Sad Story in Hindi: आरोही  हरिता और विहाना ने आज फैशन स्ट्रीट से कुछ शौपिंग की थी. सुबह से ही मौसम अच्छा था और संडे था. जब तीनों सो कर उठीं, मन हुआ, कहीं बाहर चला जाए, औनलाइन और्डर करके मन भर चुका था. आज मन हुआ था कि थोड़ा बाहर निकला जाए. तीनों ही लड़कियां देखने में अच्छी, सभ्य और आज के भागतेदौड़ते जीवन में भी आराम से अपने कैरियर पर फोकस करने यूपी से यहां मुंबई चली आई थीं. उन की उम्र 25 के आसपास थी. अब इस उम्र में घर से दूर थीं, अकेली थीं, बौयफ्रैंड तो होने ही थे, सो इन के भी थे. तीनों ने अपने बौयफ्रैंड्स से भी साथ चलने के लिए पूछा था पर तीनों ने शौपिंग के नाम से हाथ खड़े कर दिए थे.

तीनों लड़कियां अब बांबे सैंट्रल से वापस बोरीवली जाने के लिए फास्ट एसी लोकल में बैठीं थीं. तीनों को बैठने के लिए सीट्स मिल गई थीं, अब उन का ध्यान, अपने सामने बैठी हुई एक महिला पर था जिस की उम्र करीब 30-35 के आसपास  थी, उस की गोद में एक नवजात था. महिला कुछ गंभीर और परेशान सी थी पर तीनों लड़कियों से बीचबीच में बातें करने लगी.

आरोही ने पूछा, ‘‘यह लड़की है या लड़का?’’

‘‘लड़की.’’

‘‘कितने महीने की है? बहुत छोटी लग रही है.’’

‘‘2 महीने की है.’’

‘‘इस का नाम क्या है?’’

‘‘अभी रखा नहीं है.’’

महिला देखने में बहुत आम से घर की लग रही थी. उस ने हलके ग्रे रंग का सूट पहना हुआ था. उस पर गुलाबी रंग का दुपट्टा. उस का रंग सांवला था. बच्ची को उस ने काफी लपेट रखा था. आसपास के लोगों की इस वार्त्तालाप में कोई खास रुचि थी नहीं. वैसे भी मुंबई की ट्रेन में थकेहारे लोगों की इसी बात में रुचि होती है कि कब उन का सफर खत्म हो और वे घर पहुंचें. बोरीवली स्टेशन आया तो तीनों लड़कियों के साथ वह महिला भी बच्ची को लिए उतर गई और अचानक उसे याद आया, ‘‘अरे. मेरा बैग तो सीट के नीचे ही रह गया, आप लोग जल्दी से एक मिनट बच्ची को पकड़ लो, मैं भाग कर अपना बैग ले आऊं.’’

उस की रिक्वैस्ट करने का ढंग इतना स्वाभाविक था कि तीनों लड़कियों के हाथ बच्ची को लेने उठ गए. लगभग तीनों ने ही बच्ची को पकड़ लिया, ‘‘आप जल्दी से बैग ले कर आओ.’’

महिला हड़बड़ाती सी ट्रेन में वापस चढ़ गई. तीनों अपनेअपने कंधे पर टंगे अपने बैग को संभालती हुई एक किनारे हो गईं. इस समय बच्ची को हरिता ने ढंग से पकड़ लिया था, ‘‘लाओ, इसे मु झे दो. मैं ने अपने भानजे, भतीजे को अपनी गोद में कई बार पकड़ा है. तुम लोग कहीं गिरा न दो.’’

अचानक तीनों ने देखा, ट्रेन चलने वाली है और उस महिला का कहीं अतापता नहीं है. विहाना ट्रेन की तरफ भाग पड़ी, ट्रेन देखते ही देखते उन की आंखों के सामने से गुजर गई. वह अरे… अरे… कहती रह गईं और उस के भागने से न कुछ होना था, न हुआ. तीनों एकदूसरे का मुंह देखती रह गईं.

विहाना ने घबरा कर कहा, ‘‘यह क्या हो गया, यार. अब क्या करें?’’

