Stories : ‘‘अंकल, मम्मी ने कहा है कि यह कुरता अभी भी टाइट है. आप ठीक कर के रखना, मैं स्कूल से आते हुए ले लूंगी.’’
मास्टरजी ने कुरता अपने पीछे बैठे लड़के पर फेंका, सामने खड़ी लड़की पर एक नजर डाली, दूसरी नजर डालने की उन्हें फुरसत भी नहीं थी. अपने एरिया के सब से होशियार टेलर जो थे मनीषजी, जिन का नाम पड़ गया था, मास्टरजी. नजर तो लड़की पर टिकी थी उस लड़के की जिस पर मास्टरजी ने कुरता फेंका था. उसने जब इस लड़की को देखा, वह पलक झपकना भूल गया. यह कौन है, इतनी सुंदर, परी सी. स्कूल की यूनिफौर्म पहने, 2 चोटियां बनाए, हाथ में चौकलेट, गोरीगोरी, कुछ शरारती सी लग रही है. पहले तो कभी दुकान पर नहीं आई.
लड़की ने भी मास्टरजी के पीछे झांकते लड़के पर नजर डाली और मुसकरा भी दी. लड़का शरमा गया. लड़की को हंसी आ गई.
‘‘बाय अंकल, मम्मी का कुरता तैयार कर के रखना, आते हुए ले लूंगी नहीं तो मम्मी बारबार भेजेंगी.’’
मास्टरजी के हाथ किसी मशीन की तरह चलते रहे. लड़की को पता नहीं क्या सू झा, उस ने कुछ दूर जा कर फिर मुड़ कर देख लिया. लड़का अब खड़ा हो कर उसे देख रहा था. लड़की के देख लेने पर फौरन बैठ गया. लड़की को बड़ा मजा आया. वह कूदतीफांदती स्कूल चली गई.
सर्दियों के दिन थे. लड़की अपने स्कूल पहुंची. सहेलियां बाहर ही मिल गईं. उसी का इंतजार कर रही थीं. इन दिनों स्कूल का टाइम 10 से 4 बजे तक था. सब गर्ल्स स्कूल के अंदर एकसाथ ही जाती थीं. खतौली छोटी जगह थी पर स्कूल का गेट बड़ा. स्कूल में लड़कियां कम, बंदिशें ज्यादा.
बाहर खड़े चौकीदार ने कहा, ‘‘क्यों गौरा आज कहां रह गई थी?’’
‘‘बाबा, मम्मी ने मास्टरजी की दुकान पर भेजा था.’’
‘‘चलो, जल्दी अंदर जाओ, गेट बंद
करना है.’’
बाहर ठेले पर सजी लंबीलंबी, पतलीपतली मूली, खीरे की फांकों और इमली के
टुकड़ों को ललचाई नजरों से देखती सब अंदर चली गई. ठेले वाले को हंसी आ गई. बोला, ‘‘आज देर कर दी न? कल जल्दी आ कर खाना.’’
ये लड़कियां तो उस की नियमित ग्राहक थीं. घर वाले कितना भी सम झा कर, खाना दे कर भेजते, स्कूल के बाहर खड़े इन ठेले वालों के घर इन लड़कियों के चटखारों पर ही चलते. सब की सब एकसाथ कितनी ही फांकें खरीद कर खा जातीं. इस उम्र का भी एक अलग ही मजा है. अपनी जेब के हिसाब से जहां जो जैसा मिला, खा लिया. दोस्तों, सहेलियों के साथ खाने से वैसे भी हर चीज का आनंद बढ़ ही जाता है.
गौरा को स्कूल में ज्यादा बार तो नहीं हां, 1-2 मास्टरजी के पीछे से झांकता वह लड़का याद तो आया पर जैसे यों ही, जैसे कुछ खास बात न हो, फिर अचानक लगता कि नहीं, कुछ तो खास लगा उस का देखना. उसे देखना कुछ अलग से अच्छा सा लगा. मम्मी के साथ पहले भी इस दुकान पर आई थी पर यह लड़का तो कभी नहीं दिखा. कैसा पतलादुबला सा, सांवला सा रंग, शरमाए जा रहा था, पागल.
पूरा दिन लड़कियां पढ़ती रहीं, बातबेबात हंसती रहीं, खातीपीती रहीं, खेलती रहीं.
टीचर्स से डांट खाती रहीं. छुट्टी होने पर अपनाअपना बैग उठा कर स्कूल से निकलीं.
