Hindi Kahani : दीपक  आज बहुत सालों बाद अपने शहर वापस आया और आते ही उस ने अपने बचपन के दोस्त आकाश से मिलने की सोची. आकाश स्कूल से ही पढ़ाई में तेज और परिवार व व्यवहार से असली बिजनैसमैन था. दोस्तों का आकाश की जेब से 10 रुपए भी निकालना बड़ा मुश्किल रहता था. आकाश कब 10 से 100 बनाता, किसी को पता भी नहीं चलता था. कालेज का टौपर आकाश इकौनोमिक्स पर एकएक घंटा लैक्चर देते नहीं थकता था. आज उसी आकाश से मिल कर दीपक को अपनी लाइफ में चल रही फाइनैंशियल प्रौब्लम और बिजनैस लौस को दूर करने की हैल्प लेनी थी.

कई बार फोन करने पर भी जब आकाश ने दीपक का फोन नहीं उठाया, तो दीपक उस की दुकान पर ही चला गया. आकाश की दुकान सूट स्टाइलिंग की गारमैंट शौप थी जो 3 पीढ़ी पुरानी और शहर की मशहूर दुकान थी. जब दीपक दुकान पहुंचा तो दुकान काफी बदल चुकी थी.

5 साल में काफी रैनोवेशन हुआ था.

भीड़ भी पहले से ज्यादा थी. आखिर होगी ही, आकाश एक अव्वल दर्जे का

व्यापारी जो है, जिसे लोगों को अपनी दुकान में खींचना अच्छे से आता था. दीपक ने सेल्समैन को अपने आने की कही और बताया कि वह आकाश का दोस्त है तो सेल्समैन ने उसे एक कुरसी पर बैठाया और कैश काउंटर की ओर चल दिया. कैश काउंटर पर भीड़ थी, इसलिए दीपक और आकाश का एकदूसरे को देखना संभव नहीं हो पा रहा था. दीपक इधरउधर आंखें घुमा दुकान की भीड़ देख रहा था. तभी कोई उस के सामने आया.

‘‘कैसे हो भैया आप?’’

दीपक एकदम से चौंका, ‘‘अरे, मीरा तुम?’’ दीपक के सामने आकाश की बीवी मीरा हाथों में रसीदी किताब लिए खड़ी थी. दीपक कुछ बोलतापूछता कि मीरा ने एक हैल्पर से कहा, ‘‘सुनो भैया को चायकौफी कुछ दो. मैं थोड़ा यह काम निबटा आती हूं तब तक,’’ और मीरा दीपक को एक मुसकान दे वापस काम में लग गई.

दीपक उसे देख सोच रहा था कि अच्छा है मीरा भी आकाश का हाथ बंटाने दुकान आती है. इस से आकाश को काफी मदद मिलती होगी. कौफी पीते हुए दीपक का सारा ध्यान मीरा पर ही था कि कैसे वह हर लिस्ट से मौजूदा रसीद को बारबार चैक कर रही थी, सेल्समैन से सवालजवाब कर रही थी. इस बीच किसी ग्राहक की काल आई तो वह उसे भी बड़ी शांति से सुन रही थी. मीरा को इतना व्यस्त देख दीपक को चिंत्ता भी हुई कि एक महिला को कितनी परेशानी होती होगी. इस बीच दीपक ने हैल्पर से पूछा, ‘‘आकाश कहां है? दिख नहीं रहा.’’

हैल्पर ने असहजता से कहा, ‘‘भैया तो आते नहीं दुकान.’’

दीपक को यह सुन बड़ा आश्चर्य हुआ. उस ने फिर पूछा, ‘‘क्या आकाश बीमार चल रहा है?’’

हैल्पर ने फिर अटपटा सा मुंह बना कहा, ‘‘भैया बीमार तो नहीं, लेकिन नहीं आते. अब मैं भला और क्या बोलूं.’’

हैल्पर के चेहरे पर खिंची रेखा देख दीपक ने उस से और कोई सवाल नही किया.

