Long Story : पूरे 3 साल बाद इंडिया आने की खुशी पर्व के चेहरे पर साफ  झलक रही थी लेकिन मनु के चेहरे पर उस का नामोनिशान न था.

वह अभी मानसिक रूप से अमेरिका छोड़ कर यहां नहीं आना चाहती था. पर्व के कहने पर  वह मुश्किल से राजी हुई थी .इस मसले को ले कर दोनों के बीच बहुत बहस हुई थी. आखिर में जीत पर्व की हुई और मनु अपनी अमेरिकी कंपनी छोड़ कर इंडिया आ रही थी. यहां भी उन की कंपनी का औफिस था. कुछ साल पहले उन दोनों ने एक साथ एक कंपनी में जौब जौइन की थी. साथ काम करते हुए वे कब एकदूसरे के नजदीक आ गए पता ही नहीं चला.

मनु आजाद ख्यालात लड़की थी जबकि पर्व संस्कारों में पलाबढ़ा लड़का. उस के बाबूजी बहुत पहले चल बसे थे. मां ने किसी तरह पढ़ालिखा कर उसे इस योग्य बना दिया था कि पढ़ाई पूरी कर नौकरी जौइन करते ही कंपनी की ओर से उसे विदेश जाने का मौका मिल गया. राधा बेटे को अपने से दूर नहीं करना चाहती थीं लेकिन उसे अपने पास रोक कर उस की तरक्की में बाधक बनना भी उन्हें मंजूर न था. दिल पर पत्थर रख कर पर्व को अमेरिका भेज दिया. यहां आ कर वह मनु के प्यार में ऐसा गिरफ्तार हुआ कि उसे उस के बगैर रहना मुश्किल लगने लगा. उस ने मनु के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया.

वह बोली, ‘‘यह क्या कह रहे हो पर्व? अभी हम दोनों एकदूसरे को जानते ही कितना हैं?’’

‘‘साथ रहेंगे तो वह भी जान लेंगे.’’

‘‘मु झे सोचने का मौका दो,’’ मनु बोली.

मनु इतनी जल्दी शादी के बंधन में नहीं बंधना चाहती थी लेकिन पर्व को बहुत जल्दी

थी. वह जानता था मां ने उसे ले कर बहुत बड़े सपने देखे हैं लेकिन अपनी इच्छा के आगे उस के लिए यह बात कोई माने नहीं रख रही थी. उसे उम्मीद थी वह वापस जा कर उन्हें मना लेगा. उस के लिए सब से बड़ी चुनौती इस समय मनु को शादी के लिए रजामंद करने की थी. मनु के सामने ऐसी कोई समस्या न थी. उस के मम्मीपापा दोनों जौब करते थे. उन्होंने खुद भी अपनी पसंद से शादी की थी. वह जानती थी वे कभी भी उस की पसंद को इनकार नहीं करेंगे. पर्व को उस के जवाब का इंतजार था.

‘‘क्या सोचा तुम ने?’’

‘‘शादी के लिए जल्दीबाजी करना ठीक

नहीं है पर्व. यहां हम दोनों अपना अधिकांश वक्त साथ बिताते हैं. हमें कोई रोकनेटोकने वाला भी नहीं है. पता नहीं तुम शादी को ले कर इतने सीरियस क्यों हो?’’

‘‘तुम मु झ से शादी नहीं करना चाहती.’’

‘‘मेरी कहने का यह मतलब नहीं है. शादी हम कभी भी कर सकते हैं. मु झे अपनी जिंदगी में किसी का दखल पसंद नहीं है, बचपन से मैं ने यही सीखा है. मैं अपनी जिंदगी खुल कर जीना चाहती हूं.’’

‘‘तो तुम्हें रोक कौन रहा है? तुम जैसा चाहोगी हम वैसी जिंदगी जी सकते हैं. मेरे पास परिवार के नाम पर केवल मां है और कोई नहीं.’’

