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दोनों के बीच एक खामोशी की दीवार थी जिसे तोड़ पाना अब मुमकिन नहीं था. सारिका जानती थी अब विनय उस का कोई भी सच नहीं सुनना चाहेगा.

वह विनय की आंखों में नफरत का सैलाब देख कर सहम गई थी. वह प्रकट में शांत था, मगर सारिका सम झ चुकी थी कि विनय अंदर ही अंदर  झुलस रहा है.

कुछ दिन बाद ही कबीर पूरी तरह स्वस्थ हो कर घर आ गया. इतने लंबे अंतराल के रोग ने उसे अब कुछ गंभीर भी बना दिया था. वह अधिकतर चुप ही रहता. मगर पिता को अपने से दूरी बनाते देख अधीर हो उठता था.

‘‘पापा अब मेरे साथ पहले जैसे क्यों नहीं खेलते मम्मा? वे क्यों मु झे हर वक्त तुम्हारे पास जाने को कहते हैं? बोलो न मम्मा?’’

‘‘पापा आजकल औफिस में बिजी रहते हैं न इसलिए,’’ सारिका बस इतना ही कह पाती.

विनय ने खुद को औफिस और अपने कमरे तक सीमित कर लिया था. वह किसी से कोई बात नहीं करता था. सारिका और कबीर जैसे अब उस के कुछ नहीं लगते थे. देर रात लड़खड़ाते कदमों से घर लौटता, शराब पी कर उस ने अपना गम भुलाना शुरू कर दिया था.

सारिका उसे दिनबदिन इस तरह घुलते नहीं देख पा रही थी. आखिरकार उस ने एक फैसला किया. विनय को इस दुख से आजाद करने का एक ही तरीका था कि वह कबीर को ले कर खुद ही विनय की जिंदगी से कहीं दूर चली जाए. वे खुद को कुसूरवार सम झती थी और उस की नजरों में उस के गुनाह की यही एक वाजिब सजा थी.

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