दीपक ने अपना पूरा ध्यान मीरा पर दोबारा लगा दिया जो कस्टमर को फैब्रिक सलैक्शन में मदद कर रही थी. मीरा बड़े ध्यान से कस्टमर की बात सुनती और फिर जवाब देती. मीरा ने कहा, ‘‘मैं सम झ रही हूं आप सगाई के लिए सूट सिलवाना चाहते हैं तो मैं आप को इटैलियन फैब्रिक एडवाइस करूंगी या आप वैलवेट टच का फैब्रिक भी ले सकते हैं. वह दिखने में बहुत रौयल और स्मूथ लुक देता है. आजकल रौयल वायलेट कलर काफी ट्रेंडिंग है. उस के साथ व्हाइट की जगह आप लाइट पीच कलर की शर्ट स्टाइल करें तो बहुत ही सुंदर लुक आएगा.’’

मीरा की एडवाइस कस्टमर को काफी अच्छी लगी. उन्होंने ने मीरा की बात को मानते

हुए उस के स्टाइल और कलर के सूट पर हामी भरी. वहीं एक और बुजुर्ग थे जो 55 साल बाद अपने दोस्तों के साथ रीयूनियन पर मिलने वाले थे. उन्हें भी अपना स्टाइल, अपना सूट बेहतरीन चाहिए था. वे भी मीरा की गैस्ट हैंडलिंग देख काफी प्रभावित हुए और मीरा से ही अपने सूट के लिए एडवाइस लेने लगे. मीरा ने बड़ी तसल्ली से बहुत से फैब्रिक को देख कर एक फैब्रिक उन के लिए सलैक्ट किया.

मीरा ने उन से कहा, ‘‘यह फैब्रिक बैस्ट है आप के सूट के लिए. इस में वूल और कौटन का अच्छा कौंबिनेशन है. आप रीयूनियन के लिए मनाली जा रहे हैं तो वहां के मौसम के हिसाब यह बहुत अच्छा औप्शन है, साथ यह चैक्ड प्रिंट आप को विंटेज और क्लासिक दोनों लुक देगा और हां साथ में एक फेडोरा या नेव्स्बौय कैप पहन ले तो स्टाइल और निखर जाएगा.’’

मीरा की एडवाइस सुन वह कस्टमर बहुत खुश हुआ. मीरा के बताए गए सूट का तो और्डर किया ही, साथ ही उसे बहुत सारी शुभकामनाएं भी दीं. एक तरफ जहां लोग मीरा की एडवाइस, उस की स्टाइलिंग की तारीफ कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर दीपक मीरा की काबिलीयत देख हैरानी में डूबा पड़ा था. मीरा की काबिलीयत, उस की लगन दीपक को बड़ा दंग कर रही थी कि क्या कमाल की लड़की से शादी की है आकाश ने.’’ लेकिन फिर उस के मन में एक प्रश्न बारबार उठता कि यह आकाश आखिर है कहां? सारा काम मीरा ही अकेले क्यों कर रही? कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हुई. कुछ देर इंतजार के बाद मीरा दीपक के पास वापस आई और बोली, ‘‘भैया माफ  करना, शादी का सीजन चल रहा है तो भीड़ ज्यादा है. आप बहुत देर से अकेले बैठे हैं, इसलिए माफ करना.’’

दीपक ने मीरा को सराहते हुए कहा, ‘‘अरे माफी कैसी. काम पहले होता है

मीरा. मैं तो बहुत खुश हुआ देख कर कि दुकान अच्छी चल रही है और तुम्हारा काम, तुम्हारी गैस्ट डीलिंग का तो मैं आज कायल हो गया. आज सम झ आया कि आकाश ने जिद कर के तुम से लव मैरिज क्यों की. तुम तो हो ही इतनी लायक कि कोई कैसे तुम्हें पसंद न करे. मगर वह है कहां? दुकान नहीं आया?’’

मीरा ने बिना संकोच कहा, ‘‘क्या भैया आप तो ऐसे बात कर रहे हैं जैसे आप को कुछ पता नही. भला आकाश को क्या पड़ी है दुकान की.’’

दीपक थोड़ा हिचकते बोला, ‘‘नहीं मीरा, मु झे कुछ नहीं पता. क्या कोई बात हुई दोनों के बीच? क्या कोई दूसरी औरत है?’’

मीरा एक व्यंग्यभरी मुसकान से बोली, ‘‘औरत नहीं भैया, आदमी.’’

‘‘आदमी,’’ सुन दीपक का चेहरा पीला पड़ गया. उसे सम झ नही आया कि अब आगे वह क्या बोले और क्या ही पूछे.

