Hindi Story : निशिता  अब और सब्र नहीं हो रहा. इंतजार है तो कल का जब तुम हमेशा के लिए मेरी हो जाओगी. हर वक्त बस तुम्हारा ही चेहरा मेरी आंखों के सामने रहता है. अब तुम्हारे बिना एकएक पल बिताना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है. आई रियली लव यू. डू यू लव मीटू?’’

मंगेतर मिलिंद की ये बातें सुन मेरी सांसें बेकाबू हो गईं.

‘‘निशिता, मैं बस तुम से वे 3 जादूई शब्द सुनना चाहता हूं. बोलो न निशी, माई लव. प्लीज, बोल दो. अब तो कल तुम्हारा नाम मुझ से जुड़ ही जाएगा. प्लीज, बोल दो न, जो मुझे इत्मीनान हो जाए कि तुम भी मुझे चाहने लगी हो.’’

मिलिंद की ये बातें मुझे मदहोश कर रही थीं. मेरी जबान तालू से चुपक गई थी. धौंकनी की तरह धुकधुकाते दिल के साथ मैं ने बस इतना कह कर लाइन काट दी, ‘‘कल, आज नहीं. थोड़ा सब्र करो.’’

मुझे अपने ऊपर आश्चर्य हो रहा था. इस मिलिंद ने मुझ पर कहीं जादू तो नहीं कर दिया. नहीं तो मुझ जैसी गंभीर शख्सियत की यह कैसी काया पलट हो गई कि उस की आवाज सुनते ही मैं जैसे किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच जाती हूं, अपने होश खो बैठती हूं.

कुछ ही देर में मेरी सांसें संयत हुईं और मैं मिलिंद के साथ बीते सुखद पलों में खो गई…

मिलिंद से मेरी मुलाकात 6 माह पहले ही हुई थी. वह एक रईस खानदानी परिवार की छोटी संतान था. उस का रिश्ता मुझे एक नामी औनलाइन मैट्रीमोनियल साइट के जरीए मिला था. मेरे परिवार का माहौल उस के परिवार की तुलना में देसी था. जहां मेरे पिता कोटा में एक परचूनी की सोना उगलती दुकान चलाते थे, वहीं उस के पिता शहर का एक प्रतिष्ठित कोचिंग सैंटर, मिलिंद और उस के बड़े भैया के साथ मिल कर चलाते थे.

मेरी विवाह योग्य उम्र हो आई थी और बाबूजी या मां मुझे जो रिश्ते सुझाते वे मुझे पसंद न आते. वे अधिकतर बिजनैस फैमिली के व्यापारी लड़कों के रिश्ते मेरे लिए ला रहे थे जो मुझे कतई पसंद नहीं आ रहे थे. उधर मेरी दादी और बाबूजी मुझे उन के द्वारा लाए रिश्तों में से किसी एक रिश्ते के लिए हां करने का दबाव बना रहे थे लेकिन मुझे किसी व्यापारी से शादी नहीं करनी थी. मेरी तमन्ना थी किसी अपनी तरह के इंजीनियर लड़के की. सो मैं ने एक मैट्रीमोनियल साइट पर अपना प्रोफाइल पोस्ट कर दिया था और उस पर इंजीनियर युवकों से कौंटैक्ट कर रही थी. मां या बाबूजी यह कर नहीं सकते थे क्योंकि उन्हें इंग्लिश नहीं आती थी.

तभी साइट पर मुझ से अपने शहर में एक दौलतमंद खानदान के मुंबई आईआईटी

से पास आउट इंजीनियर युवक मिलिंद टकराया और मैं ने उस से बात आगे बढ़ाई.

कुछ ही दिनों में बात ईमेल और फोन काल से आगे बढ़ कर आमनेसामने बातचीत और घूमनेफिरने तक आ गई और अब मैं उस के साथ हर छुट्टी के दिन हैंग आउट करने लगी.

मिलिंद उच्च शिक्षित होने के साथसाथ टौल, डार्क और हैंडसम, लच्छेदार बातें करने वाला खासा हाजिरजवाब था. किसी भी लड़की के आइडियल बौयफ्रैंड का अवतार. उस ने मेरे दिन का चैन और रातों की नींद चुरा ली थी.

