Long Story: आशी अपने 10 साल के बेटे के साथ मौरिशस के हरेभरे ले मोर्नेब्रैबेंट द्वीप पर दांतेदार पहाड़ के सामने उस का हाथ थाम चरम उत्तेजना से चिल्लाई, ‘‘चुनमुन… देख सामने… सो ब्यूटीफुल. नीले आसमां तले वसंती बयार में ?ामतेलहराते ताड़ के पेड़ों की कतार और पहाड़ की 3 दिशाओं में ठाट मारते फीरोजी रंग के समुद्री पानी के नयनाभिराम दृश्य को देख कर घोर आश्चर्य से आशी की सांस थमी की थमी रह गई थी.

कुछ देर आशी और उस के बेटे चुनमुन ने समुद्रतट की सफेद बालू पर चहलकदमी की. चुनमुन बालू के घरोंदे बनाने लगा. तभी उस के पास खेल रही एक प्यारी सी लगभग उस की ही उम्र की एक लड़की उस के पास आई और उस से बोली, ‘‘मेरा नाम कुहू है. तुम्हारा नाम?’’

‘‘ओह… तुम्हारा नाम कुहू है. कोयल वाली कुहू?’’

‘‘धत्… कोयल वाली नहीं. मैं अपने पापा की कुहू हूं.’’

‘‘ओ… अपने पापा की कुहू, मेरा नाम चुनमुन है. तुम कहां रहती हो कुहू?’’

‘‘मैं देहली में रहती हूं. और तुम?’’

‘‘अरे वाह, मैं भी देहली में रहता हूं.’’

‘‘तुम्हारे पापा कहां हैं चुनमुन?’’

‘‘मेरे पापा… मेरी मम्मा हैं, पापा नहीं, मम्मा ने पापा को छोड़ दिया.’’

‘‘ओह… और मेरे पापा हैं, मम्मा नहीं.’’

‘‘ओह…’’

समुद्रतट के पास अनेक बड़े और बच्चे पेट के बल मास्क लगाए तैरते हुए स्नोर्कलिंग कर रहे थे जिन्हें देख कर चुनमुन चिल्लाया, ‘‘मम्मा, चलो हम भी स्नोर्कलिंग करते हैं. समुद्र के भीतर की चीजें देखने में बहुत मजा आएगा.’’

‘‘ओके बेटा, चलो, स्नोर्कलिंग वाले अंकल से बात करती हूं.’’

‘‘कुहू, चलो न तुम भी हमारे साथ स्नोर्कलिंग करो न. तुम्हें स्विमिंग आती है?’’

‘‘अरे बाबा, मु?ो तो स्विमिंग आती है लेकिन मेरे पापा को नहीं आती. व पानी से बहुत डरते हैं. मु?ो भी समुद्र में जाने से रोकते हैं. कल मैं ने स्नोर्कलिंग करने के लिए इतनी जिद की लेकिन पापा ने मना कर दिया.’’

‘‘ओह… मेरी मम्मा तो बिलकुल नहीं डरतीं पानी से. वे बहुत ब्रेव हैं.’’

‘‘अरे बुद्धू, पापा तो मेरे भी बहुत ब्रेव हैं लेकिन पानी के सामने उन की टांयटांय फिस्स हो जाती है,’’ कहते हुए कुहू खिलखिला कर हंस दी.

तभी कुहू के पापा उन दोनों के पास आ कर बैठ गए और बोले, ‘‘शैतान बच्चो, यह तुम दोनों मेरे बारे में क्या गासिप कर रहे हो?’’

इस पर वहीं बैठी आशी ने उन से कहा, ‘‘आप की बेटी कह रही है कि आप को पानी से बहुत डर लगता है.’’

दोनों ने एकदूसरे को अपना परिचय दिया और बातें करने लगे.

तभी स्नोर्कलिंग कराने वाला वहां आ गया और आशी और चुनमुन वहां से उठ कर स्नोर्कलिंग के लिए आवश्यक गीयर पहनने लगे और कुछ ही देर में तैराकी में निपुण मां और बेटा मास्क पहन कर स्नोर्कलिंग करने लगे.

समुद्र के भीतर की दुनिया अद्भुत थी. वहां औरेंज, लाल रंग की मछलियां थीं. खूबसूरत नीली, पीली, गुलाबी और गोल्डन मछलियां थीं. कछुए और आक्टोपस थे. बहुत प्यारीप्यारी रंगबिरंगी स्टारफिश भी थीं.

उन से कुछ दूर बेहद स्वीट डौल्फिस पानी में तैर रही थीं.

करीब 1 घंटे तक स्नोर्कलिंग का लुत्फ उठा कर मांबेटा अपने होटल वापस आए.

अगले दिन उन्होंने हैलिकौप्टर से द्वीप के ऊपर उडान भरी. ऊपर से वह आईलैंड अद्भुत रूप से सुंदर लग रहा था. हैलिकौप्टर से ही उन दोनों ने समंदर के पानी के नीचे ?ारने के रूप में प्रसिद्ध अनोखे औप्टिकल भ्रम को देखा.

पूरा दिन आईलैंड पर समय बिता शाम को आशी होटल में आराम कर रही थी. चुनमुन थक कर सो गया. आज वह बेइंतिहा खुश थी. आज उसे एहसास हो रहा था कि उस ने अपनी जिंदगी में एक मुकाम हासिल कर लिया था. वह मंजिल पा ली थी जिस का सपना उस ने पिछले कुछ बरसों से खुली आंखों से देखा था.

पिछले 2 दिनों से रोजमर्रा की जिंदगी की आपाधापी से परे मौरिशस के इस

खूबसूरत टापू पर बेटे के साथ बेफिक्री से समय बिता उसे यों लग रहा था मानों उस का बचपन एक बार फिर लौट आया है.

