Hindi Kahaniyan : आप  को कभी इश्कविश्क जैसा कुछ हुआ है? मैं भी क्या बेतुका सा सवाल कर रहा हूं. बिलकुल हुआ ही होगा. जब सब को होता है तो आप को क्यों नहीं. दरअसल, यहां मैं यानी राहुल आप से यह जनाना चाहता हूं कि मुझे आजकल जो हो रहा है वह क्या बला है? कहीं यह इश्क तो नहीं.

वर्षों से बंद पड़े मेरे दिल के खाली कमरे में आज उस गहरी काली आंखों वाली का बसेरा था, उस के बारे में क्या कहूं, बस यों समझ लीजिए कि वह जैसे किसी भव्य मंदिर के गर्भगृह में स्थापित की हुई एक नायाब प्रतिमा थी. इतनी नायाब कि जिसे हरकोई देखना चाहे. बस उसी नायाब सी लड़की ने मेरे दिन का चैन और रातों की नींद छीन ली थी. जब से मैं ने उसे देखा था तब से हर तरफ बस उस का ही चेहरा दिखाई दे रहा था. मैं रातभर उस के तसव्वुर में खोया रहा और सुबह होते ही…

‘‘रोहित… रोहित… अरे, अभी तक बिस्तर पर ही पड़ं हो, अरे, मियां शादीब्याह वाले घर में जवान लड़के इतनी देर तक सोएंगे तो ब्याह के कामकाज कैसे होंगे?’’ देहरादून वाले श्याम उर्फ रंगीले फूफाजी की कर्कश आवाज ने मु?ो उस के खयालों से बाहर खींचा. दरअसल, असल नाम तो फूफाजी का श्याम ही था पर हम बच्चे उन के रंगीले मिजाज के चलते उन का एक चोर नाम रखे थे ‘रंगीले फूफाजी.’ उन के रंगीले मिजाज से आप आगे रूबरू हो जाएंगे. फिलहाल आप मेरी प्रेम कहानी पर अपना फोकस रखिए तो आइए चलिए आप को अपनी इस प्रेमयात्रा पर अपने साथ लिए चलता हूं…

वह लड़की जिस का नाम जानना अभी बाकी था जिस से कल रात लखनऊ एअरपोर्ट

पर पहली मुलाकात हुई थी. दरअसल, यहां लखनऊ में मेरी मौसी की बेटी यानी मेरी मौसेरी बहन डाली की शादी थी. मेरी और डाली की बचपन से  ही बड़ी अच्छी बनती थी, इसलिए उस की शादी में मैं पूरे 5 दिन की छुट्टी ले कर दिल्ली से लखनऊ आया था.

रंगीले फूफाजी पूरी शादी की तैयारियों का मोरचा बिलकुल ऐसे संभाले थे जैसे चुनाव के समय पार्टी का कोई प्रमुख नेता. हमारे देश की शादियों में फूफा, जीजा टाइप के किरदार खुद तो शादियों में शादी का कोई काम करते नहीं है, मगर दूसरों से शादी के तो छोडि़ए खुद के भी पर्सनल काम करा लेते हैं.

‘‘अरे, रोहित, रात की फ्लाइट से कनाडा से डाली की 2 सहेलियों आ रही हैं. उन्हें एअरपोर्ट से लाने का जिम्मा तुम्हारा है, हम्म.. और हां जब एअरपोर्ट जा ही रहे हो तो भोले पान भंडार वाले से हमारे लिए 2 बनारसी पान भी लगवा लाना.’’

जब रात हुई तो मैं निकल गया डाली की सहेलियों को एअरपोर्ट से लेने के लिए. एअरपोर्ट के बाहर ‘वैलकम डाली मैरिज’ का स्लोगन पकड़े मैं 2 विदेशी लड़कियों का इंतजार कर ही रहा था कि किसी ने चूडि़यों से खनकता हाथ मेरे कंधे पर रख कर कहा, ‘‘आर यू डाली ब्रदर?’’

उस गहरी काली आंखों वाली लड़की की शहद सी मीठी आवाज मेरे कानों से सीधे मेरे दिल तक उतर गई.

‘‘यस… यस… य… ससस… आई एम,

आर यू बोथ डाली फ्रैंड्स?’’ उस की खूबसूरती के आगे मैं ने खुद को संभालते हुए कहा.