‘‘मेरे लिए शादी केवल तुम्हारा और मेरा साथ है. उस के बीच में कोई तीसरा व्यक्ति नहीं होना चाहिए. बुरा मत मानना. सुन कर तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा होगा लेकिन मैं अपनी आजादी रिश्तों में बंध कर खोना नहीं चाहती. यह सब मु झे नापसंद है. मेरे लिए शादी का मतलब 2 जवान लोगों का साथ रह कर अपनी शारीरिक और मानसिक जरूरतें पूरा करना है. रिश्तों में बंध कर मैं उसे कुरबान नहीं करना चाहती.’’

यह सुन कर पर्व चुप हो गया. वैसे भी वह मां को बगैर बताए मनु से शादी करना चाहता था. वह जानता था यह सुन कर उन्हें धक्का लगेगा लेकिन उसे अपने पर विश्वास था कि वह शादी के बाद मां को हर हाल में मना लेगा. अभी बड़ा काम मनु को मनाना था. उस की बात सुन कर वह परेशान हो गया. वह सम झ गया उस की मानसिकता को ले कर मनु यह शादी टाल रही है. उस ने भी सोच लिया वह मनु को हर हाल में पा कर रहेगा.

पव बोला, ‘‘तुम जो चाहेगी वही होगा मनु. हमारी जिंदगी में कोई भी तीसरा शख्स नहीं आ पाएगा जिसे तुम नापसंद करती हो.’’

‘‘बात पसंद और नापसंद की नहीं है पर्व. व्यक्तिगत आजादी की है. मैं उसी में विश्वास करती हूं. मैं ने बचपन से यही सब देखा है. मम्मीपापा ने अपनी निजता को सब से ऊपर रखा.मु झे उन का जीने का अंदाज पसंद आया. मैं भी वही चाहती हूं.’’

इस समय पर्व में इतना साहस नहीं था कि वह भी मनु को बता सके कि उस का जीवन

भी मां के प्यार और विश्वास के भरोसे ही पला है. अगर वे उस की जिंदगी में न होतीं तो पता नहीं आज वह कहां होता. वह मां की ममता और मनु के प्यार के बीच उल झा हुआ था. वह किसी भी हालत में मनु को खोना नहीं चाहता था. वह सम झ गया मनु उस की मां की वजह से शादी को टाल रही है.

पर्व ने मनु को सोचने का पूरा समय दिया. अपनेआप से लड़ते हुए आखिर में उस ने मनु की खातिर सब से अलग रहने का मन बना लिया. वैसे भी अभी उस के अनुबंध में 3 साल अमेरिका रहना था. यहां कोई उन्हें डिस्टर्ब करने वाला नहीं था. मनु के मम्मीपापा व्यस्त रहते थे. वे कई देश घूम चुके थे इसलिए उन्हें यहां आने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उस का छोटा भाई इंग्लैंड में पढ़ाई कर रहा था. मनु की हर शर्त मान कर वह उस के आगे अपने प्यार को जताना चाहता था.

मनु को उम्मीद नहीं थी वह इतनी जल्दी मान जाएगा. उसे उस की पारिवारिक पृष्ठभूमि पता  थी. अब मना करने की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी. मनु ने यह बात अपने मम्मीपापा को बता दी. उन्हें उस के निर्णय पर कोई एतराज नहीं था. जल्द ही दोनों शादी के बंधन में बंध गए. मनु को पा कर पर्व के पैर धरती पर नहीं पड़ रहे थे.

2 साल कब बीत गए पता ही नहीं लगा. पर्व अपनी दुनिया में खुश था. उस ने इस बारे में अपनी मां को अभी कुछ नहीं बताया था. वह इंडिया आ कर उन्हें सरप्राइज देना चाहता था.

उन के अनुबंध के 3 साल पूरे होने वाले थे. यह उन पर था कि वे आगे अमेरिका में रह कर जौब करना चाहते हैं या फिर इंडिया में. तभी मनु ने उसे गुड न्यूज सुना दी, ‘‘पर्व तुम पापा बनने वाले हो.’’

यह सुन कर पर्व उसे अपनी बांहों में भर  बोला, ‘‘मु झे इस खबर का बड़े दिनों से इंतजार था मनु.’’

‘‘पापा बनने में अभी पूरे 7 महीने का समय बाकी है.’’

‘‘देख लेना वह भी हंसीखुशी कट जाएगा.’’