मीरा उस की असहजता को देख बोली, ‘‘नही भैया मेरा मतलब वह नही था. दरअसल आकाश आजकल एक बाबा को गुरु मान उस के आश्रम में ही पड़ा रहता है. वहीं उस बाबा की सेवा करता है, उपदेश सुनता है और बाबा का भजन करता है.’’

‘‘क्या?’’ मीरा की बात पर दीपक को विश्वास नहीं हुआ.

वह कुछ बोलता उस से पहले ही मीरा बोल पड़ी, ‘‘3 साल हो गए, उसे इस दुकान में पैर रखे. बापदादा की पहचान, यह कारोबार सब दान कर देता, अगर मैं बीच में नहीं आती तो. थोड़ी बुद्धि शायद बाकी है उस में. इसलिए दुकान की पूरी जिम्मेदारी मु झे दे दी. नहीं तो पूरा परिवार सड़क पर आ जाता. मगर फिर भी हर महीने उसे दानपुण्य करने के लिए पैसे देती रहती हूं. खैर, भैया पुश्तों की मेहनत एक दिन में दान करने से अच्छा है कि हर महीने की तनख्वाह ही बंध जाए. कम से कम घर वालों का और यहां काम कर रहे लोगों का सहारा तो नहीं छूटेगा.’’

दीपक को मीरा की किसी भी बात पर विश्वास करना बहुत मुश्किल हो रहा था क्योंकि जिस आकाश को वह जानता था वह तो बाबाओं और भजनों से दूर भागता था. फिर यह क्या ही हो रहा हैं.

इस बीच मीरा का फोन बजा, ‘‘अच्छा

कैसे रहा मेरी गुडि़या का दिन? स्कूल में पढ़ाई की न?’’

दीपक सम झ गया कि मीरा अपनी और आकाश की बेटी जिया से बात कर रही है. अब शायद 5 या 6 साल की हो गई होगी जिया. दीपक ने आखिरी बार जिया को उस के दूसरे जन्मदिन पर देखा था. आकाश ने बहुत बड़ी पार्टी दी थी.

‘जिया पर तो जान छिड़कता है आकाश. बाबा के चक्कर में पड़ा है तो क्या बेटी से बहुत प्यार करता है आकाश?’ दीपक मन ही मन आकाश और जिया के प्यारभरी यादों में डूबा था.

उधर मीरा फोन पर जिया की नौकरानी से बोल रही थी, ‘‘खाना खिला देना.

थोड़ी देर सुला भी देना. शाम को जिद्द करे तो ले आना. मैं यहीं अपने पास रख लूंगी.’’

‘‘रख लूंगी,’’ अब दीपक के सवाल फिर शुरू हो गए,’’ क्या घर पर आकाश के पापामम्मी नहीं.’’

मीरा ने कहा, ‘‘नहीं भैया, मम्मी का मोतियाबिंद का औपरेशन है तो मेरी ननद के यहां गई हैं. अब मैं यहां काम देखती या उन की तबीयत इसलिए वे ननद के यहां चली गईं पापा के साथ.’’

‘‘और आकाश, वह नहीं देख सकता था?’’ दीपक ने सवाल किया.

मीरा ने फिर व्यंग्यभरी मुसकान से कहा, ‘‘आकाश के गुरुजी का जन्मदिन है. उस ने कहा वह व्यस्त रहेगा इसलिए मां को दीदी के पास भेज दो. वैसे भी आकाश अब हम से ज्यादा हिलतामिलता नहीं. सिर्फ किसी रात को जिया से मिलने आ जाता है.’’

इतना सब सुन दीपक का दिमाग चक्करा रहा था. अब आकाश को देखने की दीपक की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी. दीपक मीरा से आकश के बाबा का पता पूछता उस से पहले मीरा ही बोल पड़ी, ‘‘अभी आकाश के बाबा के जन्मदिन का कुरतापाजामा जाएगा. आप को मिलना हो तो आप हैल्पर के साथ चले जाना. मगर पहले कुछ खा लो भैया. आप बहुत दूर से आए हो. मेरे पास तो समय ही नहीं कि घर ले

जा आप की खातिरदारी करूं. मैं यहीं कुछ मंगा देती हूं.’’

दीपक एकदम खड़ा हो बोला, ‘‘नहींनहीं मीरा, इतना परेशान न हो.’’