गहराती रात के साथ पुराने दिनों के स्याह सायों ने उसे फिर से एक बार जकड़ लिया और अनायास आंखों की चिलमन में उस का गुजरा अतीत कतराकतरा तैरने लगा…

3 भाईबहनों में सब से छोटी संतान, मातापिता के दिल की धड़कन थी वह. अपूर्व रूप का खजाना ले कर जन्मी थी वह. बेहद शोख, चंचल, हंसमुख और बिंदास स्वाभाव था उस का. जहां बैठती हंसी की फुल?ाडि़यां छोड़ती रहती. संजीदगी और गांभीर्य उसे छू तक नहीं गया था. तनिक अपरिपक्व भी थी. अपने इंपल्सिव और जिद्दी स्वभाव के चलते अकसर घर में किसी न किसी बात पर अड़ जाती और जब तक अपनी जिद पूरी न करा लेती, चैन से न बैठती. मातापिता सोचते उम्र के साथ उस का यह बचपना अपनेआप दूर हो जाएगा लेकिन वह 19 साल की होने को आई थी पर उस का खिलंदड़ापन ज्यों का त्यों कायम था.

आशी को आज भी अच्छी तरह याद है वह दिन जब पहली बार उस ने अपने ऐक्स पति अभय को देखा था. उन दिनों कालेज यूनियन के चुनाव चल रहे थे. चुनाव में खुद को आजमाने वाले प्रत्याशियों के पक्षविपक्ष में धुआंधार भाषणों का दौर जारी था.

अभय स्वयं यूनियन के एक पद का दावेदार था. उस दिन दोपहर का वक्त था. तभी अभय ने डायस पर जा कर एक बेहद प्रभावशाली भाषण दिया. आशी उस के भाषण से बेहद प्रभावित हुई. ऊंची कदकाठी, साथ ही खासा सुदर्शन और प्रभावशाली व्यक्तित्व था उस का. वह उस की प्रभावी वक्तता पर फिदा हो गई थी. वह स्वयं भी यूनियन के चुनावों में अभय के विरोधी उम्मीदवार के रूप में खड़ी हुई थी लेकिन विरोधी होने के बावजूद वक्त के साथ दोनों नजदीक आए.

अभय अकसर आशी से कहता, ‘‘दोस्ती तभी धारदार होती है जब 2 विपरीत प्रकृति के व्यक्ति दोस्ती में बंधे हों.’’

शुरू से दोनों के मन में एकदूसरे के लिए कोमल भावनाएं थीं जो वक्त के साथ गहराती जा रही थीं. दोनों शिद्दत से एकदूसरे को पसंद करने लगे थे. जल्द ही ताउम्र साथसाथ रहने के वादे किए गए और फिर इजहारे मुहब्बत और इकरार हुआ.

एक दिन वाकायदा अभय ने अपने प्रगाढ़ दोस्तों के सामने एक गुलाबों का बुके आशी को देते हुए घुटनों पर बैठ कर उसे प्रोपोज किया.

ख्वाबोंखयालों की उम्र, उसे लेश मात्र भी एहसास नहीं हुआ कि शादी जिम्मेदारियों और प्रतिबद्धता का दूसरा नाम है. सो साथियों की व्हिसिल्स और तालियों के बीच 19 साल की कमसिन बाला ने प्रेमी का विवाह प्रस्ताव झिझकते, शरमाते स्वीकार लिया.

उस दिन के बाद से दोनों की युगल जोड़ी कालेज प्रांगण, कैंटीन, लाइब्रेरी, लैब्स में साथसाथ देखी जाती. दोनों की दिनोंदिन बढ़ती नजदीकियों की कालेज में चर्चा होने लगी थी और इस की उड़तीउड़ती खबर उसी के कालेज में पढ़ने वाली उस की बड़ी बहन शिवानी को लगी. शिवानी ने उस से इस विषय में पूछा और आशी ने निस्संकोच अभय के प्रति अपनी भावनाओं का बेधड़क खुलासा कर दिया. उस ने बिना पलक ?ापकाए अपनी अग्रजा की आंखों में आंखें डालते हुए कहा, ‘‘मैं अभय से बेहद प्यार करती हूं. दुनिया की कोई ताकत अब हमें एकदूसरे से अलग नहीं कर सकती.’’

कालेज में अभय की प्रतिष्ठा अच्छी न थी. शिवानी ने एकाध बार उसे

कालेज के पास लड़कियों को छेड़ने वाले गु्रप में शामिल भी देखा था. वह एक दादानुमा, बड़बोला, नेता टाइप लड़का था जो बेहिसाब पीनेपिलाने से भी गुरेज न रखता था. कई बार पी कर नशे में धुत्त कालेज भी आया था और विरोधियों ने जम कर उस की खिंचाई करी थी.

सो बहन के मन में ऐसी धूमिल छवि वाले लड़के के लिए शिद्दत का लगाव देख कर वह जैसे आसमान से गिरी. उस ने अपने स्तर पर बहन की आंखें खोलने की भरसक कोशिश की, ‘‘वह लड़का सही नहीं है. उस दिन देखा था, कैसे नशे में धुत्त भरे कालेज के सामने नौटंकी कर रहा था. फिर इतना हेकड़ और बदमिजाज भी है. लड़कियों तक से ढंग से बिहेव नहीं करता…’’

आशी ने स्वयं बहन की बात बीच में काट उस का मुंह बंद कर दिया, ‘‘बसबस दीदी, ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है. मैं ने फैसला कर लिया है, मैं उस से दोस्ती किसी हालत में नहीं तोड़ने वाली. मैं उस से प्यार करती हूं और यह कोई गुनाह नहीं.’’

शिवानी एक बेहद सम?ादार और उम्र से कहीं अधिक मैच्योर थी. उसे अभय जैसे बिगड़े हुए लड़के से नजदीकियां बढ़ाते देख वह बेहद उद्विग्न हो गई और उस ने आननफानन में यह बात उसी दिन घर आ कर पिता को बता दी.