‘‘हमें भविष्य की प्लानिंग अभी से कर लेनी चाहिए.’’

‘‘इस में प्लानिंग की क्या बात है? शुरू के कुछ महीने छुट्टी में कट जाएंगे. उस के बाद हमतुम मिल कर बारीबारी से बेबीसिटिंग किया करेंगे.’’

‘‘यह इतना आसान नहीं है मनु. बच्चों के साथ किसी अनुभवी का होना जरूरी है.’’

‘‘मेरे बस का हर समय बेबीसिटिंग करना नहीं है.’’

‘‘चिंता मत करो मैं घर से मां को बुला लूंगा. तुम्हारी मम्मी को तो आने की फुरसत रहेगी नहीं.’’

‘‘मैं रिश्तों में बंध कर नहीं रह सकती. यह बात मैं ने तुम्हें शादी से पहले भी बता दी थी. बच्चे के लिए हम किसी आया को रख लेंगे.’’

‘‘परदेश में फुल टाइम मेड रखना हमारी पहुंच से बाहर होगा मनु. मेरे

खयाल से हमें ऐग्रीमैंट पूरा होते ही इंडिया लौट जाना चाहिए. वहां पर बच्चे की परवरिश ठीक से हो जाएगी. कुछ साल बाद हम फिर वापस आ जाएंगे.’’

‘‘ऐसा भी तो हो सकता है हम अभी बच्चा पैदा ही न करें. कुछ साल बाद इस के लिए कोशिश करेंगे.’’

‘‘कैसी बात करती हो? हमारे प्यार का अंकुर तुम्हारे अंदर पल रहा है. मैं उसे किसी भी हालत में गिराने की अनुमति नहीं दूंगा. ऐसा तुम सोचना भी नहीं,’’ पर्व बोला.

मनु भी बच्चे को जन्म देना चाहती थी लेकिन समस्या उसे पालने की थी. परदेश में बच्चे को पालना उन दोनों के लिए आसान नहीं था और मनु किसी को अपने साथ रखने के लिए तैयार नहीं थी. पर्व के बहुत सम झाने पर आखिर वह इंडिया आने के लिए तैयार हो गई थी. यहां कम खर्चे में काम करने वालों की कमी नहीं थी. वह इंडिया आ तो रही थी लेकिन मन उस का अमेरिका में ही लगा था. वहां का खुलापन उसे बहुत पसंद था. पर्व से उस की अच्छी अंडरस्टैंडिंग थी. इस वजह से उन दोनों का समय बहुत अच्छे से कट रहा था.

इंडिया आने से पहले ही मनु ने मम्मीपापा से कह कर अपने लिए किराए पर एक घर ले लिया था. आज वे एअरपोर्ट से सीधे वहीं जा रहे थे. घर पर मम्मीपापा उस का इंतजार कर रहे थे. फ्लाइट राइट टाइम थी. एअरपोर्ट से टैक्सी ले कर वे घर के लिए रवाना हो गए.

पर्व बोला, ‘‘तुम्हें अमेरिका छोड़ने का दुख हो रहा है मनु.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है. इतने सालों बाद यहां आ रही हूं एडजस्ट करने में कुछ समय लगेगा. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा,’’ इस से ज्यादा उस ने पूरे रास्ते उस से कोई बात नहीं की और अपने ही खयालों में खोई रही.

अपनों से मिल कर मनु खुश थी. उन्हें

भी पर्व से मिल कर अच्छा लगा.

4 दिन साथ रह कर मम्मीपापा वापस चले गए. उन दोनों ने भी यहां की कंपनी में जौब जौइन कर ली. घर पर काम करने के लिए गार्ड ने शांताबाई को भेज दिया था. खाना बनाने के लिए सुशीला आ जाती थी. अमेरिका में यह सब काम उन्हें खुद से करने होते थे. इंडिया आ कर उस पर घर के काम का कोई बो झ नहीं था लेकिन यहां का महौल उसे बहुत ज्यादा पसंद नहीं था. लोग अपने से ज्यादा दूसरों में रुचि दिखाते थे. यह बात उसे हमेशा अखरती थी.

