Hindi Love Story: उन के वैवाहिक जीवन की शुरुआत किसी मधुर रागिनी सी थी. रितु और रोहन दोनों ही प्रतिष्ठित पदों पर कार्यरत, परिपक्व और एकदूसरे के प्रति स्नेहिल भावनाओं से भरे हुए. उन की अरेज्ड मैरिज थी और दोनों परिवारों ने इस जोड़े की शुरुआत को बड़ी उम्मीदों और उत्साह के साथ देखा. शुरुआती 4 वर्ष प्रेम, उत्साह और आपसी सामंजस्य में बीते.

मगर समय के साथ जीवन की लय धीरेधीरे बदलने लगी. अब वे अकसर एकदूसरे से कुछ खिंचेखिंचे से रहने लगे थे. जहां कभी बातों की बहार होती थी, वहीं अब चुप्पियों का सन्नाटा पसरा रहने लगा था.

अब जीवन की व्यस्तताएं उन के घर की दीवारों पर अपनी थकी हुई. परछाइयां छोड़ने लगी थीं. सुबह से रात तक मीटिंग्स, डैडलाइंस और मोबाइल स्क्रीन पर टिकी आंखें.

रितु भी अपनी नौकरी में व्यस्त रहती थी और रोहन की तरह ही उस का दिन भी योजनाओं, प्रेजैंटेशंस और कार्यभार में बीतता. इन सब ने रितु और रोहन की दिनचर्या को जैसे मशीन में बदल दिया था. सहज संवाद की जगह अब अनकही थकावट ने ले ली थी. रितु जब बात करने की कोशिश करती तो रोहन बस ‘हूं,’ ‘हां’ में जवाब दे कर चुप हो जाता. कभी जो शामें साथ बीतती थीं, वे अब मोबाइल और लैपटौप की रोशनी में धुंधला जातीं.

रिश्तों की गरमाहट अब धीरेधीरे ठंडी पड़ने लगी थी मानो किसी पुराने अलाव की बु झती हुई राख, जिस में कभी चिनगारियां दहका करती थीं. रितु भी रोहन जितनी ही मेहनत करती थी, उतना ही थकती थी लेकिन उस के हिस्से में औफिस से लौटने के बाद भी रसोई, सफाई और पूरे घर की जिम्मेदारियां आती थीं. थकी हुई आंखें, बो िझल कंधे और पीठ में उतरती हुई थकान लिए वह हर दिन घर को सहेजती और हर दिन मन ही मन बस इतना चाहती थी कि रोहन कुछ पल उस के पास बैठे कुछ कहे, कुछ सुने.

मगर रोहन अकसर चुपचाप अपने लैपटौप या मोबाइल में डूबा रहता जैसे उस के पास सब के लिए वक्त था बस रितु के लिए नहीं.

पर रितु को सब से ज्यादा जो चुभता था वह थी वह खामोशी जो हर शाम कमरे की दीवारों पर उतर आती थी.

एक छोटा सा सवाल जो कभी उस का सब से बड़ा सहारा लगता था, ‘‘आज दिन कैसा रहा?’’

अब कई दिनों से उस सवाल की कोई आवाज ही नहीं आती थी. जैसे उस का दिन अब किसी की परवाह से बाहर हो गया था जैसे वह हर रोज अपने भीतर ही लौट जाती थी. अपनी बातें, अपने एहसास सब अधूरे रह जाते.

धीरेधीरे यह चुप्पी ही उन के रिश्ते को भीतर से खोखला करने लगी थी. थकावट अब केवल शरीर की नहीं रही यह अब दिल और संवाद दोनों को थकाने लगी थी.

उस पर समाज की अनकही अपेक्षाएं भी जैसे रोज एक नया भार बन कर उतरतीं, ‘‘अब बच्चा कब करोगे?’’

यह सवाल हर मुलाकात का अपरिहार्य हिस्सा बन गया था.

