राहा   और पार्थ उस छोटी सी बालकनी में खड़े थे जहां से नीचे जाती सड़क पर अनवरत भागती जिंदगी दिखाई देती थी. गाडि़यों की आवाज, लोगों की हंसी, बातें और दूर से आती टेन की सीटियां सबकुछ राहा को नया और अपना सा लग रहा था.

राहा ने गहरी सांस ली, ‘‘पार्थ, कभी सोचा भी नहीं था कि मेरी सुबहें ऐसे शुरू होंगी.’’

पार्थ ने उस की ओर देखा. उस की आंखों में थकान थी पर उस से कहीं ज्यादा संतोष. बोला, ‘‘मु?ो पता था राहा. तुम इस जिंदगी के लिए बनी हो. बस हालात ने तुम्हें गांव की चारदीवारी में बांध रखा था.’’

राहा मुसकराई लेकिन उस मुसकान के पीछे बीते दिनों की थकान साफ ?ालक रही थी. उस ने कहना शुरू किया, ‘‘4 बहनों मैं सब से बड़ी थी. सुबह से शाम तक बस काम. चूल्हा, पशु, खेत, छोटेछोटे ?ागड़े और फिर वही सवाल अब शादी कब करेंगी?’’

पार्थ चुपचाप सुनता रहा. राहा की आवाज भर्रा गई, ‘‘मैं भागना नहीं चाहती थी. मैं बस पढ़ना चाहती थी. इंटर पास करते समय लगा था कि अब कुछ बदलेगा. लेकिन मां ने कहा अब और पढ़ाई किसलिए? घर के काम ही तो करने हैं.’’

पार्थ ने उस का हाथ थाम लिया, ‘‘और तब तुम ने प्राइवेट से पढ़ने का फैसला किया.’’

राहा ने सिर हिलाया, ‘‘हां, किताबें रात को पढ़ती थी. कई बार नींद से आंखें जलने लगती थीं पर मन नहीं भरता था.’’

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद उसने पूछा, ‘‘तुम्हें याद है पहली बार हम कैसे मिले थे?’’

पार्थ हलका सा हंसा, ‘‘कैसे भूल सकता हूं. रोहन मामा के घर गया था. तुम आंगन में गेहूं साफ कर रही थीं और साथसाथ किताब पढ़

रही थीं.’’

राहा को भी हंसी आ गई, ‘‘तुम ने तभी

कहा था कि इतनी मेहनत के बीच भी सपने पालने की हिम्मत कहां से लाती हो तो मैं ने पलट कर कहा था कि सपने नहीं पालूंगी तो जिंदगी बो?ा बन जाएगी.’’

‘‘तुम्हारी सुंदरता पर मैं लट्टू हो गया था राहा. मु?ो तुम्हारे आगे कुछ सू?ा ही नहीं रहा था. मैं मामा से मिलने 2 दिन के लिए आया था और पूरे 2 हफ्ते तक वहीं रुक गया.’’

‘‘और उस के बाद मिलनेजुलने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह गांव छोड़ कर शहर आने पर ही थमा पार्थ.’’

दोनों की निगाहें कुछ पलों के लिए एकदूसरे में ठहर गईं. पार्थ ने आगे बढ़ कर उसे अपने सीने से लगा लिया.

राहा ने कहा, ‘‘मु?ो तुम पर भरोसा था पार्थ. तुम ने कभी बड़ेबड़े वादे नहीं किए. बस कहा संघर्ष होगा लेकिन साथसाथ…’’

पार्थ गंभीर हो गया, ‘‘घर छोड़ कर भागने का फैसला आसान नहीं था राहा. मुझे डर था कि कहीं तुम्हें मेरी वजह से तकलीफ न हो.’’

राहा ने दृढ़ स्वर में कहा, ‘‘मैं घर से भागी नहीं थी. मैं अपनी जिंदगी की तरफ चली थी. मांबाप से झूठ बोलना सब से मुश्किल था पर अगर रुक जाती तो खुद से झूठ बोलना पड़ता.’’

शहर की शाम धीरेधीरे गहराने लगी थी. सड़क की लाइटें जल उठी थीं. राहा ने

चारों ओर देखते हुए कहा, ‘‘यहां आ कर मैं ने पहली बार महसूस किया कि मैं सिर्फ किसी की बेटी या बहन ही नहीं हूं मैं एक इंसान भी हूं.’’

‘‘और मु?ो तुम पर गर्व है राहा. सुबह घर की जिम्मेदारी, शाम को ट्यूशन और रात को पढ़ाई फिर भी तुम्हारे चेहरे पर शिकन नहीं दिखती.’’

राहा की आंखें नम हो गईं, ‘‘कभीकभी मां की बहुत याद आती है. सोचती हं, अगर वे मु?ो ऐसे देख पातीं तो क्या कहतीं?’’