अपनी प्रिय संतान के विषय में यह सबकुछ सुन उन के हाथों के तोते उड़ गए. वे बेहद क्रोधित हो उठे और उन्होंने उसे आड़े हाथों लिया, ‘‘अभय से फौरन रिश्ता तोड़ दे, अभी इसी वक्त नहीं तो तेरी खैर नहीं.’’

‘‘पापा, अभय मेरा सब से अच्छा दोस्त है. मैं उस की दोस्ती की बहुत कद्र करती हूं. मैं उस से यों बेबात रिश्ता कभी नहीं तोड़ूंगी. आप कहेंगे तो भी नहीं.’’

उन्हें उस पर बेहद क्रोध आया और उन्होंने आव देखा न ताव, उसे ताबड़तोड़ 2-3 थप्पड़ रसीद कर दिए.

वह उन की सब से दुलारी बेटी थी. बचपन से अब तक उन्होंने उसे पलकों में सहेज कर पाला था. आज तक उन्होंने उसे चांटा तो दूर की बात थी, कभी एक हलकीफुलकी धौल तक नहीं जमाई थी. सो पिता से यों अनापेक्षित ढंग से चांटे खा वह बुरी तरह बिफर गई और अदम्य क्रोध से पांव पटकते अवज्ञापूर्ण स्वरों में उन से बोली, ‘‘आप ने मु?ो मारा. मैं आप से कभी बात नहीं करूंगी.’’

उस पर पहली बार हाथ उठाने पर पिता किंचित ग्लानि से भर उठे लेकिन उन्होंने कमरे से बाहर निकलतेनिकलते उसे धमकी दे डाली, ‘‘आज के बाद तू उस लड़के से मिली तो तेरी टांगें तोड़ दूंगा.’’

आशी अपनाआपा खो बैठी थी. अकेले कमरे में वह सिसकती रही, सुबकती रही. उस वक्त उसे पापा और दीदी सब अपनी जान के दुश्मन लग रहे थे जो उस के और उस के प्यार के बीच ऊंची दीवार बन कर उठ खड़े हुए थे.

अभय से प्रेमप्रसंग पर घर भर उस का दुश्मन बन बैठा था. मातापिता, बहन और बड़े भाई सभी ने उसे एक स्वर में सम?ाने की कोशिश की, ‘‘यह लड़का तेरे लिए ठीक नहीं. अगर तूने उस से रिश्ता बनाया तो वह तेरा दामन कांटों से भर देगा. अच्छा यही रहेगा कि तू उस से पूरी तरह से रिश्ता तोड़ दे.’’

सभी ने उस से बात करना बंद कर दिया लेकिन आशा के विपरीत घर भर के विरोध ने अभय के प्रति उस के प्यार को एक नई ऊर्जा दी.

अगले दिन आशी अभय से उदास मन मिली और उसे घर में घटित संपूर्ण प्रकरण सुनाया.

आशी एक शरीफ घराने की उच्च शिक्षित मातापिता की संतान थी. उस की तुलना में अभय का खानदान कुछ भी न था. अभय के मातापिता का वैवाहिक मतभेदों और असामंजस्य के चलते बहुत पहले उस के बचपन में ही तलाक हो चुका था. पिता के अनुशासन के अंकुश के अभाव में वह गलत संगति में पड़ बिगड़ चुका था. आए दिन नईनई लड़कियों से दोस्ती बनाता. फिर उन से मन भर जाने पर उन्हें छोड़ देता. पिछले साल बीए के अंतिम वर्ष में फेल तक हो गया था. उस की मां की मुख्य बाजार में साडि़यों की छोटी सी दुकान थी. उस से बस गुजारा भर आमदनी होती.

आशी से नजदीकियां बढ़ने के बाद अभय सम?ा गया था कि आशी जैसी खूबसूरत और खानदानी लड़की उसे चिराग ले कर ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेगी. आशी के भोलेभाले, निश्छल और मासूम व्यक्तित्व ने उस पर गहरी छाप छोड़ी थी और वह उसे किसी कीमत पर खोना नहीं चाहता था.

उधर अपने प्रेमप्रसंग पर पिता के हाथों मार खा कर आशी को यों महसूस हो रहा था मानो वह इस भरी दुनिया में निबट अकेली है. कोई भी तो उस के साथ न था. उस के मन में पापा और बहन के विरुद्ध विद्रोह के भाव आ गए थे.

अगले ही दिन आशी ने अभय से कहा, ‘‘चलो शादी कर लेते हैं. अब अकेले तुम्हारे बिना रहना सजा सी लगती है.’’

अभय की पढ़ाई तक तो पूरी हुई नहीं थी. न ही कमाई का कोई साधन था. सो अपनी हालिया परिस्थितियां देखते हुए उस ने आशी को शादी की रट से डिगाने की भरपूर कोशिश की लेकिन स्वभाव से इंपल्सिव आशी कुछ सुनने को तैयार न थी.

घर पर उस से मां, पापा, बहन या भाई कोई भी बात नहीं कर रहा था. उसे दिनरात उन से ताने सुनने को मिल रहे थे. वह घर में भीतर ही भीतर घुट रही थी. शादी ही उस की उस घुटन से मुक्ति का एकमात्र जरीया थी.

सो एक दिन उस ने अभय को धमकी दे दी, ‘‘अगर तुम ने मुझ से फौरन शादी नहीं की तो मैं मम्मापापा की बात मान कर तुम से अपना रिश्ता तोड़ लूंगी और फिर कभी तुम्हारा मुंह नहीं देखूंगी.’’