अब गरमगरम समोसे के ठेले तैयार थे. स्कूल
के बाहर खड़े ठेले वाले किसी मनोवैज्ञानिक से कम नहीं होते, मार्केटिंग की पूरी जानकारी होती
है इन्हें. वे दिनभर कहीं भी खड़े रहें, स्कूल की छुट्टी के समय वहां जरूर पहुंच जाते हैं जहां झुंड के झुंड इन पर टूट पड़ते हैं. गौरा और उस की सहेलियों ने 2-2 समोसे खाए, फिर घर की
ओर चलीं.
गौरा ने रास्ते में कहा, ‘‘तुम लोग जाओ, मैं मम्मी का कुरता ले कर जाऊंगी.’’
अंजू ने पूछा, ‘‘मैं साथ आऊं?’’
‘‘नहीं, नहीं, तुम लोग जाओ. ठंड हो रही है,’’ और फिर गौरा अपने कोट की जेब में हाथ डाले जल्दीजल्दी चलने लगी.
मास्टरजी दुकान पर नहीं थे. वही लड़का आ कर काउंटर पर खड़ा हो गया.
गौरा ने कहा, ‘‘अंकल कहां हैं?’’
‘‘मामा तो आराम करने गए हैं.’’
‘‘तुम कौन हो? तुम्हारा नाम क्या है ?’’
‘‘मैं उन का भानजा हूं तभी तो उन्हें मामा कह रहा हूं.’’
‘‘अच्छाअच्छा पर नाम क्या है?’’
‘‘नंदन.’’
‘‘वह चंपक नंदन पराग वाला नंदन?’’ लड़की अपनी ही बात पर खुल कर हंसी.
नंदन को लगा कि वह सही सम झा था कि यह बहुत शरारती है.
‘‘कुरता हो गया?’’
‘‘हां,’’ नंदन ने कुरता सामने निकाल कर एक पेपर में लपेट दिया.
‘‘स्कूल जाते हो?’’
‘‘आजकल तो नहीं.’’
‘‘क्यों?’’
‘‘काम सीख रहा हूं.’’
‘‘कहां से आए हो? पहले तुम्हें कभी
देखा नहीं?’’
‘‘मंसूरपुर से.’’
‘‘अच्छा, चलो, बाय.’’
नंदन ने सिर हिला दिया. दोनों एकदूसरे को एक लगाव से देख रहे थे. दोनों ने
महसूस किया कि ये उन की आम नजरें नहीं हैं, इन निगाहों में कुछ खास सा दिख रहा है. गौरा का मन हुआ कि वह नंदन से अभी और बातें करे. नंदन का भी मन हुआ कि वह गौरा से ढेर सारी बातें करे. उस से उस के स्कूल के बारे में बहुत कुछ पूछे. पर दोनों चुप रहे. मुसकराते रहे. गौरा चली गई. नंदन कपड़ों पर तुरपाई करने बैठ गया.
गौरा फिर आ कर काउंटर पर बोली, ‘‘चौकलेट खाओगे?’’
नंदन अचानक आई आवाज से हड़बड़ा गया. गौरा जोर से हंसी, ‘‘बहुत डरपोक हो. लो, खा लो पर मैं ने आधी खा रखी है.’’
नंदन ने चौकलेट ले ली और हंस दिया. 14 साल के नंदन और 13 साल की गौरा के लिए जीवन का यह पहला मधुर भाव था जिस ने दोनों के दिलों को एक उमंग से भर दिया. गौरा फिर सचमुच घर चली गई.
घर आ कर गौरा अपनी मम्मी के रोज पूछे जाने वाले सवालों के जवाब देते हुए नंदन के बारे में सोचने लगी, अच्छा है नंदन, कैसी प्यारी सूरत है, सीधा सा लगता है. अब कैसे दोबारा देखूंगी उसे? कैसे जाऊंगी फिर मास्टरजी की दुकान पर.
गौरा रोज की तरह अपना दिन बिता कर सो गई. उस के पापा हरीश
एक सरकारी कर्मचारी थे, मम्मी गीता घरगृहस्थी देखतीं और उस में खुश रहतीं. छोटा परिवार था. यह दिसंबर का महीना था, कुहरे की सुबहें थीं.
अगले दिन जब गौरा स्कूल के लिए निकली, उसे लगा कोई सड़क के किनारे खड़ा हुआ है और अब उस के पीछेपीछे चलने लगा है, वह डरी और भाग पड़ी. पीछे से जोर की हंसी के साथ आवाज आई, ‘‘डरपोक तो तुम भी हो.’’
गौरा ने आवाज पहचानी, रुकी, मुड़ कर देखा, एक आम से स्वैटर
की जेबों में हाथ डाले नंदन खड़ा हंस रहा था.