इस बीच स्टौक बुक लिए एक लड़का आ खड़ा हुआ. मीरा ने लेजर पर नजर डाली और कहा, ‘‘नहींनहीं, हम इस फैक्टरी का माल और नहीं ले सकते. इन का फैब्रिक पहले से बहुत पड़ा है. लोगों को खास पसंद नहीं आया. इसलिए पहले पुराना स्टौक क्लीयर करेंगे. बाद में देखेंगे नया और्डर करना है या नहीं.’’

बुक से निगाह हटा मीरा  झट से अपनी और दीपक की बात पर आ गई. मीरा भी

जिद्द कर बोली, ‘‘नहीं भैया नातेरिश्तों से आकाश ने मुंह फेर रखा है. हम तो अपने संबंध निभाएंगे न. आप बैठो खाना खाओ, बिना खाए जाने नहीं दूंगी.’’

मीरा ने हैल्पर से कहा, ‘‘वह बगल में

होटल है न. वहां से साउथ इंडियन थाली ले

आना भैया के लिए. भैया को साउथ इंडियन

खाना बहुत पसंद है. मु झे याद है, हम पहली बार इन की पसंद के ही साउथ इंडियन होटल में मिले थे. हैं न भैया.’’

मीरा के चेहरे पर उत्साह देख दीपक खुश भी था और परेशान भी. खुश इसलिए कि मीरा को 6 साल पहले की बात आज तक याद है और परेशान इसलिए कि अपनी जिम्मेदारियों के बीच भी वह सबकुछ कैसे संभाल रही है. अगर इस की जगह कोई और लड़की होती तो आकाश को लात मार कर चली जाती या किसी कोने में बैठ आंसू बहा रही होती.

मीरा दोबारा अपने काम में व्यस्त हो गई और दीपक अपनी थाली का स्वाद लेने लगा. लेकिन थाली के व्यंजनों में आज कोई रस दीपक को नहीं मिल रहा था. नहीं खाना तो स्वादिष्ठ ही था, बस मीरा की कहानी दीपक की जबान फीकी कर गई थी.

दीपक मीरा को कभी स्टौक का और्डर देते देखता तो कभी खुद ही दुकान का फर्नीचर ठीक करते देखता. मीरा का अपने स्टाफ के साथ मालिकनौकर जैसा कोई व्यवहार नहीं दिख रहा था. सब मीरा को दीदी बोलते और उस के साथ हंसीमजाक करते हुए अपनी गलती होने पर अच्छी डांट भी खाते.

दीपक भोजन के बाद एक हेल्पर के साथ गुरुजी का कुरतापाजामा लिए बाइक पर आकाश से मिलने चल दिया. करीब 40 मिनट के सफर के बाद दीपक आश्रम पहुंचा. जिसे देख दीपक यही सोच रहा था कि उस जगह को आश्रम कहे या कोई रिजोर्ट. आश्रम जहां पूल था, वाटर फाउंटेन, एक बड़ा सा गार्डन और सफेद चमचमाता बंगला. आश्रम के आंगन में कई युवायुवती आंखे बंद कर मधुमक्खी की आवाज निकाल रहे थे और एक सफेद लिबास पहने महिला उन को और तेज आवाज निकालने की प्रेरणा दे रही थी. आंगन से होता हुआ दीपक बंगले के पिछले हिस्से में पहुंच गया. पिछले

भाग में भी एक सुंदर बाग था और बाग के बीचोंबीच आकाश.

आकाश पर नजर पड़ते ही दीपक उस की ओर चल पड़ा. कुछ 20 कदम की दूरी तय कर दीपक ने देखा कि आकाश कोई धुन रमते हुए बाग में फूलपौधे लगा रहा है. दीपक कुछ देर चुप आकाश को देखता रहा. लंबे बाल, सिर पर सफेद टीका, गले में न जाने कितनी मालाएं पहनी होंगी और सफेद धोतीकमीज पहने आकाश दीपक की मौजूदगी से अनभिज्ञ था.

एक लंबी सांस ले दीपक बोला, ‘‘ओ बैरागी कुछ होश है तुम्हें कि कौन आया है?’’

आकाश ने नजर ऊपर की और चौंक कर बोला, ‘‘अरे तुम? कैसे आए? क्या तुम्हें भी मु झे सम झाने भेजा है मेरे मां बाप ने?’’