‘‘हां, हम दोनों डाली की ही सहेलियां हैं, होने वाली दुलहनिया की…’’ अब की कंधे उचकाते हुए उस की साथ वाली लड़की बोली.

‘‘आप दोनों को हिंदी आती है?’’

‘‘बहुत अच्छे से हम इंडिया से ही हैं.’’

‘‘हां, वह तो मैं आप को देख कर ही समझगया था.’’

‘‘तो फिर क्यों पूछा कि हिंदी आती है?’’

‘‘बस यों ही.’’

गहरी काली आंखों वाली के साथ वाली लड़की चैटर बौक्स की तरह लगातार बोले जा रही थी.

उन दोनों के बड़ेबड़े से ट्रौली बैग कार की डिग्गी में सैट कर मैं उन्हें कार की पिछली सीट पर बैठा कर चल पड़ा. वह गहरी काली आंखों वाली लड़की जिस की हाथों की चूडि़यां बारबार खनक रही थीं, वह कार की खिड़की से लखनऊ को ऐसे निहार रही थी जैसे आंखों से ही वह पूरा लखनऊ छू कर महसूस कर रही हो.

कार के सामने वाले मिरर में मैं उस की आंखों का काजल देखने की कोशिश कर रहा था, उस की आंखों की एकएक बनावट को मैं लगातार देखे जा रहा था.

तभी उस के साथ वाली लड़की बोली ‘‘अरे, आगे देख कर चलाओ यार, हमें शादी

वाले घर में ही जाना है, यमलोक नहीं और कार की अंदर वाली लाइट क्यों जला रखी है.’’

मैं अंदर की लाइट बंद कर कार का स्टयेरिंग सड़क के घुमाव के मुताबिक घुमाने लगा. एफएम चालू किया तो कार में बिलकुल सिचुएशन के हिसाब का गाना बजने लगा, ‘‘तुम जो मिल गए हो तो यों लगता है कि जहां मिल गया…’’ बस फिर क्या गाने सुनतेसुनते और उस का एहसास लेतेलेते घर आ गया. वे दोनों कार से उतर कर सीधे डाली के पास चली गईं.

भारतीय घड़ी रात का 1 बजा रही थी. काश, अभी दोपहर के 1 बजे होते तो मैं डाली से कह कर उस की सारी कुंडली निकलवा कर अपनी कुंडली से उस का मिलान करा लेता. मगर इतनी रात सभ्य लड़के चुपचाप जा कर सोते हैं सो मैं भी कार पार्क कर सोने जाने लगा. तभी रंगीले फूफाजी निशाचर की तरह अपनी हथेली आगे करते हुए मेरे पास आए, ‘‘दिल्ली वाले मियांजी, हमारा बनारसी पान लाए या नहीं?’’

ये फूफा लोगों को आधीआधी रात में भी अपना काम याद रहता है, ‘‘नहीं, भूल गया,’’ कहते हुए मैं पतली गली से निकलने को हुआ कि तभी वे पीछे से बोले, ‘‘पान की तरह सुबह जल्दी उठना भी न भूल जाना, सुबह 3-4 लड़कों को ले कर सब्जी मंडी चलना पड़ेगा. सुबह ही ताजाताजा सब्जियां मिलती हैं, समझे.’’

यह बात फूफाजी ने मुझसे इतनी तेज आवाज में बोली कि उन की बात पूरे माहौल में फैल गई पर सुनी सिर्फ मैं ने ही. उन की बात को तवज्जो न देते हुए मैं ने सुबह के कामों की अपनी अलग ही लिस्ट तैयार कर ली कि उस का नाम जानना है, उस के बारे में जानना है, उस की कुंडली से अपनी कुंडली का मिलान कराना है और फिर सब ठीक रहा तो यही आप की होने वाली बहू है मौम, यह कह कर उसे अपनी मौम से मिलाना है. यही सब सोचतेसोचते मैं सो गया. आज तक किसी लड़की को देख कर मेरे दिल में कोई हलचल नहीं हुई थी, पहली बार आज मेरा दिल इतनी जोरों से धड़क रहा था.

