Stories : सुनीति बहुत देर से खिड़की से झांक रही थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने मम्मीपापा को क्या जवाब दे. बाहर बहुत शोरगुल था. सुनीति को इस बड़े शहर के शोरगुल से भी कुछ फर्क नहीं पड़ रहा था. वह अपने खयालों में खोई हुई एकटक बाहर देख रही थी. तभी उस के मोबाइल की घंटी बजी और उस का ध्यान भंग हो गया. फोन उस की फ्रैंड चित्राक्षी का था. उस ने सुनीति से पूछा, ‘‘फिर क्या सोचा तुम ने? क्या तुम शादी की खातिर अपनी इतनी अच्छी नौकरी छोड़ दोगी?’’
सुनीति ने जवाब दिया, ‘‘नहीं, ऐसा नहीं है कि मैं नौकरी छोड़ दूंगी. सवाल तो यह है कि मुझे शादी भी करनी है या नहीं.’’
चित्राक्षी ने कहा, ‘‘लेकिन अगर तुम्हें लड़का पसंद आ गया तो फिर?’’
सुनीति ने कहा, ‘‘तो फिर मैं यहां से ट्रांसफर ले लूंगी.’’
उस की फ्रैंड ने कहा, ‘‘देख जो कुछ भी करना, सोचसमझ कर करना,’’ कह कर चित्राक्षी ने मोबाइल रख दिया.
सुनीति फिर सोच में डूब गई. वह एक बहुत सुलझी हुई और समझदार लड़की थी. उस के लिए शादी के कई औफर आते थे. ऐसा नहीं था कि उसे अपने हिसाब का लड़का चुनने की आजादी नहीं थी लेकिन उस के पास ये सब सोचने का टाइम नहीं था इसलिए उस ने ये सब बातें अपने मम्मीपापा पर छोड़ना ही बेहतर समझा. सुबह अपने फ्लैट की किचन में कौफी बनाते समय उस का ध्यान अपने मोबाइल पर गया तो उस ने देखा कि उस की मम्मी ने 4-5 लड़कों के फोटोग्राफ भेजे थे. उस ने बड़े ही मजाकिया अंदाज में उन्हें देखना शुरू किया क्योंकि ऐसा पहले भी कई बार हो चुका था.
सुनीति पहले भी कई लड़कों को रिजैक्ट कर चुकी थी. उसे पता था कि मम्मी द्वारा इस बार भेजे गए फोटोज का भी वही जवाब होगा. लेकिन एक लड़के के फोटो ने उस का ध्यान खींचा. नीली गहरी आंखें, गोरा चिट्टा रंग, एकदम लंबा लड़का. मल्टीनैशनल कंपनी में ऊंची पोस्ट पर काम कर रहा था. ऐसा नहीं था कि
वह खुद किसी से कम थी. वह भी अपनी कंपनी में अच्छे पद पर थी. उस की जैसी स्मार्ट और खूबसूरत लड़की को ऐसा ही लड़का मिलना चाहिए था. उस ने अपनी मम्मी को इस लड़के से मिलने की हामी भर दी.
उधर उस की मम्मी गायत्री खुशी से झूम उठीं. गायत्रीजी स्वभाव से बहुत ही
भली महिला थीं. उन का जैसा सरल स्वभाव मिलना मुश्किल था. वे जहां भी जातीं, सब को अपना बना लेती थी. सुनीति थोड़ी अलग स्वभाव की थीं. उसे लोगों से खुलने में वक्त लगता था. उस का स्वभाव थोड़ा क्रांतिकारी किस्म का था. वह गलत बातों का पुरजोर विरोध करती थी. गलत का साथ देना उसे बचपन से ही गवारा नहीं था. उस की मां ने भले ही अपने जीवन में एडजस्टमैंट का नारा दिया हो लेकिन वह अपने उसूलों से समझौता नहीं करने वाली स्वतंत्र दिमाग की लड़की थी.
