डोर बेल बजी तो अमन ने दरवाजा खोला फिर वही गलत पते पर बुके वाला खड़ा था.

‘‘अरे भैया फिर?’’ अमन ने अपना मत्था ठोक लिया, ‘‘हर शनिवार ही गलत पते पर गुलदस्ता लाते हो. भाई क्या चाहते हो? यह ऊपर 40 नंबर वाले का बुके है. अराधना नाम देखो न. 38 नंबर हमारा है. नाम अमन है. कितनी बार बताना पड़ेगा. जो भेजता है उस को बोलते क्यों नहीं कि सही पता लिखा करे...’’

‘‘प्लीज साहब आप ही दे देना... 40 नंबर वाली मैडम बहुत देर से आती है न? मुझे दुकान बंद कर 7 बजे अपने कमरे पर जाना होता है... मां बीमार है न साहब...’’ लड़का दांत निपोर कर यों कहता कि उसे लेना ही पड़ता.

‘‘मैडम को आप ही बोल देना साहब कि भेजने वाले को सही पता, लिखाने को.’’

‘‘अरे मेरा छुट्टी के दिन बस यही काम रह गया है कि तू देता जाए और मैं पहुंचाता जाऊं और वह भी बुके एक लड़की को... यह 8वां शनिवार है. आगे से मैं लूंगा नहीं... तू ही और्डर लिया कर न...’’

‘‘क्या बात करते हो साहबजी 4 पैसे किसी तरह जोड़ पाता हूं, गरीब के पेट पर लात न मारना साहब...’’ वह रोंआसा सा हो गया.

‘‘ठीक है ठीक है जा भई जान मत खा ला दे दे दूंगा... मैं ही कुछ करता हूं तेरी मैडम का...’’ अमन ने बुके ले कर दरवाजा बंद कर दिया. लड़कियों से बात करने में वह वैसे ही घबराता था. इसीलिए उन से बचता रहता.

‘क्या मुसीबत है,’ सोचते हुए बुके एक ओर टेबल पर रखा. फूल कुम्हलाएं नहीं इसलिए हमेशा की तरह जग में पानी ला कर उस में उसे खड़ा कर रख दिया. फिर सोचने लगा कि अब इंतजार करूं उन मैडम का कि कब उन के कदमों की आहट सुनूं और मैं झट उन की अमानत उन्हें पेश करूं... लानत है यार... दिनभर काम से थका मैं न टीवी देखूं, न किसी से फोन पर बात ही करूं कि कहीं आन की आहट न सुनाई दे और फिर अमानत पहुंचाने में बहुत देर हो जाए या इसी सब में भूल जाऊं तो सुबह उठते ही जा कर जबरदस्ती ऐटीकेट में सौरी कहते हुए देना पड़े... अजीब मुसीबत है... 9 बजे का अलार्म ही लगा लेता हूं. आज तो जा कर उस की घंटी बजा कर बोल ही दूंगा कि अपने वैलविशर को सही पता लिखने को तो बोल दे और बुके के लिए शनिवार शाम को घर पर ही रहा करे, वह अपना मन पक्का कर रहा था.

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