मरता क्या न करता, अभय किसी कीमत पर आशी को खोना नहीं चाहती था. सो मजबूरन उस ने आर्य समाज मंदिर में अपनी शादी की तारीख बुक कर दी और नियत दिन दोनों शादी के बंधन में बंध गए.

शादी के बाद अभय उसे अपने घर ले गया. सास ने पहले तो उसे अपनी बहू मानने से इनकार कर दिया लेकिन जब अभय ने उन्हें आशी के साथ घर छोड़ने की धमकी दी तो उन्होंने बड़े बेमन से उन्हें घर में रहने की इजाजत दे दी.

नया घर, नए लोग, आशी नए परिवेश में भरसक सामंजस्य बैठाने की कोशिश कर रही थी लेकिन सास का रूखा व्यवहार उसे आहत करता. आशी उन्हें असमय गले पड़ी ढोल लगती. सो वे आए दिन उसे जलीकटी सुनाने से बाज न आतीं.

आशी ने शुरूशुरू में कुछ दिन तो सास के तानेउलाहने उन का लिहाज करते हुए सुने लेकिन कितने दिन सुनती?

सो अब सास जब भी उस से कलह करतीं वह भी उन्हें एक की चार सुनाती. घर में आए दिन दोनों के बीच तांडव मचता. अभय दोनों मां और बीवी के बीच पिसता.

अभय अब दुकान पर बैठने लगा था. विवाह के बाद मात्र साल भर थोड़ा सुकून से बीता. जितनी देर वह अभय के साथ अपने कमरे में रहती मानो खुशियों के पंखों पर सवार प्यार की तिलिस्मी दुनिया में गुम रहती लेकिन अभय के घर से जाते ही उसे अपनी लड़ाई वास्तविकता के कठोर धरातल पर बेहद शिद्दत से लड़नी पड़ती. उसे घर के काम करने की कतई आदत न थी लेकिन यहां ससुराल में सास पूरे घर का काम उस पर छोड़ कर दुकान चली जाती.

उसे पैसे की किल्लत हमेशा रहती. उस के पास कभी अपनी जरूरतें पूरी करने के पैसे भी न रहते. साड़ी की दुकान कोई खास न चलती. सो अभय भी पैसों की कमी में रहता तो आशी को पैसे क्या ही देता?

साल बीततेबीतते आशी उम्मीद से हो गई. गर्भावस्था की स्वास्थ्यगत परेशानियां, घर की जिम्मेदारियां, इन सब में आशी पिस रही थी.

विवाह कर मनचाहे जीवनसाथी के साथ सुखद वैवाहिक जीवन बिताने का सतरंगा ख्वाब हकीकत के धरातल पर दम तोड़ चुका था. उस की जिंदगी कदमदरकदम एक दुर्वह लड़ाई बन कर रह गई थी. एक हंसताखिलखिलाता बेफिक्र बिंदास जीवन संघर्ष बन कर रह गया था जहां थे तो महज ताने, उलाहने, कटुता और दोषारोपण.

पति का साथ एक  पत्नी के लिए बहुत बड़ा संबल होता है लेकिन उस से कुछ कहने पर अभय उस पर पलटवार करता, ‘‘तुम्हें ही शादी की इतनी जल्दी थी. अब भुगतो.’’

दुखी मन आशी को समझ न आता कि परिस्थितियों के इस निर्मम मोड़ पर वह क्या करे? धीरेधीरे पति से भी उस का मोह भंग होता जा रहा था.  जिस सुदर्शन, बांके चेहरे की छवि कभी उस के दिल की धड़कनें बढ़ा देती थी, वही चेहरा अब अपने स्वार्थी, असंवेदनशील और रूखे स्वभाव के चलते उस में उस के प्रति वितृष्णा पैदा करने लगा था.

बेहद कठिन परिस्थितियों में उस ने एक कमजोर बेटे को जन्म दिया. अब बेटे के खर्चों के लिए आशी को आए दिन सास के सामने हाथ फैलाने पड़ते जिस से वह सौसौ मौतें मरती. एक दिन उस के बेटे का मिल्क पाउडर खत्म हो गया और उस के पास उसे खरीदने तक के पैसे नहीं थे. सो घोर तनाव के क्षणों में उस ने अपनी बहन को फोन कर अपनी हकीकत से रूबरू कराया.

आशी की कहानी सुन कर पूरा घर सकते में आ गया. नाजों पली बेटी की त्रासद कहानी सुन उस के मातापिता मानो जीते जी मर गए. उस के पिता उसी वक्त उस के घर पहुंचे और उसे अपने साथ अपने घर ले आए.

मातापिता ने उसे सम?ाया कि अभय का वास्तविक स्वभाव जानने के बाद उस के साथ उस का कोई भविष्य नहीं, सो उसे उस से तलाक ले लेना चाहिए लेकिन आशी अभी तक तलाक के लिए अपने मन को सम?ा नहीं पाई थी. आखिर वह उस की पहली मुहब्बत था.

एक दिन आशी दोपहर के वक्त अपने कुछ कपड़े लेने ससुराल गई जहां पति का असली चेहरा उस के सामने बेनकाब हो गया.

अभय ने ही दरवाजा खोला था. वह अपने कपड़े लेने अपने बैडरूम में गई तो वहां एक लड़की को अस्तव्यस्त कपड़ों में अपने बैड पर देखा.

यह देख आशी पूरी तरह से टूट गई. अभय के इस विश्वासघात ने उस की कमर तोड़ दी. इस घटना के बाद उस के मातापिता ने उसे उस जैसे मूल्यहीन, खोखले इंसान से तलाक लेने की सलाह दी जिसे उस के प्यार और समर्पण की कोई कद्र न थी.

आशी को भी अब अभय के साथ अपना रिश्ता कायम रखने की कोई वजह नजर नहीं आ रही थी. सो उस ने पिता को तलाक की काररवाई की शुरुआत करने के लिए हामी भर दी. उस की बहन एमबीए कर एक एमएनसी में देहली में जौब करने लगी थी. उस का विवाह हो चुका था.

