प्रेम एक ऐसी यात्रा है, जिस की मंजिल तय करने के लिए एकसुढृढ़ शरीर से कहीं ज्यादा एक अडिग मन का होना जरूरी है.
कविता की आंखों को देख कर अनुराग न जाने कितनी पढ़ दिया करता था. उस के लिए कविता के बाल कभी कालिदास की रचना मेघदूतम बन जाते. तो कभी कविता का रूप, प्रेम शृंगार में डूबा अभिज्ञान शाकुंतलम की कहानी. आखिर कविता की सुंदरता भी शकुंतला से कम न थी.
अनुराग अकसर कविता को कहता, ‘‘अगर आज राजा दुष्यंत जीवित होता तो देखता की उस की शकुंतला, प्रेम साहित्य के रूपसौंदर्य में मेरी कविता से थोड़ा पीछे रह गई है.’’
इस पर कविता उस का हाथ अपने हाथ से झटकते कहती, ‘‘अब इतनी बढाई मत करो मेरी नहीं तो दुष्यंत की आत्मा तुम से लड़ने न आ जाए.’’
अनुराग फिर से उस का हाथ अपने हाथ में थामा कहता, ‘‘तो क्या हुआ. लड़ने का जज्बा मैं भी रखता हूं और इस युग की शकुंतला तुम्हें बनाए रखने के लिए मैं एक क्या 10 दुष्यंतों से लड़ जाऊं.’’
कविता उठ कर गार्डन की लगी घास अपने कपड़ों से ?ाड़ते हुए बोली, ‘‘सुनिए, हिंदी साहित्य के महान प्रोफैसर साहब, आप का और मेरा प्रेम कोई प्रेम रचना या कथा नहीं बल्कि एक सच्चा जीवन है. इसलिए मु?ो मेरे पीजी छोड़ कर अपने घर जाए और सोचें कि आप को मु?ा से विवाह करना है या मु?ो प्रेम प्रसंग बना कर छोड़ देना है.’’
अनुराग ?ाट से खड़ा हो. बोला, ‘‘नहींनहीं, मेरी सुंदर कविता मैं विवाह करूंगा तुम से. बस थोड़ा धीरज रखो.’’
‘‘पहले तुम चुप करो,’’ कविता आगे चलतेचलते बोली, ‘‘अब मैं थक गई यों बात करते अब नौर्मल भाषा में बात करें नहीं तो मैं अपना फाइनैंस नौलेज भूल रागमलहार न गाने लगूं.’’
अनुराग ने सिर हिला हामी भरी.
कविता बोलती रही, ‘‘दुनिया में आजकल लड़के इंग्लिश, फाइनैंस के प्रोफैसर बन रहे हैं तो तुम्हें क्या सू?ा हिंदी लिटरेचर का प्रोफैसर साहब बनने की बोलो?’’
अनुराग ने कहा, ‘‘और उन इंग्लिश, फाइनैंस के प्रोफैसर्स को छोड़ तुम्हें क्या पड़ी इस हिंदी प्रोफैसर से प्यार करने की. तुम बोलो?’’
कविता अपनी बालों की लटों में उंगली घुमाते हुए बोली, ‘‘क्योंकि यह
हिंदी का प्रोफैसर बातें बहुत मीठीमीठी करता है. इसलिए फंस गई.’’
अनुराग भी अपनी जुल्फों में हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘नहीं तो, हिंदी के इस प्रोफैसर को पता है कि सुंदर लड़की मीठी बातों से मिलेगी. इसलिए तो हिंदी लिटरेचर को चुना.’’
गार्डन से बाहर आ अनुराग ने अपनी बाइक स्टार्ट की और कविता को ले निकल पड़ा. करीब आधे घंटे की राइड के बाद अनुराग ने कविता को उस के पीजी उतारा.
कविता ने जाने से पहले अनुराग से कहा, ‘‘19 साल की उम्र से अपने प्रोफैसर से दिल लगा बैठी थी मैं. अब पूरे 4 साल हो गए. देखो मेरे 23वें जन्मदिन में मु?ो तुम्हारे नाम की अंगूठी पहननी है और वह भी सब के सामने यानी हमारी सगाई और ऐसा नहीं हुआ तो तो सम?ा लो कि इस कविता को प्रेमी प्रोफैसरों की कमी नहीं.’’
अनुराग हाथ जोड़ बोला, ‘‘मेरी प्यारी कविता, आप का 23वां जन्मदिन तो अगले महीने ही है.’’
कविता ने लंबी सांस भर कहा, ‘‘मतलब तुम से नहीं होगा.’’
अनुराग कविता का रूठा चेहरा देख बोला, ‘‘अरे क्यों नहीं होगा. कल अपने घर पर बात करूंगा, अगले हफ्ते तुम्हारे घर पर और अगले महीने सगाई.’’
कविता मुंह बना कर बोली, ‘‘1 हफ्ता लगेगा तुम्हें मेरे घर पर बात करने में?’’
अनुराग फिर से हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘देवी दया. सुनो मेरी प्यारी, तुम
जब अगले हफ्ते घर जाओगी तभी न मैं आऊंगा वहां. अकेले बात कर आऊं, क्या यह चलेगा तुम्हें?’’
कविता एक छोटी सी मुसकान लिए बोली, ‘‘ठीक है मेरे फकीर जैसे तुम बोलो. लेकिन अगले हफ्ते यानी अगले ही हफ्ते. कोई टालमटोल अब नहीं चलेगी. वैसे भी जब से यह दिल्ली का औफर आया है तब से सब बहुत खुश हैं कि मैं वाराणसी से वापस घर दिल्ली आ जाऊंगी. लेकिन मु?ो अकेले नहीं जाना. तुम सगाई करो और अपना ट्रांसफर लो वहां की किसी यूनिवर्सिटी में सम?ो?’’
अनुराग सिर झुका बोला, ‘‘जी मालकिन.’’
अनुराग कविता को अलविदा कह निकल गया. यूनिवर्सिटी का साल खत्म हो चुका है. स्टूडैंट्स की छुट्टियां पड़ी हैं. यूनिवर्सिटी की रोज की दौड़भाग भी शांत है. कविता और अनुराग के इस प्रेम संबंध की आज तक यूनिवर्सिटी में किसी को भनक भी नहीं पड़ी नहीं तो पूरी यूनिवर्सिटी में हिंदी प्रोफैसर और फाइनैंस ओनर्स स्टूडैंट के प्रेम गीत बज रहे होते. और वैसे भी 3 साल तो अनुराग और कविता के बीच केवल एक आम बात और आंखों की शरमाशरमी का दौर ही हुआ करता था. दोनों ही अपने दायरे में रहते थे ताकि उन की आंखों की कहानी कहीं यूनिवर्सिटी का फसाना बन उन का नामना खा जाए.