आरोही ने कहा, ‘‘चलो, जीआरपी (सरकारी रेलवे पुलिस) स्टेशन चल कर देखते हैं. उन्हें बताते हैं.’’

जीआरपी रेलवे परिसर और ट्रेन में होने वाले अपराधों को देखती है. तीनों पसीनापसीना हो रही थीं. जीआरपी जा कर वहां इंस्पैक्टर संजय कदम को पूरी बात बताई जिन्होनें पूरी बात ध्यान से सुनी, गौर से तीनों को पुलसिया नजरों से देखा, फिर कहा, ‘‘सीसीटीवी चैक कराता हूं. आप लोग महिला की पहचान करो.’’

फिर किसी को आवाज दे कर पूरी बात बताई और सीसीटीवी चैक करने के लिए कहा. आरोही, हरिता और विहाना भी उस आदमी के पीछेपीछे चली गईं. बच्ची अभी तक हरिता ने संभाल रखी थी. सीसीटीवी की फुटेज में तीनों ने उस महिला को पहचाना पर अब उस ने सूट नहीं, साड़ी पहन ली थी. इस का मतलब वह साड़ी लपेट कर उन के सामने से चली गई थी, वह भागती सी जाती दिखी थी. स्टेशन से बाहर जा कर वह कहां गई, यह पता करना आसान नहीं था. संजय उन्हें वापस अपने औफिस में ले गया. लड़कियां अब थक भी गई थीं और घबरा भी गई थीं.

हरिता ने कहा, ‘‘संजय साहब. अब मैं कब तक बच्ची को पकड़ी रहूंगी. आप इस का इंतजाम कर दीजिए कि इस का क्या करना है. इसे किसी अनाथालय में छुड़वा देंगें?’’

‘‘क्या मैं आप तीनों के बारे में जान सकता हूं? मु झे अपना परिचय दे दीजिए.’’

‘‘मैं हरिता, एक मोबाइल कंपनी में काम करती हूं.’’

‘‘मैं आरोही हूं, एक फार्मा कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर हूं.’’

‘‘मैं विहाना एक फाइवस्टार होटल में बैंकेट मैनेजर हूं. हम तीनों बोरीवली में ही एक फ्लैट शेयर करते हैं और हम तीनों ही यूपी से हैं.’’

संजय ने आसपास एक नजर डाली और धीरे से कहा, ‘‘मैं इस बच्ची का अनाथालय में रहने का इंतजाम तो कर ही दूंगा पर उस में कुछ वक्त लग जाएगा, मेरी आप से एक रिक्वैस्ट है कि जब तक इस बच्ची का इंतजाम हो रहा है तब तक इसे कुछ दिन अपने पास रख लें.’’

तीनों को जैसे करंट सा लगा, ‘‘यह आप क्या कह रहे हैं? हम एक बच्चे को कैसे अपने पास रख सकते हैं? हमें औफिस भी जाना है. हमारे लिए यह सब बिलकुल आसान नहीं है.’’

मगर संजय के बात करने के ढंग से तीनों को यह जरूर सम झ आ गया था कि वह एक सभ्य, नर्म दिल इंसान है. उस ने कहा, ‘‘कई लोग ऐसे मिले  हुए बच्चों को फुटपाथ पर छोड़ जाते हैं, आप पढ़ीलिखी हैं, फिल्मों में भी देखा ही होगा, अंदाजा लगा ही सकती हैं कि फिर उन बच्चों के साथ क्या होता होगा. बस मु झे थोड़ा वक्त दे दीजिए कि मैं जांचपरख कर किसी अनाथालय में इस के रहने का प्रबंध कर लूं. बस इतना  सहयोग कर दीजिए.’’

तीनों ने एकदूसरे को देखा, आंखों ही आंखों में कुछ बात करने का इशारा किया.

विहाना ने कहा, ‘‘हम आपस में बात कर के आप को बताते हैं. लो, विहाना, अब तुम इसे थोड़ी देर पकड़ लो, मेरे हाथ दुखने लगे.’’

‘‘हां, हां, आप लोग उस बैंच पर आराम से आपस में बात कर लो, मैं आप लोगों के लिए चाय भिजवाता हूं,’’ संजय ने एक कोने में रखी बैंच की तरफ इशारा करते हुए कहा.

