Social Story : रात्रि की कालिमा पूरे वातावरण में गहरा रही थी. एक गहरा सन्नाटा पसरता जा रहा था. कभीकभी झींगुरों की आवाज से रात्रि की नीरवता भंग हो रही थी.
लोग इस समय अपने घरों में खापी कर कब के निद्रादेवी के आगोश में मीठे सपनों का आनंद ले रहे थे.
अभी तो वैसे भी चीन के वुहान शहर से निकल कर फैलने वाला वाइरस कोरोना सारे विश्व को अपनी चपेट में लेने के साथ ही पूरे भारत में भी तेजी से फैल कर लोगों को संक्रमित कर रहा था.
लोग संक्रमित हो कर भारी संख्या में मौत के मुंह में जा रहे थे. पर भारत सरकार ने इसे रोकने के लिए सभी प्रदेशों को लौकडाउन कर दिया था.
लोग अपनेअपने घरों में बंद हो गए थे, लोगों से दूरी बना ली गई थी.
बाबू ब्रजकिशोर की आंखों की नींद बुलाने से भी नहीं आ रही थी. आज उन की आंखों पर से जातिपाति, धर्म का झूठा आवरण दूर हो चुका था.
उन्हें पता चल चुका था कि वह भी उम्र के 7वें दशक में कि इंसान की जाति उस का कर्म तथा इंसानियत उस का धर्म होता है. आज उन की छोटी बहू और बेटे ने असली धर्म का उदाहरण दे कर उन के सामाजिक अंधविश्वास के नकाब को हटा दिया था.
ब्रजकिशोरजी अपनी नासम झी पर बारबार पछता रहे थे. उन्हें वे दिन याद आ रहे थे, जब उन के छोटे पुत्र ने उन के खिलाफ जा कर सोनिया से शादी कर के अपनी जिंदगी का एक अहम फैसला खुद लिया था और संस्कारों की दुहाई दे कर जिस बड़ी बहू को धूमधाम से ब्याह कर लाए थे, खानदानी और कुलीन ब्राह्मण के घर की बेटी कह कर बारबार गर्वित होते रहे थे. उस ने कितने ओछे संस्कारों का परिचय दिया, जिस को इंसानियत के नाम पर कलंक ही कहा जाएगा. वे अपने अतीत को न चाहते हुए भी सोचने पर मजबूर हो गए थे. उन का दिमाग अतीत के गलियारे में दौड़ लगाने लगा था…
बाबू ब्रजकिशोर ने रेलवे में एक क्लर्क की नौकरी से अपने जीवन की शुरुआत की थी. उन की पत्नी दुर्गा देवी एक धार्मिक लेकिन बहुत कम पढ़ीलिखी महिला थीं.
उन के एक बेटे अमर के होने के बाद एक और बेटे की चाह में 1-1 कर के 5 बेटियां हो गई थीं- सुमन, गीता, रेखा, पूनम और मंजू फिर सब से बाद में एक बेटा आलोक का जन्म हुआ था.
अब एक क्लर्क के लिए इतनी सारी संतानों का पालनपोषण, पढ़ाईलिखाई एक बहुत बड़ी समस्या थी. लड़कियों की तो उन्होंने पढ़ाईलिखाई की चिंता ही नहीं की. किसी तरह जैसेजैसे वे थोड़ीबड़ी होती गई उन के छोटी उम्र में ही ब्याह कर दिए गए.
उन के विचार से लड़कियों को ज्यादा पढ़नेलिखाने का मतलब उन से ज्यादा पढ़ालिखा लड़का खोजना पड़ेगा और अधिक से अधिक दहेज देना पड़ेगा और वे दहेज कहां से जुटाएंगे.
वे लड़कियों को बो झ से ज्यादा कुछ नहीं सम झते थे. किसी तरह घरगृहस्थी के कामों को सिखा कर नाबालिग ही में उन के विवाह उन्होंने कर दिए थे.
सारा खर्चा विशेष रूप से बड़े बेटे अमर पर किया क्योंकि बड़ा पुत्र होने के नाते कुछ बन जाएगा तो मातापिता और छोटे भाई और बहनों की जिम्मेदारी को संभालेगा.
बड़ा बेटा अमर इलाहाबाद में एक नामी कंपनी में इंजीनियर बन भी गया. उन्होंने अमर की शादी भी काफी धूमधाम से अपने परिचित आनंद की बेटी नीलिमा से कर दिया थी.