दरअसल, इन दोनों का प्रेम तो यूनिवर्सिटी के बाहर बीते 1 साल में अधिक जोर पकड़ा. जब कविता यूनिवर्सिटी से पास हो आम दुनियादारी में लग गई. जहां अनुराग को आम दिनों की तरह कविता सूरत देखनी को नहीं मिलती थी और कविता को अनुराग की कविताएं नहीं सुनाई देती थीं. अपने इसी अभाव को पूरा करते आखिर दोनों एक हो ही गए.
अगले दिन अनुराग अपने और कविता के प्रेम संबंध पर परिवार की मुहर
लगवाने के लिए वाराणसी से मिर्जापुर अपनी बाइक पर निकल गया. अनुराग को देख घर वाले काफी खुश थे. बहुत से पकवानों का स्वाद ले जब अनुराग शांति से अपने मांबाप के साथ बैठा तो मां ने उस की शादी की बात छेड़ दी.
अनुराग ने मां की पूरी बात सुनी और फिर नजर नीचे कर अपने और कविता के रिश्ते के बारे में बताया. मां ने अनुराग का प्रेमराग सुन ?ाट से उस के पापा की ओर देखा.
अनुराग के पापा ने बड़े गंभीर स्वर में कहा, ‘‘अच्छा, तो अब तुम यह सब भी पढ़ाने लगे.’’
अनुराग ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. पापा ने फिर पूछा, ‘‘अब पढ़ाई के बाद लड़की क्या करती है?’’
अनुराग ने ?ाट से जवाब दिया, ‘‘एक प्राइवेट बैंक में जौब कर रहा है. मगर अब वही बैंक अपनी दिल्ली ब्रांच में पोस्टिंग कर रहा है.’’
पापा ने सुनते ही कहा, ‘‘अच्छा, मतलब अब लड़की अपने होमटाउन जा रही है. फिर तो तुम्हें भी पीछेपीछे जाना होगा. है न?’’
अनुराग के मन में तो हां ही थी, लेकिन पापा को नाराज नहीं करने के लिए उस ने कह दिया, ‘‘पापा ऐसा नहीं है. मैं ठीक हूं यहां भी.’’
अनुराग के पापा एक मीठी मुसकान दिए बोले, ‘‘अरे, बाबू कालिदास. हम सब सम?ाती हैं. तुम्हारी उम्र का रास्ता हम बरसों पहले तय कर आए तो हमें न समझाओ, तुम्हें क्या ठीक है क्या नहीं. भला हम क्यों तुम्हारे मधुबन का कांटा बनें. किसे पता, तुम कब कालिदास से देवदास बन जाओ.
‘‘जाओ लड़की के मांबाप से मिल आओ. वे हां कह दें, तो तुम दोनों का लग्न निकलवा देंगे.’’
बस इतना सुनते ही अनुराग के मन में कई तरंगें दौड़ उठीं. उस ने ?ाट से पापा की हामी की बात कविता को मैसेज कर दी. जिसे पड़ वह भी उत्साहित हो उठी.
रात को अनुराग बिस्तर पर अपने प्रेम सागर में डुबकी लगा रहा था. अनुराग बहुत खुश
था, इसलिए नहीं कि उस के मांबाप मान गए बल्कि इसलिए कि उस के मांबाप बिना कोई सिरदर्दी किए मान गए. न मां ने कोई अपनी पसंद की बहू की मांग की, न पापा ने जातसमाज का कोई राग सुनाया. वह तो अब बस यही चाह रख रहा था कि इतनी ही सहजता कविता के घर वाले भी दिखाएं.
इस बीच मां चुपके से अनुराग के कमरे में आईं और उसे खुशी की हिलोरें लेते देख जोर से हंस पड़ीं. मां को देख अनुराग शरमा गया.
मां अनुराग की बगल में बैठ बोलीं, ‘‘अब जरा दिखा भी दे अपनी हीरोइन का फोटो मु?ो.’’
अनुराग अपने कमरे का दरवाजा बंद कर बोला, ‘‘अरे मां फोटो क्यों तुम लाइव देखो’’ और अनुराग ने कविता को वीडियो काल की.
कविता ने 2 रिंग बाद काल उठाई तो अनुराग के साथ उस की मां को देख थोड़ा सकपका गई. उस ने आंखें नीचे कर नमस्ते कहा. मां ने आज पहली बार कविता को देखा था और कुछ देर देखती ही रह गईं. कविता का रूप देख मां की आंखों में भी चमक आ गई.
मां कविता से कहा, ‘‘अच्छा तो यह है हमारे विश्वामित्र की मेनका.’’
इस पर कविता लजा गई. फिर मां मुसकान लिए कविता और अनुराग को काल पर छोड़ अपने कमरे में चली गईं.
अनुराग कविता से बोला, ‘‘अरे, नजरें ऊपर करो. मां चली गईं.’’
कविता अनुराग की ओर ताक बोली, ‘‘तुम्हारे घर में कोई नौर्मल भाषा बोलता ही नहीं.’’
अनुराग हंस कर बोला, ‘‘लो तो नौर्मल भाषा में बोल देते हैं. अरे कविता, तुम बहुत सैक्सी लगती हो.’’
कविता अनुराग की बात सुनते ही अपने बैड पर लोटपोट होने लगी.
अनुराग कविता से बोला, ‘‘इतवार को आ रहा हूं मैं, तुम्हारा हाथ मांगने. तैयार रहना. पापा से मत कह देना कि अरे, पापा मैं तो इसे जानती ही नहीं.’’
‘‘पापा तो राह देख ही रहे हैं संडे की. वे भी तो मिलना चाहते हैं राजा दुष्यंत उर्फ विश्वामित्र उर्फ प्रोफैसर अनुराग से,’’ कविता बोली.