महीनेभर के अंदर सबकुछ ठीक से एडजस्ट हो गया था. पर्व मनु का बहुत खयाल रखता. एक दिन वह बोला, ‘‘मां अपनी बहू को देखने के लिए बहुत बेचैन हैं. हम उन से मिलने कब जा सकते हैं?’’

‘‘मेरी उन से मिलने में कोई रुचि नहीं है.’’

‘‘कोई बात नहीं तुम नहीं जा सकती तो मैं उन्हें यहां बुला लेता हूं.’’

‘‘न मैं वहां जाऊंगी और न वे यहां आएंगी. तुम मेरी शांत जिंदगी में उथलपुथल मत मचाओ पर्व. मु झे यह पसंद नहीं है. तुम चाहो तो उन से मिलने जा सकते हो लेकिन मु झे मजबूर मत करना.’’ कह कर उस ने बात खत्म कर दी.

पर्व उसे ऐसी हालत में कोई तनाव नहीं देना चाहता था. उम्मीद के विपरीत इंडिया आ कर भी मनु ने उस की मां से मिलने में कोई रुचि नहीं दिखाई थी. यह देख कर पर्व को बुरा लगा. यहां आ कर मनु को अपने मम्मीपापा से मिलना मंजूर था लेकिन उस की मां से नहीं. क्या हुआ वे ग्रामीण परिवेश की हैं पर हैं तो उस की मां.

1 हफ्ते बाद पर्व अकेला ही उन से मिलने चला गया. पर्व ने सारी बात मां को सम झा दी. सुन कर उन्हें बुरा तो लगा लेकिन उन के हाथ में कुछ नहीं था. उन्होंने यही सोच कर संतोष कर लिया कि बेटे को जिंदगी में जो खुशियां वे न दे सकीं वे अब मिल रही हैं.

समय से कुछ दिन पहले मनु डिलिवरी के लिए मम्मी के पास चली गई. उस ने नर्सिंगहोम में एक प्यारी बिटिया को जन्म दिया. पर्व उस की खिदमत में लगा था. 2 महीने बाद वह वापस घर आने वाली थी. उसने पर्व को विशेष हिदायत दे दी थी कि परी के घर आने से पहले आया का इंतजाम हो जाना चाहिए. उस के बस का सारा दिन बेबीसिटिंग नहीं है. मायके में उस की मम्मी ने जरूरत के हिसाब से काम वालों का इंतजाम कर रखा था जो परी को आराम से देख लेते थे.

‘‘चिंता मत करो मनु सब हो जाएगा. मैं ने एक एजेंसी से बात की है. वे जल्दी ही हमें एक आया उपलब्ध करा देंगे.’’

‘‘आया का चुनाव सोचसम झ कर करना. दिनभर परी को उन के साथ रहना है.’’

’’ तुम बेफिक्र रहो. परी को ले कर तुम्हें कोई टैंशन नहीं होगी. जहां जरूरत होगी मैं उस काम को देख लूंगा,’’ पर्व बोला.

परी 2 महीने की हो गई थी. मनु की छुट्टी में भी कुछ महीने बाकी थे. पर्व ने आया का

प्रबंध कर लिया. निश्चित तारीख पर परी और मनु घर आ गए. उन के आने से पहले आया घर पर मौजूद थी.

पर्व बोला, ‘‘तुम्हें यहां कोई परेशानी नहीं होगी. रहने का भी ठीक इंतजाम है. बस तुम्हें हमारी परी का खयाल रखना है.’’

‘‘चिंता मत कीजिए मेरी ओर से कोई शिकायत का मौका नहीं मिलेगा बाबूजी. पर मु झे कुछ कहना है.’’

‘‘कहो क्या बात है?’’

‘‘मैं रोज सुबह मंदिर जाती हूं. चाहती हूं मेरा यह क्रम न टूटे. परी के उठने से पहले मैं वापस आ जाया करूंगी. आप को कोई तकलीफ नहीं होगी.’’

‘‘ठीक है मंदिर पास में है तुम वहां जा कर पूजा कर सकती हो.’’

‘‘साल में मु झे 2 हफ्ते की छुट्टी चाहिए ताकि मैं अपने गांव जा कर सब से मिल सकूं,’’ वह हाथ जोड़ कर बोली.