‘‘सम झाने,’’ दीपक यह सुन मन ही मन बोला कि सच में तो मैं आया था तुम से बिजनैस सम झने लेकिन अब तुम्हें देख मेरी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया है. दीपक ने कहा, ‘‘भाई मु झे किसी ने नहीं भेजा. मु झे तो तुम्हारा बैराग आज ही पता चला है. अपने शहर आया था. सोचा एक बार तुम से भी मिल लूं. कालेज की कुछ यादें ताजा हो जाएंगी.’’

आकाश मुसकरा कर दीपक से बोला, ‘‘याद. याद करने जैसा था कहां.

वह सब तो बचपना था.’’

दीपक आकाश की बात सुन मन ही मन बोला कि तुम्हारा कालेज में टौप करना, इंडियन इकौनोमिक्स पर घंटाभर लैक्चर देना, अगर बचपना है तो भाई तुम सच में पागल हो गए हो.

आकाश, ‘‘देखो भाई यहां कितनी शांति है. मन और आत्मा का सच्चा मिलन इस आश्रम में हो जाता है. बाहरी दुनिया के शोर, परिवार के चोचलों और प्यारमुहब्बत की किताबी बातों से परे है यह दुनिया. सच्चा जीवन तो यहीं है अपने गुरु की सेवा में.’’

दीपक सम झ नहीं पा रहा था वह आकाश से क्या कहे. इतने में आकाश ने दीपक से कहा कि चलो तुम्हें अपने गुरुजी के दर्शन कराएं.

दीपक आकाश के पीछे चलतेचलते उस सफेद बंगले की पहली मंजिल के एक बड़े से कमरे में गया. वहां सफेद लिबास पहने एक आदमी जो न जवान था और न ही वृद्ध अवस्था में. शायद वह यही कोई 45 वर्ष के आसपास का होगा. वह आदमी आकाश का गुरु एक सागवान की कुरसी पर बैठ अपने दोनों पैर एक पीतल की बड़ी सी परात में रखे था और 2 युवा महिलाएं उस के पैर दूध और पानी से धो रही थीं. यह देख

मन ही मन दीपक को आकाश की मूर्खता पर बहुत गुस्सा आ रहा था.

आकाश ने इशारे से दीपक को गुरुजी के पैर छूने को कहा. लेकिन दीपक उस के इशारे को नजरअंदाज कर एक नमस्ते कर गया. आकाश ने दीपक का परिचय अपने गुरु से कराया.

गुरु ने दीपक का स्वागत किया, और फिर पूछा, ‘‘बोलो क्या कष्ट तुम्हें मेरे पास ले आया?’’

दीपक ने बड़े उखड़े स्वर में कहा, ‘‘कोई कष्ट मु झे आप के पास नहीं लाया. मैं तो बस अपने दोस्त को देखने आया था कि भला एक टौपर, एक व्यापारी खानदान का वारिस बगीचे में पौधे लगाते कैसा दिखता होगा.’’

दीपक का व्यंग्य आकाश को बहुत चुभा. वह अपना गुस्सा दिखाता कि उस के गुरु जोर से हंस पड़े. अब दीपक को गुरु की हंसी एक कटाक्ष की तरह चुभी.

गुरु ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारा रोष सम झता हूं. दोस्त का यों

संन्यासी बनना तुम से बरदाश्त नहीं हो रहा है. लेकिन यही जीवन की सचाई है जिसे बहुत कम लोग ही देख और सम झ पाते हैं. अपना सबकुछ प्रभु को दे देना, मोहमाया से परे हो जीवन गुजारना कोई आसान बात नहीं. बहुत कठिन जीवन है.’’

गुरु की हां में हां मिलाते हुए आकाश ने कहा, ‘‘बिलकुल सही कह रहे हैं. गुरुजी और तुम इतना नाराज मत हो, मैं अपनी मरजी से यहां रहता हूं. यहां के आश्रम में सेवा करता हूं. बाग में फूलपौधे लगता हूं, रसोई में सब्जियां काटता हूं, रात को गुरुजी जब पूरे दिन के काम से थक जाते हैं तो उन के पैरों की तेल से मालिश भी करता हूं. सच कहूं बड़ी शांति मिलती है उन की सेवा कर के. लगता है कि प्रभु शरण में आ गया मैं.’’

इस पर दीपक भनक कर बोला, ‘‘यह शांति तो मांबाप के पैर दबाने से भी मिल जाती

है. तूने कभी उन के पैर दबाए हो तो न जान पाता. तू तो आंटी के औपरेशन में भी साथ नहीं गया, उलटा उन्हें दीदी के घर भेज दिया.’’