दुर्गा देवी भी गठिया की मरीज थी. उन से अब घर का काम नहीं हो पा रहा था. बेटियां अपनेअपने घर चली गई थीं. दुर्गा देवी ने सोचा, शायद बड़ी बहू आ जाएगी तो बो झ हलका हो जाएगा. लेकिन बड़ी बहू ने बो झ हलका क्या किया बल्कि बो झ को और भारी कर दिया था. सो कर कर 8 बजे उठती और चाय की फरमाइश करती, खाना बनाना तो दूर की बात थी. कभी रसोईघर में झांकना तक उसे गवारा नहीं था.
दिनभर काम कर के दुर्गा देवी थक जाती थीं. कुछ कहने पर जोरजोर से लड़ने लगती थी. दहेज के केस में फंसाने की धमकी देती थी. देवर आलोक को तो फूटी आंखों से देखना भी पसंद नहीं करती थी.
अमर तो इलाहाबाद से छुट्टियों में आता तो दिनभर सासससुर, देवर के खिलाफ उस के कान भरती रहती थीं. ननदों का तो मायका आना लगभग बंद हो चुका था.
छोटी ननद मंजू एक बार अपने पति के साथ आई थी अपनी मां से मिलने के लिए. लेकिन नीलिमा ने बेवजह इतना अपमान किया कि वह आंखों में आंसू लिए ससुराल गई तो फिर कभी न लौट के मायके की देहरी पर आई.
अब बाबू ब्रजकिशोर रिटायर्ड हो चुके थे. उन्होंने रिटायरमैंट के पैसों से बनारस में ही मकान बनवा लिया था.
नीलिमा ने अमर पर अपने साथ रहने
का दबाव बनाया तो अमर को उसे साथ मे ले
कर इलाहाबाद जाना ही पड़ा क्योंकि उस के झगड़ालू स्वभाव से सभी गम खाते थे और
फिर आलोक ने भी अपनी पढ़ाई पूरी कर ली. वह एक गणित का प्रोफैसर था और संयोगवश उस की नियुक्ति भी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हो गई थी. तभी एक हादसा हो गया. खाना बनाते वक्त दुर्गा देवी जल गईं. हुआ यह कि दुर्गा देवी दूध गरम कर रही थी और कुछ विचारों में खोई हुई थी.
अचानक दूध उफन कर गिरने लगा और वे अपनी साड़ी के पल्लू से
दूध उतारने लगी.
बस इतने में आग ने जोर पकड़ लिया. आलोक कालेज गया हुआ जैसे ही उन की चिल्लाहट की आवाज ब्रजकिशोर बाबू के कानों में पड़ी, वे अपने कमरे से तेजी से दौड़े आए. लेकिन आग ने साड़ी को पूरी तरह से अपनी चपेट में ले लिया था.
आग की तपन और जलन से दुर्गा देवी बेहोश हो गईं. विधि का विधान आज तक भला कौन मिटा पाया? अस्पताल ले जाते समय ही उन की सांसें बंद हो गईं. अब तो बाबू ब्रज किशोर बाबू जिंदगी के सफर में अकेले हो गए. जब उन्होंने छोटे बेटे आलोक को रोते देखा तो वे भी बिलखने लगे कि दुर्गा… तुम ने भी मेरा साथ छोड़ दिया अब जिंदगी अकेले कैसे कटेगी? तब आलोक ने किसी तरह उन को धीरज बंधाया था.
दुर्गा देवी के अंतिम संस्कार और क्रियाकर्म हो जाने के बाद उन के पुत्र अमर ने उन्हें अपने साथ इलाहाबाद चलने को कहा पर उन्हें आलोक को अकेला छोड़ना उन्होंने मंजूर नहीं था.
अब ब्रजकिशोर बाबू ने खाना बनाने के लिए एक नौकर रख लिया था. सुबह का खाना खुद बनाते तथा बेटे का टिफिन भी खुद तैयार करते थे.
एक दिन आलोक का रिश्ता बहुत ही अच्छे और संपन्न घर से आया और लड़की वगरैह भी उन्होंने बिना आलोक को बताए ही देख ली.
ब्रजकिशोर बाबू ने आलोक का रिश्ता पक्का कर के तब आलोक को बताया, ‘‘बेटा, मैं ने तुम्हारा रिश्ता सोमेश्वर की बेटी से पक्का कर दिया है.’’
अब आश्चर्य की बारी आलोक की थी, ‘‘पापा, आप ने एक बार भी मु झ से पूछना उचित नहीं सम झा. मैं किसी भी अपरिचित लड़की से शादी नहीं करूंगा चाहे आप जो भी कर लीजिए. मैं अपने कालेज में इंगलिश पढ़ाने वाली एक लड़की सोनिया से शादी करूंगा क्योंकि वह मु झे पसंद है.’’