दूसरे दिन वह देर से नजर आई लेकिन जब नजर आई तो मेरे दिल के सारे तार

बजा गई. डाली ने मुझे बुला कर अपनी दोनों मेहमान सहेलियों की जिम्मेदारी सौंपी, ‘‘रोहित, यह सिल्की है इंडिया से ही है, पर पिछले 3 साल से कनाडा में जौब कर रही है.’’

सिल्की, कितना यूनीक नाम है न, सच एकदम शुद्ध वाले सिल्क से बनी है. मैं उस के नाम में खो गया और डाली मुझे उस के साथ आई दूसरी सहेली मेनका से मिलाने लगी, जिस से मिलने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी.

‘‘सुनो, तुम्हें इन का खयाल रखना है और आज इन दोनों को शौपिंग भी करानी है, समझे?’’

समझ गया, नेकी वह भी पूछपूछ. डाली ने तो बिलकुल मेरे दिल की बात कह दी थी.

मैं फटाफट तैयार हो कर उन्हें शौपिंग ले गया. उस दौरान सिल्की जब भी मुझे देख कर मुसकराती मेरा रोमरोम नाच उठता. शौपिंग का एकएक सामान वह मेरी पसंद का खरीद रही थी. शौपिंग के बाद लौटते वक्त वह आगे मेरे साथ वाली सीट पर बैठी तो मैं उस का ग्रीन सिंगग्नल समझगया.

यहां शादी की रस्में शुरू हो गई थीं. मेहंदी, हलदी, बरात, सब शानदार प्रोग्राम रहे. डाली के संगीत प्रोग्राम में सिल्की ने अपना डांस पार्टनर मुझे चुना. शादी के दौरान वह हमेशा मेरे

आसपास ही रही. कभी मैं उस पर फूल की पंखुडि़यां फेंकता तो वह बदले में मेरी तरफ एक मीठी सी मुसकान फेंक देती. वह हर वक्त मेरे ही इर्दगिर्द रहती.

शादी में ऐसे कई मौके आए जिन्होंने हमारे बीच की नजदीकियों को खूब बढ़ाया. हमारे देश की शादियों में शादी तो सिर्फ दूल्हादुलहन की ही होती है पर लवस्टोरी? तमाम लोगों की बन जाती है क्योंकि प्रेमप्रसंग में मैं ही अकेला न था. रंगीले फूफाजी भी बिट्टू बूआ की आंखों से बच कर दूल्हा पक्ष से आई एक सुंदर विदेशी महिला को बराबर ताक रहे थे और भी तमाम प्रेमप्रसंग बन रहे थे, बिगड़ रहे थे.

विदाई के वक्त मेरी मौम मुझे और सिल्की को लगातार देखे जा रही थीं. उन्होंने धीरे से मेरा हाथ पकड़ कर मुझे  अपनी तरफ खींचते हुए कहा, ‘‘रोहित, यह लड़की बहुत चालबाज लग रही है. इस से दूर ही रहो तुम. मैं लगातार देख रही हूं कि कुछ ज्यादा ही चिपकाचिपकी हो रही तुम दोनों की.’’

‘‘मौम, मैं उस से प्यार करता हूं और शायद वह भी. अगर यही आप की होने वाली बहू बन जाए तो?’’

‘‘क्या? 4 दिनों में तुझे इस से प्यार हो गया और इतनी जल्दी बात शादी तक पहुंच गई, देख रोहित मेरी अनुभवी आंखें कहती हैं कि यह लड़की तेरे लिए ठीक नहीं है.’’

मौम की बात को हमेशा की तरह आज भी मैं ने गंभीरता से नहीं लिया. यहां डाली की विदाई हो रही थी और वहां रंगीले फूफाजी फूटफूट कर रो रहे थे. बिट्टू बूआ उन के रोने से परेशान थीं, ‘‘मेरी भतीजी विदा हुई है और मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा तो आप क्यों रो रहे हैं जी?’’

अब कौन कहे बिट्टू बूआ से कि फूफाजी डाली के लिए नहीं बल्कि बरात के साथ जाने वाली उस विदेशी महिला के लिए रो रहे हैं जिस से वे पूरी शादी में नैनमटक्के कर रहे थे.

खैर, मेरी छुट्टी के 5 दिन आज पूरे हो रहे थे. आज शाम मेरी दिल्ली की फ्लाइट थी, यह बात सिल्की को पता चली तो वह बोली, ‘‘2 दिन की छुट्टी और ले लो न, मुझे लखनऊ घुमा दो प्लीज…’’ सिल्की ने इतने सिल्की अंदाज से प्लीज कहा कि मैं ने तुरंत अपनी 2 दिन की छुट्टी बढ़ा ली.