गायत्रीजी को सुनीति की इसी बात से डर लगता था कि आगे चल कर वो इस सोच के साथ समाज में अपना जीवन निर्वाह कैसे कर पाएगी? लेकिन सुनीति के पापा हमेशा उन्हें समझाते कि ऐसा नहीं है कि सुनीति एडजस्ट नहीं कर सकती. बात सिर्फ इतनी है कि वह अपने अधिकारों के प्रति सजग लड़की है और नए जमाने की सोच रखती है इसलिए उन्हें ऐसा लगता है.
शाम की ट्रेन से सुनीति घर वापस आ रही होती है तो वह देखती है कि एक अकेली लड़की को एक अधेड़ उम्र का आदमी परेशान कर रहा था. वह बारबार उसे कुछ खाने का प्रस्ताव दे रहा था. सुनीति ने उस आदमी को लताड़ा और लड़की को अपने पास बैठने की जगह दी. यहां तक कि ट्रेन से उतर कर भी उसे औटो में भी बैठाया और फिर वह खुद औटो से घर आ गई. हालांकि उस के पापा ने कार से उसे लाने की बात बोली थी लेकिन उस ने उन्हें इतनी रात को परेशान होने के लिए मना कर दिया.
करीब 11 बजे सुनीति घर पहुंचीं. मां ने आते ही उसे गले लगा लिया. उसे हाथमुंह धोने की कह कर उस के लिए खाना बनाने लगीं. सारा खाना सुनीति की पसंद का था. गाजर का हलवा, गरमगरम खस्ता कचौरी से लेकर गरमगरम पूरियां और खट्टामीठा अचार. इतना सारा खाना देख कर सुनीति के मुंह में पानी आ गया. उस ने बड़े चाव से खाना खाया. खाना खा कर हटने के बाद तो उस की मां ने उस से कहा, ‘‘बेटा, कल पार्लर जा आना. परसों लड़के वाले तुम्हें देखने आएंगे तो तुम्हें अच्छा दिखना होगा.’’
सुनीति हंस पड़ी. उस ने मां से कहा, ‘‘ऐसा नहीं है कि मुझे सजनासंवरना पसंद नहीं लेकिन इतना ज्यादा किसी और के लिए करना मुझे पसंद नहीं.’’
मां का उतरा चेहरा देख कर सुनीति ने कहा, ‘‘अच्छा ठीक है, आप कहती हैं तो मैं चली जाऊंगी. वह क्या है कि औफिस से घर और घर से औफिस, बस अब यही मेरा जीवन रह गया है.’’
सुनीति की मां बोलीं, ‘‘इसीलिए तो बेटा मैं चाहती हूं कि तुम्हें भी एक जीवनसाथी मिले, जिस के साथ हंसीखुशी से तुम अपना जीवन गुजारो. मेरी बात मानो इस रिश्ते के लिए हां कर देना, ऐसा लड़का ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेगा.’’
सुनीति ने कहा, ‘‘मम्मी, बहुत रात हो गई है, मैं भी थक गयी हूं और आप भी. आप सो जाओ, सुबह बात करते हैं. दोनों अपनेअपने कमरे में सोने चली गईं. सुनीति को थकान के कारण तुरंत नींद आ गई.
सुबह उठी ही कि मां कौफी ले कर आ गईं.
‘‘मम्मी, एक बात बताओ, क्या पूरी रात नहीं सोईं? जरूर मेरी शादी की बात सोच रही होंगी,’’ सुनीति ने कहा.
तभी सुनीति के पापा हंसते हुए कमरे में आ गए और बोले, ‘‘तो यह रात को न खुद
सोई, न मुझे शांति से सोने दिया. बारबार लड़के वालों की तारीफ के पुल बांध रही थी.’’
सुनीति मम्मी को समझाते हुए बोली, ‘‘मम्मी, भावुक होना अच्छी बात है पर क्या आप ने कभी यह सोचा कि आप को इस बारे में थोड़ा व्यावहारिक हो कर सोचना चाहिए? आप सीधे हो, जमाना बहुत टेढ़ा है. लोगों को परख कर ही आप को शादी जैसा कदम उठाना चाहिए.’’
गायत्रीजी को अचानक याद आया कि उन्होंने आंच पर दूध रखा है. वे लगभग भागती हुईं जा कर दूध संभालती हैं. दूध उफान ले चुका था. रसोई मे काम फैल चुका था.