पार्थ ने शांत स्वर में कहा, ‘‘एक दिन तुम खुद उन के सामने खड़ी हो कर कहोगी कि तुम ने गलत रास्ता नहीं  बस अपना रास्ता चुना था.’’

राहा ने उस के कंधे पर सिर रख दिया, ‘‘मैं अपने फैसले से डरती नहीं हूं पार्थ. मु?ो अपनेआप पर गर्व है और इस बात पर भी कि मैं ने तुम्हें जीवनसाथी चुना.’’

पार्थ ने उसे कस कर थाम लिया, ‘‘और मु?ो इस बात पर कि तुम ने अपना भविष्य खुद लिखने की हिम्मत की.’’

नीचे सड़क पर जिंदगी अपनी रफ्तार से चल रही थी और ऊपर उस छोटी सी बालकनी में 2 जवां दिल अपने संघर्ष, सपनों और विश्वास के साथ एक नई शुरुआत को चुपचाप जी रहे थे.

6 महीने कब बीत गए राहा को पता ही नहीं चला. शहर की तेज रफ्तार जिंदगी में दिन भागते चले जा रहे थे लेकिन राहा के मन में एक सवाल धीरेधीरे गहराने लगा.

एक शाम राहा रसोई में चाय बना रही

थी. खिड़की के बाहर बारिश की हलकी फुहारें गिर रही थीं. पार्थ औफिस से लौटा तो उस

के चेहरे पर वही रोज वाली थकान थी. पार्थ

सोफे पर बैठते हुए बोला, ‘‘सिर बहुत भारी हो रहा है आज.’’

राहा ने चाय का कप उस की ओर बढ़ाया फिर खुद सामने कुरसी खींच कर बैठ गई. कुछ पल वह चुप रही जैसे शब्दों को भीतर ही भीतर तराश रही हो. फिर उस ने धीमे लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा, ‘‘6 महीने हो गए हैं हमें साथ रहते हुए.’’

पार्थ ने कप होंठों से हटाया, ‘‘हं…’’

‘‘तुम सम?ा रहे हो न मैं क्या कहना चाहती हूं?’’ राहा की आंखें सीधे पार्थ के चेहरे पर थीं.

पार्थ ने गहरी सांस ली, ‘‘राहा, अभी

हालात ठीक नहीं हैं. नौकरी नई है, सैलरी भी

तुम जानती हो.’’

राहा की आवाज में संयम था लेकिन भीतर की बेचैनी छलक पड़ी, ‘‘मैं पैसों की

बात नहीं कर रही. मैं सुरक्षा की बात कर रही हूं, समाज की बात कर रही हूं.’’

पार्थ चुप रहा.

‘‘हर बार मकानमालकिन का सवाल, शादी कब करोगे? हर पड़ोसी की नजर देख कर मु?ो लगता है जैसे मैं कोई अपराध कर रही हूं.’’

पार्थ ने सिर ?ाका लिया, ‘‘मैं नहीं चाहता कि हमारी शादी किसी जल्दबाजी में हो. मैं चाहता हूं कि तुम्हें वह सम्मान दूं जो एक स्थिर जिंदगी से आता है.’’

राहा की आंखें भर आईं, ‘‘सम्मान सिर्फ

पैसे से नहीं आता पार्थ. भरोसे से आता है और भरोसा तब मजबूत होता है जब रिश्ते को नाम मिलता है.’’

कुछ देर कमरे में सिर्फ घड़ी की टिकटिक सुनाई देती रही.

‘‘तुम्हें पता है बगैर शादी के इस तरह रहना मु?ो असुरक्षित करता है. कभीकभी लगता है कि अगर कुछ हो गया तो मेरे पास संजोने के लिए सिर्फ यादें होंगी, कोई अधिकार नहीं,’’ राहा ने भारी स्वर में कहा.

पार्थ अचानक उठ खड़ा हुआ, ‘‘तुम

सोचती हो मैं भाग जाऊंगा?’’ उस की आवाज

में चोट थी.

राहा भी खड़ी हो गई, ‘‘मैं तुम पर शक नहीं कर रही. मैं हालात से डर रही हूं. मैं वही लड़की हूं जिस ने अपने घर से निकलते वक्त सबकुछ दांव पर लगाया था.’’

पार्थ ने नर्म पड़ते हुए कहा, ‘‘मेरे औफिस

में प्रमोशन की बात चल रही है. अगर सब ठीक रहा तो…’’

‘‘तो कब? मेरी उम्र, मेरी पढ़ाई, मेरी पहचान सब जैसे ठहरे हुए हैं,’’ राहा ने बीच में

ही पूछा.

पार्थ की आंखों में उल?ान साफ थी, ‘‘मु?ो थोड़ा वक्त चाहिए राहा.’’