आशी के पेरैंट्स ने उसे सम?ाया कि उसे अब अपनी पढ़ाई पूरी कर अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करना चाहिए.

कभी जो आशी के दिल की धड़कन हुआ करता था, उस का असली चेहरा देख कर वह अवसाद में आती जा रही थी. उस की बेवफाई से उसे शिद्दत का सदमा पहुंचा था. सो जगह बदलने से उस का मन बहलेगा, यह सोच कर उस के पेरैंट्स ने उसे देहली शिवानी के पास भेज दिया जहां उस ने पूरी लगन से किसी प्रतिष्ठित कालेज से एमबीए करने के लिए राष्ट्रीय स्तर की एमबीए प्रवेश परीक्षा की तैयारी करनी शुरू कर दी.

दुख और अवसाद के उस दौर में पढ़ाई में मन लगाना आसान न था. उस की बहन उस का बहुत ध्यान रखती और उसे मानसिक संबल प्रदान करती. जीजा शौर्य भी उस का पूरापूरा ध्यान रखता.

पहले प्रयास में आशी कैट क्लीयर नहीं कर पाई लेकिन अपनी लगन और बहनबहनोई की सपोर्ट से वह दूसरे प्रयास में उस में बहुत बढि़या पर्सेंटाइल के साथ सफल रही. उसे देहली में ही बहुत नामचीन बिजनैस स्कूल में दाखिला मिल गया.

आशी के पेरैंट्स ने उस के बेटे की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली और उसे अध्ययन के लिए मुक्त छोड़ दिया.

जीवन में इतने संघर्ष के बाद स्टडीज में पूरी तरह से मन लगाना आसान न था. पुरानी कटु यादें उस का पीछा न छोड़तीं लेकिन शिवानी, शौर्य और मातापिता का सतत प्रोत्साहन उसे अपनी जिंदगी को नई दिशा देने को हर पल प्रोत्साहित करता. अपनी इच्छाशक्ति सहेज वह पूरे मनोयोग से स्टडीज करती.

एक बढि़या कैरियर बनाने की चाह में 2 वर्षों की एमबीए की अवधि भी किसी तरह ठहरतीठिठकती चाल से बीत गई. वह दिन उसे भुलाए न भूलेगा जिस दिन उसे काले चोगे में एमबीए की डिगरी मिली. एक स्वतंत्र सुनहरे भविष्य की गारंटी उस के हाथों में थी. बहुत जल्दी उसे एक नामी एमएनसी में देहली में ही मोटे पैकेज पर नौकरी मिल गई. उस के बाद उस ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. नियत अवधि में उस का तलाक हो गया.

बहनबहनोई के साथ रहने की वजह से आशी की जिंदगी बेहद आसान हो गई थी. जिंदगी एक निश्चित ढर्रे पर चलने लगी थी.

तभी आसमान में हवाईजहाज की तीव्र गड़गड़ाहट से उस की तंद्रा टूटी और वह अतीत से वर्तमान में वापस लौटी. रात के 12 बजे थे. बेटे को कलेजे से चिपका वह नींद के आगोश में समा गई.

अगले 2 दिन मौरिशस के विभिन्न टूरिस्ट स्पौट्स की सैर में बेहद व्यस्त बीते. वह वापस देहली आ गई.

देहली में जिंदगी हमेशा की तरह चल रही थी, उस का वर्क फ्रौम होम, चुनमुन का स्कूल, उस का होमवर्क और प्रोजैक्ट्स, घर गृहस्थी के सौ काम…

उस दिन संडे था. शाम को आशी, चुनमुन, शिवानी और उस के बहनोई शौर्य देहली के गार्डन टूरिज्म फैस्टिवल में गए थे. इस वार्षिक फैस्टिवल में दुनिया के विभिन्न हिस्सों से भिन्नभिन्न प्रकार के फूल, पौधों और बगीचे के उपकरणों को प्रदर्शित किया गया था.

उस दिन वहां औन द स्पौट पेंटिंग कंपीटिशन भी था. कंपीटिशन शुरू होते ही चुनमुन पार्क में बिछी दरी पर बैठा ही था कि तभी किसी ने बेहद उत्तेजित स्वर में उसे पुकारा. उस ने मुड़ कर देखा, उस के ठीक पीछे कुहू बैठी हुई थी. वह भी अपनी फ्रैंड को इतने दिनों बाद देख कर बेहद खुश हुआ.

कंपीटिशन के खत्म होने के बाद आशी ने कुहू के पापा का परिचय शिवानी और उस के पति शौर्य से कराया. दोनों परिवारों ने साथसाथ फैस्टिवल में प्रदर्शित खूबसूरत फूलों और पौधों को देखा.

चुनमुन और कुहू की चटरपटर अनवरत जारी थी. चुनमुन और कुहू की जिद पर दोनों परिवारों ने साथसाथ वहां फूड स्टौल्स पर अपनीअपनी पसंद का खाना खाया. दोनों परिवारों की अच्छीखासी दोस्ती हो गई.

‘‘पुलकितजी, आप से मिल कर बहुत खुशी हुई. अगले संडे आप दोनों हमारे घर लंच पर आइए. हमें बहुत अच्छा लगेगा,’’ शौर्य ने कुहू के पापा से कहा.

‘‘जी, जरूर आते हैं.’’

अगले संडे पुलकित और कुहू आशी के घर आए. आशी और शिवानी ने स्वादिष्ठ खाने की तैयारी की थी. डाइनिंगटेबल पर इधरउधर की बातों का सिलसिला चल निकला.

पुलकित ने बताया कि उस की पत्नी का देहांत कोरोना से उस की दूसरी लहर में हुआ था.