मनु और पर्व ने उस की दोनों शर्तें मान लीं.

‘‘और कुछ कहना है?’’

‘‘हो सके तो मु झे अम्मां कह कर बुलाइएगा. सालों से यही शब्द सुनती आई हूं. गांव में बेटे

की अम्मां थी. उस की देखादेखी सभी अम्मां कहने लगे. अब मु झे यही शब्द सुनने की आदत पड़ गई है.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा शब्द है. इस में अपनापन  झलकता है. हम तुम्हें नाम से नहीं अम्मां कह कर ही बुलाएंगे. अब तुम खुश हो.’’

यह सुन कर उस के चेहरे पर मुसकान तैर गई. पहले दिन से ही अम्मां परी की सेवा में जीजान से जुट गई. यह देख कर मनु को बड़ा सुकून था. घर पर खाना बनाने और साफसफाई के लिए 2 लोग और आ जाते थे. अम्मां का काम केवल परी की देखभाल करना था और वह उस में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी.

कुछ दिन बाद मनु ने भी जौब जौइन कर ली. उसे भी लग रहा था अम्मां भरोसेमंद है. उसे किसी बात का लालच नहीं था. यही उस की सब से बड़ी खूबी थी. मनु ने उस के बारे में कभी कुछ पूछने की जरूरत नहीं सम झी और उस ने भी अपनी ओर से कभी कुछ नहीं कहा. समय गुजर रहा था. परी अब चलने लगी थी. वह भी हर समय अम्मा का पल्लू पकड़े उस के आगेपीछे घूमती रहती. मनु और पर्व उस की ओर से निश्चिंत थे. सालभर में अम्मां मात्र 2 हफ्ते के लिए अपने गांव गई थी. इस दौरान मनु परी को ले कर अपने मायके चली गई. कभी परी की तबीयत खराब हो जाती तो अम्मां सारी रात जाग कर उस के साथ बनी रहती. इस परिवार के साथ जुड़ कर अम्मां अपनी परेशानी भूल गई थी. वह कभी किसी को याद न करती. उस ने अपनी दुनिया इसी घर में बसा ली थी. खाना बनाने वाली शाम को खाना बना कर चली जाती. रात को परी के सो जाने के बाद अकसर अम्मां मनु और पर्व को खाना गरम कर के परोस देती. यह देख कर मनु को बहुत अच्छा लगता.

अम्मां के होते उसे घर पर कोई भी परेशानी नहीं थी. अब उसे लग रहा था पर्व ने

ठीक ही कहा था परी की परवरिश जिस तरह से इंडिया में हो सकती है वैसी वे दोनों मिल कर अमेरिका में नहीं कर सकते. पर्व भी अम्मां का विशेष खयाल रखता. उन के खानेपीने से ले कर हर बात का उसे ध्यान रहता. वह चाहता अम्मां स्वस्थ रहे जिस से परी को कोई परेशानी न हो. बढ़ती गरमी को देखते हुए उस ने अम्मां के कमरे में भी एसी लगा दिया था.

यह देख कर मनु ने थोड़ा ऐतराज जताया, ‘‘अम्मा को इतना सिर पर मत चढ़ाओ. कल वह सोचने लगे उस के बगैर इन का काम नहीं चलता.’’

‘‘इस में सोचने वाली

क्या बात है मनु? मैं और तुम

भी जानती हो अम्मां के बगैर हमारा एक दिन भी काम नहीं चलने वाला. अगर हम उस

का खयाल रखेंगे तो वह भी अपना ज्यादा वक्त हमें दे सकेंगी.’’

यह सुन कर मनु ने आगे बहस करना ठीक नहीं सम झा. अम्मां की वजह से परी की परवरिश बहुत अच्छी हो रही थी. देखते ही देखते वह 4 साल की हो गई. पर्व  ने उसे पास के स्कूल में  डाल दिया. दोपहर में अम्मां उसे स्कूल से भी ले आती. वह उस के साथ ढेर सारी बातें करती.

छुट्टी के दिन कभीकभी मनु की फ्रैंड्स घर पर आ जातीं. अम्मां को देख कर विभा बोली, ‘‘सच मनु तुम्हें परी के लिए बहुत अच्छी केयरटेकर मिल गई.’’