तभी सुनीति वहां आ गई और बोली, ‘‘मम्मी लड़की के साथ लड़की की मां को भी सुंदर दिखना होता है. यह सब मैं संभाल लूंगी, आप ऐसा करो फटाफट तैयार हो कर आ जाओ, हम दोनों ही पार्लर हो कर आते हैं.’’
सुनीति के पापा हंसे, ‘‘तुम यह क्या कर रही हो? तुम्हारी मां किसी हीरोइन से कम है क्या? लड़की वाले इसे कहीं तुम्हारी बड़ी बहन न
समझ लें.’’
सुनीति की मां ने झुंझलाते हुए बोलीं, ‘‘देखो मेरा मजाक बनाने से पहले अपने इन सफेद बालों को डाई कर लो. सुना है वे बहुत ऊंचे लोग हैं.’’
सुनीति की मां के ऐसा कहने पर उस के पापा ने कहा, ‘‘मौडर्न और ऊंचा इंसान दिमाग से होता है न कि देखने से और तुम भी नौर्मल रहो, किसी को अगर हम पसंद नहीं तो कोई बात नहीं. हम जैसे हैं, अच्छे हैं.’’
यह बात सुन कर गायत्रीजी चुप हो गईं. फिर दोनों मांबेटी पार्लर जा कर सजसंवर आईं. सुनीति के पापा दोनों को देख कर प्रसन्न हो गए.
लड़के वालों के स्वागत की तैयारी शुरू हो गई. सुनीति की मां सुनीति को एक बनारसी साड़ी निकाल कर पहनने को दी. सुनीति चिढ़ गई. बोली, ‘‘मैं ने बपनी पसंद का सूट पहन लिया है और आप भी लड़के वालों से कह देना कि घर में तो मैं सूट पहन लूंगी लेकिन औफिस जाते वक्त मुझे ट्राउजर और शर्ट पहननी होती है और मैं वही पहनूंगी इसलिए मैं जानबूझ कर यह साड़ी नहीं पहन रही. मैं नहीं चाहती कि किसी भी रूप में मुझे एक पारंपरिक लड़की समझा जाए. मैं जैसी हूं, वैसे ही उन के सामने दिखना चाहती हूं.’’
सुनीति की मां थोड़ा घबरा गईं फिर अपनी बेटी की बात उन्हें सही लगी और फिर वे उस का मूड खराब नहीं करना चाहती थीं इसलिए उसे सौरी बेटा, कह कर चली गईं.
दोपहर के करीब 3 बजे लड़के वाले घर आए. लड़के की मां वाकई बहुत
खूबसूरत थीं. उन को देख कर ही पता चलता था कि वे लोग बहुत अमीर हैं. हालांकि सुनीति का परिवार अच्छाखासा संपन्न था लेकिन उन लोगों के सामने वे लोग कुछ नहीं थे. लड़के की मां का गुरूर देखने योग्य था. उन की साड़ी का पल्लू टस से मस नहीं हो रहा था. वे कहने लगीं, ‘‘ऐसा है जी हमारे वंश के लिए तो बहुत रिश्ते आते हैं लेकिन आप की लड़की का फोटो, बायोडाटा उसे बहुत पसंद आया इसलिए हमें यहां आना ही था. लड़के की पसंद हमारी पसंद,’’ ऐसा कह कर वे मुसकराने लगीं. उन के साथ उन की ननद और बहन भी आई थीं, जो लगातार उन की हां में हां मिलाए जा रही थीं.
उधर सुनीति को जब वंश से मिलवाया गया तो सुनीति देखते ही वंश को भा गई. उस के विचार सुन कर तो वंश और भी प्रभावित हो गया लेकिन सुनीति की मां को एक बात जो सुनीति ने कही थी, उन लोगों तक पहुंचानी थी. उन्होंने कहा, ‘‘देखिए बहनजी, बाकी सब तो ठीक है लेकिन क्योंकि सुनीति वर्किंग गर्ल है, वह औफिस ट्राउजर और शर्ट में जाती है और जाएगी भी और साथ ही घर पर उसे सूट पहने की आजादी होनी चाहिए.’’