मैं उस के साथ पिछले 6 माह से अपने शहर कोटा में घूमफिर रही थी. जहां मैं हिंदी स्कूल की पैदाइश थी, वहीं वह शहर के नामचीन कौंवेंट से पढ़ा था. ऐसी फ्लूएंट इंग्लिश बोलता कि मैं उसे देखती रह जाती.

मिलिंद हर माने में एक ड्रीम हस्बैंड था और कभीकभी मैं सोचती कि उस जैसे खानदानी रईस, हैंडसम और लाखों कमाने वाले लड़के को मेरी जैसी हिंदी मीडियम की सीधीसादी और सामान्य नैननक्श की लड़की कैसे पसंद आ गई.

खैर, 6 माह तक साथसाथ घूमनेफिरने के बाद मैं ने अपने पिता को मिलिंद की बाबत हरी झंडी दे दी. मातापिता और दादी मिलिंद के घर गए और प्रारंभिक बातचीत के बाद हमारा रिश्ता तय कर दिया. उस से संबंध तय होने पर मैं 7वें आसमान में थी. कभीकभी मुझे अपने पर रश्क होता.

तय मुहूर्त में उस के सान्निध्य के सुनहरे सपने पलकों में सजाए मैं ससुराल आ गई. हनीमून के लिए हम ने उदयपुर और चित्तौड़ जाने का प्रोग्राम बनाया. उस शाम को प्यास लगने पर मैं रसोई की ओर जा रही थी कि तभी सासूमां के बैडरूम के बाहर पति की तनिक तेज आवाज में चिल्लाहट सुन मैं ठिठक कर खड़ी हो गई.

‘‘मम्मा प्लीज, मुझे इस ट्रिप के लिए पूरे 2 लाख चाहिए. एअर टिकट्स, होटल, खानापीना और घूमने में बहुत खर्चा होने वाला है.’’

‘‘नहीं, मैं तुम्हें बस 1 लाख दे सकती हूं, उस से एक रुपया भी ज्यादा नहीं. ये भी मैं अपने पास से दे रही हूं. पापा को पता चलेगा तो वे मुझे इन के लिए भी मना करेंगे.’’

‘‘मम्मा… भाई भी तो पिछले माह नेपाल गए थे. वे तो फाइवस्टार होटल्स में रहते हैं. आप बस मुझ पर कंट्रोल रखती हो. उन्हें कुछ नहीं कहती.

1 लाख तो 2 दिनों में खत्म हो जाएंगे.’’

इस बार सासूमां चीखीं, ‘‘भाई को देखा है, दिन रात…’’

तभी सामने ससुरजी आ गए और मैं झपट कर आगे बढ़ गई. सासूमां ये क्यों कह रही हैं? जेहन में घंटी बजी थी.

मन में अनवरत खींचतान चल रही थी कि क्या मिलिंंद कोचिंग सैंटर में काम नहीं करता? अपनी मां से पैसे क्यों मांग रहा है? क्या उस की कोई अपनी कमाई नहीं?

खैर, अगले ही दिन हम दोनों उदयपुर चले गए. खासे मदहोशी भरे सोने के दिन और चांदी की रातें गुजर रही थीं. हम दोनों एकदूसरे में गुम 2 जिस्म और 1 जान हो चले थे.

हनीमून से लौट कर जिंदगी निश्चित ढर्रे पर चल पड़ी थी. मेरे वर्किंग डेज

बेहद व्यस्त रहने लगे थे. पता ही नहीं चलता घरगृहस्थी और औफिस के सौ कामों की गहमागहमी में कब दिन पूरे हो जाते. शादी को पूरा माहभर बीत चला था.

आज सैकंड सैटरडे की वजह से औफिस का अवकाश था. मैं सुबह के ब्रेकफस्ट के लिए डाइनिंगरूम की ओर बढ़ ही रही थी कि तभी जेठजी के उग्र स्वर कानों में पड़े, ‘‘बरखुरदार, कभी तो औफिस आ जाया करो… घर के आदमी के औफिस में बस बैठने से ही स्टाफ पर कंट्रोल रहता है लेकिन तुम से…’’

मुझे देख कर वे एकाएक चुप हो गए.

