Hindi Story : दीपेंद्र  पेशे से वकील थे. कानूनी दांवपेंच खूब सम झते थे. अचानक आई इस मुसीबत से निबटने का कोई मार्ग न दिखा तो दामाद पर धारा 13बी हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत माही की ओर से याचिका दायर कर दी. क्या करते दुलारी बिटिया ने आसमान सिर पर उठा लिया था कि कुछ भी हो जाए अब ससुराल कभी नहीं जाएगी.

दीपेंद्र की 1 नहीं 2 बेटियां थीं- मैना और माही. दोनों ही बहनें सुंदरता की प्रतिमान थीं. गुण और शील कूटकूट कर भरे थे. बोली भी शहद समान कि सुनते मन न अघाता मगर एक बात में पूरी अलग थीं. बड़ी बहन मैना नाम की ही मैना थी यानी उड़ना क्या, वह तो चलनेफिरने में भी असमर्थ थी. बचपन से ही उस के दोनो पैरों में ताकत नहीं थी. पिता ने खूब इलाज कराया पर कोई फायदा न हुआ. अंतत: यह सोच कर सम झौता कर लिया कि उन्हें आजीवन अपनी बड़ी बेटी मैना के साथ ही जीवन बसर करना है.

मैना जैसेजैसे बड़ी होने लगी वह खूब निखरने लगी. दूधिया रंगत और गुलाबी आंखों वाली मैना को मातापिता ने गृहकार्य में दक्ष बनाया ताकि वह कम से कम अपने समस्त कार्य स्वयं कर पाए. उसे किसी तरह से उठा कर रसोई तक पहुंचाना पड़ता. उस के बाद तो वह 1-2 घंटों के भीतर रंगबिरंगे व्यंजन तैयार कर के रख देती जबकि उस के ठीक विपरीत छोटी बहन माही ने अपने पैरों को कभी घर में टिकने ही न दिया. वह पिता की तरह वकालत करना चाहती थी. उस का मन पढ़नेलिखने और अन्य कामों में लगता पर रसोई के कामकाज में पूरी शून्य थी. जब विवाह योग्य हुई तो यही तय हुआ कि माही का ब्याह समय पर कर दिया जाय. संयोगवश एक अच्छे परिवार का सुयोग्य लड़का मिला तो धूमधाम से माही बिटिया का विवाह सुदेश के साथ संपन्न कर दिया गया.

मगर यह क्या माही के विदा होते ही मैना मुर झाने लगी. उस की उदासी देख कर

दीपेंद्रजी ने माही और सुदेश को होली का त्योहार मनाने के लिए घर पर आमंत्रित किया. यह माही की पहली होली थी. घर को अंदरबाहर से चमकाया गया. आखिर घर की लाडली आ रही थी. रंगरोगन के साथ बिटिया के आने की खुशी में पूरा घर रोशनी से  िझलमिला उठा. ऐसा लगा जैसे खुशियों से घर का कोनाकोना महक उठा हो.

‘‘बेटियों से ही घर घर लगता है,’’ मां ने कहा तो पिता बोल पड़े, ‘‘हां बेटियां लक्ष्मी होती हैं. देखो, उदास पड़ा घर कैसे जगमगाने लगा है.’’

होली के रंगों की फुहार चली. दोनों बहनों ने मिल कर सुदेश को खूब रंगा. मैना को उस ने पहली बार गौर से देखा, ‘‘माही, मैना पहले नहीं दिखी…’’

‘‘वह चल नहीं सकती न इसलिए रसोईघर में कुछ न कुछ करती ही रहती है.’’

‘‘उफ.’’

‘‘खबरदार जो मेरी बहन की ओर आंख उठा कर भी देखा… पापा की जान है वह कोई अबला नारी न सम झ लेना.’’