‘‘यह तो तुम ठीक कह रही हो. यह सब पर्व की मेहरबानी है. वही ले कर आया था. रुपए भी ज्यादा नहीं लेती और समय भी पूरा देती है.’’

‘‘उन के परिवार में कोई नहीं है क्या?’’

‘‘मु झे नहीं पता. मैं कभी किसी के साथ ज्यादा नहीं जुड़ती. अम्मां भी अपना काम से

काम रखती है. हमारे बीच ज्यादा बातें नहीं होतीं. परी ही उस के बारे में छोटीछोटी बातें बताती रहती है.’’

मनु की सहेलियों के बीच में अम्मां चर्चा का विषय बनी हुई थी. अम्मां ने अपने काम

से सब का दिल जीत लिया था.

एक दिन विभा ने सुबहसुबह मनु को

फोन किया, ‘‘क्या बात है विभा कुछ परेशान लग रही हो?’’

‘‘तुम तो जानती हो श्रेयस अभी छोटा है. आज अचानक उस की केयरटेकर गांव चली गई. उस के घर में कोई समस्या आ गई थी.’’

‘‘तब तो तुम्हारे लिए परेशानी खड़ी हो गई होगी.’’

‘‘बात ही परेशानी की है. मु झे 2 दिन बाद एक कौन्फ्रैंस में हफ्तेभर के लिए बाहर जाना है. सम झ नहीं आ रहा क्या करूं? विवेक के बस का श्रेयस को देखना नहीं है. क्या तुम 1 हफ्ते के लिए अम्मां को मेरे घर भेज सकती हो. यहां उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी.’’

‘‘लेकिन परी को कौन देखेगा?’’

‘‘वे उसे ले कर सुबह यहां आ जाएं. वह अब बड़ी हो गई है. प्लीज मेरी मदद कर दो. मैं तुम्हारा यह एहसान कभी नहीं भूलूंगी.’’

‘‘ऐसा मत कहो विभा. तुम मेरी बैस्ट फ्रैंड हो. मैं कुछ सोचती हूं. परी तो वहां नहीं आ सकती. उसे स्कूल जाना होता है,’’ मनु बोली. फिर उस ने यह बात पर्व से कही.

‘‘तुम्हें उसी समय मना कर देना चाहिए था  मनु. अम्मा खुद परी को छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी.’’

‘‘विभा की परेशानी भी सम झो.’’

‘‘नौकरी में ऐसी परेशानियां आतीजाती रहती हैं. अच्छा होगा विवेक 1 हफ्ते की छुट्टी ले कर बेटे की देखरेख करें या उसे ले कर विभा के साथ चले जाएं. उन की आउटिंग भी हो जाएगी और समस्या का हल भी निकल जाएगा.’’

‘‘यह मैं उसे कैसे कह सकती हूं.’’

‘‘बात सम झने की कोशिश करो मनु. अम्मां हमारे घर की सदस्य जैसी है. हम उसे दूसरे के घर बेबीसिटिंग के लिए नहीं भेज सकते. सब का अपना स्वाभिमान होता है. उन्हें ज्यादा परेशानी है तो दिन में श्रेयस को यहां छोड़ दें अम्मां परी के साथ उसे भी देख लेगी.’’

मनु को यह ज्यादा ठीक लगा. अगले दिन विभा खुद ही घर चली आई. उसे लगा समस्या का समाधान फोन से नहीं सामने बैठ कर ही निकल सकता है. मनु ने श्रेयस को यहां छोड़ने की बात कही लेकिन वह इस के लिए तैयार नहीं थी.

‘‘वह अभी छोटा है. उस के साथ कई चीजों की जरूरत पड़ती रहती है. विवेक इतना सारा सामान ले कर यहां नहीं आ पाएंगे. प्लीज मेरी मदद करो.’’

विभा बारबार अम्मां को उन के घर भेजने की बात कह रही थी. पर्व से न रहा गया. वह बोला, ‘‘विभा समस्या तुम्हारी है. उस से तुम्हें ही उबरना है. चाहे तो श्रेयस को यहां छोड़ सकती हो लेकिन अम्मां कहीं नहीं जाएगी.’’