वंश की मां का चेहरा यह सुनते ही उतर गया, फिर उन्होंने अपनेआप को संभालते हुए कहा, ‘‘वह सब लड़कालड़की की पसंद. हां, यह तो बताइए कि शादी के बाद सुनीति यहां ट्रांसफर ले लेगी न जैसाकि आप ने कहा था?’’
सुनीति की मां ने कहा, ‘‘हां, जरूर. हम ने यही तय किया है.’’
वंश की मां ने कुछ राहत की सांस ली और जब वंश आया तो उस से मुसकरा कर इशारे से सुनीति के बारे में पूछा. वंश हंस पड़ा तब जा कर वे थोड़ा मुसकराईं. लेकिन उन का दांव अभी भी बाकी था. उन्होंने घर जा कर जवाब देने की बात कह कर वहां से रुखसत ली.
घर जा कर वंश की मां ने वंश से पूछा तो उस ने रिश्ते के लिए हां कर दी लेकिन बूआजी ने यह कहते हुए टांग अड़ा दी कि वह तो औफिस में पैंटशर्ट पहन कर जाएगी, तो क्या भाभी आप बहू को पैंटशर्ट पहनने दोगी? ऐसे में वंश की मां का सारा उत्साह ठंडा पड़ता हुआ नजर आया. वे लड़की वालों के सामने शर्त रखना चाह रही थीं कि लड़की घर पर और बाहर भी उन की पसंद के कपड़े पहने खासकर घर में साड़ी और औफिस में सूट.
जब वंश को यह पता चला कि मां लड़की वालों से इस तरह की शर्त रखने वाली हैं
तो उन्हें रोक कर उस ने कहा, ‘‘मां, मैं शादी करूंगा तो सिर्फ इसी लड़की से और वह भी बिना किसी शर्त के और बूआ को भी बता दीजिए कि ऐसी कोई शर्त न रखें जिस से कि वे लोग परेशान हों. शादी बिलकुल सादे तरीके से होगी, मुझे दिखावा बिलकुल नहीं चाहिए.’’
वंश की मां का चेहरा उतर चुका था. लेकिन उन के अंदर सुनीति के प्रति एक जलन ने जन्म ले लिया था. उस लड़की के प्रति जो अभी तक इस घर में आई भी नहीं थी. ऐसा भाव वाकई में उचित नहीं था. उधर वंश के पापा ने वंश की मां को लड़की वालों से शादी की बात के लिए हां का फोन करने के लिए कहा. वंश की मां ने फोन पर हां तो कर दी लेकिन उन के मन में कई शंकाएं थीं. सुनीति को भी वंश बहुत भाग गया था और वह भी बहुत खुश थी.
सुनीति के मातापिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वे तो इतने खुश थे कि उन्होंने शादी की तैयारी तुरंत शुरू कर दी. वंश की मां ने जैसा वंश ने कहा था, वैसी ही शादी की बात सुनीति के मातापिता तक पहुंचा दी. वे बेचारे तो इसी गलतफहमी में थे कि सुनीति की सास कितनी अच्छी हैं कि इतनी सादगी भरी शादी की बात कह रही हैं. खैर, शादी संपन्न हुई और सुनीति
5 कमरों के मकान से सीधा 25 कमरों के बड़े घर में आ गई.
घर की 1-1 चीज घर की शानोशौकत बताती थी लेकिन जैसाकि सुनीति का स्वभाव था
वह इन सब से प्रभावित नहीं होती थी. घर पर पहुंचते ही सुनीति की सास के द्वारा उसे कम गहने लाने की बात का ताना मारा गया. वे कहने लगीं, ‘‘इस से ज्यादा जेवर तो मैं ने पिछली बार अपनी नौकरानी की बेटी की शादी में दे दिए थे.’’
सुनीति क्योंकि एक समझदार लड़की थी, उस ने इस बात पर ज्यादा गौर नहीं की और इग्नोर कर दिया. उधर सुनीति की बूआ सास और मौसी सास सुनीति पर निशाना साधने लगी थीं.
मौसी सास कहतीं, ‘‘इतना बढि़या लड़का था, चाहते तो सोने के महलों से राजकुमारी ले कर आते लेकिन क्या करें. इसे तो सुनीति पसंद आ गई.’’