‘‘तुम तो बड़े शैतान हो. बस शकल से ही सीधे लगते हो. डरा दिया मु झे,’’ सीने पर हाथ रखे बोलती हुई गौरा नंदन को बड़ी प्यारी लगी.
‘‘यहां क्या कर रहे हो?’’
‘‘मामा रोज कहते हैं कि सुबह थोड़ा टहल कर आया करो तो आज आ गया.’’
‘‘अब रोज आया करोगे?’’
नंदन झेंपा, ‘‘आ जाया करूं?’’
‘‘हां,’’ गौरा भी हंस दी.
‘‘तुम्हारे पास फोन है?’’
‘‘अभी नहीं, तुम्हारे पास?’’
‘‘नहीं.’’
‘‘मेरे घर का रास्ता कैसे पता चला?’’
‘‘कल जब तुम कुरता ले कर दुकान से चली, मामा ने तुम्हारे पड़ोस का पता बता कर किसी के घर कपडे़ देने भेजा था. मैं तुम्हारे काफी पीछेपीछे ही चल रहा था. तुम अपने घर में घुसी तो पता चल गया था.’’
‘‘बड़े होशियार हो.’’
नंदन फिर झेंप गया.
‘‘तुम शरमाते बहुत हो न?’’
नंदन फिर हंस दिया. अब गौरा के साथ जाने वाली उस की सहेली अंजू का घर आने वाला था, उस ने कहा, ‘‘अब तुम जाओ, अंजू अपने घर के बाहर खड़ी होगी.’’
नंदन, ‘‘अच्छा,’’ कह कर उलटा मुड़ गया.
अंजू बाहर ही खड़ी थी. गौरा ने उसे नंदन के बारे में कुछ नहीं बताया. लड़कियां पता
नहीं कैसे यह सम झने लगती हैं कि यह बात उन्हें अपने दिल में ही रखनी चाहिए या कब किसी को बता देनी चाहिए. लड़कियों के दिल में शायद कई चैंबर्स होते हैं, जिन में अलगअलग बातें छिपी होती हैं. यह ताउम्र चलता है. गौरा देखने में तो अंजू से रोज की तरह बातें कर रही थी पर अब उस का पूरा ध्यान नंदन में था. आज तो वह उसे और अच्छा लगा था.
स्कूल पहुंच कर गौरा ने सब सहेलियों के साथ खीरे की फांकें खाईं, मूंगफली खरीदी. फिर पूरा दिन उस के मन में यही चलता रहा कि नंदन अब रोज आएगा तो कितना अच्छा लगेगा. पर किसी ने उसे नंदन से इस तरह बातें करते देख लिया तो क्या उस की शिकायत मम्मीपापा से कर देगा? क्या उसे बहुत डांट पड़ेगी? थोड़े दिन पहले पड़ोस की नीता आंटी ने नीलू दीदी को किसी लड़के से बातें करते देख लिया था तो दीदी को तो मार भी पड़ी थी. पूरा दिन गौरा के मन में यही सब चलता रहा. सहेलियों को नंदन के बारे में बताने के लिए छटपटाती रही पर फिर इस बारे में मुंह बंद ही रखा.
शाम को स्कूल की छुट्टी के समय उस ने सोचा कि अभी नंदन दुकान पर अकेला होगा, उसी तरफ से उस से मिलते हुए चली जाऊंगी पर अंजू का क्या करे. यह तो पूछपूछ कर नाक में दम कर देगी कि उधर से क्यों जाना है. कोई काम भी नहीं है. वह फिर चुपचाप अंजू के साथ घर ही आ गई. सोचा कि सुबह तो नंदन आएगा ही.
आज नंदन ने भी मास्टरजी से कई बार स्नेह भरी डांट खाई थी जब दिनभर वह गौरा के बारे में सोचता रहा और उस के हाथ में सुई चुभती रही. बटन लगाने में आज सफाई नहीं थी, बड़ाबड़ा कच्चा कर दिया था, तुरपाई रोज की तरह नहीं थी. 2 किशोर मन अपनीअपनी दुनिया में कोमल भावों का स्वाद लिए कहीं खोए से ही रहे थे. कुछ सम झ नहीं आ रहा था कि अब क्या होगा, क्या करें.
अगल सुबह गौरा फिर घर से निकली तो कुहरे में
किसी को तलाशती उस की नजरें एक जगह रुकीं तो उस के चेहरे पर एक चमक आ गई. नंदन चुपचाप उस के साथ चलने लगा. फिर कुछ दूर जा कर अपनी जेब से कुछ निकाला, ‘‘गौरा, यह तेरे लिए.’’