राहा ने थके हुए स्वर में कहा, ‘‘वक्त तुम्हें चाहिए पार्थ लेकिन समय मेरे हाथ से फिसल रहा है,’’ और फिर खिड़की के पास जा कर खड़ी हो गई. बारिश अब तेज हो चुकी थी. बोली, ‘‘मैं शहर आई थी सपनों के लिए. मैं ऐसे रिश्ते के लिए नहीं आई थी जिस में मु?ो हर दिन खुद को साबित करना पड़े.’’

पार्थ धीरेधीरे उस के पास आया. बोला, ‘‘मु?ा पर भरोसा रखो.’’

राहा ने उसकी ओर देखा और बोली, ‘‘मैं ने भरोसा कर के ही घर छोड़ा था. अब मैं बस एक ठोस फैसला चाहती हूं.’’

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया. बाहर बारिश लगातार हो रही थी और भीतर दोनों

के बीच अनकहा डर और अधूरा वादा खड़ा था. एक ऐसे मोड़ पर जहां हर कदम सोचसम?ा कर रखना जरूरी था.

राहा को सम?ा नहीं आ रहा था शादी की बात को ले कर पार्थ क्यों हर समय टालने की कोशिश करता है. 20 साल की उम्र में उस पर भरोसा कर उस ने घर छोड़ दिया था. यह बात सच थी उसे शहर लाने के बाद से पार्थ भी अपने किसी रिश्तेदार से नहीं मिला था, न ही वह घर जाता था फिर भी शादी को ले कर वह गंभीर नहीं था. 1 महीना और बीत गया था.

राहा रोज शाम को ट्यूशन पढ़ाने जाती थी. 8 वर्षीय श्वेता की मम्मी पूजा को राहा से विशेष सहानुभूति थी. एक दिन श्वेता की तबीयत खराब थी. वह जल्दी घर वापस आ गई. उस समय पार्थ घर पर था. अभी वह दरवाजे पर पहुंची ही थी कि उस ने पार्थ को बात करते हुए सुना.

‘‘मैं बहुत जल्दी इस मुसीबत से छुटकारा पा लूंगा

तुम चिंता मत करो बस कुछ समय की मोहलत

दे दो.’’

यह सुन कर राहा के पैरों के नीचे से जमीन सरक गई. इस से ज्यादा कुछ सुनने की उस की हिम्मत न थी. किसी तरह उस ने अपनेआप को संयत किया. दरवाजा धीरे से बंद किया.

हाथ अभी भी कांप रहे थे. उस ने चप्पलें उतारीं पर दिल की धड़कनें जैसे कमरे में गूंज

रही थीं. पार्थ का चेहरा उसे देखते ही सख्त हो गया था.

‘‘तुम इतनी जल्दी वापस कैसे आ गईं?’’ पार्थ ने असहज हो कर पूछा.

राहा ने आंखें ?ाकाए हुए कहा, ‘‘श्वेता की तबीयत ठीक नहीं थी. मैडम ने आज छुट्टी दे दी,’’ उस ने अपनी आवाज को यथासंभव सामान्य रखने की कोशिश की लेकिन भीतर एक तूफान उमड़ रहा था.

पार्थ ने जबरन मुसकराने की कोशिश की, ‘‘अच्छा, तबीयत कैसी है अब उस की?’’

‘‘बुखार है,’’ राहा ने संक्षेप में कहा और पानी का गिलास उठाने रसोई की ओर बढ़ गई. उसे डर था कि अगर वह सामने रुकी तो उस की आंखें सब कह देंगी.

कुछ पल की चुप्पी के बाद उस ने खुद

को संभालते हुए पूछा, ‘‘तुम किसी से बात कर रहे थे?’’

पार्थ के हाथ में रखा मोबाइल जैसे अचानक भारी हो गया, ‘‘हां, औफिस का काम

था,’’ उस रात राहा ने पार्थ से कुछ नहीं कहा. वह चुपचाप बिस्तर के एक कोने पर लेट गई. पार्थ कुछ देर इधरउधर टहलता रहा फिर मोबाइल देखते हुए सो गया. कमरे की बत्ती बु?ा चुकी थी लेकिन राहा की आंखों में नींद नहीं थी..

‘‘मुसीबत,’’ वह शब्द उस के भीतर बारबार गूंज रहा था, ‘क्या मैं सच में किसी की मुसीबत बन गई हूं?’ उस ने तकिए के नीचे हाथ दबा लिया जैसे अपने ही सवालों को वहां कैद कर देना चाहती हो. उसे गांव याद आ रहा था. मां की सख्त आवाज पर उस के पीछे छिपी चिंता. अगर आज मैं वहां होती तो कम से कम अपनी जगह तो पक्की होती. फिर खुद पर ही गुस्सा आया कि नहीं राहा, तुम डर के कारण पीछे नहीं लौटोगी.

