए गिफ्ट, मम्मी के लिए साड़ी, अपने लिए सूट पीस.

रागिनी ने कुछ नहीं खरीदा बल्कि शौपिंग के दौरान भी उस का ध्यान कहीं और था.

पल्लवी चाहती थी किसी ढंग के रेस्तरां में बैठ कर खाना खाएं. अचानक रागिनी ने कहा, ‘‘मेरा चाट खाने का मन है. रानी चाट भंडार चलें?’’

पल्लवी ने सिर हिलाया तो रागिनी बड़े उत्साह से चलने लगी जैसे उसे पता हो कहां है यह रानी चाट भंडार.

2 सड़कों के बाद एक होटल के सामने मंत्रमुग्ध सी रुक गई रागिनी. देख कर लग रहा था, नया बना होटल है, रानी चाट हाउस.

बड़े हक से रागिनी पल्लवी का हाथ पकड़ कर अंदर चली गई. लाल रंग की

कुरसियां, दीवारों पर रंगबिरंगे पोस्टर और लाल ही पगड़ी बांधे वेटर.

रागिनी ने बिना मेन्यू देखे पूछा, ‘‘आप के यहां आज भी पालक की चाट बनती है?’’

वेटर ने हां कहा तो रागिनी ने पालक की चाट के साथ और भी कई चीजें मंगवा लीं.

वेटर के जाने के बाद पल्लवी ने टोका, ‘‘क्या बात है रागि? ऐसा लग रहा है तू पहले यहां आ चुकी है?’’

रागिनी के होठों पर एक शरमीली सी मुसकान आई, ‘‘हां, मैं ने अपने बचपन का कुछ हिस्सा इस शहर में बिताया था. यहां बहुत आते थे. रोड साइड ढाबा था. अब देखो, कितना बदल गया है.’’

वेटर उन के सामने चाट की आइट्म्स रख गया. अच्छी खुशबू थी. रागिनी की आंखें चमकने लगीं. पल्लवी ने पालक चाट एक स्पून खाने के बाद पूछा, ‘‘अब बता, तू यहां क्यों आई है? अपना बचपन जीने? मुझे बताया क्यों नहीं?’’

‘‘मुझे लगा, तुम भी तो यहां आना चाहती थी अच्छा टूरिस्ट प्लेस है.’’

‘‘सिर्फ चाट तो तुझे यहां खींच कर नहीं लाई होगी? सच बता?’’

रागिनी कुछ सकुचा कर बोली, ‘‘पल्लवी, कैसे बताऊं कई सालों से मैं एक बार यहां आना चाहती थी. रमन के साथ कभी हिम्मत नहीं पड़ी. तुम ने जब कहा कि घूमने चलते हैं तो मन में आया कि यहीं क्यों न आएं. तुम ने मना भी

नहीं किया.’’

‘‘बात क्या है?’’

‘‘मैं ने तुझे अपनी फैमिली के बारे में कभी नहीं बताया न. मेरे पापामम्मी, मेरी दादी. कोई और भी थी हमारे परिवार में, जिस का नाम भी कोई नहीं लेता था,’’ कहतेकहते रागिनी की आंखों में आंसू आ गए.

पल्लवी ने उस की तरफ टिशू बढ़ाया. आंखें पोंछने के बाद रागिनी ने कहना शुरू किया, ‘‘दादी कहती थीं कि पापाजी और उन में बहुत प्यार था. वे पापा के साथ कालेज में पढ़ाती थीं. लेकिन दादाजी ने उन की शादी नहीं होने दी. वे यहीं कॉलेज में पढ़ाती थीं, अकेली रहती थीं. मैं बहुत छोटी थी, एक दिन दादी को वे बाजार में मिल गईं. उन के पांव छुए, दादी भी उन से गले मिलीं. मुझे यही बताया कि वे हमारे दूरे के रिश्ते की मौसी हैं. उन्होंने शादी नहीं की. कभीकभी दादी उन से मिलने जाती थीं, मैं भी साथ हो लेतीं. वे मेरी लता मौसी थीं. जब मैं उन से मिलने जाती, मेरे लिए खास छोलेभटूरे बनातीं. मैं कुछ बड़ी हुई तो पता चला कि वे दरअसल हैं कौन. घर में मां बहुत झगड़ती थीं उन का नाम लेने पर. हम लोगों से कहतीं, वहां जाओगी तो टांगें तोड़ दूंगी. पर मैं जाती, दादी के साथ. पापा को शायद पता था. पर वे कुछ नहीं कहते थे,’’ कह रागिनी रुक गई.

‘‘फिर?’’