‘‘आशीजी आप अपनी सिस्टर के साथ रहती हैं इसलिए चुनमुन बोर नहीं होता होगा. मेरी कुहू तो हर समय बोर होने की शिकायत करती रहती है. खासकर छुट्टी के दिन.’’

‘‘हमारे घरों में कोई खास दूरी नहीं. छुट्टी के दिन आप इसे यहां छोड़ जाया करें. चुनमुन का मन भी लग जाया करेगा.’’

‘‘जी जरूर. आज आप के यहां बहुत अच्छा समय बीता. माधवी की मौत के बाद अच्छे घर के खाने के लिए मैं तरस जाता हूं. मेड तो अपने हिसाब से कुछ भी बना कर चली जाती है. बहुत बढि़या खाना बनाया आप लोगों ने. इतने स्वादिष्ठ खाने के लिए बहुतबहुत शुक्रिया आप दोनों का,’’ पुलकित ने आशी और शिवानी की ओर मुखातिब होते हुए कहा.

‘‘आज के खाने का क्रैडिट पूरी तरह से आशी को जाता है पुलकित. मेरी कंपनी में एक प्रोड्क्ट का गो लाइव चल रहा है. सो कल पूरी रात औफिस का काम किया. सुबह काम खत्म कर मैं तो सो गई. बस अभी आधा घंटा पहले उठी हूं.’’

शिवानी और उस के पति ने गौर किया, यह बात सुन कर पुलकित की आंखों में चमक आ गई और उस ने आशी की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘‘तो आप आलराउंडर हैं. कंसल्टैंसी के साथसाथ ऐक्सिलैंटकुकिंग भी. सैल्यूट टू यू.’’

पुलकित की इतनी मुखर प्रशंसा सुन कर आशी तनिक सकुचा गई और बोली, ‘‘पूरा

क्रैडिट मुझे नहीं जाता. मैं तो अपनी मेड को बस मसाले निकाल कर दे देती हूं. थोड़ा गाइड कर देती हूं. बाकी सभी चीजों की कुकिंग उस ने ही की है.’’

इस बार पुलकित हंसते हुए बोला, ‘‘तो

आप चीफशैफ हैं. भई अच्छे खाने का राज तो मसालों में ही छिपा होता है. क्रैडिट तो आप को ही जाना चाहिए.’’

कुछ देर और गपशप कर पुलकित और कुहू घर लौट गए.

समय के साथ पुलकित, आशी, शिवानी और उस के पति के मध्य घनिष्ठता बढ़ती गई.

एक दिन आशी शाम को अपने औफिस के सामने स्टारबक्स में कौफी पी रही थी कि पुलकित वहां आया. आशी को बैठा देख कर वह भी वहां बैठ गया और अपने लिए कौफी ले आया. दोनों कौफी पीते हुए बतियाने लगे, ‘‘आशी, चलो न मेरे घर. वह मेरा घर बस सामने ही है.’’

‘‘ओके, चलो. कुहू कहां है पुलकित?’’

‘‘कुहू एक वीक के लिए अपनी नानी के घर गई है.’’

‘‘ओह कुहू घर पर नहीं है. फिर मैं और किसी दिन चलूंगी आप के घर. मुझे एक बहुत जरूरी काम याद आ गया. मैं अभी निकलती हूं,’’ कह कर आशी तेज कदमों से वहां से निकल आई.

आज पुलकित की आंखों में अपने लिए मूक आमंत्रण देख उस का दिल तेजी से धड़क उठा था.

उसे यों जाता देख पुलकित तेज कदमों से उस के पीछेपीछे आया और उस ने उस से कहा, ‘‘आशी, ऐसा भी क्या जरूरी काम याद आ गया जो अभी आई और अभी चल दी? प्लीज आशी, थोड़ी देर तो रुको.’’

आशी ने देखा पुलकित की आंखों में हसरतों का समंदर हिलोरें मार रहा था. उस की सिक्स्थसैंस कह रही थी, आज पुलकित के इरादे नेक नहीं हैं.

‘‘नहीं पुलकित, आज नहीं मुझे कहीं अर्जैंट जाना है. फिर कभी आती हूं तुम्हारे घर,’’ यह कह कर वह लगभग दौड़ती हुई वहां से निकल गई.

आशी एक बेहद सिद्धांतवादी और शरीफ लड़की थी. पुलकित के इस मौन आमंत्रण ने उस के मन में हलचल मचा दी थी. मन ही मन वह भी पुलकित के प्रति आकर्षित थी लेकिन वह उस के साथ किसी रिश्ते में बंधने से डरती थी.

अगले फ्राईडे आशी फिर से दोपहर के वक्त औफिस ब्रेक में स्टारबक्स में अकेली बैठी कौफी पी रही थी कि एक बार फिर से पुलकित वहां आया.

इस बार वह सोच कर आया था कि वह आशी को प्रोपोज कर देगा. सो उस ने आते ही

बिना कोई भूमिका बांधे आशी से कहा, ‘‘आशी, पिछले कुछ दिनों से मैं तुम्हें बेहद पसंद करने लगा हूं. क्या तुम जिंदगी की राह में मेरी हमकदम बनोगी?’’

पुलकित के मुंह से यह अनापेक्षित प्रस्ताव सुन आशी तनिक चौंक गई. प्रारंभिक असहजता के बाद स्वयं को तनिक संयत कर बोली, ‘‘सौरी पुलकित, मैं तुम्हारा यह प्रोपोजल स्वीकार नहीं कर पाऊंगी. मैं ने फैसला कर लिया है, मैं अब कभी शादी नहीं करूंगी. मेरी पहली शादी एक डिजास्टर थी. अब मेरी जिंदगी बहुत अच्छी चल रही है. अब मैं अपनी जिंदगी में किसी भी तरह की कौंप्लिकेशंस नहीं चाहती. प्लीज, मेरे बात सम?ा. तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो और हमेशा रहोगे, लेकिन अगर तुम ने मु?ा से यह बात दोबारा कही तो तुम मेरी दोस्ती से हाथ धो बैठोगे.’’

