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पिछला भाग पढ़ने के लिए- शायद- क्या हो पाई निर्वाण और प्रेरणा की दोस्ती?

प्रेक्षा रोते हुए वहीं जमीन पर बैठ गई. उसे अब सबकुछ लुटपिट जाने का आभास  होने लगा था. वह देर तक जमीन पर बैठी रोती रही.

प्रद्युमन वहां से उठ कर अपने कमरे में चले गए. कुछ देर बाद प्रेक्षा अपने चेहरे पर पानी डाल थोड़ा शांत हुई और फिर प्रद्युमन के पास गई. जाते ही सीधे बोल पड़ी, ‘‘निर्वाण ने कहा था वह मुझ से शादी करेगा. उस ने मुझ से वादा किया और मुझे यह अंगूठी भी दी थी.’’

‘‘यह अंगूठी बनावटी है आर्टिफिशियल... उस के वादे की तरह.’’

‘‘मैं ने अंगूठी नहीं, उस की भावना देखी थी?’’

‘‘यह अंगूठी नहीं लाइसैंस था संबंध बनाने का... सब सौंप दिया या कुछ बचा भी? माफ करना मैं मजबूर हूं ये सब पूछने को... तुम ने मुझे बेइज्जत करने का पूरा इंतजाम कर दिया... तुम्हारी मां को क्या कहूंगा मैं?’’

‘‘नहीं पता यह लाइसैंस था या कुछ और... मैं क्या चाहती थी, खुद ही नहीं समझ पाई.’’

‘‘अब क्या? पापा से कहो जा कर अपने.’’

‘‘घर में कह पाती तो आप के पास कहने क्यों आती? आप निर्वाण से कहो न एक बार.’’

‘‘कैसी लड़की हो तुम? जानती हो उस ने तुम्हें बताया नहीं ताकि तुम से संपर्क न रहे, फिर भी... मैं ने उस के दिए नंबर पर पहले ही फोन कर के देख लिया है... सब खत्म है... सब खत्म है... उस का नंबर भी जीवित नहीं है?’’

‘‘मेरी तबीयत ठीक नहीं उस से नहीं तो किस से कहूं?’’ हताश हो कर चीख पड़ी प्रेक्षा.

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