‘‘इतना कमा रहे हो, अब तो गाड़ी बदल लो, मकान बड़ा ले लो…’’ ये बातें जैसे प्यार और सम झदारी की जगह लेती जा रही थीं जैसे जिंदगी अब ‘साथ’ नहीं, एक ‘परियोजना’ बनती जा रही थी, जिस में हर चीज मापी जा रही थी सिवा उस खामोशी के जो बीच में पसरी थी.

हर ओर से दबाव था, हर किसी की अपनीअपनी अपेक्षाएं. एक आदर्श पत्नी, एक आदर्श बहू बनने की अनकही, लेकिन तीव्र मांगें. इन सब के बीच रितु खुद को हर दिन थोड़ा और खोती जा रही थी. उसे लगता मानो वह अपने ही जीवन में कहीं पीछे छूट गई है जैसे उस का अस्तित्व अब सिर्फ इन तमाम भूमिकाओं के नीचे दबा कोई धुंधला सा नाम रह गया हो.

वह रितु जो कभी सपने देखती थी, हंसती थी, खुल कर बोलती थी अब कहीं गुम हो चुकी थी.

शहर में वे दोनों नएनए आए थे और रिश्तेदार या पुराने दोस्त आसपास नहीं थे यही अकेलापन और अनजान माहौल रितु और रोहन की जिंदगी में अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक दबाव डाल रहा था.

परिवार की भूमिका भी कम निर्णायक नहीं थी. रोहन की मां जो पारंपरिक सोच की थीं, रितु की स्वतंत्रता और उस की निर्णयक्षमता को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रही थीं. और रितु? उस ने अपने मांपिता का घर, वह परिचित संसार छोड़ कर इस नए घर में कदम रखा था. लेकिन यहां कोई आत्मीय कोना, कोई अपनापन उसे ठौर नहीं दे सका. हर दिन उसे यही लगता कि उसे खुद को बारबार साबित करना है कि वह योग्य है, स्वीकार्य है और इस घर का हिस्सा बनने के काबिल है मानो हर सांस भी स्वीकृति मांगती हो.

धीरेधीरे संवाद की जगह खामोशियां लेने लगीं. शब्द अब बचे नहीं. वे या तो थक गए थे या डर गए थे. एकदूजे की आंखों में अनगिनत प्रश्न थे, लेकिन होंठों पर जमी थी एक जानीपहचानी चुप्पी.

यह कोई सामान्य मौन नहीं था. यह तो जैसे एक मरघट सा सन्नाटा था, जहां न कोई सुनता, न कोई कहता, बस मन की चीखें दीवारों से टकरा कर वापस लौट आती थीं और फिर भीतर ही कहीं गूंजती रहती थीं.

रोहन इस बदलते भाव को महसूस तो करता था पर उस ने कभी इसे सम झने की जरूरत नहीं सम झी. उसे लगता वह तो अपनी ओर से सबकुछ ठीक कर रहा है नौकरी, जिम्मेदारियां, मां की सेवा पर रितु वह तो अकेली पड़ गई थी.

अपने सारे रिश्ते, सारी दुनिया छोड़ कर वह सिर्फ रोहन के भरोसे आई थी. उसे सिर्फ उसी से उम्मीद थी. लेकिन हर उम्मीद चुप्पियों में खोती जा रही थी. उस ने कई बार बात करने की कोशिश की पर हर बार जवाब वही मिलता.

‘‘तुम हर बात को इतना बढ़ाचढ़ा कर क्यों कहती हो, रितु? थोड़ा तो समायोजन जरूरी होता है न?’’ और समायोजन करतेकरते वह खुद में सिमटती चली गई. एक खोल में, जहां न रोशनी थी, न आवाज. रितु की चुप्पी अब दीवार बनती जा रही थी अदृश्य, लेकिन भारी और रोहन उस दीवार की इस ओर एक अजीब सी थकान और खालीपन में धीरेधीरे खुद को खोता जा रहा था. न वह कुछ सम झ पा रहा था, न ही किसी से कुछ कह पाने की स्थिति में था.