सुबह राहा रोज की तरह जल्दी उठी. पार्थ अभी सो रहा था. उस ने चाय बनाई और चुपचाप बालकनी में खड़ी हो कर नीचे जाती जिंदगी को देखने लगी.

‘अगर आज मैं यहां से चली जाऊं तो क्या किसी को फर्क पड़ेगा?’ यह सवाल उसे भीतर तक चुभ गया.

औफिस के लिए निकलते समय पार्थ ने पूछा, ‘‘आज इतनी चुप क्यों हो?’’

राहा ने हलकी सी मुसकान ओढ़ ली, ‘‘कुछ नहीं बस थकान है.’’

वह जानती थी यह मुसकान ?ाठी है लेकिन फिलहाल यही उस का कवच थी.

श्वेता अगले दिन भी ठीक नहीं थी. पूजा ने उसे पानी का गिलास पकड़ाते हुए कहा, ‘‘राहा, तुम आज कुछ बु?ाबु?ा लग रही हो. सब ठीक तो है?’’

राहा ने सिर हिला दिया, ‘‘बस पढ़ाई और काम की थकान है.’’

मगर मैडम की आंखें मां जैसी थीं जो देख लेती थीं, ‘‘औरत जब चुप हो जाती है

न तो सम?ा लो वह बहुत कुछ सोच रही होती है.’’

राहा का गला भर आया. उस ने बात बदल दी पर भीतर कहीं एक दरवाजा खुल गया था.

घर लौटते समय वह जानबू?ा कर देर तक सड़क पर बैठी रही. बैग गोद में रखे वह आतेजाते लोगों को देखती रही. मेरे पास क्या है? एक कमरा जो मेरा नहीं, एक रिश्ता जिस का नाम नहीं और एक भविष्य जो टलता जा रहा है.

उसी शाम उस ने अपने कागज निकाले. इंटर की मार्कशीट, कालेज की रसीदें और ट्यूशन के पैसों का छोटा सा हिसाब. उस ने सबकुछ बहुत सहेज कर रखा था.

‘अगर मु?ो जाना पड़े तो मैं खाली हाथ नहीं जाऊंगी?’ उस ने सोचा.

पार्थ को कुछ सम?ा नहीं आ रहा था. वह जब भी उस से बात करना चाहता, राहा बात को टाल देती.

‘‘तुम बदल गई हो,’’ एक रात उस ने कहा.

‘‘नहीं पार्थ मैं बस खुद को सम?ाने लगी हूं.’’

उस रात वह देर तक खिड़की के पास बैठी रही. हवा में ठंडक थी. उस ने खुद से कहा कि मैं भागूंगी नहीं. अगर मु?ो जाना पड़ा तो मजबूर हो कर नहीं होश में घर छोडूंगी.

उस के भीतर डर था, प्रेम भी था और टूटने का दर्द भी. लेकिन पहली बार उस दर्द के साथ एक स्पष्टता भी थी कि किसी भी रिश्ते में आगे बढ़ने से पहले उसे अपनी जगह सुरक्षित करनी होगी. राहा ने आंखें बंद कीं. शहर की आवाजों के बीच उस ने अपने भीतर की आवाज सुन ली थी. धीमी पर अब बहुत साफ.

श्वेता की तबीयत अब कुछ संभालने लगी थी लेकिन उस दिन उस के घर का माहौल अजीब सा था. पूजा फाइलों को समेट रही थीं जैसे मन कहीं और अटका हो. राहा पढ़ातेपढ़ाते रुक गई.

‘‘मैडम, आज आप कुछ परेशान लग रही हैं?’’ राहा ने हिचकिचाते हुए कहा.

पूजा ने एक लंबी सांस ली, ‘‘परेशानी नहीं, बदलाव है. मेरा ट्रांसफर हो गया है. अगले हफ्ते दूसरे शहर जाना है.’’

यह सुनते ही राहा के भीतर जैसे कुछ टूट सा गया. उस के हाथ से पैन फिसल गया, ‘‘दूसरे शहर,‘‘ उस की आवाज कांप गई.

पूजा ने उस की ओर देखा, ‘‘तुम इतनी उदास क्यों हो गईं? लगता है नई ट्यूशन की चिंता हो रही है.’’

राहा ने नजरें ?ाका लीं पर आंसू रोक नहीं पाई, ‘‘मैडम ,आप चली जाएंगी तो मेरा यहां कोई नहीं होगा.’’

पूजा चौंक गईं, ‘‘ऐसा क्यों कह रही हो? तुम्हारा घर?’’

राहा ने गहरी सांस ली और महीनों से दबा सच बाहर आ गया, ‘‘मैं भी आप के साथ नये शहर जाना चाहती हूं, मैडम.’’