आकाश इस पर बोला, ‘‘अरे मांबाप सब सांसारिक बंधन हैं अब मेरे लिए और वैसे भी मैं गुरु के जन्मदिन की व्यवस्था में बहुत उल झा हूं. तूने देखा न अभी बाग में कितने सुंदर फूल लगाए हैं मैं ने. जन्मदिन पर पूरा बाग रंगबिरंगे फूलों से सजा दिखना चाहिए.’’

दीपक का पारा अब पूरा ऊपर हो चुका था. उस ने न आव देखा न ताव और आकाश पर बरस पड़ा, ‘‘अरे मूर्ख अपनी घर की कलियां तोड़ कौन दूसरे के बाग सजाता है.’’

आकाश भी तिलमिला उठा, ‘‘क्या कहा तुम ने, मूर्ख.’’

दीपक ऊंचे स्वर में बोला, ‘‘हां मूर्ख, वह भी अवल दर्जे का गुरुजी का जन्मदिन मनाना है, मां का आपरेशन छोड़ कर. अरे इस गुरु के पास तेरे जैसे सौ आकाश लाइन में खड़े हैं, लेकिन मां के पास तो एक ही आकाश है न. बाबा का गार्डन सजाएंगे क्योंकि उन का बर्थडे है. अरे बेवकूफ क्या बर्थडे मोहमाया या तेरे सांसारिक बंधन में नहीं आता जो खुद को सांसारिक बंधनों और चोंचलों से परे होने की बात पर प्रवचन दे रहा है? अरे बर्थडे सैलिब्रेशन तो सब से बड़ा दिखावा और चोंचला है. और तेरा यह कुरतापाजामा जो तूने सिल्क का बनवाया है, अपने गुरुजी के लिए क्या यह मोहमाया नहीं? यह सिल्क कितना महंगा होता है और जब तू मांबाप को बेगाना सम झ ही चुका है तो उन की संपत्ति का इस्तेमाल कैसे कर रहा है वह भी एक संन्यासी हो कर? आखिर इस कुरतापाजामे के पैसे और तेरा हर महीने का खर्चा जो तू इस आश्रम में देता है, उस पर तेरा हक है कहां? तू तो संन्यासी है और पारिवारिक रिश्ते से भी मुंह मोड़ चुका है. तो उस पारिवारिक संपत्ति का किस मुंह से मांग और इस्तेमाल कर रहा है? क्या तू कोई नौकरी करता है वहीं? नहीं न? जब तू कोई मेहनत, कोई काम उस दुकान में नहीं करता तो तू वहां की किसी भी चीज को कैसे ले सकता है, बता?’’

आकाश की बोलती बंद हो गई तो

स्थिति को देखते हुए गुरुजी कूद पड़े. वे आकाश का बचाव करते हुए बोले, ‘‘अरे भाई, यह उस घर का वारिस भी तो है.’’

इस पर दीपक  झेप कर बोला, ‘‘मगर एक संन्यासी कैसे वारिस हो सकता है गुरुजी.’’

गुरु फिर कुछ बोलते उस से पहले ही दीपक बोल पड़ा, ‘‘सुनो ढोंगी बीच में बोले तो तुम्हारा बर्थडे मैं तुम्हारे कान पर बजा दूंगा और मु झे कोई डर नहीं तुम्हारा या तुम्हारे भक्तों का. जेल गया भी तो कुछ देर बाद वापस आ जाऊंगा, चाचा विधायक हैं मेरे. तो पावर का इस्तेमाल तुम्हारे साथ मु झे भी आता है. बड़े आए खुद को संन्यासी बोलने वाले. शर्म करो थोड़ी, दुनिया की सब से महंगी लकड़ी के फर्नीचर पर बैठे हो, अपने पैरों को जवान लड़कियों से दूध में डुबो कर अपना पैडीक्योर करवा रहे हो, सिल्क का जामा पहने हो और बोल रहे हो मैं संन्यासी हूं. अरे असली संन्यासी हो तो एक सूती कपड़ा लपेट तुम केवल ज्येष्ठ मास की एक तेज दोपहरी, सावन की शाम की बारिश का प्रकोप और शीत की एक रात खुले आसमान के नीचे बिता दो,

मैं खुद तुम्हें गुरु बना लूंगा. बोलो, तुम्हारे बस

की है?’’