यह 1 हफ्ता तो अनुराग ने बड़े मजे से गुजारा. घर में मां के हाथ के बने पकवानों का खूब स्वाद लिया, पासपड़ोस के पुराने दोस्तों के साथ खूब क्रिकेट खेला, मां के साथ बहुत सी खरीदारी की और पापा की दुकान का कुछ छोटामोटा काम भी कर दिया. साथ मां और कविता के बीच में अभी से तालमेल बैठाने के लिए दोनों की 2-3 बार वीडियो काल पर बात भी कर दी. मां ने अनुराग से कविता का नंबर भी ले लिया ताकि अनुराग के जाने के बाद जब मन चाहे तब कविता से बात कर सके. अब तो बस इतवार का इंतेजार था.
उधर कविता भी बड़े उत्साह से अपने कमरे के परदे बदल रही थी. घर का हर
कोना साफ कर रही थी. घर की सजावट कर रही थी. कविता को इतना फुरतीला देख उस की मां ने ताना मारा, ‘‘देखो तो जरा पापा की गुडिया को. आज तक एक गिलास उठा कर किचन में नहीं रखा. अपने कपड़े तह नहीं किए. मगर आज दूसरों की आवभगत में पूरा घर चमका रही है. आज इस के हाथ नहीं टूट रहे. जब मैं बोलती थी कि जरा कपड़ा ले टेबल पर मार दे तो इस की कलाई में मोच आ जाती थी.’’
मां का ताना सुन कविता की छोटी बहन प्रिया जोरजोर हंस रही थी और कविता मां को अनसुना कर अपना काम कर रही थी.
उधर मां भी ताने मारती ही जा रही थीं, ‘‘प्रोफैसर से दिल लगा लिया. लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे कि पढ़ाई करती थी या रासलीला और वह प्रोफैसर, उसे तो देखो. उस ने भी नहीं सोचा कि स्टूडैंट से यह सब ठीक नहीं. पता नहीं, पहले कितनों को अपनी प्रेम कहानी पढ़ा चुका है.’’
यह ताना सुन कविता ने मां को घूर कर देखा.
‘‘घूरो मत मु?ो. पापा ने अभी सिर्फ मिलने पर हां भरी है. अगर हमें थोडा भी कुछ खटका, तो हम साफ मना कर देंगे. वैसे भी यह प्रोफैसरस्टूडैंट वाली कहानी मु?ो पसंद नहीं आई,’’ मां बोलीं.
इस पर प्रिया बोली, ‘‘अरे मां, अब जाने भी दो और वह प्रोफैसर कोई बूढ़ा थोड़ी है. है तो जवान ही. कुछ साल ही तो बड़ा है दीदी से. खराबी क्या है? पढ़ालिखा कमाऊं, शक्ल भी ठीक है.’’
मां फट से बोलीं, ‘‘अच्छा तो तू मिली है उस से?’’
‘‘नहीं, मैं नहीं मिली,’’ प्रिया संकुचा कर बोली.
मां ने सवाल किया, ‘‘तो शक्ल कैसे ठीक बोल दी तूने?’’
प्रिया ने कहा, ‘‘अरे मां, दीदी के फोन में बहुत सारे फोटो हैं उस के. तुम भी देख लो.’’
मां ने उखड़ कर कहा, ‘‘मु?ो नहीं देखने. आजकल के फोन में इतने फिल्टर हैं कि गधा भी घोड़ा दिखता है.’’
मां की बात सुन प्रिया फिर से लोटपोट हो गई और कविता मुंह फुला अपने कमरे में चली गई.
रात को मां के ताने जब कविता ने अनुराग को बताए तो वह बोला, ‘‘क्या तुम्हारे घर में कोई नौर्मल बोल नहीं बोलता.’’
कविता ने पूछा, ‘‘मतलब?’’
अनुराग ने कहा, ‘‘तुम मु?ो फकीर बोलती हो और तुम्हारी मां गधा.’’
इस पर कविता हंस पड़ी और बोली, ‘‘तो नौर्मल भाषा में बोल देती हूं, प्रोफैसर अनुराग तुम्हारा इंतजार रहेगा.’’
शनिवार की रात मिर्जापुर में मां ने कहा,
‘‘8 बज गए, पापा तो तेरे आए
नहीं अभी दुकान से. तेरी ट्रेन कितने बजे की है? स्टेशन से सीधा नींद भरा चेहरा ले कर जाएगा लड़की के घर?’’
अनुराग मां के सवालों को शांत करते बोला, ‘‘9 बजे की ट्रेन है. रातभर सोऊंगा. दिल्ली में एक दोस्त है तो सुबह पहले उस के घर जाऊंगा. वहां नहा कर, तैयार होने के बाद लड़की के घर जाऊंगा. अब ठीक है न?’’
मां ने हामी भरी. कुछ देर बाद पापा के आते ही अनुराग उन का आशीर्वाद ले स्टेशन चल दिया. ट्रेन समय पर थी. ट्रेन में बैठ अनुराग ने पापा और कविता को अपने ट्रेन में सकुशल बैठने का मैसेज किया और एक किताब पढ़ते हुए सो भी गया. सुबह स्टेशन पर अनुराग का दोस्त सचिन खड़ा मिला. दोनों गले मिले और घर चल दिए.
सचिन के घर पहुंच अनुराग रास्ते की थकान उतारने को नहाने चला गया और सचिन दोनों का नाश्ता लेने बाहर. कुछ देर बाद जब अनुराग नहा कर निकला तो सचिन इडली, सांबर वड़ा और कड़क चाय लिए बैठा था.
‘‘वाह जी वाह…’’ अनुराग ने कहा.
सचिन भी मुसकरा कर बोला, ‘‘भाई मैं अकेले रहता हूं तो कुछ भी कच्चापक्का बना खा लेता हूं. मगर आज तू आया तो सोचा तेरे आने की खुशी में मैं भी क्यों न थोड़ा बढि़या नाश्ता कर लूं.’’
दोनों दोस्तों ने नाश्ते का खूब लुत्फ उठाया. चाय की चुसकियां लेते, सचिन ने पूछा, ‘‘वैसे किस काम के सिलसिले में आया है?’’
अनुराग नहीं चाहता था कि अभी सचिन को कुछ बताए. एक बार कविता के पापा भी हां बोल दें, फिर तो वह ढोल पीटते हुए अपनी लवस्टोरी सब को सुनाएगा. अनुराग ने बड़ी आसानी से कहा, ‘‘अरे, एक चचेरे भाई के यहां जाना है. कुछ पारिवारिक मसला है.’’