अंतर्मन में सोच का तूफान उठा था कि कुछ तो गड़बड़ है, नहीं तो उस दिन सासूमां और आज जेठजी मिलिंद को उलाहने क्यों दे रहे थे लेकिन घर और दफ्तर के सौ जंजालों के बीच अपनी शिद्दत की व्यस्तता के चलते मैं ने उस बात को तूल नहीं दिया और बात आईगई हो गई.

वैसे भी मिलिंद रोजाना ससुरजी और जेठजी के कोचिंग सैंटर जाने के बाद चाकचौबंद हो अपनी गाड़ी से कोचिंग सैंटर के लिए निकल ही जाता था. सो मुझे तनिक भी संदेह न हुआ कि कोई भारी गड़बड़ है.

अब सोचती हूं मैं ने उसी वक्त मिलिंद के धोखे पर कोई आर या पार का निर्णय क्यों नहीं लिया? अपनी शादी के बारे में कोई निर्णायक फैसला नहीं लेने का एक कारण और भी था. मिलिंद मेरी पहली मुहब्बत था और शादी के कुछ माह गुजर जाने के बाद भी एक प्रेमी के रूप में उस का प्यार जताने का अंदाज शिद्दत का दिलकश था. अपनी दिलनशीं मुसकान के साथ मेरी आंखों में झांकते हुए जब वह मेरे नजदीक आता तो मेरा अपनेआप पर वश न रहता और मैं उस के इश्क के दरिया में मदहोश तिनके सी बह जाती.

मेरी आंखों पर उस की बेशर्त महब्बत की पट्टी बंध गई थी, जिस की आड़ में उस की हर कमी छिप जाती या फिर कहूं कि मैं उस की कमियों को देखना नहीं चाहती थी.

दिन यों ही उस की समर्पित मुहब्बत के साए में घर और औफिस की आपाधापी में बीत रहे थे.

शादी के 2 माह बाद ही मैं अनचाहे ही प्रैगनैंट हो गई थी. अब तो घर के सभी सदस्य मुझे हाथोंहाथ रखने लगे थे खासकर मिलिंद. मेरे मुंह से कोई छोटीबड़ी फरमाइश निकलती नहीं कि वह उसे पूरी कर देता. पहले वह मेरा ड्रीम लवर था और अब वह ड्रीम हस्बैंड बन गया था.

अपनी पहली वैवाहिक वर्षगांठ से माहभर पहले मैं ने एक बेटे को जन्म दिया.

पूरा घर आह्लादित था. घर को इकलौता चिराग जो मिला था. जेठानीजी को कोई गंभीर मैडिकल समस्या थी, जिस की वजह से जेठजी निस्संतान थे. सो मिलिंद की मनभावन प्रिया और घर के इकलौते वारिस की मां होने के नाते मुझे सब से बेइंतहा लाड़ मिल रहा था. मैं अब घर पर ही थी, लगभग 6 माह की मैटरनिटी लीव पर.

अवकाश के पहले दिन मैं कुछ देर से उठी थी. मैं अपने बैडरूम से निकल ही रही थी कि कानों में ससुरजी के स्वर गूंजे, ‘‘मिलिंद, अगर आज तुम औफिस नहीं गए तो मैं मम्मा से कह कर तुम्हारी पौकेट मनी बंद करा दूंगा. अरे… शादी हो गई, ब्याह हो गया लेकिन तुम्हें अभी तक अक्ल नहीं आई. एक पराए घर की लड़की तुम पर भरोसा कर के इस घर में आई है, तुम्हें उस का भी जरा खयाल नहीं? वह एक गैजटेड औफिसर, कुछ सोचा है, उस पर क्या बीतेगी जब उस पर तुम्हारी असलियत खुलेगी? न तो ढंग से पढ़ाईलिखाई की, न ही अब कोई कामकाज कर रहे हो.’’

मुझ पर मानो गाज गिरी. कानों में बारंबार ससुरजी के कड़वे बोल गूंजने लगे थे, ‘न तो ढंग से पढ़ाईलिखाई की, न ही अब कोई कामकाज कर रहे हो.’ वह तो आईआईटी पासआउट है. रोजाना तैयार हो कर कोचिंग सैंटर जाता है, फिर इस बात का क्या मतलब? मन में उधेड़बुन चलने लगी थी कि क्या सच है क्या झूठ? कुछ ही देर में बहुत सोचनेविचारने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची कि मुझे इस गंभीर मुद्दे पर ससुरजी से बात करनी ही चाहिए.