‘‘आशी, तुम शादी के नाम से इतना क्यों बिदकती हो? अपने बच्चे तो पहले से ही इतने क्लोज हैं, उन के ऐडजस्टमैंट में तो कोई प्रौब्लम आनी नहीं. फिर तुम्हारे इनकार की वजह?’’

‘‘मैं बस लाइफ में और समझते नहीं

करना चाहती. मैं अपनी जिंदगी के इस दौर में बहुत खुश हूं. प्लीजप्लीज, मेरी बात सम?ाने की कोशिश करो. एक फैं्रड के तौर पर मैं तुम्हारी बहुत कद्र करती हूं. प्लीज, इस बात को यहीं खत्म कर दो.’’

इस के बाद अब पुलकित के पास और कुछ कहनेसुनने को बचा नहीं था. भारी दिल से उस ने आशी से विदा ली.

एक दिन शिवानी ने शौर्य से कहा, ‘‘क्योंजी, मुझे लगता है पुलकित आशी को पसंद करने लगा है. क्यों न दोनों की शादी करा दें?’’

‘‘आशी राजी हो जाए तो उस से बढि़या कोई बात ही नहीं हो सकती. पुलकित हर तरह से उस के लिए सूटेबल है. मुझे तो उस का स्वभाव बेहद पसंद है. उस से पूछ कर देखो.’’

‘‘ठीक है, आज आशी आए तो पूछती हूं.’’

शाम को आशी औफिस से आई तो शिवानी ने उस से पूछा, ‘‘आशी, पुलकित के

बारे में तेरा क्या खयाल है?’’

‘‘खयाल? किस ऐंगल से पूछ रही हैं आप?’’

‘‘अरे भई, उस से तेरी शादी के ऐंगल से.’’

‘‘शादी, दीदी, भूल कर भी उस से इस

बात का जिक्र न करना नहीं तो मुझ से बुरा कोई न होगा.’’

‘‘अरेअरे, तू शादी के नाम से यों इतना क्यों बिदक रही है? मुझे तो लगता है तुम दोनों ही एकदूसरे को पसंद करने लगे हो. यह मैं नहीं मेरी सिक्स्थ सैंस कह रही है और मेरी गट फीलिंग कभी गलत नहीं होती.’’

‘‘हां, हां, मैं कब कह रही हूं मैं उसे पसंद नहीं करती? मैं उसे बिलकुल पसंद करती हूं लेकिन महज एक फ्रैंड के तौर पर. उस से ज्यादा कुछ नहीं और उस से शादी तो मैं हरगिजहरगिज नहीं करूंगी. एक शादी कर के ही जिंदगी भर का सबक मिल गया मुझे. अब दूसरी शादी, न बाबा न, कतई नहीं. मुझे जिंदगी में और सम?ाते करने नहीं चाहिए. मैं जैसी हूं, बहुत खुश हूं.’’

‘‘क्यों  भला? आखिर दूसरी शादी में प्रौब्लम क्या है? अगर तेरी शादी हो जाए तो मम्मापापा कितने खुश होंगे.’’

‘‘वे मु?ा से अभी भी खुश हैं. हां, अगर आप को मेरे और चुनमुन के यहां रहने से कुछ समस्या है तो मैं अपना रहने की इंतजाम और कहीं कर लेती हूं.’’

आशी की यह बात सुन कर शिवानी को जबरन चुप होना पड़ा और यह मुद्दा दब गया.

तभी चुनमुन स्कूल से आ गया और शिवानी ने उस से हंसते हुए पूछा, ‘‘चुनमुन बेटा, मौसी को एक बात बताएगा?’’

‘‘यस मौसी, बताओ क्या बात है?’’

‘‘बेटा अगर आप की मम्मा और पुलकित अंकल की शादी हो जाए तो कैसा रहे?’’

मौसी की यह बात सुन कर चुनमुन अतीव रोष से चिल्ला पड़ा, ‘‘नहीं, नहीं, मुझे दूसरे पापा नहीं चाहिए. मुझे पुलकित अंकल अंकल के तौर पर ही चाहिए. मैं अपनी मम्मा को कुहू के साथ शेयर नहीं कर सकता. और हां, एक बात बताऊं आप को, कुहू भी अपने पापा को मु?ा से शेयर करने के लिए राजी नहीं है.’’

‘‘ओह बेटा नो.’’

‘‘यस, यस, बेटा, यस, आई ऐग्री विद यू. हम दोनों को अपनी लाइफ में कोई तीसरा नहीं चाहिए,’’ कहते हुए आशी चुनमुन को अपनी बांहों में भींच खिलखिला उठी.

वक्त का अंतहीन कारवां बढ़ता गया. चुनमुन और कुहू दोनों में दांत काटी दोस्ती है. दोनों के अलगअलग शहरों में रहने और अति व्यस्त शैड्यूल होने के बावजूद दोनों जब तक रात को एक बार वीडियो कौल पर एकदूसरे से बात न कर लें, उन का दिन पूरा न होता.

कुहू एक प्रतिष्ठित संस्थान से एमबीए कर के पिछले 3 वर्षों से एक बड़ी एमएनसी में

जौब कर रही है.

चुनमुन एस्ट्रोनामी में मास्टर्स कर चुका है और उस में पीएचडी कर रहा है. उस की पीएचडी बस खत्म ही होने वाली है.

दोनों की विवाह योग्य उम्र हो आई है. दोनों के पेरैंट्स यानी आशी और पुलकित दोनों के विवाह को ले कर बहुत चिंतित हैं. आए दिन दोनों चुनमुन और कुहू को अच्छेअच्छे मैच बताते हैं, लेकिन अभी तक दोनों में से किसी ने उस के लिए हामी नहीं भरी है.