‘‘पापा का यहां से ट्रांसफर हो गया. मेरा कालेज यहां से पास था. मैं

कभीकभी आती थी लता मौसी से मिलने. जब रमन से मेरा अफेयर शुरू हुआ, मैं ने सब से पहले लता मौसी को ही बताया. वे कहती थीं, हमेशा उस से शादी करो, जिस से प्यार करती हो. दादी तो तब तक गुजर चुकी थीं. मैं रमन को लता मौसी से मिलाने ले गई, पर यह कह कर कि वे हमारी रिश्तेदार हैं. सही बात बताने की हिम्मत नहीं हुई. फिर तो सब जैसे पीछे छूट गया. पहले तो फिर भी लता मौसी से कभीकभार फोन पर बात हो जाती थी, अब तो वह भी नहीं होती. उन का नंबर बदल गया कि वे कहीं और रहने चली गई हैं, मुझे कुछ नहीं पता. बस एक बार उन से मिल कर यह कहना चाहती हूं कि हर प्रेम विवाह सफल नहीं होता. पर डरती भी हूं कि मुहब्बत को ले कर उन का जो यकीं है वह टूट न जाए.’’

‘‘वे यहीं रहती हैं अब भी? मिलोगी उन से.’’

‘‘मन तो है. तुम चलोगी मेरे साथ?’’

‘‘जरूर रागि.’’

‘‘और तुम्हारा टूर प्लान?’’

‘‘तुम ने ही तो कहा था कि कई बार बिना प्लानिंग के घूमने में मजा आता है.’’

रागिनी ने पल्लवी के हाथों को कस कर पकड़ लिया.

पल्लवी ने धीरे से पूछा, ‘‘और तेरे पापा? उन का क्या हुआ? वे कहां रहते हैं?’’

रागिनी धीरे से बोली, ‘‘मां के गुजर जाने के बाद पापा ने कहा कि वे अपनी बाकी की जिंदगी ऋषिकेश में बिताएंगे. कभीकभार, साल में एक बार फोन कर लेते हैं, यह कहने को कि वे जिंदा हैं. मेरे बारे में पूछ लेते हैं बस,’’ कहतेकहते रागिनी की आंखें भर आईं.

पल्लवी ने उसे गले लगा लिया और चुपचाप उस के बालों को सहलाने लगी.

अगले दिन पल्लवी के सो कर उठने से पहले रागिनी उठ कर तैयार हो चुकी थी. दोनों ने नाश्ता किया, टैक्सी बुलाई और चल पड़े.

रागिनी को पता याद था. लता मौसी के घर के सामने टैक्सी रुकी. घर पर

बड़ा सा ताला लगा था. रागिनी निराश हो गई. पासपड़ोस सब बदल गया था.

पल्लवी रागिनी को संभाल कर पास के ढाबे में चाय पिलाने ले आई. पल्लवी ने ही ढाबे में काम करने वाले एक बुजुर्ग से आदमी से पूछा, ‘‘भैया, यह सामने जो घर है न, वहां हमारी मौसी रहती थी. लता मौसी. कहीं गई हैं पता है क्या?’’

ढाबे वाले ने आंखें मिचमिचाते हुए कहा, ‘‘बहुत साल हो गए वे तो सब बेचबाच कर कहीं निकल गई हैं. सुनीसुनाई बात है मैडम. 3-4 साल पहले कोई आदमी आया था. कहते हैं उस के साथ रहने चली गईं, किसी वृद्धाश्रम में.’’

रागिनी चौंक गई, ‘‘लता मौसी किसी आदमी

के साथ चली गईं? ऐसा कैसे हो सकता है? जिंदगीभर उन्होंने शादी नहीं की और अब बुढ़ापे में…’’

पल्लवी ने उसे रोक कर सवाल किया, ‘‘कौन से वृद्धाश्रम में, पता है क्या आप को?’

बुजुर्ग ढाबे वाले ने अपने यहां काम कर रहे रसोइए को बुलाया. वह जानता था लता मौसी को ठीक से. बाद के दिनों में लता मौसी उस के यहां से रोटिया मंगवाती थीं. उस ने बताया, यहां से 400 किलोमीटर दूर पहाड़ पर एक वृद्धाश्रम है. वहीं जाने की बात कर रही थीं वे.

पल्लवी और रागिनी लौट कर होटल आ गईं. रागिनी थोड़ी निराश लग रही थी कि लता मौसी ऐसा कैसे कर सकती हैं? बुढ़ापे में किसी दूसरे आदमी के साथ रह रही हैं?

होटल लौटने के बाद दोनों थक कर बिस्तर पर पसर गईं. पल्लवी रागिनी के सिर पर हाथ फेरने लगी,. अचानक उस ने पूछा, ‘‘वृद्धाश्रम चलें?’’

रागिनी उठ कर बैठ गई, ‘‘हम यहां घूमने आए हैं न पल्लवी. छोड़ो लता मौसी को. कल तुम्हारे प्लान के मुताबिक राजा की हवेली देखने चलते हैं. लता मौसी वाला चैप्टर क्लोज.’’

सुबह पल्लवी उठ गई. नीचे टहलने गई. थोड़ी देर स्विमिंग की. कमरे में आई

तब भी रागिनी सो रही थी. उस ने उठाया, ‘‘जल्दी कर. अपना सामान बांध. नीचे टैक्सी आ गई है.’’