पूजा स्तब्ध रह गईं, ‘‘क्या? बिना सोचेसम?ो ऐसी बातें मत करो राहा. तुम रहोगी कहां?’’

राहा ?ाट से बोली जैसे यह बात वह अपने भीतर बहुत पहले तय कर चुकी हो,

‘‘प्लीज, कुछ दिन मु?ो अपने साथ रख लीजिएगा. मैं श्वेता का भी ध्यान रख लूंगी और घर के सारे काम भी कर दूंगी. उस के बाद किसी सस्ते छात्रावास में चली जाऊंगी.’’

पूजा की आंखें भर आईं, ‘‘और तुम्हारे घर वाले? जिस घर में तुम रहती हो.’’

राहा ने बहुत शांत स्वर में कहा, ‘‘मेरे जाने से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा.’’

यह वाक्य किसी शिकायत की तरह नहीं बल्कि एक स्वीकारोक्ति की तरह था. पूजा कुछ क्षण उसे देखती रहीं उस लड़की को जो उम्र से पहले परिपक्व हो गई थी.

पूजा ने उसका हाथ पकड़ लिया, ‘‘औरत जब खुद के लिए जगह ढूंढ़ने लगे तो सम?ा वह बहुत अकेली हो चुकी है.’’

राहा फूटफूट कर रो पड़ी, ‘‘मैं कमजोर

नहीं बनना चाहती मैडम. बस सुरक्षित रहना चाहती हूं.’’

पूजा ने उसे अपने सीने से लगा लिया, ‘‘ठीक है, तुम मेरे साथ चलोगी लेकिन तुम अपनी पढ़ाई और काम दोनों जारी रखोगी.’’

राहा ने आंसू पोंछते हुए सिर हिलाया, ‘‘मैं वादा करती हूं.’’

उस शाम घर लौटते हुए राहा ने पार्थ से कुछ नहीं कहा. वह चुपचाप अपने कमरे में गई, अलमारी खोली और जरूरी कपड़े, किताबें, कागज एक छोटे से बैग में रख लिए. हर चीज उठाते समय उस का दिल कांपता था लेकिन हाथ रुकते नहीं थे.

अब शब्द नहीं, कदम जरूरी था, उस ने घर को एक बार चारों ओर से देखा. वही दीवारें, वही खामोशी और वही अनकहा डर.

अगली सुबह जब पार्थ औफिस चला गया, राहा ने दरवाजा धीरे से बंद किया. चाबी वहीं मेज पर रख दी. बैग उठाया और सीढि़यां उतर गई.

नीचे पूजा इंतजार कर रही थीं, ‘‘तैयार हो?’’ उन्होंने पूछा.

राहा ने पीछे मुड़ कर आखिरी बार उस घर की ओर को देखा. बोली, ‘‘हां, मैडम.’’

कार चल रही थी और शहर पीछे छूटता जा रहा था. राहा पहली बार रोई नहीं. उस की आंखों में डर था पर उस से ज्यादा आत्मसम्मान..

शाम ढल चुकी थी. औफिस से लौटते हुए पार्थ के हाथ में आज भी वही रोजमर्रा की थकान थी लेकिन भीतर कहीं एक बेचैनी भी थी अकारण नहीं बल्कि उस खामोशी के कारण जो सुबह से घर में पसरी हुई थी.

दरवाजा खोलते ही उसे अजीब सा खालीपन महसूस हुआ, ‘‘राहा,’’ उसने आवाज दी.

कोई जवाब नहीं.

उस ने घड़ी देखी, ‘‘अब तक तो लौट

आती थी.’’

रसोई में गया चूल्हा ठंडा था. मेज पर चाय का कप नहीं रखा था. कमरे में देखा तो अलमारी अधखुली थी और कुछ हैंगर खाली लटक रहे थे. उस का दिल जोर से धड़का, ‘‘राहा?’’ इस बार आवाज ऊंची थी.

वह कमरे से बाहर आया. मेज पर रखी चाबी उस की नजर में चुभ गई. यह क्या है?

वह कुरसी पर बैठ गया. दिमाग तेजी से चलने लगा. बिना बताए ऐसे कैसे जा सकती है? पहला खयाल आया कि उसे ढूंढ़ने जाए. थाने में पूछे, ट्यूशन के घर जाए और पड़ोसियों से बात करे. फिर दूसरा खयाल उस से भी तेज कि वह उसे क्यों ढूंढे़. वह उठ कर कमरे में टहलने लगा.

‘मैं ने उसे कभी रोका नहीं फिर वह ऐसे क्यों गई?’ पार्थ ने खुद को सम?ाने की कोशिश की कि राहा का शहर में कोई नहीं है. कहां जाएगी? थोड़ी देर में लौट आएगी. फोन उठाया. उस का नंबर डायल किया. एक बार, 2 बार पर फोन बंद था. उस की उंगलियां सख्त हो गईं कि यह उस की चाल है? मु?ो डराने के लिए?