बूआ सास ने आग में घी डाला, ‘‘वैसे सुनीति तुम तो अपने मांबाप की इकलौती बेटी हो, पढ़ाईलिखाई तो तुम ने ज्यादा ही की है, उस हिसाब से घर का काम तो तुम्हें आता नहीं होगा. तुम्हारी सास बहुत अच्छा खाना बनाती है, सिर झुका कर सारी बातें सुन लेना और सीख लेना वरना भाभी का स्वभाव तुम नहीं जानती हो.’’
तभी सुनीति के देवर ने दोनों को तीखी नजरों से देखा तो दोनों सकपका वहां से अंदर चली गईं. वह सीधे अपनी मां के पास जा कर बोला, ‘‘मम्मी, आप ने मौसी और बूआ को बहुत ज्यादा छूट दे रखी है. आप को पता है अभी ये भाभी से क्याक्या कह रही थीं?’’
सुनीति की सास ने तेवर दिखाए और बोली, ‘‘अब तू बड़ों को सिखाएगा कि किसे, कब और क्या कहना है? जा, अपना काम कर.’’
उधर जब 3-4 दिन बाद सुनीति ने औफिस जाने के लिए कदम बढ़ाया तो बूआ और मौसी दौड़ीदौड़ी सुनीति की सास के पास गईं और बोलने लगीं, ‘‘देखोदेखो, कैसे पैंटशर्ट पहन कर निकली है. बाहर किसी ने देखा तो कोई क्या कहेगा.’’
सुनीति की सास जोर से चिल्ला कर बोलीं, ‘‘सुनीति, तुम्हें क्या बिलकुल तमीज नहीं सिखाई गई कि नई दुलहन को किस तरह से रहना चाहिए और ये क्या. क्या 15 दिन की भी छुट्टी नहीं मिली? अभी तो तुम दोनों का हनीमून भी नहीं हुआ है. हद कर दी तुम ने तो.’’
सुनीति थोड़ा घबराई लेकिन फिर उस ने अपनेआप को संभाला. कहा, ‘‘मेरी वंश से बात हो गई है. उन्होंने ही मुझे औफिस जाने को कहा है क्योंकि हम सर्दियों के बाद ही घूमने जाएंगे.’’
तभी मौसी सास कहने लगी, ‘‘देखो दीदी, मैं नहीं कहती थी कि इतनी पढ़ीलिखी लड़की मत लाओ, देखा कैसे जबान चलती है इस की. कैसे अपने पति का नाम आप के सामने लेती है.’’
और फिर आग में घी का काम किया बूआ सास ने. इस सारे तमाशे के बीच वह एक साड़ी उठा कर ले आईं, ‘‘देखो न भाभी, तुम्हारे समधियों ने कैसी साड़ी दी है मुझे. न कलर अच्छा है और न ही कपड़ा.’’
सुनीति ने हंगामा बढ़ता देखा तो उस ने कमरे में वापस जाने की सोची. तभी वहां वंश आ गया और कुछ देर बाद उस के पापा भी आ गए और कहने लगे, ‘‘सुनीति, ड्राइवर बाहर खड़ा है, तुम औफिस जाओ और तुम भी जाओ वंश. तुम लोग अपनाअपना काम करो.’’
फिर उन्होंने वंश की मां से कहा, ‘‘वंश की मां, आप के तो कहने ही क्या? नई लड़की है, ऊपरनीचे हो जाता है. क्या हमारी अनामिका जींस नहीं पहनती और दीदी साड़ी मैं आप को ला कर दूंगा, बेमतलब का हंगामा न करें.’’
इस बात को सुन कर बूआजी ने रोने का नाटक किया, तो वंश के पापा ने हाथ जोड़ कर उन से माफी मांगी, तब जा कर वे मानीं.
शाम को सुनीति और वंश का मूवी जाने का प्रोग्राम था तो वंश की मां, मौसी और
बूआ ने एक षड्यंत्र किया. उन्होंने घर के सारे बच्चों को उन के साथ भेज दिया ताकि दोनों अकेले समय नहीं बिता पाएं. सुनीति से ज्यादा बुरा वंश को लगा. पूरा दिन घर में बच्चों को सुनीति के कमरे में भेज दिया जाता. वंश को सुनीति से बात करने का मौका भी नहीं मिलता. वंश झुंझला कर रह जाता. उधर सुनीति के हाथ की मेहंदी भी नहीं सूखी थी, नौकरों को छुट्टी दे दी गई और सुनीति से सारे घर के काम कराए जाने लगे.