सचिन ने कहा, ‘‘अच्छा, वैसे मैं तु?ो वहां छोड़ आता, लेकिन एक जरूरी काम से नोएडा जाना है. तू चाहे तो बाइक ले जा. मैं वैसे भी मैट्रो से जाऊंगा.’’
अनुराग ने हामी भर दी.
अनुराग के लिए दिल्ली अनजान नहीं थी. अपने कालेज की पढ़ाई उस ने वहीं से की थी. इसलिए दिल्ली की हर गली से वह वाकिफ था. कविता से कुछ देर फोन पर बात कर वह दोपहर को बाइक ले कविता के घर निकल पड़ा.
कविता ने अनुराग के लिए अपने हाथों से खाना बनाया था, जिसे देख कविता की मां ने फिर ताना कसा, ‘‘मां के लिए तो आज तक एक चाय नहीं बनी मैडम से और राजा बाबू के लिए कड़ाही पनीर, दाल मक्खने और पुलाव बनाया है.’’
कविता भी इस पर ?ोंप कर बोली, ‘‘मां वही अकेले सारा नहीं खा जाएगा. तुम भी तो खाओगी न.’’
मां और कविता की नोक?ोंक कुछ देर चलती रही. इस बीच कविता के पापा ने कहा, ‘‘कविता, अनुराग कितने बजे आएगा?’’
कविता ने मां की बातों से ध्यान हटा घड़ी की ओर देखा तो 2 बजे रहे थे.
अनुराग 1 बजे निकला था. कविता ने सोचा अभी तक तो आ जाना चाहिए था. कुछ देर के बाद 3 भी बज गए. कविता बारबार अनुराग को काल करती लेकिन फोन बंद आ रहा था.
पापा ने पूछा, ‘‘कहां से आ रहा था वह.’’
कविता ने मुर?ाए स्वर में कहा, ‘‘पापा,
यहीं पटेल नगर से निकला था. उस का दोस्त रहता है वहां.’’
पापा ने गंभीर हो कहा, ‘‘पटेल नगर से विकासपुरी इतनी दूर भी नहीं तो आधा घंटा 2 घंटे में कैसे बदल गया.’’
कविता ने कोई जवाब नहीं दिया. उस के पापा ने कहा, ‘‘चलो सब खाना खाओ. जब आएगा
तब मिलेंगे.’’
पापा की बात को मानते हुए कविता ने सब के साथ खाना खा लिया. अब 4 बज चुके थे लेकिन फोन अब भी बंद था. कविता की मां के ताने अब चिंता में बदल चुके थे. मां ने कविता से बहुत प्यार से कहा, ‘‘उस के दोस्त का नंबर है तो उसे काल कर पूछ. पहले ही दिन तेरे पापा पर उस के गैरजिम्मेदार होने की छाप पड़ेगी तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी.’’
अपनी मां की बात सुन कविता उन के सारे ताने भूल गई. मगर कविता के पास सचिन का नंबर नहीं था कि वह कोई खैरखबर ले पाती. उस के पास इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. जिस तरह घड़ी के कांटे बढ़ते जा रहे थे, कविता की चिंता भी बढ़ती जा रही थी. वह बारबार अनुराग को फोन करती और हर बार यही सुनती कि आप के द्वारा डायल किया हुआ नंबर अभी बंद है. रात के 10 बजे चुके थे. कविता की सारी चिंता अब क्रोध में बदल चुकी थी.
अनुराग और कविता के रिश्ते को अनुराग का कोई दोस्त नहीं जानता था. इसलिए आज तक कविता के पास अनुराग के किसी भी दोस्त का नंबर नहीं था और अनुराग के घर वालों से तो कुछ दिन पहले ही बात शुरू की थी. मगर उन का भी नंबर कविता के पास न था. कविता का सिर क्रोध से फटे जा रहा था. तभी उस का फोन बज उठा. नंबर अनजान था. कविता उसे उठाना नहीं चाहती थी लेकिन एकदम से मन ने कहा कि उठाओ. कविता ने ?ाट फोन उठाया तो एक सिसकती आवाज आई, ‘‘कविता, बेटा तू कहां है?’’
यह आवाज अनुराग की मां की थी. मां की रोती आवाज सुन कविता का दिल बैठ
गया. कविता कुछ बोलती, उस से पहले मां बोल पड़ी, ‘‘कविता, अनुराग का ऐक्सीडैंट हो गया है. वह सफदरजंग अस्पताल में है. बेटा जा उसे देख. हम ट्रेन में हैं, सुबह 3 बजे तक आएंगे.’’
कविता अनुराग के ऐक्सीडैंट की बात सुनते ही डर गई. वह इधरउधर देख अपने आंसू संभाल रही थी. उस की मां ने, बहन ने उस का उड़ा चेहरा देख, कई बार पूछा कि क्या हुआ, फोन किस का था? मगर कविता कुछ कह नहीं पाई. जैसे उस की आवाज उस के गले में कहीं फंस गई थी.
कविता ने दीवार पर टंगी पापा की स्कूटी की चाबी ली और घर से बाहर भागी. पापा के संग मां और बहन भी कविता के पीछे दौड़ पड़े. कविता अपने कांपते हाथों से चाबी स्कूटी में लगा रही थी कि पापा ने ?ाट से चाभी छीन ली और कविता को डांटा. पापा की डांट ने कविता को ?ां?ारा और वह पापा से लिपट फूटफूट कर रोने लगी.
कविता को यों रोता देख सब डर गए. अपने रुदन ने कविता ने बताया कि अनुराग का ऐक्सीडैंट हो गया है और वह अस्पताल में है. पापा ने ?ाट से कविता के आंसू पोंछे और प्रिया को अपना पर्स और फोन लाने को कहा. मां ने भी कविता को धीरज धरने की हिदायत दी. प्रिया से पर्स, फोन ले पापा ने स्कूटी स्टार्ट की और कविता को ले अस्पताल चल दिए.