यों तो बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा, रूमी दरवाजा, ज्ञानेश्वरी मिश्रा पार्क सब मेरी कई

बार देखी हुई जगहें थीं पर सिल्की के साथ घूमने का मजा ही और था. आज उस को घुमाते हुए बड़ा इमामबाड़ा और भी बड़ा और खूबसूरत लग रहा था. मैं ने इन 2 दिनों में उसे लगभग आधे लखनऊ की सैर तो करा ही दी थी.

आज शाम की उस की फ्लाइट थी और रात की मेरी. उस के एअरपोर्ट जाने से पहले मैं ने अपने दिल की बात उस से कही तो वह बुरी तरह बिगड़ गई, ‘‘रोहित, यह क्या बकवास कर रहे हो? आर यू सीरियस? तुम लड़कों की न यही प्रौब्लम है जरा सी घास क्या डालो, तुम लोग तो गले ही पड़ जाते हो. तुम्हें पता भी है कि मैं अपने बौस की कंपनी में किस पोजीशन पर हूं? तुम कहीं से भी मेरे लायक नहीं हो.’’

उस के इन शब्दों ने मुझे पूरी तरह तोड़ दिया. मैं देर तक एक जगह बैठा बुरी तरह रोया. सिल्की ने सिर्फ अपने चंद दिनों के मनोरंजन के लिए मेरा यूज किया और मैं पागल उसे समझही न पाया. सिल्की अपनी सहेली के साथ एअरपोर्ट जा चुकी थी. रिश्तेदारों से भरे घर में मैं खुद को संभालता हुआ अपना बैग पैक कर दिल्ली जाने को तैयार था.

रंगीले फूफाजी मेरी पीठ थपथपाते हुए बोले, ‘‘मियां रोहित, परदेशियों से न अंखियां मिलाना…’’

मौम मेरे उदास मन को देख कर बोलीं, ‘‘मैं ने कहा था न कि वह लड़की…’’

मैं उन की बात आधी छोड़ते हुए ही उन के पैर छू कर दिल्ली निकल गया.

दिल्ली में जरा भी मन नहीं लग रहा था, बारबार सिल्की की याद आ रही

थी. पता नहीं क्यों? मुझे अब भी उम्मीद थी कि वह मेरे पास एक दिन जरूर आएगी. जब उसे मेरे जैसा सच्चा प्यार कहीं नहीं मिलेगा तब वह जरूर आएगी या फिर मुझे अपने पास बुला लेगी.

डाली शादी के बाद दीपक जीजू के साथ दिल्ली ही शिफ्ट हो गई थी. वह अफसर मुझे अपने घर बुलाती रहती लेकिन मैं बहुत कम ही उस के पास जाता. आज होली के बाद वाला भाईदूज का त्योहार था इसलिए डाली ने मुझ से वादा ले कर अपने घर बुला लिया.

दूज के तिलक के बाद वह धीमे से बोली, ‘‘कब तक तू उस सिल्की के लिए देवदास बन कर घूमेगा?’’

‘‘देख तूने मु? इन सब बातों के लिए यहां बुलाया है तो मैं चलता हूं,’’ यह कहते ही मैं वहां से चलने को हुआ तो मेरी नाराजगी देखते हुए दीपक जीजू ने मुझे जबरदस्ती अपने पास बैठा लिया.

मैं भी अब खुद को रोक न सका और गुब्बारे की तरह एकदम डाली पर फूट पड़ा, ‘‘तेरी सहेली थी वह तो तू उसे मना नहीं सकती थी लेकिन नहीं तुझे मुझसे क्या?’’

‘‘देख रोहित, तू उस के हिसाब का नहीं है वह अलग है, बेहद स्मार्ट और चालक भी है. वह हमारे जैसे घरों में एडजस्ट नहीं होगी. बात को समझतू ऐसी लड़कियां तेरे जैसों के लिए नहीं बनी होतीं.’’

‘‘मेरे जैसों के लिए मतलब क्या कहना चाहती है तू मैं छोटी सी जौब करता हूं, मिडल क्लास का पलाबढ़ा हूं तो उससे कमतर हूं?’’