तीनों थकी सी बैंच पर बैठ गईं, बच्ची जरा सा हिली तो आरोही चौंकी, ‘‘अरे, इसे भी तो देख लो, बेचारी को भूख तो नहीं लगी?’’

उस का कपड़ा हटाया गया. बच्ची भूखी थी. अपना मुंह इधरउधर मार रही थी. तीनों

को उस पर बड़ा स्नेह उमड़ा. स्त्री मन में ममता का भाव स्वाभाविक रूप से होता है चाहे वह किसी भी उम्र की हो. गोरी, काले घुंघराले बाल, छोटेछोटे हाथ देखते हुए तीनों बोल पड़ीं, ‘‘यार, कैसी गुडि़या सी है.’’

अब तक बच्ची ने आरोही के हाथ की एक ऊंगली पकड़ ली थी. आरोही हंसने लगी, ‘‘यार, यह तो बहुत प्यारी है. इसे ले ही चलें क्या?’’

‘‘जब हम औफिस चले जाएंगे तो कौन देखेगा?’’

‘‘इस की देखभाल के लिए ममता आंटी के पैसे बढ़ा देंगे, अपना आनेजाने का टाइम आपस में सैट कर लेंगे, बेचारी पता नहीं कब, कैसे, कहां पलेगी? कहीं गलत हाथों में न पड़ जाए.’’

‘‘सोच लो, बड़ी जिम्मेदारी का काम है. बाहर घूमनेफिरने के टाइम का बंधन हो जाएगा और फिर अपने घर वालों को क्या जवाब देंगे?’’

‘‘उन्हें कैसे पता चलेगा? और अगर कोई यहां मिलने आ गया तो ममता आंटी को सब संभालने के लिए बोल देंगे, ममता आंटी हमें कितना प्यार करती हैं.’’

इतने में बच्ची ने आंखें खोल दीं. टुकुरटुकुर तीनों को देखने लगी. उस ने अब तक आरोही की ऊंगली पकड़ी हुई थी. आरोही हंसी, ‘‘चलो, इस का नाम रखते हैं, टिनमिन.’’

विहाना और हरिता इस नाम पर हंस पड़ीं, ‘‘ठीक है. और टिनमिन हमारे साथ चलोगी? हमें परेशान तो नहीं करोगी? हमारे साथ 3 अंकल भी फ्री मिलेंगे.’’

हरिता की इस बात पर विहाना और आरोही ने अपनी हंसी बड़ी मुश्किल से रोकी. संजय ने उन के लिए चाय भिजवा दी थी. थोड़ी देर बाद वह खुद आया, ‘‘क्या सोचा आप ने मेरी हैल्प करेंगी? आप चिंता न करें, मैं आप की टच में रहूंगा. फोन पर बात होती रहेगी, बहुत जल्दी आप को इस बच्ची से फ्री कर दूंगा.’’

‘‘ठीक है, हम कोशिश करेंगे कि कुछ दिन टिनमिन को अपने साथ रख लें.’’

‘‘टिनमिन?’’

‘‘हां, अभी हम इसे टिनमिन कह रहे थे,’’ आरोही ने कहा तो संजय मुसकरा दिया, बोला, ‘‘पता नहीं, मां की क्या मजबूरी होगी जो बच्ची को छोड़ गई, यह भी देखना है कि उसी का बच्चा था या किसी और का तो नहीं उठा लाई थी. अभी हमें काफी चीजें देखनी हैं. अभी बस इतना सुकून है कि बच्ची सेफ हैंड्स में है. मैं आप से जल्दी मिलता हूं,’’ और तीनों का पता और फोन नंबर ले कर संजय ने उन्हें भेज दिया.

स्टेशन से निकलते ही हरिता ने ममता को फोन मिलाया.

उधर से उन के हैलो कहते ही हरिता शुरू हो गई, ‘‘आंटी, प्लीज न मत कहना. बहुत

अर्जेंट बात है. हमें आप की हैल्प चाहिए , हम बस कैब से 20 मिनट में घर पहुंच रही हैं, आप बस अभी आ जाओ.’’