एक शाम जब वह घर लौटा तो उस की आंखों में वही ठहराव था जैसे किसी सूखते तालाब की थकी दरारें जो चुपचाप भीतर तक रिसती जा रही हों. भीतर कुछ दरकने लगा था. लेकिन अब भी दोनों चुप थे.

कपड़े बदले बिना ही रोहन सीधे सोसाइटी के पार्क में आ बैठा. तन से ज्यादा मन थका हुआ था. पास की बैंच पर वही बुजुर्ग पहले से मौजूद थे जिन से कुछ पुरानी मुलाकातें हो चुकी थीं. उन की मुसकान में उम्र का ठहराव था और अनुभव की ठंडी छाया भी.

बुजुर्ग ने अपनी छड़ी एक ओर टिकाई, रोहन की आंखों में  झोंका और धीमे से बोले, ‘‘बेटा, यह थकान बदन की नहीं लगती. यह तो किसी ऐसे सवाल का बो झ है जो अब तक जवाब नहीं बन पाया.’’

रोहन कुछ पल तक चुप रहा. आंखें जमीन पर टिकाए हुए, फिर बोला, ‘‘शायद आप ने सही पहचाना. सबकुछ होते हुए भी जैसे कुछ भी नहीं है. कोई रिक्तता है जो भरती ही नहीं जैसे कोई दरार है दिल में, जिस में जितना भरोसा डालो, रिस जाता है.’’

बुजुर्ग ने नजरें आसमान की ओर उठाईं, फिर धीरे से बोले, ‘‘एक जमाना था बेटा जब मैं भी यही सोचता था कि सबकुछ है मेरे पास. पत्नी थी, घर था, बच्चा भी पर फिर एक दिन वह चली गई और तब सम झ आया घर तो था पर उस में वह नहीं थी और उस के बिना सबकुछ हो कर भी, सबकुछ अधूरा था. कभी पूछा ही नहीं कि वह क्या सोचती है. क्या महसूस करती है. बस सम झाता रहा जैसे हम मर्द करते हैं न.

हम सुनते कहां हैं बेटा? हम सिर्फ सम झा देते हैं और सोचते हैं कि बात खत्म हो गई पर सामने वाला हर सम झाइश में थोड़ा और चुप हो जाता है. धीरेधीरे वह ख़ुद से बात करना बंद कर देता है और फिर तुम से बात करना वह तो बहुत दूर की बात हो जाती है.’’

रोहन की आंखें कहीं गहराई में डूबती चली गई जैसे किसी सूने कुएं में  झांक रहा हो, जहां अंधेरा भी अपने उत्तर खोजता हो.

बुजुर्ग ने एक क्षण की चुप्पी के बाद धीरे से जोड़ा, ‘‘अगर कोई रोज थोड़ा कम बोलने लगे तो यह मत सम झना कि सब ठीक है. कभीकभी किसी की खामोशी, किसी की चीख से भी ज्यादा तेज होती है. बस सुनने वाला चाहिए. सच में सुनने वाला.’’

उस रात पहली बार रोहन देर तक जागा. बुजुर्ग की बातों के बाद उस के भीतर जैसे कोई दरवाजा खटका हो. भीतर की खामोशियों में कोई दस्तक सी गूंज रही थी. एक बेचैनी थी जो नींद से कहीं ज्यादा जरूरी लगने लगी थी.

कुछ ही दिन बाद जैसे शरीर ने उस मन की थकान को पकड़ लिया. रोहन की तबीयत बिगड़ गई. तेज बुखार, बदन दर्द, हफ्तों की अनदेखी थकान एकसाथ लिपट गई उस से. उस की आंखों में जलन थी और मन में चुप्पी.

रितु ने बिना एक शब्द कहे उस की देखभाल शुरू कर दी.

दवाइयां, भाप, गरम सूप. रात में उठ कर माथा टटोलना. उस के हर स्पर्श में एक पुरानी सी ममता लौट आई थी जैसे वो नाराज नहीं थी.