अस्पताल पहुंच लोगों की खराब हालात, उन के परिजनों के रोते चेहरे देख अंदर ही अंदर कविता का हौसला टूटता जा रहा था. कविता के पापा ने पूछताछ की तो पता चला कि अनुराग 18 नंबर वार्ड में है. 18 नंबर वार्ड पहुंचे तो वहां बाहर उन्हें सचिन मिला. सचिन तो पहले यह जान थोडा दंग था कि कविता अनुराग की गर्लफ्रैंड है. फिर सिर झुका नीचे कर कहा, ‘‘क्या बताऊ अंकल. यह सब मेरी गलती है. न मैं उसे अपनी बाइक ले जाने को कहता न यह सब होता. दरअसल, अनुराग तैयार हो आप से मिलने जा ही रहा था तो मैं ने ही कहा मेरी बाइक ले जा. अनुराग कुछ दूर ही था, आप के घर से. तभी यह ऐक्सीडैंट हो गया. सामने से एक बस आ रही थी और उस बस और अनुराग के बीच एक कुत्ता. कुत्ते को बचाने के चक्कर में अनुराग बस की चपेट में आ गया.
कविता के पापा सचिन से शिकायत करते हुए बोले, ‘‘तो हमें क्यों नहीं
बताया? दोपहर से अब आधी रात हो जाएगी. वह तो अभी अनुराग की मां का फोन आया नहीं तो हमें कुछ पता नहीं चलता.’’
सचिन ने कहा, ‘‘अंकल मु?ो तो पता भी नहीं था कि अनुराग आप से मिलने आया है. उस का फोन टूट चुका था. इसलिए पुलिस वाले किसी को कौंटैक्ट नहीं कर पाए. बाइक के नंबर से उन्हें मेरा रिकौर्ड मिला. जब मु?ो काल की तो मैं भागता हुआ यहां आया. फिर पुलिस के सवाल और डाक्टरों के चक्कर में लगा रहा. थोड़ी सांस ली तो अनुराग के पापा को काल की. मु?ो तो उन्होंने ही बताया कविता के बारे में. तब मैं ने उन से नंबर भी मांगा कविता को सूचित करने के लिए. मगर… मगर आंटी ने नंबर होते भी नहीं दिया. बोलीं कि कविता उस का यह हाल नहीं देख पाएगी.’’
इन सवालजवाब के बीच कविता बोली, ‘‘अनुराग कैसा है? मु?ो मिलना है उस से.’’
सचिन कविता से नजरें चुरा कर बोला, ‘‘खतरे से बाहर है. पर तुम उसे यों देख नहीं पाओगी.’’
कविता के पापा बोले, ‘‘क्या मतलब? ठीक से बोलो.’’
सचिन कविता से बोला, ‘‘दाहिना पैर बस के चक्कर में आ गया था. ठीक नहीं हो पाता, खून भी तेजी से निकला जा रहा था, इसलिए काटना पड़ा.’’
इतना सुनते ही कविता के पापा ने माथा पकड़ लिया और कविता जमीन पर एक गठरी की तरह कुछ देर शांत पड़ी रही. इस बीच कविता का फोन बजा. फोन पर अनुराग की मां थी. कविता ने धीरे से फोन अपने पापा की ओर बढ़ा दिया. पापा भी फोन ले एक कोने में चले गए और अनुराग की मां से बात करने लगे.
तभी कविता की मां और बहन भी आ गए. कविता को यों बैठा देख उस की मां का दिल बैठ गया. सचिन ने उन्हें सारी बात बताई. कविता की मां अपना माथा पीटने लगीं.
तभी नर्स ने उन्हें वहां से जाने को कहा. कविता को ले उस के घर वाले नीचे
वेटिंग हौल में आ गए. कुछ देर कुरसी पर बैठे रहने के बाद कविता एकदम से खड़ी हुई और बाहर निकल गई. कविता के ठीक पीछे उस की मां भी हो लीं. बाहर ऐग्जिट एरिया के पास के पार्क में कविता जा कर बैठ गई.
मां ने पूछा, ‘‘यहां क्यों बेटा?’’
कविता ने टूटे स्वर में कहा, ‘‘अंदर घुटन
है मां.’’
खुले आसमान के नीचे बैठना, अनुराग और कविता दोनों को बहुत अच्छा लगता था. अकसर दोनों के मिलने की जगह पार्क या कोई गार्डन ही हुआ करता था. अगर दोपहर को मिलते तो वहां की घास पर चादर बिछा लंच करते तो यह मुलाकात पिकनिक बन जाती. शाम को मिलते तो चाय की चुसकियों के साथबागों के फूलों की सैर और कुछ रात की शुरुआत में भेंट होती तो आसमान के तारों को साथ बैठ ताकते रहते या गंगा घाट पर ढलते सूरज को कैमरे में कैद करने और इन सभी में अनुराग की प्रेम कविताओं और कहानियों का सफर चलता रहता.
अनुराग कभी फूलों का हार बना, कविता के गले में सजाने की कोई पंक्ति कहता या कभी तारों को कविता के बालों में लगाने की बात कहता.
अनुराग कविता से कहता, ‘‘इन तारों की चमक, मैं क्यों न बढ़ा दूं. इन्हें तेरे काले मेघों में सजा के… कमबख्त, इन्हें भी पता चले कि आसमां से ज्यादा गहराई तो मेरे इश्क में है.’’
आज कविता का वही इश्क एक गहरे अंधेरे से घिरा हुआ है और कविता एक आत्मग्लानि की खाई में गिरती जा रही थी कि जब अनुराग दर्द से तड़प रहा था तब वह अपने परिवार के साथ बैठ आराम से खाने का स्वाद ले रही थी. वही खाना जो उस ने अनुराग के लिए बनाया था. उसे अपने खाए हर निवाले पर गुस्सा आने लगा और फिर फूटफूट कर रोने लगी.
सुबह 3 बजे अनुराग के पापा और मां पहुंचे. दोनों आते ही अस्पताल की दहलीज पर बहुत रोए. उन्हें संभालते हुए कविता के पापा बोले, ‘‘भाई साहब सोचा नहीं था कि अपनी भेट ऐसी होगी. लेकिन होनी को कौन टाल सकता है. अब तो आप को मजबूत बनना पड़ेगा नहीं तो बच्चा (अनुराग) अपना हौसला खो बैठेगा. हमे तो अब उसे सम?ाना है कि वह कमजोर नहीं पड़े, टूटे नहीं.’’
अपने पापा की बात सुन कविता में कुछ हौसला आया. उस ने अपने आंसू पोछे. अनुराग के पापा ने भी खुद को संभालते हुए कहा, ‘‘ठीक कह रहो आप. मैं बाप हूं, मैं हिम्मत नहीं हार सकता.’’
कविता के पापा ने कहा, ‘‘आप दोनों थके होंगे. घर चल थोड़ा आराम कर लो. यहां वैसे भी सब लोग नहीं रुक सकते. मैं रुक जाता हूं, आप लोग जाओ.’’