दीवाली की छुट्टियों में दोनों बच्चे अपनेअपने घर आए हैं. आज धनतेरस है. शाम को पुलकित और कुहू शिवानी के घर आए हैं.  शिवानी, शौर्य, आशी, चुनमुन, पुलकित और कुहू दीवाली के स्वादिष्ठ पकवानों का लुत्फ उठाने के बाद घर के बड़े पोर्च में पटाखे फोड़ रहे हैं. पटाखे फोड़तेफोड़ते रात के 12 बजने को आए.

तभी पुलकित ने कुहू से कहा, ‘‘बिटिया,

12 बज गए. घर नहीं चलना क्या?’’

‘‘अरे अंकल, आज तो दीवाली है. थोड़ी देर और रुकिए न, प्लीज. कितने दिन बाद तो आप लोगों से मिलना हुआ. अभी तो आप लोगों से मन भी नहीं भरा,’’ चुनमुन ने कहा. फिर चुनमुन ने कुहू से कहा, ‘‘कुहू, आज अमावस्या है. आज मून के आसमान में नहीं होने की वजह से स्टार गेजिंग और बेहतर हो पाएगी. तुम चलो छत पर. मैं टैलिस्कोप ले कर आता हूं.’’

‘‘अरे वाह, तुम्हारे पास टैलिस्कोप भी है? कब खरीदा यह तो बड़ा महंगा आया होगा?’’ पुलकित ने चुनमुन से पूछा.

‘‘अंकल, यह मेरा इस साल का बर्थडे गिफ्ट है, कुहू की तरफ से.’’

‘‘ओह, कुहू ने दिया तुम्हें, वैरी गुड. और हां कुहू, अब तुम लोग स्टार गेजिंग करोगे तो हम दोनों घर कब जाएंगे? 12 बज चुके हैं बेटा, स्टार गेजिंग कल कर लेना प्लीज.’’

‘‘अरे अंकल, हमारा दिन तो रात के 12 बजे से शुरू होता है. हम दोनों रात के 12 बजे के बाद ही एकदूसरे को वीडियो कौल करते हैं. ऐसा करिए, आप आज हमारे घर पर रुक जाइए न. मम्मा, अंकल और कुहू के सोने का इंतजाम गैस्टरूम में करा दीजिए न प्लीज. मम्मा, मौसी और मौसाजी, आप लोग जा कर सो जाइए, आप लोग थक गए होंगे,’’ कहते हुए दोनों बच्चे वहां से फर्र हो गए.

यह देख पुलकित बोल पड़ा, ‘‘अब ये छत पर चढ़ गए तो 2-3 घंटों से पहले नहीं उतरने वाले.’’

‘‘बिलकुल सही कह रहे हो पुलकित. चलो, फिर तो मैं गैस्टरूम में तुम दोनों के सोने का इंतजाम कर देती हूं,’’ कहते हुए आशी उठने ही वाली थी कि पुलकित ने कहा, ‘‘आशी, मैं इन दोनों बच्चों की आंखों में जो पढ़ पा रहा हूं क्या तुम भी देख पा रही हो?’’

‘‘आंखों में? क्या भला?’’

पुलकित की इस बात पर शिवानी उचकते हुए मुसकराती बोल पड़ी,

‘‘आशी से क्या पूछ रहे हो पुलकित, यह तो हमारी निरी बेवकूफ, आंखों की अंधी है. मैं सम?ा रही हूं, तुम क्या कहना चाह रहे हो. तुम दोनों की शादी की बात कहना चाह रहे हो न, इफ आई एम नौट रौंग?’’

‘‘बिलकुल शिवानी, मैं यही कहना चाह रहा हूं. आशी, दोनों बच्चों में जबरदस्त बौंडिंग है, यह तो तुम मानोगी न?’’

‘‘हां, उस से तो कतई इनकार नहीं लेकिन दोनों शादी के लिए तैयार हो जाएंगे, मुझे इस में डाउट है.’’

इस पर शिवानी और पुलकित, एकसाथ बोल पड़े, ‘‘क्यों डाउट है भई?’’ और दोनों ठठा कर हंस पड़े.

फिर पुलकित ने कहा, ‘‘यह तो साफसाफ नजर आ रहा है, दोनों का एकदूसरे के लिए कमिटमैंट और डिवोशन, दोनों की फ्रैंडशिप और बौंडिंग है ही जबरदस्त. फिर और बचा ही क्या? शादी फ्रैंडशिप, बौंडिंग, कमिटमैंट और डिवोशन का ही तो दूसरा नाम है. है या नहीं? मैं ने अपने सर्किल में कितने क्लोज फ्रैंड्स को शादी के रिश्ते में बंधते हुए देखा है. बस हमें इन दोनों को यह आइडिया देने की जरूरत है, मैं हंड्रेड परसैंट श्योर हूं, दोनों ही शादी के लिए मान जाएंगे.’’

इस पर आशी तनिक सोचते हुए बोल पड़ी, ‘‘आई एम नौट श्योर पुलकित… तुम और

दी कह रहे हैं तो ठीक ही होगा. चलो, कल मैं चुनमुन से बात कर के देखती हूं और पुलकित, तुम कुहू के मन की थाह लो.’’

‘‘बिलकुल… बिलकुल… मैं कुहू से कल ही बात करता हूं.’’

‘‘तो चलो, इस बात पर मुंह मीठा हो जाए. लो पुलकित, यह बेसन का लड्डू खाओ और आशी तुम भी,’’ शिवानी ने दोनों का मुंह मीठा करा मुदित मन खुद अपने मुंह में लड्डू भर लिया.

फिजा में लड्डुओं की मिठास के साथ खुशियों के इंद्रधनुष का सतरंगा उजास फैल गया था.

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