वंश अपनी मां के बदले हुए व्यवहार को देख कर चक्कर खा गया. हालांकि सुनीति ने उस से कुछ नहीं कहा लेकिन वह सब समझ रहा था. उधर सुनीति ने जब बूआ सास और मौसी सास की बहुओं से जब बात की तो उन्होंने दोनों की छोटी और चालाकी भरी मानसिकता के बारे में सुनीति को बता दिया.
अब सुनीति काफी सतर्क हो गई थी लेकिन एक दिन जब सुनीति को औफिस से आने में देर हो गई तो सुनीति की सास ने काफी हंगामा किया, सुनीति भी काफी परेशान हो गई थी. उस ने शादी के बाद से ही चैन की सांस नहीं ली थी. उस ने वंश से कह दिया कि उसे रहने के लिए इतना बड़ा घर नहीं, सुकून चाहिए. हम वापस आ जाएंगे अगर मम्मी अपना व्यवहार बदल ले तो लेकिन फिलहाल के लिए मुझे कहीं और ले चलो. वंश भी दोनों के बीच काफी पिस चुका था. वह सीधा अपने पापा के पास गया.
वेश के बिना कुछ बोले ही उस के पापा ने कहा, वंश, पास ही अपना 4 बीएचके फ्लैट है, वैलफर्नीशड है, तुम कल सुबह ही सुनीति के साथ वहां रहने चले जाओ. तुम्हारी मां हंगामा करेगी लेकिन इस वक्त तुम्हारा वैवाहिक जीवन बचाना ज्यादा जरूरी है. तुम्हारी मां अच्छी है लेकिन उस की सोच पुरानी है. वह सबक सीखेगी, तभी बदलेगी. फिलहाल तुम दोनों का यहां से जाना ही अच्छा है.’’
वंश सुनीति को ले कर अलग हो गया. उधर वंश की मां का रोरो कर बुरा हाल था.
बूआ और मौसी ने अपने बताए रिश्तों की विशेषताएं गागा कर उन का और भी बुरा हाल कर दिया था. वक्त परिंदे की तरह तेजी से बढ़ता चला जा रहा था. वंश की मां अकेली पड़ रही थी. बूआ और मौसी अपनेअपने घर लौट चुकी थीं. वैसे भी अब उन के पास चुगली करने की कोई वजह बची भी नहीं थी. सुनीति की अनुपस्थिति ने पूरा घर सूना कर दिया था. नई बहू के आगमन की खुशी काफूर हो चुकी थी.
उधर सुनीति ने अपने अनुभव से प्रेरणा ले कर अपना एक ग्रुप बनाया था जो ससुराल में बहुओं पर तानाशाही चलाने वाले लोगों और उन के जीवन को नर्क बनाने वालों को सही रास्ते पर लाने का काम करता था. वंश की बूआ और मौसी की बहुओं को जब यह पता चला तो वे भी सुनीति के साथ हो लीं.
सुनीति हर 15 दिन में सारी महिलाओं को एकत्रित करती और उन्हें गलत के खिलाफ आवाज उठाने को प्रेरित करती. अब तो बूआ और मौसी के घर भी क्रांति की ज्वाला से धधक रहे थे. उन दोनों की बहुओं के मन में धधक रही बरसों की आग अब ज्वाला बन गई थी. उन्होंने अपने मन को इतनी बार मारा था कि अब वे और समझौता करने को तैयार नहीं थीं.
दोनों भागीभागी सुनीति की सास को ये सब बताने गईं. सुनीति की सास पहले ही काफी भुगत रही थीं. अकेले पड़ेपड़े उन का जी घबराता था. उन का वंश और सुनीति से मिलने का मन करता था लेकिन अभिमान उन्हें ऐसा करने से रोकता था. वे मन ही मन अपनेआप को कोसती थीं तो कभी अपनेआप को सही भी ठहराती थीं.