तभी सचिन बोला, ‘‘अरे नहीं अंकल मैं हूं न. आप सब जाओ. सिर्फ मै रुकता हूं.’’
कौनकौन रुकेगा, कौन नहीं, इस पर बहुत बहस चली. उस पर बाद में यही फैसला हुआ कि अनुराग के मांबाप और कविता ही रुकेगी. सब के जाने के बाद कविता बाहर वार्ड के पास रुकी और अनुराग के मांबाप नीचे हौल में. कुछ घंटों बाद जब अनुराग को होश आया तो कविता उस से मिलने अंदर गई. अनुराग की हालत देख कविता का दिल जोरजोर से चीखपुकार करने लगा. लेकिन उस की जबान एक दम खामोश थी. वह धीरे से अनुराग के सिरहाने बैठ उस के सिर पर हाथ फेरने लगी.
अनुराग ने दवाइयों के नशे और दर्द से भारी पलकें खोलीं तो कविता का
चेहरा देखा और देखते ही आंखें मूंद लीं. जिस चेहरे से अनुराग की आंखें नहीं हटती थीं, आज उसी चेहरे को देख उस ने आंखें यों बंद कीं जैसे कोई भूत देखा हो.
कविता ने अनुराग का माथा चूम कहा, ‘‘हम साथ हैं, बस इतना काफी है.’’
इतना सुनते ही अनुराग जोरजोर से रोने लगा. अनुराग का रोना सुन नर्स आ गई. कविता को जाने को कहा, लेकिन कविता ने हाथ जोड़ उस से कुछ समय मांग लिया.
कविता अनुराग के आंसू पोंछ बोली, ‘‘बसबस, ऐसे नहीं टूट सकते. बाहर मांपापा आ गए हैं. उन के सामने ऐसे नहीं रो सकते हम, राजा दुष्यंत.’’
अपने मांबाप के आने की खबर सुन अनुराग और टूट गया. उस का रोना अब कविता से बरदाश्त नहीं हो रहा था. इसलिए वह कमरे से बाहर निकल खुद भी रोने लगी. कुछ देर बाद अनुराग जब शांत हुआ तो उसे मांपापा से मिलाया गया. मांपापा के सामने अनुराग शांत रहा. मां रो पड़ीं, लेकिन पापा शांत खड़े रहे.
शाम तक अनुराग को जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया. वहां उस से कविता का पूरा परिवार मिला. रात को सचिन ने ही रुकने की जिद्द की, जिसे अनुराग ने भी ठीक कहा. सब कविता के घर चले गए. हाथमुंह धोए और खाना खाने बैठे. खाने का कौर उठाते ही कविता को फिर से आत्मग्लानि होने लगी. उस ने कौर नीचे रख दिया और अपने कमरे में चली गई.
तभी पीछे से आ प्रिया ने कहा, ‘‘दीदी,
तुम खाना छोड़ आई तो वहां अब कोई खाना नहीं खा रहा.’’
कविता को यह सुन और आत्मग्लानि हुई. वह वापस आई और खाना खाने लगी. उसे खाता देख सब ने अपना खाना भी शुरू किया. रात को सब सोने को चले गए. कविता जाग रही थी. वह कभी सचिन को फोन कर अनुराग का हालचाल पूछती तो कभी आसमान ताकती. जब उस का मन कही नहीं लगा तो वह बाहर लिविंगरूम में टहलने लगी और कुछ देर बाद वहीं सोफे पर सो गई.
अगली सुबह कविता ने अनुराग के मांबाप के बीच होती बात चुपके से सुन
ली. अनराग की मां ने कहा, ‘‘अब क्या होगा… कविता से उम्मीद करना कि वह अनुराग का हाथ न छोड़े भी ठीक नहीं. आखिर कौन अपनी पूरी जिंदगी अब खराब करेगा. वह मौडर्न लड़की है, उसे तो कोई अच्छा लड़का मिल जाएगा. मगर अब अनुराग का क्या होगा.’’
कविता खामोशी से आगे बढ़ी तो उसे अपने मांपापा की बात सुनाई पड़ी. कविता की मां ने कहा, ‘‘अनुराग बच गया, यह बहुत बड़ी खुशी है. मगर अब क्या होगा. यह रिश्ता करना अब ठीक नहीं. और अच्छा हुआ कि कोई मंगनी नहीं हुई नहीं तो समाज यहीं कहता कि लड़की में दोष होगा, इसलिए लड़के पर यह ग्रहण लग गया.’’
2 दिन अनुराग अस्पताल में ही रहा. वहां सब बारीबारी जाते और उस से मिलते. डिस्चार्ज के दिन कविता अपने घर अनुराग और उस के मांपापा का इंतजार कर रही थी. मगर जब देर ज्यादा हो गई तो वह बेचैन हो गई. उस ने सचिन को काल की लेकिन उस ने फोन उठाया नहीं.
इस बीच कविता के पापा ने कहा, ‘‘बेटा उसे फोन मत करो. वह उन के साथ गया है.’’
कविता पापा की बात सुन बोली, ‘‘गया कहां है. उसे तो सब के साथ यहां आना था.’’
पापा ने कविता को सम?ाते हुए कहा, ‘‘अनुराग ने मना किया तुम्हें बताने को. दरअसल, उस ने तय कर लिया था अपने घर जाने का.’’
कविता नाराज हो बोली, ‘‘तो चला जाता. लेकिन कुछ दिन बाद. यहां थोडा आराम तो कर लेता. पापा आप ने पहले क्यों नहीं बताया कि उस ने ऐसी खिचड़ी पकाई है.’’
पापा ने कहा, ‘‘बेटा वह चाहता है अब तुम उस से न मिलो.’’
पापा की यह बात सुन कविता का चेहरा पीला पड़ गया. पापा बोले, ‘‘वह चाहता है तुम अब यह रिश्ता यहीं खत्म कर दो. अब वह तुम्हारे लायक नहीं, इसलिए वह हमेशा के लिए चला गया.’’
कविता ने पापा की बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. बस चुपचाप अपने कमरे में चली गई. उस पूरे दिन कविता चुप रही. चुप रह कर ही खाना खाया, थोड़ा टीवी देखा और रात होने पर सो भी गई.
रात को कविता के मांपापा बात कर रहे थे.
