राहा   और पार्थ उस छोटी सी बालकनी में खड़े थे जहां से नीचे जाती सड़क पर अनवरत भागती जिंदगी दिखाई देती थी. गाडि़यों की आवाज, लोगों की हंसी, बातें और दूर से आती टेन की सीटियां सबकुछ राहा को नया और अपना सा लग रहा था.

राहा ने गहरी सांस ली, ‘‘पार्थ, कभी सोचा भी नहीं था कि मेरी सुबहें ऐसे शुरू होंगी.’’

पार्थ ने उस की ओर देखा. उस की आंखों में थकान थी पर उस से कहीं ज्यादा संतोष. बोला, ‘‘मु?ो पता था राहा. तुम इस जिंदगी के लिए बनी हो. बस हालात ने तुम्हें गांव की चारदीवारी में बांध रखा था.’’

राहा मुसकराई लेकिन उस मुसकान के पीछे बीते दिनों की थकान साफ ?ालक रही थी. उस ने कहना शुरू किया, ‘‘4 बहनों मैं सब से बड़ी थी. सुबह से शाम तक बस काम. चूल्हा, पशु, खेत, छोटेछोटे ?ागड़े और फिर वही सवाल अब शादी कब करेंगी?’’

पार्थ चुपचाप सुनता रहा. राहा की आवाज भर्रा गई, ‘‘मैं भागना नहीं चाहती थी. मैं बस पढ़ना चाहती थी. इंटर पास करते समय लगा था कि अब कुछ बदलेगा. लेकिन मां ने कहा अब और पढ़ाई किसलिए? घर के काम ही तो करने हैं.’’

पार्थ ने उस का हाथ थाम लिया, ‘‘और तब तुम ने प्राइवेट से पढ़ने का फैसला किया.’’

राहा ने सिर हिलाया, ‘‘हां, किताबें रात को पढ़ती थी. कई बार नींद से आंखें जलने लगती थीं पर मन नहीं भरता था.’’

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद उसने पूछा, ‘‘तुम्हें याद है पहली बार हम कैसे मिले थे?’’

पार्थ हलका सा हंसा, ‘‘कैसे भूल सकता हूं. रोहन मामा के घर गया था. तुम आंगन में गेहूं साफ कर रही थीं और साथसाथ किताब पढ़

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