‘‘इस टाइम? नहीं, अभी मु झे सब के लिए घर में खाना बनाना है, बहुत काम है? सुबह आऊंगी.’’

‘‘आंटी, प्लीज.’’

ममता को इन लड़कियों से विशेष स्नेह था, इन लड़कियों से ही नहीं, इन के बौयफ्रैंड्स की बातों पर, आपस के हंसीमजाक पर ममता को बहुत हंसी आती थी. तीनों के घर वाले जब भी आए, उसे कुछ दे कर ही गए. सब उसे अपने घर का ही मैंबर मानने लगे थे.

तीनों लड़कियों के स्पीकर पर प्लीजप्लीज कहने पर वह आने के लिए तैयार हो गई. कैब ड्राइवर तीनों की बातें बहुत ध्यान से सुनता रहा, पर उन्होंने बहुत तोलमोल कर ऐसे बातें कीं कि वह कुछ अंदाजा नहीं लगा पाया कि बच्ची है किस की.

जब तीनों घर पहुंचीं, ममता आ चुकी थी, बच्ची को देख कर चौंकी, ‘‘इसे कहां से ले आए? कौन है यह?’’

‘‘अंदर तो आओ, आंटी,’’ और फिर अंदर जा कर उन की गोद में टिनमिन को देते हुए तीनों बोलीं, ‘‘लो आंटी, इसे संभालो. पहले इसे कुछ खाने को दे दो, यह भूखी है,’’ फिर ममता को पूरी बात बताई गई.

ममता ने अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहा, ‘‘यह क्या किया तुम लोगों ने? इसे संभालेगा कौन?’’

‘‘आंटी, हम चारों ही मिल कर संभाल लेंगे, आंटी, देखो न, कितनी छोटी सी है, इसे कुछ खाने को तो दो.’’

‘‘इसे खाने को नहीं, पीने के लिए दूध देना है. अभी यह बस दूध पीएगी. कैसे करोगी तुम लोग? न इस के कपड़े हैं, न बोतल.’’

तीनों उसी टाइम ममता से पूछपूछ कर उस की जरूरत की चीजें और्डर करने लगीं. आरोही ने कहा, ‘‘आंटी जो कहती हैं, सब और्डर कर लेते हैं, फिर बाद में शेयर कर लेंगे.’’

विहाना ने कहा, ‘‘आंटी, आप जितना पैसा कहेंगी. हम बढ़ा देंगे, बस आप इसे दिन में संभाल लेना और जितनी देर हो सके, रात में भी. प्लीज आंटी.’’

50 साल की ममता नर्म दिल की स्त्री थी. वह भी सम झ रही थी कि जब तक इस का इंतजाम नहीं होता, इस की देखरेख करनी ही चाहिए. उस के बच्चे बड़े थे, वे घर संभाल सकते थे. जल्द ही टिनमिन का सामान आ गया. ममता ने उसे नहला कर तैयार कर दिया. अब तीनों उस से एक खिलौने की तरह खेलने लगीं.

अगले दिन औफिस था. तीनों के औफिस निकलने तक ममता अपने बाकी 2

घरों का काम कर के आ गई. फिर शाम तक टिनमिन की देखभाल की. जब वे औफिस से आ गईं, तब वह अपने घर गई. रात को आरोही का बौयफ्रैंड कविश, हरिता का जीविन और विहाना का बौयफ्रैंड मानव आ गया. तीनों लड़के टिनमिन का किस्सा सुन कर तीनों का मुंह देखते रह गए.

लड़कों को कुछ सम झ नहीं आया कि ये तीनों सीदीसादी सी लड़कियां कैसे टिनमिन को संभालेंगी. मानव ने कहा, ‘‘यह सब आसान नहीं है, तुम लोग किसी मुसीबत में न पड़ जाना.’’