बिंदास माही ने कह तो दिया पर शिकारी ने शिकार पहचान लिया था. तभी तो ससुरजी के एक आग्रह पर मोम हो गया. दीपेंद्रजी के कहते ही कि सारा समय होली मिलन में निकल गया 1-2 दिन और रुक जाते तो दोनों बहनें साथ रह लेतीं  झट से आराम की मुद्रा में आ गया.

इधर मैना की खुशी का ठिकाना न था. वह छोटी बहन को उस के पसंद की हर चीज बना कर खिला देना चाहती थी. मगर हिरणी बांधे कब बंधी है वह तो आपदा में अवसर तलाशती थी. पति ने आने से पहले इतना नखरा दिखाया था कि उसे मायके में 2 दिन और मिलेंगे इस का जरा भी भान न था. तुरंत ही कालेज की सहेलियों संग एक दिन सिनेमा तो दूसरे दिन खरीदारी का प्रोग्राम बना लिया. इस बीच मैना ने ही जमाई बाबू की देखभाल की. शाम होने तक घर लौट कर आने वाली माही वैसे भी लापरवाह थी मगर यह पहली बार था कि सुरेश ने उसे कुछ बुराभला न कहा तो वह भी शहर की सारी चाटपकौडि़यां चख कर ही घर लौटी. मांबाप तो वैसे ही एक बिटिया के दुख में आधे थे तो दूसरी की खुशी में क्योंकर बाधक होते. 2 दिन आननफानन में निकल गए.

गरमियां शुरू हो गईं तो मैना की तबीयत नासाज रहने लगी. पहलेपहल

लगा कि लू लगी होगी या कुछ अपच हुआ होगा मगर जब उलटियां ज्यादा होने लगीं तो चैकअप के लिए डाक्टर बुलाया गया. डाक्टर से मैना के गर्भवती होने की बात सुनते ही मांबाप सकते में आ गए. सब से पहले तो डाक्टर से बच्चे को हटाने की मिन्नत करने लगे. मगर छोटे शहर में ऐसी सुविधा नहीं थी. उस पर कोई भी खबर जंगल की आग की तरह फैलती. डाक्टर से हाथपैर जोड़ कर यह बात खुद तक रखने को कहा गया. उस ने भी मजबूर मांबाप को देख कर हामी भर दी और निकल गया. मगर महल्ले वालों की नजरें उस घर से आनेजाने वालों पर टिकी थीं और क्यों न टिकतीं? मैना तो सब की चहेती थी.

फिलहाल उन के लिए यह बड़ी पहेली बनी थी. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था यह सब कब और कैसे हुआ. जिस लड़की ने कभी घर के बाहर कदम नहीं रखा, जिसे आज तक किसी ने जी भर कर नहीं देखा वह भला कैसे गर्भवती हो सकती है. उन के घर नौकरचाकर, ड्राइवर तक के आने पर मनाही थी फिर कौन अहेरी मैना का शिकार कर गया. ऐसे ही जाने कितने प्रश्न थे जो मन को  झक झोर रहे थे.

आखिर किस ने उस का यह हश्र किया है? किस वेष में आ कर उस मोम की मूरत को धूमिल कर गया? पाप की यह कैसी पराकाष्ठा है जिस ने एक दिव्यांग को भी नहीं बख्शा… आखिर कौन है वह जिस ने उस मासूम के पाक दामन को मैला किया. मैना से बहुत पूछा गया तो उस ने जिस ओर इशारा किया वह माही का जीवन उजाड़ने के लिए काफी था.

‘‘जिस व्यभिचारी ने मेरी बहन की जिंदगी बरबाद की है. मैं उस के आंगन में एक दिन भी नहीं बिता सकती,’’ माही ने यह कहा तो ससुराल में खूब तमाशा हुआ.