क्रोधावेश में कदम बढ़ाती डाइनिंगरूम में पहुंच गई और मैंने ससुर जी को घेर लिया, ‘‘पापाजी, आप की इस बात का क्या मतलब? क्या मिलिंद ने आईआईटी से इंजीनियरिंग नहीं की और क्या वह कोचिंग सैंटर में कोई काम नहीं करता मुझे सचसच बताइए.’’

मुझे यों अपने सामने मिलिंद के बारे में पड़ताल करते देख ससुरजी और जेठजी हड़बड़ा गए. ससुरजी सकपकाते हुए बोले, ‘‘नहीं बेटा, ऐसी तो कोई बात नहीं. यह मिलिंद इन दिनों कोचिंग सैंटर थोड़ी देर से जा रहा है, बस इसीलिए उस की खबर ले रहा था.

‘‘हां… हां… थोड़ा लेटलतीफ है यह मेरा भाई. वैसे कोचिंग सैंटर ठीकठाक संभालता ही है यह. तुम्हें किसी बात का जिक्र करने की जरूरत नहीं.’’

उन दोनों की इस लीपापोती पर मैं भड़क उठी और मैंने सीधेसीधे मिलिंद से कहा, ‘‘मिलिंद, जरा बैडरूम में आओ. मुझे तुमसे कुछ बात करनी है. मुझे अपनी इंजीनियरिंग का सर्टिफिकेट दिखाओ, अभी इसी वक्त,’’ मैं ने धधकते लोहे सी निगाहों से उस से कहा. मेरे मन में शक का बीज जडें़ जमा चुका था.

मिलिंद मेरी तमतमाती नजरों का सामना न कर सका और थोड़ा हकलाता हुआ सा बोला, ‘‘हां… हां… दिखा दूंगा… शाम को जरूर दिखा दूंगा. ऐसी क्या जल्दी है भई अभी तो मुझे औफिस जाने दो.’’

मैं ने तुर्शी से जवाब दिया, ‘‘नहीं… उन्हें बिना दिखाए तुम्हारी मुक्ति नहीं या तो अभी के अभी दिखाओ नहीं तो मैं अपने घर जा रही हूं. अब तुम लोगों से बाबूजी ही बात करेंगे.’’

‘‘यह क्या कह रही हो निशी, माई लव? अभी कल ही तो तुम अस्पताल से आई हो और इस कड़ाके की ठंड में अपने घर कहां जाओगी. मैं जैसे ही औफिस से लौटता हूं तुम्हें सर्टिफिकेट दिखा दूंगा. आज सैंटर पर जरूरी मीटिंग है. सो मेरा जाना बहुत जरूरी है. चलो, मैं अभी जाता हूं, शाम को बात करेंगे,’’ कहते हुए वह मेरी ओर एक फ्लाइंग किस उछालते हुए चला गया.

मन में तूफानी कशमकश चल रही थी. रहरह कर ससुरजी के शब्द

धारदार कांच की तरह अंतर्मन को चीर रहे थे. यह तो तय था मिलिंद की डिगरी में कुछ तो लोचा है नहीं तो उस के पिता इतनी बड़ी बात क्यों कर कहते? साथ ही कोचिंग सैंटर का कामधाम नहीं करने का उलाहना बिना किसी आधार के तो नहीं दिया होगा उन्होंने.  उफ… इतना बड़ा फ्रौड. यह मैं कहां फंस गई. मुझे इन चीट्स के साथ जिंदगी नहीं बितानी अंतर्मन का क्रोध आंखों की राह बरसने लगा और मैं परिस्थितियों के मकड़जाल में फंसी मन ही मन कलप रही थी.

मिलिंद से रिश्ता जोड़ना मेरा फैसला था. मैं ने शादी से पहले उस की पूरी जांचपड़ताल क्यों नहीं कराई. लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था.