पार्थ को राहा की बातें, उस की चुप्पी

और उस की आंखों में जमा हुआ डर याद आ

रहा था पर उसी पल भीतर का एक और स्वर

उठ खड़ा हुआ कि अगर आज तुम उसे ढूंढ़ने निकल गए तो यह मान लो कि तुम कमजोर हो. वह खिड़की के पास जा कर खड़ा हो गया.

नीचे सड़क पर लोग आजा रहे थे जैसे कुछ हुआ ही न हो. उस ने खुद से कहा कि वह लौटेगी क्योंकि उस के पास लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.

पार्थ के भीतर पुरुष का अहम जाग चुका था. वह अहम जो प्रेम से नहीं, अधिकार से जन्म लेता. रात गहरी होती गई घड़ी की सुइयां आगे बढ़ती रहीं पर पार्थ वहीं बैठा रहा.

हर आहट पर उस की नजरें सिर उठतीं कि राहा लेकिन दरवाजा नहीं खुला. अब बेचैनी की जगह गुस्से ने ले ली.

अगर वह गई है तो जाए. मैं क्यों हर बार ?ाकूं?

उस ने खुद को सम?ाया कि मैं ने उसे सबकुछ दिया छत, सहारा और शहर की जिंदगी. पर यह कहते हुए कहीं भीतर एक हलकी सी दरार पड़ गई. वह जानता था राहा को उस ने छत दी थी पर सुरक्षा नहीं, साथ दिया था पर नाम नहीं. फिर भी वह नहीं पसीजा, न ढूंढ़ने गया और न किसी से पूछा. वह इंतजार करता रहा इस भरोसे पर नहीं कि वह लौटेगी बल्कि इस जिद पर कि वह खुद ही लौटेगी.

और उस खाली कमरे में पहली बार पार्थ को यह एहसास हुआ कि कुछ रिश्ते तकरार

से नहीं खामोशी ओढ़ कर खत्म होते हैं.

नया शहर एकदम अलग था. सड़कें चौड़ी थीं, रफ्तार तेज थी और लोगों के चेहरों पर अजनबीपन था लेकिन राहा के भीतर पहली बार एक अजीब सा हलकापन था जैसे सांस खुल कर आ रही हो.

पूजा  के साथ आए अभी कुछ ही दिन हुए थे कि एक शाम उस ने कहा, ‘‘राहा, कल मेरे बौस के घर चलना है.’’

राहा थोड़ा घबरा गई. पूछा, ‘‘क्यों, मैडम?’’

पूजा मुसकराईं, ‘‘उन की पत्नी को बेबी सिटर चाहिए. मैं ने तुम्हारा जिक्र कर दिया था.’’

अगले दिन वे एक आलोक कालोनी के साफसुथरे मकान के सामने खड़ी

थीं. घर से निकलते समय राहा का दिल तेज धड़क रहा था डर से नहीं, उम्मीद से.

दरवाजा खुलते ही एक सलीकेदार महिला सामने आईं, ‘‘आप ही पूजा हैं?’’

‘‘जी, और यह राहा है,’’ पूजा ने कहा.

रीता मैडम ने राहा को ऊपर से नीचे तक देखा. उस में जांच नहीं, परख थी.

‘‘बच्चों का अनुभव है?’’

राहा ने शांत स्वर में जवाब दिया, ‘‘जी, पढ़ातेपढ़ाते बच्चों को सम?ाना आ गया है और जरूरत पड़ी तो सीख भी लूंगी.’’

रीता मैडम मुसकरा दीं, ‘‘मु?ो यही जवाब चाहिए था.’’

कुछ ही देर में बात तय हो गई. काम के घंटे, वेतन, छुट्टियां सबकुछ साफसाफ.

‘‘और हां, अगर तुम आगे पढ़ना चाहो तो हमें कोई एतराज नहीं. बस वीवा का ध्यान ठीक से रखना,’’ रीता मैडम ने कहा.

शाम को जब वह पूजा के साथ लौटी तो कुछ पल चुपचाप बैठी रही. फिर अचानक उस की आंखें भर आईं, ‘‘मैडम,’’ उस की आवाज टूट गई.

पूजा ने चौंक कर पूछा, ‘‘क्या हुआ? कुछ गलत.’’

राहा उठी और उन के सामने हाथ जोड़ दिए, ‘‘मैं सम?ा नहीं पा रही आप का धन्यवाद कैसे करूं.’’

पूजा ने ?ाट से उस के हाथ पकड़ लिए, ‘‘पागल हो गई हो क्या? यह एहसान नहीं है.’’

‘‘नहीं मैडम, जिस दिन मैं सब से ज्यादा अकेली थी, आप ने मु?ो थाम लिया. आप ने मु?ा पर भरोसा किया, बिना सवाल किए,’’ राहा बोली.