विहाना ने कहा, ‘‘हम ने भी यह सब सोचा पर इंस्पैक्टर संजय से बात कर के तसल्ली है, ऐसा लगा उन की बात सम झनी चाहिए, बच्ची गलत हाथों में भी नहीं पड़नी चाहिए. वे लगातार हम से टच में हैं. तुम लोग चाहो तो उन से टच में रह लो, उन्हें भी लगेगा कि हम अकेले नहीं हैं. और हां, तुम लोग भी फ्री होने पर इसे संभालने में हमारी हैल्प कर दिया करना.’’

तीनों लड़कों ने ‘‘ठीक है,’’ कहा तो लड़कियों को एक राहत सी मिली.

कविश, जीविन और मानव ने इंस्पैक्टर का नंबर लेकर सेव कर लिया.

अब सब मिल कर टिनमिन का ध्यान रखने लगे. कोई न कोई अपना काम ऐसा सैट कर लेता कि ममता की भी हैल्प हो जाती. अब टिनमिन को घर आए 15 दिन हो रहे थे. मुंबई में आसपास का माहौल ऐसा होता है कि दूसरे के निजी जीवन में ताक झांक नहीं की जाती. वैसे भी टिनमिन घर में ही रहती, ज्यादा रोने वाली बच्ची थी भी नहीं. साफसुथरी सी गुडि़या जैसी टिनमिन अब मुंह से कोई आवाज निकालती तो सब के लिए एक खेल हो जाता.

सब उस से ऐसी बातें करने लगतीं जैसे वह सब सम झ रही हो. तीनों के बौयफ्रैंड्स

आते तो अब सब की बातें ही बदल गई थीं. अब तीनों टिनमिन की बातें ही उन से करतीं तो वे कहते, ‘‘इस बच्ची ने तो हमारी आउटिंग्स ही बंद करा दी, देखने में जरा सी है, पर सब का रूटीन बदल कर रख दिया.’’

1-1 रात सब टिनमिन को रात को संभालने की जिम्मेदारी ले लेतीं. कभी उस के डायपर बदलतीं. कभी उस के लिए बोतल में दूध लातीं, पर किसी को भी रात में नींद पूरी न होने की शिकायत नहीं थी. उन्हें अब टिनमिन से लगाव हो गया था. औफिस में रहतीं तो ममता को फोन कर के उस के हालचाल पूछती रहतीं. एक छोटी सी जान जैसे अब उन्हीं का हिस्सा हो गई थी. तीनों में एक अलग ही ऐनर्जी आ गई, तीनों खूब हंसती, मजाक करतीं, कोई शिकायत नहीं, बस टिनमिन और उस की बातें.

टिनमिन ने कैसे बोतल पकड़ी, कब गिराई, कब हंसी, कब रोई, रात में कितनी बार जागी. बस टिनमिन और टिनमिन. जैसे अब टिनमिन के सिवा उन की लाइफ में और कोई जैसे है ही नहीं. अपने पेरैंट्स से किसी कोने में जा कर बात करती, कहीं कोई पूछ न ले कि बच्चे की आवाज कहां से आ रही है. न किसी को शौपिंग याद आती, न बाहर जा कर अपने बौयफ्रैंड के साथ घूमनाफिरना. ममता ने भी बच्ची को पूरे मन से संभाल लिया था. वह भी सम झ रही थी कि बच्ची को सही ठिकाना मिलना चाहिए.

1-2 बार संजय भी सादे कपड़ों में फ्लैट पर चक्कर काट गए थे. वे यूनिफार्म पहन कर नहीं आते थे, कहीं लड़कियों को पड़ोस के लोग परेशान न करें. वे उन की हर बात का ध्यान रख रहे थे, एक दिन आए, कविश, जीविन और मानव भी बैठे हुए थे. छुट्टी का दिन था, तो बताने लगे, ‘‘एक अनाथालय में इस के पेपर्स बन गए हैं, अब थोड़ी ही देर में एक महिला आएगी, इसे ले कर मैं उस के साथ ही चला जाऊंगा, मेरे साथी नीचे गाड़ी में ही है. आप लोगों ने इस बच्ची को संभालने में मेरी जो हैल्प की उसे मैं याद रखूंगा.’’