इंतजार था तो शाम का. सो मिलिंद को अपनी सफाई देने का एक मौका देते हुए मैं ने निश्चय किया कि मैं शाम को मिलिंद का सर्टिफिकेट देख कर ही मायके जाने के बारे में कोई फैसला लूंगी. मिलिंद, उस के पिता और भाई तीनों सैंटर से साथसाथ लौटे थे. उन तीनों के ही चेहरों पर तनाव शिद्दत से हावी था.

मिलिंद मेरे फैवरिट रेस्त्रां से मेरी पसंदीदा साबूदाने की खिचड़ी लाया था, जिस की फरमाइश मैं ने अस्पताल से लौटते ही की थी लेकिन आज उस का यह लाड़ और केयर दोनों मुझे जहर लग रहे थे.

बड़े ही बेमन से खिचड़ी का डब्बा परे सरका कर मैं ने मिलिंद पर अपनी दहकती निगाहें टिका दीं और उस की ओर सवाल उछाला, ‘‘सर्टिफिकेट?’’

मेरे प्रश्न के उत्तर में मिलिंद ने मलिन मुख और शिथिल कदमों से अलमारी खोली और एक फाइल से सर्टिफिकेट निकाल मुझे थमा दिया. मैं ने झपट कर उस पर निगाहें फिराईं.

फाइनल सैमिस्टर में उस की सारे सब्जैक्ट्स में बैक आई थी. यह

देख कर सदमे से मुझे लगा. मेरे सीने पर भारी शिला आन पड़ी है और उस के बोझ तले मेरी सांसें रुकरुक कर आ रही हैं.

कुछ क्षणों के लिए मेरी सोचनेसमझने की शक्ति लोप हो गई थी और मैं शून्य में ताकते स्तब्ध बैठी रह गई.

तभी कड़ाके की ठंड में भी माथे पर आए पसीने को पोंछते हुए वह नम आंखों से बोला, ‘‘मैं तुम्हारा मुजरिम हूं. जो सजा देना चाहो दे सकती हो. बस मुझे छोड़ कर मत जाना. मैं तुम्हारे और नन्हे के बिना मर जाऊंगा. मैं तुम्हें खुद से भी ज्यादा चाहता हूं.’’

मेरी समझ में नहीं आ रहा था मैं कैसे रिएक्ट करूं? तभी अचानक कानों में ससुरजी का वाक्य गूंजा कि न तो ढंग से पढ़ाईलिखाई की, न ही अब कोई कामकाज कर रहे हो और मैं उस पर बिफर पड़ी, ‘‘पापाजी ने कहा था, तुम सैंटर में कुछ करतेधरते भी नहीं हो, इस का क्या मतलब?’’

वह हकलाते हुए बोला, ‘‘नहीं, नहीं मैं तो रोजाना सैंटर जाता हूं. तुम किसी से भी पूछ लो. वो तो पापा को मेरा एक दिन भी सैंटर नहीं जाना बरदाश्त नहीं. कल जरा मैं दोस्तों में चला गया था तो बस इसी वजह से सुबह मुझे डांट रहे थे और कोई बात नहीं, सच में.’’

मैं पूरी रात मिलिंद और उस के घर वालों के इस झूठ से क्षुब्ध करवटें बदलती रही. मन में दावानल सुलगता रहा.

मिलिंद जबरदस्ती बारबार मुझे अपनी बांहों के घेरे में लेते हुए मनाता रहा, इस झूठ को ले कर मुझ से सौरी कहता रहा और माफी के लिए मनुहार करता रहा.

मेरी वह रात आंखों ही आंखों में कटी थी. मैं स्पष्टता से कुछ सोच नहीं पा रही थी. मिलिंद से शादी पेरैंट्स की मरजी के बिना मेरा अपना फैसला था. पिता तो मेरा रिश्ता अपने जैसे किसी मालदार पर अपने स्वतंत्र कारोबार वाले लड़के से जोड़ना चाहते थे, जबकि मिलिंद पिता और भाई के साथ साझे में काम कर रहा था. इस वजह से पापा ने मुझे चेताया भी था लेकिन मेरी आंखों पर तो मिलिंद की मुहब्बत की पट्टी बंधी थी.