गुरुजी दीपक की शर्त सुन आंखें मटकाने लगे तो दीपक ने ही बोला, ‘‘अरे ढोंगीपने की भी हद होती है. लेकिन तुम्हारी गलती भी क्या, जब पढ़ेलिखे टौपर लोग आंखों से यह सारा भोगविलास देख कर भी तुम्हें संन्यासी पुण्यआत्मा सम झें तो आंखों से अंधे और मन से मंदबुद्धि तो वे स्वयं हैं और ऐसे लोगों का ही तो शिकार करना तुम जैसों के जीवन जीने का एकमात्र साधन होता है.’’

एक लंबी सांस ले गुरुजी ने कहा, ‘‘हमारा बहुत अनादर हुआ है आकाश. हम जा

रहे है एकांत में. तुम दोस्त की बात को दिल से मत लगाना. हम इसे माफ कर देते हैं.’’

दीपक के मन में तो था कि एक चप्पल निकाल गुरुजी का बर्थडे मना दे लेकिन किसी प्रकार की हिंसा को त्यागना ही उस ने ठीक सम झा. गुरुजी फट से चले गए और आकाश खामोश रहा.

इस पर दीपक आकाश से बोला, ‘‘और तू किस प्रभु की भक्ति की बात कर रहा है? यहां तो मु झे किसी प्रभु का राग या मूर्त नहीं दिखी. अरे, हर दीवार पर तो तेरे इस  झूठे गुरु की तसवीरें सजी पड़ी हैं, जिन पर फूलमाला, दीयाधूप, सोनाचांदी का भोग लगा है. अरे, जो खुद को भगवान का दर्जा दे रहा है, अपनी पूजा करा रहा है, वह क्या प्रभु भक्ति करेगा. अरे यह राजस्व तो सिर्फ एक राजा के पास होता है और आज के इस अंधविश्वास के दौर में एक ढोंगी के पास न कि किसी संन्यासी के पास. देख भाई, मु झे नहीं पता इस गुरु ने तु झे क्या घुटी पिलाई. आकाश, जो सबकुछ देखते भी आंखें मूंद कर बैठा रहे उसे स्वयं सूर्य भी रास्ता नहीं दिखा सकते,’’ इतना कह दीपक आश्रम से निकल चला.

दूर निकलने पर उस ने सोचा कि अब वह कहां जाए. अरे जिस टौपर आकाश से वह सलाह लेने आया था, वह आकाश तो स्वयं जीवन में फेल हो रखा है. उसे तो इस बात की हैरानी थी कि आकाश जैसा शार्प, इंटैलीजैंट, एक विवेकशील लड़का कैसे इन गुरुओं के पाखंड का शिकार हो सकता है. अपनी टूटी आशा लिए दीपक अपने घर की ओर निकल ही रहा था कि उस के मन में एक बात आई और वह बात उस के मन और मस्तिष्क दोनों को तर्कपूर्ण लगी.

दीपक ने वापस आकाश की दुकान की ओर रुख किया. वहां दुकान में जा उस ने देखा कि कैसे दुकान के एक कोने में मीरा बहीखाता लिए बैठी है और ठीक उस की बगल में उस की बेटी जिया बैठ कर स्कूल का होमवर्क कर रही है. मीरा कभी बहीखाते पर दुकान के अकाउंटैंट से सवालजवाब करती तो कभी जिया का होमवर्क चैक करती.

यह वही मीरा है जिसे दुनिया का सारा सुख देने के लिए, जिंदगीभर का प्यार देने के लिए एक दिन आकाश हर किसी से लड़ गया था. एक निचले दर्जे की लड़की को बीवी बनाने के लिए हर किसी के मुंह पर अपनी बातों से ताला लगा देता था. आज उसी मीरा को वह बेवकूफ आकाश दुनियाभर के  झमेले में एक छोटी सी बच्ची के साथ अकेला छोड़ गया है.

आज मीरा को इतनी मजबूती से खड़ा देख दीपक को उस पर बहुत गर्व और आकाश पर बहुत लानत महसूस हो रही थी. आज दीपक की आंखों में यह निचले दर्जे की लड़की सब से बड़ी, सब से महान हो गई थी. दीपक मीरा का परिश्रम देख इतना भावविभोर हो रहा था कि कुछ पल के लिए वह अपना चेहरा छिपा रो भी लिया.