बाबू ब्रजकिशोर गुस्से में थरथर कांपने लगे और बोले, ‘‘तेरी इतनी हिम्मत, क्या मैं ने इसीलिए पढ़ायालिखाया था कि तू मेरा धर्म, जाति सब डुबे देगा? एक ईसाई लड़की से शादी कर के तू मेरा धर्म और इज्जत मिट्टी में मिलाएगा? जो करना है करो लेकिन अभी के अभी मेरे घर से निकल जाओ.’’
उस समय रात के 7 बज रहे थे. अपना सारा सामान ले कर आलोक घर से निकल
गया और अपने कुलीग अभिषेक जो उस के दोस्त, हमराज सबकुछ थे.
उसी के यहां आलोक रात में रुक गया. सुबह कोर्ट जा कर उस ने सोनिया से कोर्ट मैरिज कर के उसी के क्वार्टर में शिफ्ट हो गया.
उन के बड़े बेटेबहू ने भी सुना तो आलोक को आड़े हाथों ही नहीं लिया बल्कि ब्रजकिशोर बाबू को और भड़काया तथा उन का मकान और बाकी संपत्ति से आलोक को बेदखल करवा दिया.
ब्रजकिशोरजी भी अभी गुस्से में थे. अत: जो बड़े बेटेबहू ने कहा वे करते गए. सारी संपत्ति बड़े बेटेबहू के नाम कर दी, लड़कियों की भी याद उन्हें नहीं आई.
अब बाबू ब्रजकिशोरजी की दुर्दशा उसी दिन से आरंभ हो गई. वे अब बड़े बेटेबहू के
पास रहने आ गए और इसी बीच नीलिमा को बेटा हुआ. फिर अपनी बेटी की देखरेख करने उस के मम्मीपापा आए. अब बाबू ब्रजकिशोरजी को एक कप चाय के लिए भी कोई नहीं पूछता.
नीलिमा के पिता आंनद तो एक अच्छे व्यक्ति थे पर मां उमा देवी एक बहुत चालाक, धूर्त और स्वार्थी महिला थी. अपनी बेटी की परिवरिश भी अपने ही जैसी की थी.
न उन्हें समय से भोजन दिया जाता था न खाना. ब्रजकिशोर के बेटे अमर सुबह ड्यूटी पर चले जाते और शाम को घर आते. ब्रजकिशोर बेटे के आने पर उस को थका हुआ देख कर पुत्रमोह में कुछ नहीं कह पाते.
आनंद और उन की पत्नी उमा देवी के भोजन कर लेने के बाद उन के लिए अलग से सिर्फ एक सब्जी तथा 4 रोटिया परोस कर नीलिमा द्वारा परोस दी जाती और फिर दोबारा पूछने नहीं आती. अगर नीलिमा के पिता
आंनद ब्रजकिशोरजी से खाने को कुछ पूछते तो नीलिमा कहती, ‘‘पापाजी ने तो कब का खाना खा लिया है.’’
3 महीने बाद आंनद और उमा देवी चले गए. अब सुबहसुबह ब्रजकिशोरजी टहलने निकल
जाते थे. जब लौट कर घर आते तो बहू को आवाज देते चाय के लिए तो नीलिमा कभी कहती, ‘‘पापाजी आप खुद बना लीजिए मैं अपने बच्चे को सुला रही हूं या मेरे पास आप के लिए चाय बनाने की फुरसत नहीं है.
कभी सुबहसुबह सब्जी का झोला पकड़ा देती थी, कभी नौकरानी नहीं आई तो झाड़ू पकड़ा देती थी. कभी ढेर सारे बरतन सिंक में डाल कर धोने को कहती. अब उन्हें अपना महत्त्व एक नौकर से भी बदतर लगने लगा था. अब उन्हें नीलिमा और बड़े बेटे की चालाकी से मकान और सारी जायदाद अपने नाम कराने की साजिश सम झ में आ गई.
एक दिन ब्रजकिशोर बाबू बाजार से सब्जी ले कर घर के दरवाजे पर पहुंचते ही बेहोश हो कर गिर पड़े. उन की बगल के पड़ोसी बाबूलालजी जो दरवाजे पर खड़े थे
उन्होंने उन्हें गिरते हुए देख लिया और जल्दी से संभाल लिया.
बाबूलालजी ने उन्हें बिस्तर पर लिटाया और फिर डाक्टर को फोन किया. डाक्टर ने चैक कर के देखा तो उन का रक्तचाप काफी कम था, शरीर में खून की कमी थी. वे जरूरी दवाइयां लिख कर उन्हें सख्त हिदायत देते हुए बोले कि इन को अभी दूधफल और दवाइयां समय पर नहीं गया तो जान को खतरा हो सकता है.