इधर बिस्तर पर पड़े रोहन के पास अब समय ही समय था और एक गहरी, बेचैन खामोशी जो भीतर से कुरेदती रही, पूछती रही, ‘‘कब आखिरी बार तुम ने उसे सुना था बिना टोके?’’

बीमारी के उन दिनों में रोहन को अपने भीतर  झांकने का बहुत समय मिला.

बुजुर्ग की बातें रहरह कर उसे मथती रहीं जैसे वह खुद से भाग नहीं पा रहा था. उसे हर वह क्षण याद आने लगा जब रितु कुछ कहना चाहती थी पर वह फोन में व्यस्त होता था या किसी मीटिंग में उल झा होता था या जब उस ने अनसुना करते हुए कहा था, ‘‘छोटीछोटी बातों में क्यों उल झी रहती हो?’’

अब समझ आने लगा शब्दों को अनसुना करना, कभीकभी रिश्तों को अनदेखा कर देने जितना ही दर्दनाक होता है.

एक सवाल उस के भीतर बारबार गूंजता रहा, ‘‘क्यों हमेशा कोई हादसा, कोई गिरावट या कोई बीमारी ही हमें अपनों की अहमियत का एहसास कराती है?’’

अब सम झ आ रहा था कि रिश्ते जब अपने मौन में डूबते हैं तब अकसर जीवन कोई  झटका दे कर उन्हें फिर सुनने लायक बना देता है.

वह सम झ रहा था पर देर से. बहुत देर से.

मनोविज्ञान कहता है कि मानव मन तब तक दूसरों की पीड़ा या असुविधा को महसूस नहीं करता जब तक वह स्वयं उस अनुभव से न गुजरे. और रोहन के साथ भी यही हुआ.

जब उस का शरीर असहाय हो गया, जब पलंग उस का ठिकाना बना और रितु की परछाईं उस का सहारा तब पहली बार उस ने रितु के त्याग, स्नेह और मौन समर्पण की गहराई को, उस की नजर, उस के स्पर्श और उस की रातों की थकान को महसूस किया.

हर रात जब रितु उस के सिर पर ठंडी पट्टियां रखती, तो रोहन को लगता जैसे उस की हथेलियां कुछ कहती हैं, ‘‘तू चाहे कुछ न कह, मैं तु झे अब भी उसी प्रेम से देखती हूं, जिसे तू कभी जान ही न सका.’’

उस के स्नेह ने न कोई शर्त रखी, न कोई शिकवा बस एक मौन आशीर्वाद था जीवित और अनमोल.

उस ने जाना मनुष्य अकसर जीवन की सचाइयों को तब तक नहीं सम झता, जब तक वह शारीरिक या मानसिक संकट से न गुजरे और यही वह क्षण होता है जब हम सब से कमजोर होते हैं और उसी समय हम अपने रिश्तों, अपने परिवार और स्वयं को एक नए दृष्टिकोण से देखना शुरू करते हैं.

वह जो हम से दूर लगता था, वह सब से करीब होता है पर हमें देखने की आंख और महसूस करने का समय तब आता है जब हम खुद टूटने लगते हैं.

जीवन की व्यस्तता और आदतों की जड़ता उसे इस कदर जकड़ चुकी थी कि वह रिश्तों की दरारों को या तो देख नहीं पाया या देख कर भी अनदेखा करता चला गया.

रोजमर्रा की आपाधापी में वह ठहरना, सोचना, महसूस करना सब भूल चुका था. जब तक यह बीमारी का  झटका न आया, उसे अपनी ही चुप्पियों की गूंज सुनाई न दी. लेकिन अब वह क्षण आ चुका था और वही अनुभव उसे भीतर तक  झक झोर रहा था जैसे किसी सच के बंद दरवाजे पर पहली बार दस्तक पड़ी हो.

हर खामोशी अब एक सवाल थी और हर जवाब रितु की आंखों में था, जिसे वह पहले कभी पढ़ना ही नहीं चाहता था.