यह सुन कर विभा के साथ मनु को भी बुरा लगा. उस के जाने के बाद मनु बोली,

‘‘तुम्हें मेरी बैस्ट फ्रैंड के साथ इस तरह बात नहीं करनी चाहिए थी. क्या सोचेगी वह? तुम चाहते हो एक आया के लिए मैं उस से अपनी दोस्ती तोड़ दूं.’’

‘‘दोस्ती की भी कोई मर्यादा होती है. अम्मां कोई मजदूर नहीं जिसे काम के लिए आज यहां और कल वहां भेज दिया जाए.’’

‘‘तुम्हें अम्मां से इतनी हमदर्दी क्यों है? है तो आया ही. इन्हें कई घरों में काम करने की आदत होती है.’’

‘‘आज तक तुम्हें यह एहसास  ही नहीं हुआ मनु कि एक आया दूसरे के बच्चे के लिए अपना सबकुछ दांव पर नहीं लगाती. वे मेरी मां हैं. मेरी परेशानी देख कर उन से न रहा गया तो तुम्हारे घर पर आया बन कर रहना स्वीकार कर लिया. तुम तो उन से मिलना तक नहीं चाहती थी. मजबूरी में ही सही वे खुद यहां चली आईं.’’

यह सुन कर मनु अवाक रह गई. वह सोच भी नहीं सकती थी कि अम्मां अपने बेटे की खातिर इतना सबकुछ करने के लिए तैयार हो जाएगी.

‘‘अब जब तुम जान ही चुकी हो कि वे मेरी मां हैं तो अब यह तुम पर है कि तुम उन्हें यहां रखना चाहती हो या नहीं. परी इतनी बड़ी हो गई है कि उसे क्रेच में रखा जा सकता है.’’

अम्मां चुपचाप एक किनारे खड़ी उन दोनों की बातें सुन रही थीं. एक आया के रूप में ही सही अपने परिवार के साथ वे संतुष्ट थीं. अचानक आई इस समस्या के कारण मनु के सामने उस की असलियत आ गई थी. उन की बगल में परी खड़ी थी. वह बोली, ‘‘आप मु झे छोड़ कर चली जाओगी?’’

अम्मां ने उस की बात का कोई जवाब नहीं दिया और उसे गोद में उठा कर उसे

चूम लिया. उन्हें उम्मीद थी यह सब जान कर मनु उन्हें यहां रहने की इजाजत नहीं देगी. वे कमरे में आ कर अपना सामान पैक करने लगी थीं. मनु के लिए दुविधा खड़ी हो गई थी. अम्मां के कारण वह परी की ओर से बिलकुल निश्चिंत थी. अगर वे चली गईं तो क्या होगा? जब कभी खाना बनाने वाली बाई नहीं आती तो अम्मां वह काम भी बहुत प्यार से कर देती थीं. यह सब अब उसे सम झ में आ रहा था कि वे इस घर को अपना सम झ कर सबकुछ कर रही थीं और मनु को वह एक आया से ऊपर कभी नहीं दिखाई दी.

कुछ देर बाद अम्मां के कमरे का दरवाजा हौले से खुला. सामने परी खड़ी थी. उस का चेहरा उतरा था.

‘‘परी बिटिया को क्या हुआ?’’

‘‘दादी तुम मु झे छोड़ कर मत जाना. मु झे तुम्हारे बगैर अच्छा नहीं लगेगा. मम्मीपापा दिनभर औफिस में रहते हैं. एक तुम हो जो मेरा इतना खयाल रखती हो.’’

यह सुन कर अम्मा की आंखों में आंसू आ गए. अपनी धोती के कोरों से उन्हें पोंछा और परी को गले लगा लिया. आज पहली बार परी के मुंह से अपने लिए दादी शब्द सुन कर उन के अंदर दबी हुई सारी भावनाएं आंसुओं के रूप में आंखों से बह रही थीं.

सही रिश्ते के रूप में पहचान पा कर वे बड़ी देर तक उसे गले लगा प्यार करती रहीं. यह देख कर दरवाजे पर खड़े मनु और पर्व की आंखें भी सजल हो गईं.

डा. के. रानी 

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