पूजा की आंखें नम हो गईं, ‘‘राहा, मैं ने तुम्हें इसलिए साथ नहीं लाई कि तुम कमजोर

हो. मैं ने तुम्हें इसलिए साथ लिया क्योंकि तुम मजबूत हो और मजबूत लड़कियों को कभीकभी बस एक मौका चाहिए.’’

राहा ने सिर ?ाका लिया, ‘‘मैं यह मौका कभी व्यर्थ नहीं जाने दूंगी.’’

उस रात जब वह अपने छोटे से कमरे में लेटी तो पहली बार उसे यह डर नहीं था कि कल क्या होगा. अब उस के पास काम था. एक सुरक्षित छत थी और सब से बढ़ कर अपने फैसलों की जिम्मेदारी खुद उठाने का साहस था. उस ने मन ही मन कहा कि मैं अभी पूरी नहीं बनी हूं पर अब टूट भी नहीं रही.

और पहली बार, उस ने बिना किसी अपराधबोध के चैन की नींद ली. समय अब राहा के लिए बो?ा नहीं साथी बन गया था. पूजा ने अपने पड़ोस में ही उस के रहने के लिए एक कमरे की व्यवस्था कर दी थी.

सुबह वह रीता मैडम के घर पहुंचती. नन्ही वीवा को नहलाना, उसे कहानी सुनाते हुए खाना खिलाना, उस के साथ रंग भरना ये सब अब काम नहीं लगते थे बल्कि एक अपनापन बन गए थे.

वीवा अकसर उस से पूछती, ‘‘दीदी, आप हमेशा किताबें क्यों पढ़ती रहती हो?’’

राहा मुसकरा कर जवाब देती, ‘‘ये किताबें मु?ो आगे ले जाती हैं वीवा…’’

दोपहर में जब वीवा सो जाती, राहा अपनी किताबें खोल लेती. कभीकभी आंखें थक जातीं पर मन नहीं थकता था.

‘अब रुकने का कोई बहाना नहीं,’ वह खुद से कहती.

शाम होतेहोते वह कालेज की औनलाइन क्लास या नोट्स में डूब जाती और श्वेता को भी पढ़ाती. पूजा मैडम कई बार उसे पढ़ते देख कहती, ‘‘इतनी मेहनत मत करो, बीमार पड़ जाओगी.’’

‘‘मैडम, मेहनत से अब डर नहीं लगता. रुक जाना गलत है.’’

3 साल कब निकल गए, उसे पता ही नहीं चला. जब उस का ग्रैजुएशन का रिजल्ट आया और अच्छे नंबर देखे तो वह देर तक स्क्रीन को देखती रही. आंखों से आंसू गिरने लगे, ‘‘मैडम,’’ वह दौड़ कर पूजा के पास पहुंची, ‘‘मैं पास हो गई. अच्छे नंबर आए हैं.’’

पूजा ने उसे गले लगा लिया, ‘‘मु?ो भरोसा था. तुम बस पढ़ नहीं रही थीं, तुम खुद को गढ़ रही थीं.’’

इसी बीच नन्ही वीवा स्कूल जाने लगी. उस की छोटी सी पीठ पर टंगा बैग देख कर राहा को अपना बचपन याद आ जाता. उसे स्कूल छोड़ने के बाद वह कोचिंग सैंटर जाने लगी. सुबह जल्दी उठना शाम को वीवा के साथ समय बिताना और रात को किताबों के बीच लौट आना. दिन बेहद थका देने वाले होते थे.

एक शाम पूजा ने कहा, ‘‘अगर बहुत ज्यादा हो रहा है तो छोड़ दो कोचिंग.’’

राहा ने सिर हिलाया, ‘‘नहीं मैडम, यह थकान अस्थाई है पर उपलब्धि स्थाई होगी.’’

परीक्षा का दिन आया. सवाल मुश्किल थे पर राहा का मन स्थिर था. बाहर

निकलते हुए उस ने आसमान की ओर देखा और बुदबुदाई, ‘‘मैं ने पूरी कोशिश की है.’’

जब रिजल्ट आया तो उस का नाम चयन सूची में था. कुछ पल उसे यकीन ही नहीं हुआ. हाथ कांप रहे थे और दिल जोरजोर से धड़क रहा था, ‘‘मैडम,’’ वह सिर्फ इतना ही कह पाई.

पूजा ने स्क्रीन देखी और मुसकरा दीं, ‘‘बधाई हो, बैंक अफसर साहिबा.’’

राहा फूटफूट कर रो पड़ी, ‘‘अगर आप

न होतीं…’’

पूजा ने उस का वाक्य पूरा नहीं होने दिया, ‘‘तो भी तुम रास्ता ढूंढ़ लेतीं. मैं ने सिर्फ दरवाजा खोला है.’’