‘‘क्या है?’’
‘‘मैं ने बनाया, देख.’’
गौरा ने देखा, रंगबिरंगे कपड़ों से बनाया हुआ एक खूबसूरत रिबन था, ‘‘यह तो बहुत अलग और सुंदर है.’’
‘‘हां, मैं ने मामा की दुकान पर रखी हुई कतरनों से यह तब बनाया जब वे खाना खाने गए हुए थे. तु झे अच्छा लगा?’’
‘‘हां, बहुत. थैंक यू.’’
‘‘और बनाऊंगा.’’
‘‘हां, बनाना, बहुत सुंदर है.’’
दोनों बातें करते चलते रहे. अपने दोस्तों की, घर की, स्कूल की, मास्टरजी की.
अब यह रोज का नियम हो गया. नंदन रोज उस के लिए मामा की दुकान से बची हुई कतरनों से एक सुंदर सा रिबन बना लाता. गौरा उसे अपनी चौकलेट में से आधी जरूर देती. नंदन ने उसे बताया था कि उसे चौकलेट बहुत पसंद है पर उस के पास इतने पैसे नहीं रहते हैं कि वह खरीद कर खा सके. गौरा घर जा कर नंदन के दिए रिबन अपनी किताबों के नीचे छिपा कर रख देती. पर वह मां ही क्या जो कभी अपने बच्चों की अलमारी पर नजर न डाले तो गौरा के रंगबिरंगे रिबन भी कब तक गीता की नजर से छिपे रह सकते थे. गौरा का सामान उलटपुलट कर देखते हुए गीता को जैसे एक करंट सा लगा, ये सब रिबन गौरा ने कब खरीदे और मु झे क्यों नहीं दिखाए, न कुछ बताया. जरूर किसी लड़के ने दिए होंगे. गुस्से में उस का चेहरा तनता चला जा रहा था ठीक वैसे ही जैसे हर मां का बेटी की ऐसी चोरी पकड़ कर तनता है.
शाम तक तो गीता पता नहीं क्याक्या सोचने लगी थी, यह जरूर किसी लड़के का
चक्कर है, नहीं तो बताती जरूर. पता नहीं क्या कर रही है, कुछ उलटासीधा तो नहीं कर रही है. सारा दिन गीता ने एक पल चैन नहीं लिया. मन तो हो रहा था कि स्कूल पहुंच कर रंगे हाथ पकड़े. पर उस ने दिल पर पत्थर रख कर गौरा के आने का इंतजार किया.
शाम गौरा लौटी, मां की नजरें जैसे एक कोतवाल की नजरें बन गईं. गौरा को ऊपर से नीचे तक देखा, थका चेहरा, रोज की तरह चोटी के ढीले पड़ते रिबन. भोला सा चेहरा देख कलेजा मोम सा हो आया, फिर रिबन याद आ गए.
उधर गौरा मां से लिपट गई, ‘‘मम्मी, बहुत भूख लगी है. आज बहुत खेले, थक गई.’’
अब कौन मां पहले डांटती, फिर खाना देती. गीता मन ही मन कलपते हुए किचन में चली गई. तब तक गौरा हाथमुंह धो कर कपड़े बदल कर बिस्तर पर पसर चुकी थी.
गीता कुछ फल काट कर लाई, गौरा के हाथ में प्लेट दी, फल देख कर गौरा ठुनकी पर मां का मूड किसी बात पर बहुत खराब है, सम झ गई थी, चुपचाप खाने लगी. फिर पूछ लिया, ‘‘मम्मी. तबीयत ठीक है न?’’
सीधा तोप चली, ‘‘तुम्हारे पास इतने रिबन कहां से आए? किस ने दिए?’’
गौरा जैसी उम्र में दिमाग बहुत तेजी से चलता है. फल खाते हुए बोली, ‘‘मम्मी, क्लास की एक लड़की रेनू की बहन यह सब बनाती रहती है, वह मेरी अच्छी सहेली है, वही मु झे देती है.’’
‘‘मु झे क्यों नहीं दिखाए?’’
‘‘याद नहीं रहा होगा, मम्मी. आप को अच्छे लगे? मु झे तो पसंद नहीं आए, बस शायद इसलिए आप को बताना भूल गई होगी.’’
गीता को लगा, वही मूर्ख है, सुबह से पता नहीं क्याक्या सोचे जा रही थी. बेटियों की मांएं अपना आधा समय तो यही सब सोचने में बिता देती हैं. गौरा मन ही मन अपनेआप को शाबाशी दे रही थी.