रोहन को अब महसूस हो रहा था वह रितु, जिसे वह नजरअंदाज करता रहा, जो उस की बातों में पीछे रह जाती थी, जिस के मौन को वह कमजोरी सम झता था आज उस की सब से बड़ी ताकत बन कर खड़ी थी.

उस की बीमारी की रातें रितु की जागती हुई दुआओं से संजीवनी पा रही थीं. बीमारी के उस सप्ताह में उसे बारबार उस बुजुर्ग की बातें याद आईं, ‘‘हम सुनते कहां हैं बेटा? हम बस सम झा देते हैं और सोचते हैं कि बात खत्म.’’

अब उसे सम झ आ रहा था. रितु की हर चुप्पी में वह एक कहानी पढ़ता रहा जो शब्दों में कभी कही नहीं गई थी पर सेवा और प्रेम में हर रात दोहराई जाती रही.

एक दिन जब बुखार कुछ हलका पड़ा, रोहन की नजर रितु पर पड़ी. थकी हुई थी वह, लेकिन चेहरे पर एक जबरदस्ती की मुसकान सजाए थी.

रोहन का गला भर आया. धीरे से बोला, ‘‘तुम थक गई होगी न? मैं ने कभी महसूस ही नहीं किया कि तुम रोज क्याक्या  झेलती रही.’’

रितु चौंकी जैसे कुछ टूटा हो और जुड़ भी गया हो पर बोली कुछ नहीं. बस निगाहें  झुका लीं.

वह शाम जब शब्द नहीं बोले, मौन बोला. बिजली के चमकते उजाले में 2 चाय के कप रखे थे सामने पर उस दिन किसी ने चाय नहीं पी.

रोहन ने रितु का हाथ अपने हाथ में लिया न कोई लंबा भाषण, न कोई सफाई, बस एक मौन जिस में वर्षों की दूरी क्षणभर में सिमट आई.

‘‘मु झे माफ कर सको, तो करना रितु,’’ उस की आवाज धीमी थी, पर सच्ची, ‘‘अब से हर मोड़ पर मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूंगा सिर्फ एक पति के तौर पर नहीं, एक साथी की तरह जो तुम्हें सुनेगा, सम झेगा और तुम्हें फिर से खोने नहीं देगा.’’

रितु की आंखें भर आईं लेकिन होंठों पर जो मुसकान आई वह पहली बार भीतर से निकली थी और उस में एक विश्वास था जो सिर्फ कहे हुए शब्दों से नहीं, सम झे गए मौन से पैदा होता है और यही वह रात थी, जिस ने रिश्तों की चुप परतों को धीरेधीरे खोलना शुरू किया.

रोहन ने रितु का हाथ थामे रखा और पहली बार अपने मन की दीवारों को गिरते देखा.

सुबह की पहली किरण खिड़की से  झांकी और रितु ने हलके से मुसकरा कर कहा,

‘‘कभीकभी हम घर में होते हैं पर उस में अपनी जगह नहीं होती.’’

रोहन ने धीरे से जवाब दिया, ‘‘अब तुम्हारा हर कोना तुम्हारा है रितु क्योंकि तुम ही हो जो इस घर को घर बनाती हो.’’

जिंदगी कभीकभी बीमारियों के रास्ते हमें वह सबक सिखाती है जो हम हंसतेखेलते हुए भूल चुके होते हैं.

उस रात रोहन और रितु ने शब्दों से नहीं संवेदनाओं से एक नया अध्याय शुरू किया और जैसे ही नींद ने रितु की आंखों को छुआ, रोहन ने अपने मन में एक चुप वादा दोहराया, ‘‘अब मैं हर दिन सुनूंगा तुम्हें, हर दिन समझूंगा तुम्हें क्योंकि अब मैं जानता हूं प्यार का मतलब सिर्फ साथ होना नहीं बल्कि उसे महसूस करना है हर खामोशी, हर मुसकान, हर त्याग में.

लेखक- विजय आनंद

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