मैं एक इंजीनियर थी, अकेले गुजारा करने लायक अच्छा कमा रही थी. चाहती तो उसी

वक्त मिलिंद से अलग हो सकती थी लेकिन उस से हमेशा के लिए अलगाव या तलाक लेने का सोच कर ही मेरा दिल बैठा जा रहा था. मुझ अकेले में महज नन्हे के साथ जिंदगी बिताने की हिम्मत न थी. मायके जा कर पेरैंट्स के साथ में रह नहीं सकती थी क्योंकि उन की पुरातनपंथी संकीर्ण मानसिकता मुझे ससुराल छोड़ मायके में रहने की अनुमति कभी नहीं देती.

सो मेरे दिन घोर मानसिक ऊहापोह में बीत रहे थे. इधर मैटरनिटी लीव के चलते मेरे घर पर रहने से मेरा जेठानी और सासूमां के बीच  समीकरण धीरेधीरे गड़बड़ाने लगा. पहले औफिस और गृहस्थी की व्यस्तता के चलते जेठानी से मेरा वास्ता बहुत कम पड़ता था लेकिन अब पूरे वक्त एक छत तले उन के साथ रहने से मैं देख रही थी कि उन्हें मिलिंद से बहुत शिकायतें थीं. वे आए दिन उस से उलझतीं और उस के कोचिंग सैंटर में कोई काम न करने पर कटाक्ष करने का कोई मौका नहीं छोड़तीं. अपनी कलह में कभीकभी मुझे भी लपेटे में ले लेतीं.

अभी कल की ही बात थी. ससुरजी, जेठजी और मिलिंद लंच कर के दोबारा कोचिंग सैंटर जाने वाले थे कि तभी मिलिंद ने ससुरजी से कहा, ‘‘पापा, आज मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं. बुखार लग रहा है. मैं थोड़ा रैस्ट करूंगा.’’

यह सुन कर जेठजी ने उस की ओर कटु स्वरों में उलाहना उछाला, ‘‘बरखुरदार, यह क्या रोजरोज बहाने बनाते हो? आराम करना किसे अच्छा नहीं लगता लेकिन तुम ने तो हर दूसरे दिन सैंटर न जाने की आदत डाल ली है. इतना काहिलपना ठीक नहीं.’’

तभी जेठानीजी भी बोल पड़ीं, ‘‘जब हाथ पर हाथ रखे ही ऐश हो रही हो तो मशक्कत करना किसे अच्छा लगेगा?’’

सास और ससुर मूक यह सब देखते रहे. जेठजी और जेठानीजी के इन व्यंग्य बाणों ने मेरे अंत:स्थल को धारदार चाकू की तरह चीरचीर कर दिया और क्रोध मिश्रित क्षोभ से मेरी आंखों में आंसू उतर आए.

मन में सुनामी उमड़-घुमड़ रही थी. अपने बैडरूम के एकांत में मैं मिलिंद पर बरस पड़ी, ‘‘ये लोग किस हक से तुम्हें जलीकटी सुनाते रहते हैं? अब मेरी बरदाश्त के बाहर हो गया है. भाई साहब और भाभीजी को हमारा कोई लिहाज ही नहीं. अब मैं इस घर में नहीं रहूंगी. मैं आज ही औफिस में क्वार्टर के लिए अप्लाई करती हूं.’’

मुझे सरकारी क्वार्टर एलौट हो गया था और कुछ ही दिनों में हम वहां शिफ्ट हो गए. अब ससुराल से अलग होकर मेरे मन का चैन वापस आ गया था लेकिन अब मुझे एक और जंग लड़नी थी और वह थी मिलिंद की काहिली और सुस्ती के खिलाफ.

ससुराल में रहते हुए तो उसे ससुरजी और जेठजी के अंकुश तले रहते हुए

कोचिंग सैंटर में रैग्युलरली हाजिरी बजानी पड़ती थी, लेकिन अब अपने घर में उन की खबर लेती चौकस निगाहों से परे वह बहुत आराम में आ गया था.

मैं तो सुबहसवेरे 9 बजतेबजते औफिस के लिए निकल जाती और वे महाशय मुझे काम पर भेज नन्हे के साथ दोबारा बिस्तर में घुस जाते. कोचिंग सैंटर 12 बजे तक जाते और आए दिन किसी न किसी बहाने से समयबेसमय औफिस से छुट्टी मार लेते और नन्हे को क्रैच से वापस ला उस के साथ बिस्तर में चैन की नींद सोते. उस के ऐसा करने पर ससुरजी मुझे हमेशा फोन करते और शुरूशुरू में मैं इस के चलते उसे 10 बातें सुनाती लेकिन धीमेधीमे यह उस की आदत में आ गया और उस पर मेरी जलीकटी का असर तक होना बंद हो गया.