ऐसे में बूआ सास और मौसी सास दोनों ने अपना हाल बताया और उलाहना भी दिया कि यह सब तुम्हारी बहू की करतूत है.
अब की बार 6 महीने से भरी पड़ी सुनीति की सास को क्रोध आ गया. उन्होंने कहा, ‘‘हर बार मेरी बहू गलत नहीं हो सकती. तुम दोनों ने मेरे दिमाग में उस के खिलाफ इतना जहर भरा कि वह मेरे बेटे सहित अलग हो गई. मैं तो यही कहूंगी कि मैं और तुम दोनों ही क्या, सभी सासों को जो बहुओं को कुछ भी नहीं समझतीं और उन्हें आजादी नहीं देतीं, उन्हें अपनी आदतों में सुधार कर लेना चाहिए.
‘‘मैं तो अभी सुनीति के पास जा रही हूं. मैं अपने बच्चों से और अलग नहीं रह सकती. मेरी मानो तुम भी वहीं चलो. मैं ने सुना है कि क्लब के ये सारी बहुएं हर 15 दिन में मीटिंग करती हें, तुम्हारी बहुएं भी वहीं होंगी.
मौसी और बूआ सुनीति की सास का ऐसा बदला स्वरूप देख कर दंग रह गईं. लेकिन उन्हें भी अकेलेपन से डर लग रहा था तो वे भी सुनीति की सास के साथ क्लब आ गईं. वहां सुनीति महिलाओं की काउंसलिंग कर रही थी. जैसे ही अपनी सास को सुनीति ने देखा वह उठ कर उन से मिलने आई और उन के पैर छुए. बड़े प्यार से उन्हें बैठाया. मौसी और बूआ की बहुएं भी आ चुकी थीं. सुनीति की सास ने उस से माफी मांगी और घर चलने का आग्रह किया.
सुनीति ने कहा, ‘‘मम्मी, मैं भी आप को सौरी कहना चाहती हूं लेकिन मेरे पास और कोई रास्ता नहीं बचा था. मौसी और बूआ भी अपनी बहुओं से वापस घर आने की बात कहने लगीं.’’
तभी सुनीति ने कहा, ‘‘देखिए मौसीजी और बूआजी, आप मम्मी की देखादेखी इन्हें
वापस मत ले कर जाइए. पूरे दिल और खुले दिमाग के साथ इन की घर वापसी होनी चाहिए और मम्मी पहले मैं घर जाती हूं फिर मैं वंश से बात करूंगी. तभी मैं घर वापस आने की सोच सकती हूं.’’
उधर वंश की मां शाम को बेसब्री से इंतजार करने लगीं. वंश जब शाम को घर आया तो सुनीति ने उसे यह सब बताया.
वंश बोला, ‘‘देखो, आज मां अकेले रह जाने के डर से ये सारी बातें बोल रही हैं लेकिन बाद में इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वे आगे ऐसा नहीं करेंगी. फिर वही ताने, लड़ाईझगड़ा और बाद में अलग होना. मैं यह सब दोबारा नहीं चाहता.’’
सुनीति ने कहा, ‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि चाहे कोई भी कारण रहा हो, मम्मी अब बदल गई हैं. फिर हर आदमी को एक मौका तो मिलना ही चाहिए.’’
वंश मुसकरा दिया. दोनों मां के साथ रहने घर की ओर चल दिए. घर पहुंचे तो पापा ने उन्हें गले लगा लिया.
वंश की मां के आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे. उन की खुशी का ठिकाना नहीं था. ऐसा लग रहा था कि वंश आज ही सुनीति से शादी कर पहली बार उसे घर ले कर आया था. मां ने दोनों की आरती उतारी.
वंश के पापा ने कहा, ‘‘हर घर में कुछ न कुछ जरूर घटता है लेकिन जरूरत है समझदारी से उसे हल करने की. सुनीति की ससुराल अब उस की ससुराल नहीं, मायका बन गयाथा. सुनीति ने अपना भविष्य खुद अपने हाथों से लिखा है जिस में न कोई कष्ट है, न अपमान और न दुविधा बल्कि सुकून और शांति है.
-रितुप्रिया शर्मा