आरोही, हरिता और विहाना को जैसे एक धक्का सा लगा, हड़बड़ा गईं, कुछ सम झ नहीं आया कि क्या कहें. संजय का मुंह देखती रह गईं, इस समय ममता के हाथ में थी टिनमिन. तीनों उस की ओर लपकीं, तीनों ने ही उसे लेने के लिए हाथ बढ़ाए, ये पल इतने भारी होंगे, किसी ने भी नहीं सोचा था.

ममता ने तीनों की तरफ देखा, तीनों के आंसू बह निकले थे. इतने में दरवाजे

की घंटी बजी, ममता ने आरोही की गोद में टिनमिन को दे दिया. एक महिला थी, सब सम झ गए, ये संजय की साथी हैं.

संजय ने उठते हुए कहा, ‘‘आओ मीरा. यह है बच्ची.’’

‘‘जी सर,’’ कहते हुए मीरा ने आरोही के हाथ से बच्ची को ले कर अपने गले से लगा लिया. बच्ची कुनमुनाई तो मीरा ने उसे प्यार से थपका. तीनों को लग रहा था जैसे उन के हाथ से किसी ने एक  झटके में उन की प्रिय चीज छीन ली है. मीरा सब को ‘थैंक यू’ कहते हुए निकल गई,

संजय कह रहे थे, ‘‘आप लोगों के मन की स्थिति का अंदाजा लगा सकता हूं पर टिनमिन का जाना भी बहुत जरूरी है. आप लोग उसे हमेशा अपने साथ नहीं रख सकते थे. प्लीज बी प्रैक्टिकल. आप लोगों ने बच्ची के लिए जो किया, एक बार फिर उस के लिए शुक्रिया’’ कह कर वे हाथ जोड़ कर चले गए.

हरिता, आरोही और विहाना धम से सोफे पर बैठ कर मुंह को हाथों से ढक कर सिसकने लगीं. मानव, जीविन और कविश तीनों को तसल्ली देने लगे, ‘‘संजय साहब सही कह गए हैं, टिनमिन को तो जाना ही था. उन्होंने उस का सही प्रबंध किया होगा और अभी तुम लोग उसे ज्यादा दिन अपने साथ नहीं रख सकती थीं. तुम लोगों के पेरैंट्स को अभी तक पता नहीं चला था, यही अच्छी बात है वरना वे तुम्हें इस चीज में पड़ने ही न देते. आगे किसी का भी जीवन इतना आसान न होता जितना अभी लग रहा था.’’

ममता भी कह रही थी, ‘‘यह सम झ लो कि जितने दिन टिनमिन साथ रही. तुम लोगों को जीवन का एक मीठा सा अनुभव दे गई, तुम लोगों को अभी से सम झ आ गया कि बच्चे की जिम्मेदारी क्या होती है. जाओ, इतने दिन से घर में बैठी थीं, अब थोड़ा बाहर घूम आओ.’’

अब तक तीनों लड़कियां अपनेआप को संभाल चुकी थीं. कहने लगीं, ‘‘आंटी,

थैंक यू, टिनमिन को संभालने में आप ने हमारी बहुत हैल्प की. क्या हमें उसे गोद ले लेना

चाहिए था?’’

‘‘नहीं, मैं ने एक दिन अपने वकील दोस्त

से पूछा था, उस ने बताया था कि बहुत ही मुश्किल प्रक्रिया है और बहुत टाइम लगता है,’’ मानव ने बताया.

ममता ने कहा, ‘‘और हां, मैं टिनमिन को संभालने का एक भी ऐक्स्ट्रा पैसा नहीं लूंगी,’’ कहतेकहते उस की आवाज भी भर्रा गई, ‘‘अभी तो पता नहीं उस के जीवन में क्याक्या संघर्ष लिखे होंगे.’’

‘‘आंटी, हम सब कभीकभी उसे देखने चला करेंगे, मैं कदम से इस बारे में बात कर लूंगी.’’

तीनों लड़के भी कहने लगे, ‘‘हमें भी ले जाना. हम ने भी कभीकभी रोती हुई टिनमिन को चुप कराया है.

इस बात पर सब ने हलका सा मुसकराने की कोशिश की पर इस मुसकराहट में एक उदासी थी. टिनमिन की आवाजें जैसे खाली घर में गूंज रही थीं.

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