अगली सुबह गौरा ने नंदन को यह किस्सा बताया. दोनों खूब हंसे. इस बात से डरे नहीं, मिलते रहे. किशोर प्रेम ज्यादा सोचने में विश्वास नहीं करता. यह प्रेम बस इन पलों को जी रहा होता है.
ऐसे ही दिन बीतते रहे. धीरेधीरे कुहरा छंटने लगा, सर्दियां कम हो गईं तो सुबह लोगों की आवाजाही बढ़ने लगी. दोनों को अब एकदूसरे से काफी लगाव हो गया था. यह किशोरावस्था का आकर्षण था. लगाव था या दोस्ती, इस के बारे में दोनों सोच भी नहीं रहे थे. बस दोनों को एकदूसरे के साथ बातें करते हुए, हंसते हुए साथ चलना अच्छा लगता था, बस यही जानते थे. अब रास्ते में और लोग मिलते तो दोनों दूरदूर चलने लगते. गौरा परिचितों को नमस्ते करते हुए आगे बढ़ जाती.
एक सुबह नंदन गौरा के साथ चलता हुआ चुप सा था. गौरा ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’
‘‘कल मामा ने बहुत डांटा.’’
‘‘क्यों?’’
‘‘मैं तुम्हारे बारे में सोच रहा था, काम में मन नहीं लग रहा था. मामा गुस्सा हुए कि मेरा ध्यान पता नहीं आजकल कहां रहता है और
फिर कतरनें ढूंढ़ने लगे. उन्हें कुछ काम था, नहीं मिलीं तो मु झे डांटने लगे कि मैं कुछ ठीक से नहीं रखता हूं.’’
‘‘तो फिर तू अब मेरे लिए रिबन नहीं लाएगा?’’
‘‘अरे, लाऊंगा. तु झे रिबन की पड़ी है, मु झे कल पहली बार डांट पड़ी,’’ कहताकहता नंदन हंस दिया.
गौरा भी हंसने लगी. फिर बोली, ‘‘ये बड़े लोग किसी भी बात पर गुस्सा हो जाते हैं न?’’
‘‘हां,’’ नंदन को उस की बातों पर हंसी ही आती थी.
एक दिन अंजू ने बताया, ‘‘गौरा, मैं मम्मीपापा के साथ एक शादी में 2 दिनों के लिए बाहर जा रही हूं, आऊंगी तो मु झे अपनी स्कूल की कौपी देना.’’
गौरा खुश हो गई. उस ने अगली सुबह नंदन से कहा, ‘‘अंजू बाहर जा रही है, मैं आज छुट्टी के बाद दुकान पर आती हूं.’’
नंदन भी खुश हुआ.
‘‘अब तू कल यहां मत आना, दुकान पर ही मिल लेंगे.’’
‘‘हां, ठीक है.’’
अगले दिन छुट्टी के बाद गौरा मास्टरजी की दुकान पर खुशीखुशी पहुंची, फौरन बैग में हाथ डाला, ‘‘ले चौकलेट, आज पूरी लाई, सुमन ने दी थी.’’ कहतेकहते उस की नजर नंदन के चेहरे पर पड़ी, ‘‘क्या हुआ? मामा ने डांटा क्या?’’
‘‘नहीं गौरा, अभी जब मामा आ जाएंगे तो मैं वापस घर जा रहा हूं, पिताजी ने बुलाया है, उन की तबीयत ठीक नहीं है. उन की दुकान का काम देखना है.’’
‘‘उफ, फिर कब आएगा?’’
‘‘पता नहीं. आऊंगा भी कि नहीं, यह भी नहीं पता. देख, मैं ने तेरे लिए आज कितने सारे रिबन बनाए हैं,’’ गौरा के हाथ में सारे रिबन दे कर वह उसे देखने लगा.
‘‘ठीक है, फिर कभी आएगा तो मिल
लेंगे. चल, अब मैं भी चलती हूं, मम्मी इंतजार कर रही होंगी. बाय,’’ कहते हुए उसने सारे रिबन अपने बैग में डाले और दुकान की सीढि़यां उतर गई. कुछ दूर चल कर पीछे मुड़ कर देखा, नंदन उसे ही देख रहा था, हर तरफ देखते हुए उसने गौरा को हाथ उठा कर बाय का इशारा किया. दोनों को पता नहीं था कि वे कभी आगे मिलें
न मिलें, पर ये चौकलेट और रिबन की यादें हमेशा उन के होंठों पर एक प्यारी मुसकराहट जरूर लाने वाली थीं.