उस की इस आदत की वजह से मैं बेहद परेशान रहने लगी थी. मैं उसे लाख समझाती कि यों इस तरह निठल्लेपन से जिंदगी बिताना सही नहीं, तुम्हें कुछ तो करना चाहिए. मगर उस की समझ में यह बात नहीं आती और वह मुझे बस अपना समर्पित प्यार जता कर नि:शब्द कर देता.

विवाह को खासा वक्त बीत जाने के बावजूद मेरे प्रति उस की मुहब्बत कम नहीं हुई थी और उस का प्रेमी अवतार परफैक्ट था. वक्त के साथ उस ने धीमेधीमे दोस्तों के साथ अड्डेबाजी भी छोड़ दी और वह घर पर नन्हे की केयर बहुत समर्पित भाव से करता.

घर पर रहते हुए घर के सारे काम भी बड़ी सफाई से निबटा डालता और मुझे घर में हाथ तक नहीं हिलाना पड़ता.

उसे बाहर के लोगों के सामने भी घर के काम करने में कोई शर्म महसूस नहीं होती और अब तो पासपड़ोस, नातेरिश्तेदारी में भी यह बात फैल गई थी कि मिलिंद पूरी तरह से हाउस हस्बैंड बन कर रह गया.

एक दिन मैं और मिलिंद मांबाबूजी की शादी की वर्षगांठ पर मायके गए थे और किसी पड़ोसी ने परिचितों और रिश्तेदारों के हुजूम के सामने मिलिंद से पूछा था, ‘‘आप कहां काम करते हैं,’’ और इस के जवाब में मेरे एक दूर के मुंहफट जीजा ने कहा, ‘‘मिलिंद अपने घर में काम करते हैं,.ये हाउस हस्बैंड हैं.’’

उन की इस बात पर मैं शर्म से पानीपानी हो गई और पूरा वक्त मैं खून के आंसू पीती रही.

घर लौट कर मैं ने मिलिंद को खूब खरीखोटी सुनाई और फिर घोर गुस्से की वजह से आंसू बहाए लेकिन मेरे इतना क्रोध और कलह करने पर भी मिलिंद ने चूं तक नहीं की और देर रात उस ने मुझे अपनी बांहों में बांध थपक कर सुला दिया.

रात की टैंशन अगले दिन भी मुझ पर हावी थी और लंच टाइम में अपनी घनिष्ठ कलीग

के साथ खाना खाते हुए उस ने पूछा, ‘‘क्या बात है निशिता, आज बहुत टैंस दिख रही हो? मिलिंद से झगड़ा हुआ क्या?’’

मैं भरी बिरादरी के सामने मिलिंद के हाउस हस्बैंड डिक्लेयर किए जाने पर भरी बैठी थी. सो मैं ने उस वजह से अपनेआप को हुए शर्मिंदगी के एहसास को उस के साथ शेयर किया- उस के जवाब में उसने मुझे इस मसले पर एक अलग ही एंगल का खुलासा करते हुए कहा, ‘‘इतनी पढ़ीलिखी होने के बावजूद तू मिलिंद के घरेलू जिम्मेदारियों को बखूबी निभाने की स्किल को इतना कमतर आंक रही है? मुझे देख, मैं अपने हस्बैंड के वर्काहसेलिक होने की वजह से इतनी परेशान हूं कि बता नहीं सकती. वह वर्क फ्रौम होम करने के बावजूद घर के कामों में रत्तीभर मदद नहीं करता. न ही बच्चों की देखभाल में मेरा हाथ बंटाता. तीनों वक्त का खाना, बच्चों की पढ़ाई, स्कूल और बैंक के चक्कर, मेहमानों की आवभगत, बाजार से राशन, सब्जी, दूध और बिजलीपानी के बिल, बच्चों की बीमारी हर काम की जिम्मेदारी मेरी है. घर और दफ्तर की दोहरी जिम्मेदारी निभातेनिभाते मैं हलकान हो आई हूं. देखती है न, इसी वजह से मेरे आफिशियल कामों में भी आए दिन कमियां रह जाती हैं और मुझे सीनियर्स की डांट सहनी पड़ती है.