‘‘देख, मेरे कहने का वह मतलब नहीं है भाई.’’

‘‘तो क्या कहना चाहती हो डाली?

तुम्हारी वह सहेली पूरी शादी में मु?ो अपने

हाथों का झुनझुना बनाए रही और फिर मुझे

बुरी तरह हर्ट कर के चली गई,’’ यह कहतेकहते मैं रो पड़ा तो दीपक जीजू ने

मुझे संभाला.

तभी डाली गुस्से में बोली, ‘‘लड़की जरा सा तुम लड़कों

के साथ हंसबोल क्या ले तुम लड़के उसे प्यार समझलेते हो. उस ने कहा कभी कि उसे तुम से प्यार है तो फिर किस बात का धोखा दिया सिल्की ने तुम्हें?’’ डाली कहतेकहते रो पड़ी.

मेरी जिंदगी का यह सब से खराब दौर था. मुझे पहली बार किसी लड़की से प्यार हुआ था और वह लड़की मेरे हिसाब से मुझे धोखा दे कर जा चुकी थी. मैं रातदिन किसी बड़ी जौब की तलाश में लगा रहता. मैं खुद को सिल्की से भी ज्यादा कामयाब बनाना चाहता. मेरे भीतर एक अजीब सी कुढ़न रहती. मौम शादी के लिए मुझे बराबर लड़कियों की तसवीरें भेजती रहतीं. पर मैं कभी कोई तसवीर नहीं देखता.

देर तक डाली के लविंगरूम में उदासी पसरी रही थोड़ी देर में मौम की काल आई, ‘‘हैलो रोहित, आज मैं तु?ो कोई तसवीर नहीं भेज रही, आज सीधे एक लड़की तुझसे मिलने आ रही है और उस का नाम है सिल्की.’’

‘‘सिल्की, मैं अचंभे में आ गया तो डाली मेरा फोन ले कर मौम से बात करने लगी. यह इन सब की प्लानिंग थी. कुछ ही देर में डोरबैल बजी और एक संवाली रंग की गंभीर आंखों वाली लड़की अंदर आई, ‘‘रोहित, यह है सिल्की. तुम्हारे जीजू के साथ औफिस में काम करती है और हमारे बगल वाले फ्लैट में पिछले 6 महीनों से रह रही है.’’

देर तक बहुत सारी बातें हमारे बीच होती रहीं, कुछ देर बाद सिल्की चली गई. उस के

जाते ही डाली ने मुंह मटकाते हुए मुझसे पूछा, ‘‘पसंद है?’’

‘‘नहीं, मुझे शादीवादी नहीं करनी.’’

‘‘तो शादी सीधे करने को कौन कह रहा है, पहले प्यारव्यार करो, अगर लगे तो फिर शादीवादी भी कर लेना.’’

‘‘लाइफ में प्यार सिर्फ एक बार होता है और मैं अपने हिस्से का प्यार कर चुका हूं.’’

इस बार दीपक जीजू ने अपनी तगड़ी वाली फिलौसफी झड़ी, ‘‘पहली बार का प्यार भी कोई प्यार होता है भला, वह तो बस आकर्षण होता है आकर्षण. अरे सालेजी आप की बहनजी भी मेरा दूसरा प्यार हैं. देखो, मेरे कहने पर तुम 1-2 बार अकेले में सिल्की से मिल लो. पसंद आए तो ठीक नहीं आए तो ठीक.’’

सच कहूं तो सिल्की मुझे अच्छी तो लगी थी पर दोबारा मैं प्यारव्यार के झंझट में नहीं पड़ना चाहता था. खैर, डाली और जीजू के कहने पर मैं सिल्की से 1-2 बार मिला और फिर बारबार मिलने लगा. एक दम सिंपल सी रहने वाली उस लड़की के थौट्स इतने खास थे कि मैं हर मुलाकात में उस की बातों का मुरीद हो जाता.

वह एक बेहद पढ़ीलिखी, सभ्य, सरल सी

लड़की थी. फिर से मेरे दिल के कमरे में कोई दस्तक देने लगा था. मेरी रातों की नींद और दिन का चैन सब गायब था. यह शायद इश्कविश्क जैसा ही कुछ था.

 लेखक- पूर्ति खरे     

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