‘‘सामान?’’ रागिनी चौंकी.

‘‘हां, हम होटल खाली कर रहे हैं, जब यहां रहना नहीं है तो पैसे क्यों दें? अब तुम और मैं असली टूरिस्ट की तरह घूमेंगे.’’

सामान पैक हो गया. कमरा खाली कर दोनों टैक्सी में आ कर बैठीं. रागिनी ने पूछा भी नहीं कि वे कहां जा रहे हैं.

पूरे 7 घंटे बाद टैक्सी रुकी, पहाड़ों से घिरी एक खूबसूरत बिल्डिंग के सामने. पल्लवी ने रागिनी को झकझोर कर कहा, ‘‘जाओ, अंदर जा कर पता करो लता मौसी के बारे में. यही है वह वृद्धाश्रम.’’

कांपते पैरों से रागिनी गाड़ी से उतरी. हां, वहां लता नाम की महिला रहती थी. उन के कमरे का दरवाजा खटखटाते समय रागिनी को जैसे बुखार चढ़ गया.

दरवाजे के उस पार थी उस की लता आंटी. नीले रंग के पाजामा सूट में बिलकुल पहले जैसी. बस बाल कुछ और सफेद हो गए थे. रागिनी को पहचान कर खुशी से रो पड़ीं.

रागिनी अब भी सहज नहीं थी. लता मौसी हाथ पकड़ कर कमरे में ले आईं, ‘‘आखिर तू आ ही गई न मुझे खोजती हुई. मुझे पता था और कोई आए न आए, तुम जरूर आओगी.’’

‘‘क्यों मौसी, मेरा इंतजार क्यों कर रही थीं? तुम ने जिंदगीभर मुझे जो ज्ञान दिया, वह तो फेल हो गया न?’’

‘‘क्या कह रही है बेटी? तू इतने गुस्से में क्यों है?’’

‘‘मैं आप से एक बार सिर्फ इसलिए मिलना चाहती थी कि आप से यह कह सकूं कि मौसी प्रेम के बारे में आप की थ्योरी गलत थी. आप ने खुद भी तो साबित कर दिया न जिंदगीभर अपनी मुहब्बत के नाम पर शादी नहीं की और अब…’’

‘‘अब क्या बेटी? मैं ने ऐसा क्या कर दिया?’’

रागिनी का मन हुआ लता मौसी को झकझोर दे, मुझ से पूछ रही हो क्या किया?

कमरे के अंदर से अचानक आवाज आई, ‘‘कौन है लता?’’ रागिनी को आवाज पहचानी हुई लगी. पापा खड़े थे सामने. रागिनी को देख कर उन के हाथ की छड़ी नीचे गिर गई. वे भरभरा कर रोने लगे. रागि ने आगे बढ़ कर उन्हें संभाला.

लता मौसी ने धीरे से कहा, ‘‘तेरे पापा तुझे बहुत याद करते हैं रागिनी. तेरी मां के

गुजर जाने के बाद वे आए थे मेरे पास. हम ने तय किया कि जो काम हम सालों पहले नहीं कर पाए अब करेंगे. तेरे पापा को लगता था अगर तेरी ससुराल वालों को पता चल जाएगा कि बुढ़ापे में तेरे पापा ने दूसरी शादी कर ली है तो पता नहीं तेरे साथ कैसा व्यवहार करेंगे. मैं उनसे कहती थी रागिनी ने अपनी पसंद से शादी की है, खुश होगी. तुम खुश तो हो न बेटी?’’

पापा के पास बैठ गई रागिनी. आंखों में शिकायत थी. पापा की आंखों में लाचारी.

लता मौसी कह रही थीं, ‘‘मैं कहती थी न एक दिन रागिनी हम से मिलने जरूर आएगी.’’

रागिनी की आंखों में धुंधलाहट सी थी. तो लता मौसी की मुहब्बत का फलसफा गलत नहीं था.

मौसी और पापा के पास 2 दिन बिता कर रागिनी और पल्लवी लौटने लगीं. लता मौसी बारबार कहती रहीं, ‘‘देख बेटी, तेरे पापा के हाथ में बहुत कुछ नहीं था, माफ कर देना बेटा उन्हें. वे लाचार थे, बस यह समझ ले हम दोनों ने अपनी जिंदगी से कुछ दिन चुराए हैं, साथ रहने के लिए.’’

ट्रेन में बैठने के बाद बहुत देर बाद रागिनी ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हारा ट्रिप चौपट कर दिया न?’’

‘‘नहीं रे. हर ट्रिप में हमें जिंदगी इतना फलसफा कहां सिखा पाती है?’’

‘‘हां, कुछ फलसफे मुझे भी सीखने हैं जैसे अपनी मुहब्बत को सफल बनाना,’’ रागिनी ने धीरे से कहा. पल्लवी बुदबुदाई, ‘‘आमीन.’’

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