‘‘मिलिंद एक हाउस हस्बैंड है. कोई बात नहीं. हर शख्स में कोई न कोई कमी होती है. वह अपनी स्टडीज और काम में कुछ अचीव नहीं कर पाया, यह कोई शर्म की बात नहीं.

इस जहां में किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता. किसी को जमीं तो किसी को आसमां नहीं मिलता,’’ उस ने मुसकुराते हुए कहा, ‘‘हमें जो मिला है, उस के लिए थैंकफुल होना चाहिए.’’

उस दिन उस की इन बातों से अंतर्मन में विचारों की रस्साकशी चलने लगी, ‘‘मिलिंद अपनी पढ़ाईलिखाई और कैरियर में कुछ अचीव नहीं कर पाया लेकिन घर के फ्रंट पर तो बेटे की देखभाल से लेकर घरेलू जिम्मेदारियां तक बखूबी बहुत लगन और मेहनत से निभा रहा है.

मैं बिना बात उसे मेहनती और जिम्मेदार न होने के तानेउलाहने देती रहती हूं. उस दिन एक मुद्दत बाद मुझे सुकून आया और रात को मैं मिलिंद की बांहों में निश्चिंत सोई. उस दिन के बाद से मुझे अपनी जिंदगी में मिलिंद के सार्थक योगदान का एहसास हुआ और उस के प्रति मेरे रवैए में जमीनआसमान का अंतर आ गया.

जिंदगी की गाड़ी बस इसी तरह खिंची जा रही थी. साल दर साल यों ही गुजरते गए.

घरगृहस्थी, बेटे की जिम्मेदारियों से मुक्त औफिस में अपने बेहतरीन समर्पित प्रदर्शन के चलते मैं सफलता के सोपान सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ती गई और आज मेरी प्रमोशन सुपरिटैंडिंग इंजीनियर के पद पर हो गई थी.

दफ्तर में मेरी उत्कृष्ट परफौर्मैंस के दम पर मेरा नाम मेरे विभाग के बेस्ट औफिसर के तौर घोषित हुआ था. आज मुझे यह सम्मान प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा मिला था.

उस दिन औफिस में दफ्तर के सभी सम्मान प्राप्त अधिकारियों के लिए पार्टी आयोजित

की गई थी. मैं ने मिलिंद के साथ पार्टी अटैंड की.

पार्टी में किसी नए अफसर की पत्नी ने मुझ से बातोंबातों में पूछा, ‘‘आप के हस्बैंड क्या करते हैं?’’

‘‘मिलिंद हाउस हस्बैंड हैं. शुरू से वे घरगृहस्थी के सारे काम संभालते आए हैं. उन्हीं की बदौलत मुझे आज बैस्ट औफिसर का अवार्ड मिला है. आई एमप्राउड औफ हिम,’’ कहते हुए मैं ने मिलिंद का हाथ हौले से थाम लिया.

मिलिंद ड्राइव कर रहा था और मेरे मन में सोचों का तांता बंधा हुआ था कि आज की सफलता बेहद अहम है. मेरा एक मुद्दत से खुली आंखों से देखा सपना सच हुआ है.

मैं ने जो कुछ भी चाहा मुझे मिला. एक बढि़या कैरियर, मेधावी संतान, शिद्दत से प्यार करने वाला जीवनसहचर…

मैं ने ड्राइव करते हुए मिलिंद से कहा, ‘‘मिलिंद, अगर तुम मेरी जिंदगी में न होते तो मैं कभी ये ऊंचाइयां हासिल नहीं कर पाती. थैंक यू माई लव, तुम दुनिया के बैस्ट हस्बैंड हो.’’

‘‘बैस्ट हस्बैंड या हाउस हस्बैंड?’’ एक हलकी मुसकान के साथ मिलिंद ने मुझ से पूछा.

‘‘अनडाटेडली बैस्ट हस्बैंड, माई ड्रीम हस्बैंड,’’  मिलिंद ने खिलखिलाते हुए मेरा हाथ थाम चूम लिया.

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