उस शाम राहा देर तक खिड़की के पास

बैठी रही. उसे पार्थ की याद आई पर अब दर्द के साथ नहीं.

‘कुछ लोग साथ चलने के लिए नहीं, खुद को पहचानने के लिए आते हैं,’ उस ने सोचा.

पूजा मैडम की मदद से उस की जिंदगी सचमुच बदल गई थी लेकिन उस बदलाव की सब से बड़ी वजह अब वह खुद थी.

मुंबई के लिए ट्रेनिंग का पत्र हाथ में आते

ही राहा का दिल धकधक करने लगा था. यह उस की जिंदगी की पहली हवाईयात्रा थी. पूजा मैडम ने ही टिकट बुक करवाए और जाते समय उस के हाथ में एक छोटा सा बैग थमाते हुए कहा, ‘‘डर लगे तो याद रखना तुम यहां तक अपने दम पर पहुंची हो.’’

राहा समय से बहुत पहले एअरपोर्ट पहुंच गई थी. कांच की दीवारों के बाहर खड़े जहाज उसे किसी और ही दुनिया के लग रहे थे. चैक इन, सुरक्षा जांच सबकुछ उस ने बड़े ध्यान से किया जैसे हर कदम उस की नई पहचान पर मुहर लगा रहा हो.

लाउंज में बैठ कर राहा किताब पलट रही थी पर शब्दों से ज्यादा उस की नजर बारबार घड़ी पर चली जाती थी.

तभी किसी की आवाज उस के कानों में पड़ी, ‘‘एक ब्लैक कौफी, नो शुगर.’’

यह आवाज जानीपहचानी थी. राहा का हाथ किताब पर ही रुक गया. उस ने सिर उठाया. कुछ दूरी पर पार्थ खड़ा था. वही चेहरा, वही कदकाठी बस आंखों के नीचे हलकी थकान और माथे पर समय की लकीरें. कुछ पल दोनों एकदूसरे को देखते रहे जैसे भीड़ अचानक गायब हो गई हो.

पार्थ ने पहले पहचान लिया. वह धीरेधीरे उस की ओर आया, ‘‘राहा तुम,’’ उस के स्वर में हैरानी और अविश्वास था.

राहा उठी नहीं. उस ने बस शांत स्वर में कहा, ‘‘हैलो पार्थ.’’

‘‘तुम यहां.’’

उस ने चारों ओर देखा जैसे कोई जवाब वहां लिखा हो, ‘‘ट्रेनिंग के लिए मुंबई जा रही हूं,’’ राहा ने संक्षेप में कहा.

पार्थ के चेहरे पर एक अजीब सी हलचल आई.

‘‘तुम, हवाईजहाज से…’’

राहा हलका सा मुसकराई, ‘‘हां, पहली बार…’’

कुछ क्षण की चुप्पी. फिर पार्थ बोला, ‘‘तुम अचानक बिना बताए चली गई थीं?’’

राहा ने उस की आंखों में देखा. अब वहां कोई शिकायत नहीं थी सिर्फ थकान और कुछ खो देने का एहसास. उस ने कहा, ‘‘कुछ बातें कहने के लिए नहीं, सम?ाने के लिए होती हैं. मैं ने वही किया.’’

पार्थ बगल की कुरसी पर बैठ गया, ‘‘मैं ने तुम्हें ढूंढ़ा नहीं यह मेरी सब से बड़ी गलती थी.’’

राहा की आवाज संयत थी, ‘‘और मैं ने इंतजार नहीं किया. शायद यह मेरी सब से बढि़या बात थी.’’

पार्थ ने गहरी सांस ली, ‘‘मैं सम?ा ही नहीं पाया कि तुम इतने आगे निकल जाओगी.’’

‘‘मैं आगे नहीं निकली पार्थ. मैं बस वहीं पहुंची जहां मु?ो होना चाहिए था.’’

तभी घोषणा हुई, ‘‘मुंबई के लिए उड़ान संख्या 48 वाले बोर्डिंग की तैयारी करें.’’

राहा ने अपना बैग उठाया तो पार्थ हड़बड़ा गया, ‘‘क्या हम कभी बात कर सकते हैं?’’

राहा ने एक पल सोचा, फिर सिर हिलाया, ‘‘अभी नहीं. आज मैं उस जिंदगी की

ओर जा रही हूं जिसे मैं ने बहुत मेहनत से

बनाया है.’’

पार्थ कुछ कहना चाहता था पर शब्द साथ नहीं दे पाए. राहा बोर्डिंग गेट की ओर बढ़ गई. उस ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा क्योंकि कुछ मुलाकातें बीते हुए कल से होती हैं और राहा अब अपने आने वाले कल की तरफ उड़ान भर रही थी.

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