कविता की मां बोली, ‘‘वह चुप क्यों है. कहीं कुछ ऐसावैसा तो नहीं करेगी अपने साथ.’’
‘‘नहीं, मेरी बेटी बहुत स्ट्रौंग है. वह ऐसा कुछ नहीं करेगी,’’ पापा बोले.
‘‘तो क्या वह मान गई अनुराग को छोड़ने को?’’ मां ने पूछा.
अब इस सवाल पर दोनों को रातभर नींद नहीं आई. मगर अगली सुबह अपनी नींद से जाग कविता ने अपना सामान पैक किया. उसे पैकिंग करते देख मां ने सवाल किया, ‘‘कहां… क्यों? अरे कुछ बोल तो कहां जा रही है?’’
कविता ने एक गहरी सांस भरी, ‘‘अरे मां, मैं नौकरी करती हूं. कब तक यहां बैठी रहूंगी. जाने दो मु?ो.’’
यह सुन कविता के पापा ?ाट से बोले, ‘‘तो मैं भी चलता हूं तुम्हारे साथ. कुछ दिन तुम्हारे साथ रहूंगा.’’
कविता पापा की ओर देख बोली, ‘‘वह गर्ल्स पीजी है.’’
तब मां ?ाट से बोल पड़ीं, ‘‘अच्छा तो मैं चलती हूं.’’
कविता ने मना नहीं किया और मां भी उस के साथ वाराणसी आ गईं.
कविता सुबह तैयार होती और नौकरी पर निकल जाती. शाम को आती. मां को थोड़ा घुमानेफिराने ले जाती, फिर रात खाना खा सो जाती. ऐसा 1 हफ्ता चला और इस 1 हफ्ते में उस ने एक बार भी अनुराग को न कोई मैसेज किया न कोई काल. न ही वहां मिर्जापुर में अनुराग ने कविता का नाम लिया. दोनों ओर शांति छाई थी. दोनों शायद अपने रिश्ते पर विराम लगा चुके थे. अब कविता की मां भी वापस दिल्ली चली गई थीं. ऐक्सीडैंट को हुए अब 1 महीना हो चुका था. अनुराग धीरधीरे अपने एक पैर पर ही आम जीवन जीने की कोशिश कर रहा था. डाक्टर ने उसे प्रोस्थैटिक लैग के बारे में बताया तो उसे यह सु?ाव ठीक लगा और वह इस प्रोसीजर के लिए तैयार हो गया.
अब यूनिवर्सिटी को जौइन करने का समय आ चुका था. अनुराग सोच में था कि वहां के स्टूडैंट्स और स्टाफ का क्या रिएक्शन होगा, उसे यों देख कर. यह सोच वह डर भी रहा था और दूसरी ओर उस का दिल कहता कि क्या अनुराग, एक तरफ तो तुम स्टूडैंट्स को सीख देते हो कि हर विपत्ति का सामना हौसले से करो और जब खुद पर बिजली गिरी तो छिपने को घर ढूंढ़ रहे हो.
वाराणसी जाने के दिन तक बड़ी मुश्किल से अनुराग ने खुद
को हिम्मत दे खड़ा किया था कि अचानक कविता सामने आ गई. अनुराग के कमरे में, ठीक उस के सामने. अनुराग ने गौर किया तो कविता का पूरा परिवार था.
अनुराग के पापा कुछ कहते उस से पहले ही कविता के पापा बोल पड़े, ‘‘भाई साहब हमें कुछ नहीं पता. कविता ने कहा कि चलो कहीं चलना है, तो हम सब आ गए. हमें नहीं पता था यहां आना है.’’
कविता ने अपने पापा से कहा, ‘‘हमारी कल सगाई हो सकती है पापा?’’
कविता की बात सुनते ही सब का रंग उड़ गया. कोई कुछ पूछताबोलता उस से पहले ही कविता अनुराग से बोली, ‘‘मैं उस पार्क में कई रात गई, वहां का आसमान खाली हो चुका है. मेरे बालों में सजने को एक तारा भी बाकी नहीं वहां.’’
यह सुनते ही अनुराग की आंखें भर आईं और मुंह से निकला, ‘‘कविता.’’
कविता अनुराग के पास बैठ बोली, ‘‘मैं वहां भी कई बार गई जहां के फूल तुम्हें बहुत पसंद थे जो महकते थे तो लगता था किसी ने इत्र की बोतल उडे़ली हो. मगर अब उन फूलों में वह खुशबू नहीं. लगता है किसी ने उन्हें कागज के फूलों से बदल दिया.’’
अनुराग यह सुन कविता का हाथ थाम रोने लगा.
अपने भरे कंठ से कविता बोलती गई, ‘‘मैं गंगा के घाट पर भी गई थी, जहां तुम घंटों नाव में बैठ मेरी और डूबते सूरज की तसवीरें लिया करते थे.पता है अब मेरे जाने से पहले ही अंधेरा हो जाता है. लगता है सूरज ने वहां अब डूबना ही छोड़ दिया.’’
एक गहरी सांस ले कविता के पापा ने कहा, ‘‘हां, कल सगाई हो सकती है.’’
इस पर कविता की मां और अनुराग की मां ने थोड़ी शंका जताई, ‘‘लोग क्या कहेंगे और फिर अभी तो ये जवान हैं, इसलिए नहीं सम?ा पा रहे, बाद में कोई बात हुई तो? एकदूसरे सी मन ऊब जाए तो क्या होगा?’’
इस पर कविता के पापा बोले, ‘‘मैं क्या सम?ाऊं अपनी बेटी को. आप लोग खुद ही बोलो. क्या आप लोग सम?ा सकते हो? नहीं न? अरे, जहां आज के जमाने में लोग सबकुछ होते हुए भी बरसों की शादी तोड़ देते हैं, लड़कालड़की एकदूसरे को रंगरूप पर छोड़ देते हैं. उन सब से तो मेरी बेटी कहीं ऊपर है जो इतनी बड़ी बात होने पर भी साथ निभाने का हौसला रखती है. अब कल क्या होगा, यह सोच कर आज कैसे कोई कड़ा कदम उठा लूं.’’
अनुराग के पापा भी बोले, ‘‘बच्चे सम?ादार हैं. अपना फैसला खुद कर लेंगे.’’
कविता ने अनुराग की तरफ देखा तो अनुराग हाथ जोड़ उस से बोला, ‘‘मेरे लिए पूरी जिंदगी मत खराब करो. मैं बो?ा बन जाऊंगा कविता. मेरी मानो तुम जाओ यहां से.’’