इसी बीच मीरा की नजर उस पर पड़ी. मीरा ने उसे आवाज देते हुए कहा, ‘‘भैया आप आ गए. आइए न यहां. देखो जिया भी है.’’

दीपक अपना रोता हुलिया ठीक कर मीरा के पास आता. मीरा ने जिया को दीपक से मिलवाया.

जिया ने बड़े प्यार से दीपक को नमस्ते कर पूछा है, ‘‘अंकल आप चाय पीयोगे? शाम हो गई है, शाम को यहां सब चाय पीते हैं.’’

जिया का यह आदरप्यार देख कर दीपक की आंखें फिर भर आईं. वह मन ही मन

आकाश को कोसते बोला कि निर्लज्ज एक तू था, जिस ने दोस्त को पानी तक नहीं पूछा और एक तेरी बेटी, नहींनहीं तेरी नहीं मीरा की बेटी है जो चाय पूछ रही है. अरे शैतान तु झे पता नहीं तूने किस बहार को ठुकरा कर वह नर्क चुना है.

मीरा ने दीपक को उस के खयाल से बाहर निकालते पूछा, ‘‘भैया कहां खोए हैं? जहां से आए हैं, वहां की बातें वहीं छोड़ दें और चाय पीएं.’’

दीपक को बड़ी हैरानी हुई कि कैसे मीरा उस का मन भांप गई और उस बात को कोई महत्त्व न देते हुए उसे वास्तविकता में आने और जीने की बात को बड़ी सरलता से बोल गई. शायद इतने सालों का संघर्ष मीरा को इतना सहासी बन चुका है कि अब ये सारी बातें उस के लिए निरर्थक है.

चाय आई और चाय की चुसकी लेते हुए दीपक ने मीरा से कहा, ‘‘तुम यह इतनी आसानी से संभाल लेती हो. यह सब आसान नहीं मीरा. बड़ेबड़े मार खा जाते हैं.’’

मीरा ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘शायद मेरा बड़ा न होना ही काम कर गया.’’

दीपक ने पूछा, ‘‘वह कैसे?’’

मीरा ने कहा, ‘‘भैया, मैं बहुत छोटे घर से हूं. पापा की छोटी दुकान थी सिलाई की लेकिन गलीमुहल्ले का बहुत काम आता था. दिनभर उन लोगों के साथ पापा माथापच्ची करते थे. जब वे खाना खाते या दुकान से बाहर होते तो वह माथापच्ची मु झे करनी पड़ती. सब का हिसाब भी देखना पड़ता. कपड़ों की परख भी पापा के साथ रहते आ गई. तो इस तरह से मेरे पुराने जीवन की सीख इस जीवन में स्किल बन गई भैया.’’

दीपक मीरा की बात से इतना प्रभावित हुआ कि उस ने जिया के सिर पर

हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटा, मैं तेरे लिए एक भी गिफ्ट नहीं लाया. मु झे माफ कर दे. लेकिन एक आशीर्वाद, एक सीख जरूर दे सकता हूं कि तू बड़े हो कर कोई डाक्टर, इंजीनियर बने न बने लेकिन तुम अपनी मां जैसी ही बन जाएगी तो सफल हो जाएगी.’’

मीरा दीपक की बात पर एक मुसकान दे बोली, ‘‘भैया आप फालतू की बढ़ाई कर रहे हैं.’’

‘‘फालतू नहीं सच्ची बढ़ाई है यह और इसलिए मैं वापस भी आया. मु झे अपने बिजनैस को ले कर बहुत परेशानी चल रही है आजकल. सोचा था उस टौपर से सलाह लूंगी. लेकिन वह तो नालायकों का सरताज बने बैठा है. मगर मेरी नजरों में तुम्हारी प्रतिभा तो सब को पीछे छोड़ चुकी है तो अब तुम ही मेरी कोई मदद करो,’’ दीपक बोला.

मीरा सकुचाती सी बोली, ‘‘भैया मैं कैसे?’’

‘‘एक बार सुन तो लो.

क्या पता तुम्हें ही कोई रास्ता

दिख जाए. आखिर मेरी दुकान

भी फैब्रिक की ही तो है,’’ दीपक ने कहा.

मीरा ने हामी भरी और दीपक और मीरा चर्चा में जुट गए…

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