माही का पति स्वयं को निर्दोष बता रहा था. वह किसी हालत में अपनी गलती मानने के लिए तैयार नहीं था. भला कौन सा ऐसा भंवरा होगा जो यह स्वीकार कर ले कि फलां फूल का रस उस ने ही पीया है. माही के पास सचाई जानने का एक ही सहारा शेष था. वह जेठ की सुनसान दोपहरी में घर आई और मैना के कमरे का अंदर से कुंडा बंद कर पूछा, ‘‘सचसच बोलना दीदी कि ये सब कब और कैसे हुआ?’’

‘‘होली के बाद जब तू घर में नहीं थी. पिताजी कोर्ट गए थे और मां पूजा कर रही थी. सुदेश बाबू को दोपहर का खाना खिला कर गंगा अपने घर चली गई. मां के इंतजार में मैं रसोई में बैठी थी कि सुदेश रसोई में घुस आए और कहने लगे कि पहली बार ऐसी स्वादिष्ठ खीर खाई है. उस रोज उन के बात करने का ढंग अलग ही था. उन की लाल आंखों में अजीब सी चमक थी. मु झ से थोड़ी और खीर देने के लिए कहा. मैं बरतन से निकाल ही रही थी कि मु झे पीछे से पकड़ लिया. मेरा शरीर उन की बाजुओं में था. जब तक होश संभालती उन का हाथ मेरे मुंह पर था. आवाज घुट कर ही रह गई.’’

‘‘बस करो दीदी और न सुना जा रहा… पराई नारी पर ऐसी कुदृष्टि… यह सब पहले क्यों न बताया…’’

‘‘उन्होंने मु झे खूब धमकाया कि अगर मैं ने मुंह खोला तो वह तु झे यहीं छोड़ कर चले जाएंगे. मेरी जिंदगी तो पहले ही बरबाद थी, तुम्हारी कैसे होने देती?’’ बोलती हुई मैना सिसक पड़ी.

माही को सारा मामला सम झ में आ गया कि उस की गंगा समान पवित्र बहन छोटी बहन की चिंता में ही खामोश रह गई. यह जानने के बाद वह वापस नहीं गई.

बच्चों के उजड़े जीवन को देख कर मांबाप के दुख का ठिकाना न रहा. एक बहन के पति ने दूसरी की इज्जत पर हाथ डाला था. अपने ही घर में हुए इस अन्याय का न्याय जरूरी हो गया था. माही के भविष्य की चिंता कर अगर सुदेश को क्षमा किया तो वह भविष्य में भी ऐसे ही कुकृत्य करता रहेगा. यही विचार आया मगर वकील साहब ने आपसी सहमति से तलाक कराना अधिक मुनासिब सम झा.

1 वर्ष पूरा होते ही दूसरी याचिका दायर हुई और पारस्परिक सहमति से तलाक हो गया. अपराधी सुदेश ने अपराधबोध से मुक्ति हेतु बच्चे के लालनपालन हेतु एक मोटी रकम उस के नाम कर फिक्स डिपौजिट के कागजात घर भेज दिए.

दोनों बहनें अब हर शाम आंगन में वैसे ही निर्दोष खेलती हैं जैसे बचपन में खेला

करती थीं. अब उन के साथ उन के कुल का दीपक शांतनु भी है. भले ही बालक माही का नहीं तो क्या हुआ. आखिर खून तो इसी परिवार का है. बहन मैना का बच्चा दोनों बहनों की आंखों का तारा है जिस ने कुल का दीपक बन कर उन के जीवन के तिमिर को हर लिया.

नियति का खेल भी अजीब ही है. एक बहन के सौभाग्य ने दूसरी को इस कदर लूटा कि उस की दुनिया भी अछूती न रही. मगर माही ने भविष्य के लिए कुछ और तय कर लिया. उस ने वकालत की पढ़ाई पूरी कर ली और अपना समस्त जीवन पिता के कार्य को आगे बढ़ाने में समर्पित कर दिया. वह दिव्यांगों और महिलाओं के केस मुफ्त में लड़ती है क्योंकि उस ने हर अन्याय का न्याय करने की ठान ली है.

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