कविता ने अनुराग का हाथ अपने हाथों में ले कहा, ‘‘ठीक है चली जाऊंगी पर सगाई के बाद.’’
अनुराग और कुछ बोलता उस से पहले ही उस के होंठों पर ऊंगली रख कविता बोली, ‘‘दुष्यंत की तो याददाश्त चली गई थी, इसलिए वह अपनी शंकुतला को भूल गया था, तुम्हारी तो टांग गई तो तुम कैसे अपनी शकुंतला को भूल गए? बोलो, तुम्हारी याद क्या टांग में है?’’
अनुराग कविता की बात सुन रोतेरोते हंस पड़ा. कविता ने अनुराग के कान खींच कहा, ‘‘तुम दुष्यंत नहीं, दुष्ट हो दुष्ट.’’
अनुराग ने कविता से फिर कहा, ‘‘एक बार फिर सोच लो कविता.’’
कविता ने एक मीठी मुसकान से कहा,
‘‘1 महीना सोचा ही है मैं ने. बहुत
सोचा. सोचा कि जब अनुराग मु?ो प्रेमराग सुनाता था तो टांग से थोड़ी सुनाता था. न टांग मु?ो उस वक्त आकर्षित लगती थी. मु?ो तो उस के बोल लुभाते थे जो आज भी वैसे ही मीठे हैं. न टांग जाने से अनुराग प्रोफैसर से कोई भिखारी बन गया न टांग जाने से मैं कविता से कोई सूर्पनखा बन गई और न ही अनुराग एक भले मानुष से कोई जंगली जानवर. अनुराग तो आज भी वही अनुराग है जो वहले था. सिर्फ एक टांग ही तो नहीं और टांग तो एक अंग है, तुम्हारा चरित्र नहीं. क्या टांग वाला ही अच्छा पति बनेगा मेरा? क्या तुम्हारा सुंदर चरित्र और निर्दोश मन ही काफी नहीं हम दोनों के लिए? अंग का होना बहुत जरूरी है क्या प्रेम निभाने के लिए? फिर अगर मैं अंगहीन हो जाती तो तुम मु?ो छोड़ देते?
अनुराग एकदम से बोला, ‘‘कभी नहीं. मैं तुम्हें किसी भी हाल में नहीं छोड़ता.’’
कविता ने कहा, ‘‘तो अब क्यों छोड़ा क्योंकि तुम एक अंगहीन हो और मैं नहीं. अगर यह हम दोनों के बीच की असमानता है तो. मैं इसे दूर कर दूं. मैं भी एक टांग कटवा लेती हूं, फिर दोनों बराबर होंगे. तब तो तुम्हें कोई खेद नहीं होगा न?’’
अनुराग कविता के मुंह पर हाथ रख बोला, ‘‘नहीं, ऐसा मत बोलो कविता. मैं यह सुनना भी बरदाश्त नहीं कर सकता.’’
कविता अनुराग का हाथ हटा कर बोली, ‘‘किस दौर की सोच में खोए हो अनुराग. आज बिना पैर की महिला भारत की बेहतरीन नर्तकी है. एक निचले शरीर से पैरालाइज व्यक्ति एक राजनेता, एक ट्रेन हादसे में पैर गंवाने वाली महिला आज माउंट ऐवरैस्ट तक की दूरी हौसले से तय कर आई है और तुम सिर्फ अपने मन के डर से बाहर निकल नहीं पा रहे. यह डर इन सभी को था. लेकिन देखो क्या यह डर इन्हें इन की खुशियों से दूर कर पाया? क्या ये खुश नहीं? क्या ये सफल नहीं? क्या इन का परिवार नहीं? फिर तुम क्यों अपनी खुशियों से मुंह मोड़ रहे हो? तुम क्यों मु?ो अकेला छोड़ रहे हो और साथ निभाने के लिए अगर पूरे अंग ही जरूरी होते तो दुनिया में सुपुष्ट शरीर वालों के तलाक नहीं होते. एक सुंदर साथी होते भी लोग क्यों एकदूसरे को धोखा दे रहे हैं? अरे रिश्ता निभाने के लिए सिर्फ शरीर से पूरा होना जरूरी नहीं, मन से भी विशुद्ध होना जरूरी है. 2 जनों के बीच साथ, सम?ा और प्यार होना जरूरी है और इतना तो हम दोनों रखते है न. है न बोलो?’’
कविता की बातों ने दोनों मांओं के चेहरे से संदेह हटा दिया था. अनुराग ने भी एक गहरी सांस ली और अपने आंसू पोंछ बोला, ‘‘पापा कल सगाई करेंगे.’’
चारों तरफ बहुत भीड़ थी. सुबह 7 बजे से शुरू हुई यह सिटी मैराथन जोरदार धूम मचा रही थी मानों शहर की सारी जनता औडियंस बन तालियां बजा रही हो. इन्हीं के बीच सुर्खियां बटोर रहा था एक अनूठा प्रतियोगी, जिसे देख सब लोग उस का ही नाम पुकार रहे थे, ‘‘अनुराग… अनुराग…’’
इसी शोरगुल के बीच एक मीठी पुकार थी, ‘‘पापा… पापा….’’
‘‘अथर्व भैया की तरह पापा को तुम भी चीयर करो काव्या,’’ यह कविता ने अपनी 2 साल की बेटी काव्या से कहा.
आज कविता अपनी शादी के 10 साल बाद भी उतनी ही सुंदर है जितनी पहले थी.
बस थोड़ा सा वजन बड़ गया है और औदा भी. आज कविता कुंआरी कविता नहीं बल्कि बैंक मैनेजर कविता, अनुराग की पत्नी और 2 बच्चों की मां भी है. 6 साल का अथर्व जो अनुराग की तरह ही कहानियां लिखनेपढ़ने का शौक रखता है, बस भाषा इंग्लिश पसंद है और काव्या जो अभी सिर्फ डौल हाउस का शौक रखती है. वही एक टांग के छिन जाने से निराश हुआ अनुराग आज अपने मजबूत हौसलों से साहित्य जगत का एक नामी लेखक और कवि है, साथ ही अपनी प्रोस्थैटिक लेग पर दौड़ते कई मैराथन का विजेता भी और आज भी एक और मैराथन जीत वह अपने नाम कराने वाला है. द्य