नीलिमा ने अमर को इस बात की खबर भी नहीं दी. शाम को अमर घर आया और पिताजी को लेटे देखा तो पूछा, ‘‘पापा, क्या आप की तबीयत ठीक नहीं है?’’
उन के कुछ कहने से पहले ही नीलिमा बोल पड़ी, ‘‘आप के पापा ने तो नाक में दम कर रखा है बिना खाना बाजार जाने की क्या जरूरत थी?’’
फिर आंखों में नकली आंसू भर कर बोली, ‘‘दिनभर इधरउधर घूमते रहते हैं क्योंकि मेरी बदनामी जो करानी है.’’
अब ब्रजकिशोरजी के पास कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी. इस तिरियाचरित्तर को देख कर वे अचंभित रह गए थे पर बेटे की लापरवाही उन्हें अंदर तक चीर गई और बहुत धक्का लगा कि आखिर अमर तो उन का अपना सगा बेटा है. एक बार खुद से भी तो अमर मेरे बारे में डाक्टर से जानकारी ले सकता था. उन्होंने मन ही मन कुछ सोचा और निर्णय लिया और सुबह थोड़ी राहत महसूस की. उन्होंने अपनी पौकेट डायरी से खोज कर आलोक का नंबर लगाया जिसे वे अपने मोबाइल से गुस्से में ब्लौक कर चुके थे.
उधर से आवाज आई, ‘‘हैलो अरे पापा आप? आप कैसे हैं और कहां हैं?’’
आलोक की आवाज सुनते ही बज्रकिशोरजी का धैर्य टूट गया. वे भरभरा कर रो पड़े, ‘‘बेटा, मु झे माफ कर दो, मैं ने अपने पुरातन विचारों
और धर्मजाति के भेदभाव में जकड़ कर तुम्हें सम झने में भूल कर दी.’’ और फिर बेटे कोे सारी बातें बता दी.
कुछ ही घंटों में आलोक फ्लाइट से इलाहाबाद आया और पापा को देखते ही उन्हें गले लगा लिया और रो पड़ा, ‘‘पापा मैं आप को अपने से कभी दूर नहीं जाने दूंगा.’’
बनारस बाबतपुर हवाईअड्डे पर उन के स्वागत में उन की पांचों बेटियां दामादों के साथ खड़ी थीं और साथ में उन की खूबसूरत प्रोफैसर बहू डाक्टर सोनिया भी बड़ी बेसब्री से उन के स्वागत का इंतजार कर रही थी.
बड़ी श्रद्धा से सोनिया उन के पांव छू कर गले मिली जिस से अब ब्रिजकिशोरजी का मन खुशी से भावविभोर हो उठा.
उन की पांचों बेटियों को भी सोनिया बहुत आदरसम्मान तथा प्यार देती, जिस से उस की पांचों ननदें सुमन, गीता, रेखा, पूनमऔर मंजू सभी सोनिया को बहुत प्यार और सम्मान करतीं.
अचानक इलाहाबाद से ब्रजकिशोरजी के आते ही घर में खुशियों का माहौल छा गया था. सोनिया ब्रजकिशोरजी को गाजर, चुकंदर, टमाटर इत्यादि का सूप देती तो कभी फल काट कर देती. कभी अनार मौसमी का जूस तैयार कर के देती. सोनिया की सेवा से वे गदगद हो चुके थे. अब वे पूरी तरह स्वस्थ हो चुके थे लेकिन लौकडाउन के कारण सारे संस्थान बंद हो गए थे. पूरा दिन वे घर में खाट पर पड़े टैलीविजन देखते और बहूबेटे के साथ बातचीत करते रहते.
लौकडाउन की वजह से दोनों बहूबेटे सोनिया और आलोक घर मे ही रहते थे. सोनिया कभी ब्रजकिशोरजी के साथ कैरम खेलती तो कभी शतरंज की बिसात बिछा लेती थी. उन का मन अपने बेटे आलोक की पारखी नजरों का कायल हो चुका था, जिस ने सोनिया जैसे हीरे की परख कर ली नहीं तो उन की जिंदगी पटरी पर कभी नहीं आती या वे जिंदा भी होते या नहीं ये कोई नहीं जानता था.
सोनिया चूंकि एक अनाथ लड़की थी
और अनाथालय में पली थी, जिस से बाबू ब्रजकिशोरजी में उसे अपने पिता की झलक दिखती थी क्योंकि अब सोनिया अनाथ नहीं थी, उसे ब्रजकिशोरजी पिता के रूप में मिल चुके थे.
राइटर : शशिलता पांडेय
