Online Story : बालकनी से कमरे में आ कर मैं धम्म से बिस्तर पर बैठ गई और सुबकसुबक कर रोने लगी. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि बालकनी में खड़ी हो अपने गीले बाल सुखाने में मैं ने कौन सा अपराध कर दिया जिस से दाता हुक्म (ससुरजी) इतना गुस्सा हो उठे. मुझे अपना बचपन याद आने लगा. जब होस्टल से मैं घर आती थी तो हिरण की तरह खेतों में कुलाचें भरती रहती थी. सहेलियों का झुंड हमेशा मुझे घेरे रहता था. गांव की लड़की शहर के होस्टल में रह कर पढ़ाई कर रही है तो शहर की कई बातें होंगी और यही सहेलियों के कौतुहल का कारण था.

मेरे भैयाभाभी भी कितने प्यारे हैं और कितना प्यार करती हैं भाभी मुझे. कभी भाभी ने मां की कमी महसूस नहीं होने दी. यहां आ कर मुझे क्या मिला? न घर, न किसी का स्नेह और न ही आजादी का एक लम्हा. हां, अगर सोनेचांदी के ढेर को स्नेह कहते हैं तो वह यहां बहुत है, लेकिन क्या इन बेजार चीजों से मन का सुख पाया जा सकता है? अगर हां, तो मैं बहुत सुखी हूं. सोने के पिंजरे में पंछी की तरह पंख फड़फड़ा कर अपनी बेबसी पर आंसू बहाने से ज्यादा मैं कुछ नहीं कर सकती.

पति नाम का जीव जो मुझे ब्याह कर लाया, उस के दर्शन आधी रात के बाद होते हैं तो दूसरों को मैं क्या कहूं. पता नहीं किस बुरी घड़ी में महेंद्र की नजर मुझ पर पड़ गई और वह मुझे सोने के पिंजरे में बंद कर लाया.

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